रविवार, 17 फ़रवरी 2013

.कैग [विनोद राय] मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन] नहीं हो सकते


 
 एक बहस सी छिड़ी हुई है इस मुद्दे पर कि कैग विनोद राय ने जो किया सही था या नहीं ?अधिकांश यही मानते हैं कि विनोद राय ने जो किया सही किया .आखिर  टी.एन.शेषन से पहले भी कौन जनता था चुनाव आयुक्तों को ?और यह केवल इसलिए क्योंकि एक लम्बे समय से कॉंग्रेस  नेतृत्व से जनता उकता चुकी है
और इस कारण जो बात भी कॉंग्रेस सरकार के खिलाफ जाती है उसका समर्थन करने में यह जनता जुट जाती है और दरकिनार कर देती है उस संविधान को भी जो हमारा सर्वोच्च कानून है और हमारे द्वारा समर्थित व् आत्मार्पित है . 
हमारे संविधान के अनुच्छेद १४९ के अनुसार -नियंत्रक महालेखा परीक्षक उन कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संसद निर्मित विधि के द्वारा या उसके अधीन विहित किये जाएँ .जब तक संसद ऐसी कोई विधि पारित नहीं कर देती है तब तक वह ऐसे कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संविधान लागू होने के पूर्व भारत के महालेखा परीक्षक को प्राप्त थे .
    इस प्रकार उसके दो प्रमुख कर्तव्य हैं -प्रथम ,एकाउंटेंट के रूप में वह भारत की संचित निधि में से निकली जाने वाली सभी रकमों पर नियंत्रण रखता है ;और दूसरे,ऑडिटर के रूप में वह संघ और राज्यों के सभी खर्चों की लेख परीक्षा करता है .वह संघ और राज्य के लेखों को ऐसे प्रारूप में रखेगा जो राष्ट्रपति भारत के नियंत्रक-महालेखा-परीक्षक की राय के पश्चात् विहित करे .
     संघ लेखा सम्बन्धी महा लेखापरीक्षक का प्रतिवेदन राष्ट्रपति के समक्ष  रखा जायेगा जो उसे संसद के समक्ष पेश करवाएगा .
  अब आते हैं मुख्य निर्वाचन आयुक्त की संवैधानिक स्थिति पर -मुख्य निर्वाचन आयुक्त निर्वाचन आयोग के कार्यों का सञ्चालन करता है और जो कि निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करता है तब जब कोई अन्य निर्वाचन आयुक्त इस प्रकार नियुक्त किया जाता है [अनु.324-3]
   निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र निकाय है और संविधान इस बात को सुनिश्चित करता है कि जैसे उच्चतम न्यायालय [न्यायपालिका ]कार्यपालिका के हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र व् निष्पक्ष रूप से कार्य करता है वैसे ही निर्वाचन आयोग भी कर सके .
   अनुच्छेद ३२४ के अंतर्गत निर्वाचनों का निरीक्षण ,निर्देशन और नियंत्रण करना निर्वाचन आयोग का कार्य है.

      इस प्रकार अनु.३२४-१ के द्वारा प्रदत्त अधिकार इतने व्यापक हैं कि निर्वाचन आयोग के प्रधान के रूप में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अधिकारों को स्वयमेव ही परिभाषित कर देते हैं -
   -कन्हैय्या बनाम त्रिवेदी [१९८६] तथा जोसे बनाम सिवान [१९८७]के वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा -कि अधीक्षण ,निदेशन व् नियंत्रण के अधिकार में यह निहित है कि निर्वाचन आयोग उन सभी आकस्मिकताओं में भी ,जिनका विधि में उपबंध नहीं किया गया है ,कार्य करने की शक्ति रखता है . 

