सोमवार, 31 जनवरी 2011

मूल अधिकार

    मानव जीवन में अधिकारों का बहुत महत्व है ओर यदि वे देश के सर्वोच्च कानून ''संविधान ''द्वारा   मिले हों तो उनका महत्व कई गुना बढ़ जाता है. संविधान के भाग ३ को भारत का अधिकार पत्र [megna carta ]कहा जाता है .[megna carta ] इसलिए कि ये इंग्लेंड के संविधान से ग्रहण किये गए हैं. [megna carta ]इंग्लेंड का अधिकार पत्र है.इस अधिकार पत्र द्वारा ही अंग्रेजों ने सन १२१५ में इंग्लेंड के सम्राट जान  से नागरिकों के मूल अधिकारों की सुरक्षा प्राप्त की थी.यह अधिकार पत्र मूल अधिकारों से सम्बंधित प्रथम लिखित दस्तावेज है.इस दस्तावेज को मूल अधिकारों का जन्मदाता कहा जाता है .इसके पश्चात् समय-समय पर सम्राट ने अनेक अधिकारों को स्वीकृति प्रदान की .अंत में १६८९ में [bill of rights ]नमक दस्तावेज लिखा गया जिसमे जनता को दिए गए सभी महत्वपूर्ण अधिकारों ओर स्वतंत्रताओं को समाविष्ट कर दिया गया.
     भारतीय संविधान अपने में मूल अधिकारों की कोई परिभाषा समाविष्ट नहीं  करता क्योंकि उसका उद्देश्य इन्हें समाविष्ट करने का ये था कि एक विधि शासित सरकार की स्थापना हो न कि मनुष्य द्वारा संचालित सरकार कि-''a government of law and not of men .'' अर्थात एक ऐसी सरकार जिसमे बहुसंख्यक अल्पसंख्यक का शोषण न कर सकें.संक्षेप में यदि कहूं तो इसका उद्देश्य प्रोफ़ेसर डायेसी    के'' विधि के शासन'' की स्थापना करना है;ओर इस दिशा में भारतीय संविधान संसार के अन्य संविधानों से आगे है.न्यायाधीश सप्रू ने मूल अधिकारों के उद्देश्यों की व्याख्या करते हुए कहा किइन अधिकारों का उद्देश्य न केवल भारत में रहने वाले नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा ओर नागरिकता  को समानता प्रदान करना है जिससे कि वे भारत के नवनिर्माण की प्रक्रिया में सहयोग दे सकें वरन यह उद्देश्य भी है कि व्यवहार ,नागरिकता ,न्याय और निष्पक्षता का एक निश्चित मापदंड भी निर्धारित किया जा सके .इनका उद्देश्य यही था कि प्रत्येक नागरिक को इस बात का पूर्ण बोध हो जाये कि संविधान ने विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया है.ओर यह उपबंधित किया है कि इन सभी अधिकारों के सम्बन्ध में समाज के प्रत्येक वर्ग को पूर्ण समानता प्रदान की गयी है.
   मूल अधिकारों के विषय में और भी जानकारी लेकर जल्दी ही फिर आऊँगी.आपका सहयोग मेरे लिए सबसे बढ़कर है.बनाये रखियेगा..