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शनिवार, 3 सितंबर 2011

श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.



   आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है .
कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं करती हैं और इसके लिए विधि बनाने में काफी समय लगेगा ;अतः जब तक विधान मंडल समुचित विधि नहीं बनाता है न्यायालय द्वारा विहित मार्गदर्शक सिद्धांत को लागू किया जायेगा .
न्यायालय ने ये भी निर्णय दिया कि ''प्रत्येक नियोक्ता या अन्य व्यक्तियों का यह कि काम के स्थान या अन्य स्थानों में चाहे प्राईवेट हो या पब्लिक ,श्रमजीवी महिलाओं के यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित उपाय करे .इस मामले में महिलाओं के अनु.१४,१९ और २१ में प्रदत्त मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विशाखा नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने लोकहित वाद न्यायालय में फाईल किया था .याचिका फाईल करने का तत्कालीन कारण राजस्थान राज्य में एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना थी .न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये-
[१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शरीक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींताकंशी  करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम [१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शरीक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींताकंशी  करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम या विनियमों में यौन उत्पीडन रोकने सम्बन्धी नियम शामिल किये जाने चाहिए और ऐसे नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए समुचित दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए .
[स] प्राईवेट क्षेत्र के नियोक्ताओं के सम्बन्ध में औद्योगिक नियोजन [standing order  ]अधिनयम १९४६ के अधीन ऐसे निषेधों को शामिल किया जाना चाहिए.
[द] महिलाओं को काम,आराम,स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञानं के सम्बन्ध में समुचित परिस्थितियों का प्रावधान होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया  जाना चाहिए  कि महिलाओं को काम के स्थान में कोई विद्वेष पूर्ण वातावरण न हो उनके मन में ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि वे नियोजन आदि के मामले में अलाभकारी स्थिति में हैं .
[२] जहाँ ऐसा आचरण भारतीय दंड सहिंता या किसी अन्य विधि के अधीन विशिष्ट अपराध होता हो तो नियोक्ता को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को शिकायत करके समुचित कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए .
[३]यौन उत्पीडन की शिकार महिला को अपना या उत्पीडनकर्ता  का स्थानांतरण करवाने का विकल्प होना चाहिए.
न्यायालय ने कहा कि ''किसी वृत्ति ,व्यापर या पेशा के चलाने के लिए सुरक्षित काम का वातावरण होना चाहिए .''प्राण के अधिकार का तात्पर्य मानव गरिमा से जीवन जीना है ऐसी सुरक्षा और गरिमा की सुरक्षा को समुचित कानून द्वारा सुनिश्चित कराने तथा लागू करने का प्रमुख दायित्व विधान मंडल और कार्यपालिका का है किन्तु जब कभी न्यायालय के समक्ष अनु.३२ के अधीन महिलाओं के यौन उत्पीडन का मामला लाया जाता है तो उनके मूल अधिकारों की संरक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना ,जब तक कि  समुचित विधान नहीं बनाये जाते उच्चतम न्यायालय का संविधानिक कर्त्तव्य है.
इस प्रकार यदि इस निर्णय के सिद्धांतों को नियोक्ताओं द्वारा प्रयोग में लाया जाये तो श्रमजीवी महिलाओं की स्थिति में पर्याप्त सुधार लाया जा सकता है.
शालिनी कौशिक एडवोकेट 

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

फांसी और वैधानिक स्थिति







पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी जी के हत्यारों मुरुगन,संतन,और पेरारिवलन की फाँसी की सजा ८ सप्ताह तक टालना एक  बार फिर फाँसी को लेके विवादों को जन्म दे गया इनकी फाँसी की सजा को माफ़ करने के पक्ष में तमिलनाडु के कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए कांचीपुरम में सेनकोदी[२७] नाम की महिला ने खुद को आग लगा कर जान दे दी .२९ अगस्त को कानून के करीब १०० छात्रों ने ट्रैफिक जाम कर दिया.वहीँ ''द हिन्दू गवर्नमेंट ला कॉलेज''के छात्रों ने त्रिची में ''रेल रोको'आन्दोलन किया .जबकि दंड विधि के अंतर्गत फाँसी के लिए निम्न व्यवस्थाएं की गयी हैं-