 -महेन्द्र बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त [१९७८] के वाद में स्पष्ट किया गया है कि -उसे निर्वाचन के सञ्चालन के लिए आवश्यक आदेश ,जिनमे पुनः मतदान कराने या न कराने का आदेश भी सम्मिलित है ,पारित करने का अधिकार है ,राजनीतिक दलों के प्रतीक के आवंटन से सम्बंधित विवादों पर निर्णय  देने तथा राजनीतिक दलों को मान्यता देने या उसे समाप्त करने का अधिकार भी निर्वाचन आयुक्त को है [सादिक अली बनाम निर्वाचन आयुक्त १९७२]
   इस प्रकार २१ जून १९९१ को राजीव गाँधी की हत्या के बाद चुनाव का अगला दौर तीन सप्ताह के लिए स्थगित करना ,पंजाब विधान सभा चुनाव मतदान से ठीक एक दिन पहले स्थगित करना ,आंध्र व् पश्चिम बंगाल में मुख्य चुनाव अधिकारी की नियुक्ति के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को पत्र लिखकर आरोप लगाना ''कि पश्चिम बंगाल में संवैधानिक तंत्र पूरी तरह से टूट गया है '',केरल के ओट्टापलम व् मद्रास के पालानी के चुनाव स्थगन आदि जो भी कार्य शेषन द्वारा किये गए वे निर्वाचन  आयोग के कार्यों के रूप में शेषन को अधिकार रूप में प्राप्त थे उनका एक कार्य भी संवैधानिक मर्यादा से बाहर जाकर नहीं किया गया था हाँ ये ज़रूर है कि उन्होंने जिस तरह से अपने अधिकारों का प्रयोग किया उस तरह से उनसे पहले के चुनाव आयुक्तों ने नहीं किया था इसलिए वे  सत्ता के लिए सिरदर्द बने और उनपर नियंत्रण के लिए ही दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की गयी .
     और कैग जिन्हें भारत की संचित निधि से निकाली जाने वाली सभी रकमों पर नियंत्रण का अधिकार है वे अपनी शक्ति को महत्व न देते हुए कहते हैं -'' कि सिविल सोसायटी  की अधिकाधिक रुचि को मद्देनज़र रखते हुए क्या हमारा काम केवल सरकारी खर्च का हिसाब किताब जांचने और रिपोर्ट संसद पटल पर रखने तक ही सीमित है ?''
   पहले के निर्वाचन आयुक्तों की अपेक्षा जैसे शेषन ने अपने अधिकारों में से ही अपने कार्य करने की शक्ति ढूंढी विनोद राय क्यों नहीं देखते ?क्या नहीं जानते कि सारी विश्व व्यवस्था पैसे पर टिकी है और वे जिस पद पर हैं उसके हाथ में ही सारे पैसे का नियंत्रण है .भले ही वे खुद को मात्र एकाउंटैंट ही समझें किन्तु इस पद पर होकर क्षुब्ध होने जैसी कोई बात नहीं है .सरकार के उचित अनुचित खर्चों का नियंत्रण उनके हाथ में है इस प्रकार सरकारी गतिविधियों पर अंकुश लगाना उनके बाएं हाथ का खेल है.इस प्रकार वे सरकारी धन का सदुपयोग  कर सकते हैं और उसकी बिल्कुल सही  निष्पक्ष रिपोर्ट सदन के पटल पर रखकर संवैधानिक निष्ठा की जिम्मेदारी भी पूरी कर सकते हैं .अन्य राष्ट्रों में महालेखा परीक्षकों को प्राप्त उच्च स्थान को लेकर उनका क्षोभ इसलिए मान्य नहीं किया जा सकता क्योंकि वे एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद धारण करते हैं .आज जो विपक्षी दल उनके अमेरिका के हार्वर्ड केनेडी स्कूल में दिए गए भाषण को उनकी वर्तमान व्यवस्था के प्रति नाराजगी के रूप में व्यक्त कर उनका समर्थन कर रहे हैं उन्हें उनकी संवैधानिक स्थिति में जो बदलाव वे चाहते हैं वैसे संशोधन के प्रस्ताव का कथन भी उनसे करना चाहिए और उसकी जोरदार आवाज़ भी उनके द्वारा उठाई जानी चाहिए ताकि उनका सच्चा समर्थन विनोद राय के प्रति अर्थात एक महालेखा परीक्षक की संवैधानिक स्थिति की मजबूती के प्रति सही रूप में प्रकट हो सके और यह भी दिखाई दे जाये  कि  वे वास्तव में इस स्थिति में  बदलाव चाहते हैं न कि सत्ता की नकेल कसने को ऐसा कर रहे हैं .
    क्योंकि यदि ऐसा कोई संशोधन लाया जाता है तो संविधान  के  अध्याय ५ से सम्बंधित होने के कारण सदन के कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित व् मतदान करने वाले दो तिहाई सदस्यों के मत के साथ आधे राज्यों के विधान मंडल द्वारा पारित होकर अनुसमर्थन भी आवश्यक है जिस पर राष्ट्रपति की अनुमति के पश्चात् यह अनु.३६८ के अंतर्गत एक संशोधन के रूप मान्य होगा . 
    फिर एक तरफ विनोद राय कहते हैं कि लोकलेखा की परंपरागत भूमिका वित्तीय लेनदेन की जाँच-पड़ताल करना है पर क्या आम आदमी के इससे कोई सरोकार नहीं कि सरकार धन को कैसे खर्च करती है ?और दूसरी तरफ वे कहते हैं कि हम अपने लेखा परीक्षण आकलनों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों को व्यापकता प्रदान करने के लिए संलग्नक के तौर पर छोटी पुस्तिकाएं और रिपोर्ट तैयार करते हैं .इनसे विषय विशेष पर लोगों को तमाम महत्वपूर्ण सन्दर्भ जानकारी भी मिल जाती है और उनकी जागरूकता भी बढती है .नतीजतन वे सरकार से बेहतर योजनायें और उनके क्रियान्वयन की मांग करते हैं .
   ये महत्वपूर्ण कार्य जो वे अपनी संवैधानिक मर्यादा के अधीन रहकर कर रहे हैं और आज के भारत का सूचना का अधिकार अधिनियम २००५ जिसके  अनुच्छेद २-ज के अंतर्गत जनता -
 -कार्यों ,दस्तावेजों,अभिलेखों का निरीक्षण कर सकती है .
-दस्तावेजों या अभिलेखों की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ ले सकती है .

 -सामग्री के प्रमाणित नमूने ले सकती है .
-यदि सूचना कम्पूटर व् अन्य तरीके से रखी गयी  है तो डिस्केट ,फ्लॉपी ,टेप ,वीडियो कैसिट या अन्य इलेक्ट्रोनिक माध्यम या प्रिंट आउट के रूप में सूचना प्राप्त कर सकती है .

      साथ ही जनलोकपाल पर जनता की उमड़ी भीड़ ,क्या इसके बाद भी जनता के जीवन स्तर में सुधार की आड़ ले उनका इस तरह का संवैधानिक मर्यादा का हनन उन्हें शोभा देता है ?राजनीतिक विरोध या राजनैतिक पक्षपात के आधार पर हम इनके कार्यों को गलत सही का आकलन नहीं कर सकते .यूँ तो शेषन पर भी चंद्रशेखर सरकार,राजीव गाँधी सरकार के करीबी होने के व् उन्हें फायदा पहुंचाने के आरोप लगते रहे तब भी उन्होंने जो भी किया अपने पद की गरिमा व् मर्यादा के अनुकूल किया ऐसे ही विनोद राय पर भी यही आरोप लग रहे हैं कि ''ये भाजपा के करीब हैं और आने वाले समय में उनकी सरकार की संभाव्यता देखकर ही ऐसे अनुचित कार्य कर रहे हैं .''किन्तु ये तो उन्हें ही देखना होगा कि जो कार्य वे कर रहे हैं वह न तो जनता के हित में है न देश हित में कि विदेश में जाकर भारतीय राजनीति पर कीचड उछाली जाये .२३ मई 1991 को शेषन ने एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में अनुशासनात्मक शक्तियां संविधान के अंतर्गत लेने के लिए पंजाब चुनावों का कच्चा चिटठा खोलने का दबाव बनाया किन्तु वह जो उन्होंने किया देश के अन्दर किया न कि विनोद राय की तरह ,जिन्होंने अपने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होते हुए भी विदेशी राष्ट्र में अपनी क्षुब्धता की अभिव्यक्ति की इसलिए यही कहना पद रहा है कि विनोद राय [कैग] टी.एन.शेषन [ मुख्य निर्वाचन आयुक्त]नहीं हो सकते .
          शालिनी कौशिक
             [कानूनी ज्ञान  ]