१-भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ना या युद्ध करने का प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना ;[धारा १२१]
२- सैनिक विद्रोह का दुष्प्रेरण,[धारा १३२]
३- मृत्यु दंड से दंडनीय अपराध के लिए किसी व्यक्ति  की दोषसिद्धि करने के आशय से उसके विरुद्ध मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना [धारा १९४]
४- हत्या[धारा-३०२]
५- आजीवन कारावास के दंडादेश के अधीन रहते हुए किसी व्यक्ति की हत्या करना [धारा ३०३]
६- किसी शिशु या उन्मत्त व्यक्ति को आत्महत्या करने के  लिए दुष्प्रेरित करना [धारा ३०५]
७- आजीवन सिद्धदोष अभियुक्त द्वारा हत्या का प्रयास [धारा ३०७]
८- हत्या सहित डकैती [धारा ३९६]
उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त अपराधों में से केवल क्रमांक ५ में वर्णित धारा ३०३ के अपराध को छोड़कर शेष सभी सात अपराधों के लिए मृत्युदंड के विकल्प के रूप में आजीवन   कारावास का दंड दिया जा सकता है लेकिन धारा ३०३ के अपराध के लिए केवल मृत्यु दंड की एकमात्र सजा का प्रावधान है .परन्तु सन १९८३ में मिट्ठू बनाम पंजाब राज्य ए.आई .आर.१९८३ सु.कोर्ट .४७३ के प्रावधान की वैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि उक्त धारा के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद १४ एवं २१ से विसंगत थे .उच्चतम न्यायालय की पञ्च न्यायाधीशों की खंडपीठ ने ,जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.वाई .चन्द्रचूढ़ कर रहे थे ,ने इस वाद में विनिश्चित किया की धारा ३०३ असंवैधानिक थी क्योंकि इसके अंतर्गत मृत्यु दंड दिया जाना अनिवार्य रखा गया था जबकि अन्य अपराधों के लिए आजीवन कारावास  के विकल्प रखे गए थे अतः इस निर्णय के बाद सभी प्रकार की हत्याएं चाहे वे आजीवन कारावास भोग रहे अभियुक्त के द्वारा क्यों न की गयी हों ,भारतीय दंड सहिंता की धारा ३०२ के अंतर्गत ही दंडनीय होती हैं
ये सब तो हुई कानूनी बात पर इस विषय पर यदि हम मानवीय रुख की बात करते हैं तो हम पाते  हैं कि जो अपराध फाँसी की  श्रेणी में रखे गए हैं वे सभी अपराध करने वाले अभियुक्त इसी सजा के हक़दार हैं आप खुद ही सोचिये  धारा १२१ में भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध  करने का दुष्प्रेरण करना ;क्या ये अपराध किसी माफ़ी के लायक है?
ऐसे ही यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को किसी के मिथ्या साक्षी के कारण फाँसी हो जाती है तो क्या ये अपराधी फाँसी से कम सजा का हक़दार है?
आज अपहरण एक धंधा बन गया है और इसमें क्या हत्या होने पर फाँसी नहीं मिलनी चाहिए?
ऐसे ही  कई सवाल आज के जनमानस के मन में हैं कि राजीव गाँधी जी की हत्या करने वाले अभियुक्त आज तक जिंदा घूम रहे हैं इनसे कैसी सहानुभूति दिखाई जा रही है जबकि ये फाँसी के ही हक़दार हैं क्योंकि सु.कोर्ट ने भी ''रेयरेस्ट ''मामलों में अर्थात गंभीरतम अपराध के मामले में फाँसी का प्रावधान किया है और ये मामले गंभीरतम है.
   शालिनी कौशिक