रविवार, 10 फ़रवरी 2013

संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें कैग

 संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें कैग    
Congress attacks CAG for criticising Govt in US Flag Foundation Of India
आज उथल-पुथल का दौर है ,जो जहाँ है वह वहीँ से इस कार्य में संलग्न है सरकार ने महंगाई से ,भ्रष्टाचार से देश व् देशवासियों के जीवन में उथल-पुथल मचा दी है ,तो विपक्ष ने कभी कटाक्षों के तीर चलाकर ,कभी राहों में कांटे बिछाकर सरकार की नींद हराम कर दी है कभी जनता लोकपाल मुद्दे पर तो कभी दामिनी मुद्दे पर हमारे लोकतंत्र को आईना दिखा रही है तो कभी मीडिया बाल की खाल निकालकर तो कभी गड़े मुर्दे उखाड़कर हमारे नेताओं की असलियत सामने ला रही है.इसी क्रम में अब आगे आये हैं कैग ''अर्थात नियंत्रक -महालेखा -परीक्षक श्री विनोद राय ,इनके कार्य पर कुछ भी कहने से पहले जानते हैं संविधान में कैग की स्थिति .
    कैग अर्थात नियंत्रक-महालेखा-परीक्षक की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद १४८ के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है .अनुच्छेद 149 में नियंत्रक-महालेखा-परीक्षक के कर्तव्य व् शक्तियां बताएं गए हैं
-अनुच्छेद १४९-नियंत्रक महालेखा परीक्षक उन कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संसद निर्मित विधि के द्वारा या उसके अधीन विहित किये जाएँ .जब तक संसद ऐसी कोई विधि पारित नहीं कर देती है तब तक वह ऐसे कर्तव्यों का पालन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो संविधान लागू होने के पूर्व भारत के महालेखा परीक्षक को प्राप्त थे .
    इस प्रकार उसके दो प्रमुख कर्तव्य हैं -प्रथम ,एकाउंटेंट के रूप में वह भारत की संचित निधि में से निकली जाने वाली सभी रकमों पर नियंत्रण रखता है ;और दूसरे,ऑडिटर के रूप में वह संघ और राज्यों के सभी खर्चों की लेख परीक्षा करता है .वह संघ और राज्य के लेखों को ऐसे प्रारूप में रखेगा जो राष्ट्रपति भारत के नियंत्रक-महालेखा-परीक्षक की राय के पश्चात् विहित करे .
     इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद १४९ के अनुसार कैग का कार्य एक तरह से भारत की संचित निधि के नियंत्रण व् सरकार के एकाउंटेंट का ही है ,ऐसे पद पर रहते हुए श्री विनोद राय कहते हैं -कि कैग महज लेखाकार के रूप में संसद में रिपोर्ट पेश करने तक अपनी भूमिका सीमित नहीं रख सकता ,उसने इस भरोसे से अपने लिए एक नया रास्ता अख्तियार किया हैकि अंततः वह जनता के प्रति जवाबदेह है .उसे जनता को जागरूक करने व् खासकर प्राथमिक शिक्षा ,पेयजल ,ग्रामीण स्वास्थ्य ,प्रदूषण ,पर्यावरण जैसे सामाजिक मुद्दों पर उसकी प्रतिक्रिया जानने का हक़ है .
   जनता के प्रति कैग विनोद राय जी की ये संवेदनशीलता सराहनीय व् आश्चर्यजनक है क्योंकि आमतौर पर ऐसे पदों पर बैठे अधिकारीगण जनता के साथ जिस तरह का व्यवहार करते हैं उसका वर्णन शब्दों में तो हो नहीं सकता .किन्तु यहाँ श्री विनोद राय जी से ये अपेक्षा नहीं की जाती कि वे जनता के प्रति इस तरह से अपनी जवाबदेही बनायें .यहाँ वे सरकारी सेवक है और अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदारी ही उनकी कर्तव्यनिष्ठा को जाहिर करती है और करेगी भी .संवैधानिक पदों पर आसीन विभूतियों की कुछ मर्यादाएं होती है और इस पर कार्य कर रहे अधिकारी को हमारे संविधान ने वे अधिकार और कर्तव्य नहीं दिए जिनका प्रयोग व् पालन वे कर रहे हैं .वे सरकार के द्वारा किये जाने वाले खर्चे जो भारत की संचित निधि पर भारित हैं ,पर नियंत्रण रख सकते हैं और इस तरह जनता के पैसे का सदुपयोग कर सकते हैं इसके साथ ही वे उन खर्चों से सम्बंधित रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत कर सरकार की मनमानी पर रोक लगा सकते हैं क्योंकि वहां जनता के लिए उपयोगी व् अनुपयोगी व्यय पर बहस के लिए सम्पूर्ण विपक्ष मौजूद है .वहां सरकार की जवाबदेही हमारे संविधान ने ही निश्चित की है और विपक्ष के कार्य को कैग द्वारा अपने हाथ में लेना विपक्ष के कार्य में अनाधिकार हस्तक्षेप ही कहा जायेगा .
    साथ ही ,इस सम्बन्ध में उनका ये कदम इसलिए भी अधिक निंदनीय हो गया है क्योंकि उन्होंने इस अभिव्यक्ति के लिए विदेशी भूमि अमेरिका और विदेशी मंच हार्वर्ड कैनेडी स्कूल को चुना.इस कारण वे ''घर के भेदी''की भूमिका में आ जाते हैं जिन्होंने किया तो सब कुछ अपने देश व् देशवासियों के हित के लिए था किन्तु जिनके कारण उनके देश व् देशवासियों को हार का मुहं देखना पड़ा .हमारे अंदरूनी हालातों का विदेश में जाकर एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का ये कदम मर्यादा का उल्लंघन है और उनकी संविधान के प्रति निष्ठा  की जो शपथ उन्होंने नियुक्ति के समय ली उसके प्रति संदेह की स्थिति उत्पन्न करता है .यदि उन्हें वास्तव में जनता के प्रति जवाबदेह होना है तो अरविन्द केजरीवाल की तरह अपने को ऐसी मर्यादाओं की रस्सी से [उनके इस कदम के कारण ये उनका इन मर्यादाओं के प्रति यही भाव प्रतीत होता है ]जिनमे उनकी आत्मा बंधा हुआ महसूस करती  है उससे उन्हें खुद को मुक्त कर लेना चाहिए और अरविन्द केजरीवाल के पद चिन्हों पर चलते हुए सरकार के उद्योगपतियों से ही नहीं ,माफियाओं से ,विपक्षी नेताओं से जिन जिन का भी खुलासा कर सकें ,दिलखोल कर करना चाहिए.
                शालिनी कौशिक
                      [कानूनी ज्ञान ]

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

अफ़रोज़ ,कसाब-कॉंग्रेस के गले की फांस

अफ़रोज़ ,कसाब-कॉंग्रेस के गले की फांस
Delhi Gangrape Case : sixth accused in the case as minor as unfortunate, says father
दिल्ली गैंगरेप कांड के एक आरोपी अफ़रोज़ के नाबालिग होने के कारण उसकी इस कांड में सर्वाधिक वहशी संलिप्तता होने के बावजूद उसे नाममात्र की ही सजा मिलने की बात है और इसलिए एक प्रश्न यह भी उठाया जा रहा है कि यदि कसाब भी नाबालिग होता तो क्या वह भी छूट जाता ? 
दिल्ली गैंगरेप कांड के एक आरोपी अफ़रोज़ के नाबालिग होने के कारण उसकी इस कांड में सर्वाधिक वहशी संलिप्तता होने के बावजूद उसे नाममात्र की ही सजा मिलने की बात है और इसलिए एक प्रश्न यह भी उठाया जा रहा है कि यदि कसाब भी नाबालिग होता तो क्या वह भी छूट जाता ?   इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें भारतीय कानून का गहराई से विभिन्न पहलूओं पर अवलोकन करना होगा .
   किशोर न्याय [बालकों की देखभाल व् संरक्षण ]अधिनियम २००० की धारा २ k के अनुसार किशोर से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जिसने १८ वर्ष की आयु पूरी न की हो .

  और इसी अधिनियम  की धारा १६ कहती है कि किसी किशोर को जिसने कोई अपराध किया है मृत्यु या आजीवन कारावास का दंड नहीं दिया जायेगा और न ही प्रतिभूति या जुर्माना जमा करने में चूक होने पर कारावासित किया जायेगा  ......इसी धारा में आगे कहते हुए ये भी कहा गया है कि किशोर जिसने १६ साल की आयु पूरी कर ली है और उसका अपराध गंभीर प्रकृति का है और उसका आचरण व् व्यवहार ऐसा नहीं है कि स्पेशल होम भेजना उसके व् अन्य किशोरों के हित में हो तो बोर्ड उसे अन्य सुरक्षित स्थल में भेजेगा और आगे की कार्यवाही के लिए राज्य सरकार को रिपोर्ट करेगा .
किन्तु राज्य सरकार भी अन्य व्यवस्थाएं करते हुए किशोर के लिए निर्धारित अवधि के कारावास से अधिक के निरोध का आदेश नहीं दे सकती .
    दूसरी ओर भारतीय संविधान का अनुच्छेद १४ यह उपबंधित करता है कि ''भारत राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से अथवा विधियों के समान संरक्षण से राज्य द्वारा वंचित नहीं किया जायेगा .''......और अनुच्छेद १४ का यह संरक्षण नागरिक और अनागरिक दोनों को प्राप्त है और विधि के समक्ष समता व् विधियों के समान संरक्षण दोनों वाक्यांशों का एक ही उद्देश्य है -समान न्याय  और इसके अनुसार ये अधिकार नागरिक व् विदेशी को समान रूप से प्राप्त हैं .विधि की दृष्टि में सभी व्यक्ति समान हैं और एक जैसी विधियों से नियंत्रित होंगे .अर्थात भारत में दोहरी विधि प्रणाली प्रचलित नहीं है .  

ऐसे में यदि कसाब नाबालिग होता तो वह भी इस संरक्षण का अधिकारी होता जिसका अधिकारी आज अफ़रोज़ हो रहा है .
   अब एक बात और जिसका आलोचकों द्वारा बहुतायत में ढोल पीटा जा रहा है कि अफ़रोज़ को मुस्लमान होने की वजह से बचाया जा रहा है तो ये जानकारी तो उन्हें होनी ही चाहिए कि ये इस देश का कानून है जो अफ़रोज़ को देखकर नहीं बनाया गया और हमारा कानून धर्म,मूलवंश,लिंग,जाति जन्मस्थान के आधार पर अनु.१५ के अंतर्गत विभेद को प्रतिषिद्ध करता है अर्थात यहाँ कोई धर्म ,मूलवंश ,जाति,लिंग जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का शिकार नहीं होगा .

यहाँ दिल्ली सरकार  कानून के अनुसार कार्य कर रही है इसलिए इस मामले में उसे कोई दोष नहीं दिया जा सकता यदि कोई दोष दिया भी जायेगा तो हमारी कानून व्यवस्था को दिया जायेगा जो भावी समस्याओं को देखते हुए किसी कानूनी दंड का पहले किये गए अपराध पर लागू किये जाने का प्रबंध नहीं करती .
  कानून व्यवस्था बनाये रखना राज्य सूची का विषय है और ऐसे में दिल्ली सरकार अपनी लापरवाह व्यवस्था की दोषी है किन्तु नित नयी घटती ऐसी दुखद घटनाएँ हमारी कानूनी व्यवस्था में अमूल चूल परिवर्तन की बात जोह रही हैं जिसका दारोमदार केन्द्रीय  व्यवस्थापिका  का है और ऐसी घटनाएँ जो बहुत पहले से घट रही हैं उन्हें देखते हुए उसके द्वारा सही कदम न उठाया जाना जितना सत्तारूढ़ दल को दोषी बनत है उतना ही दोष वह अन्य दलों जिसमे लगभग सम्पूर्ण विपक्ष आता है ,का भी है .जो अपने राजनीतिक दांवपेंचों में ही उलझे रहते हैं किन्तु उस ओर ध्यान नहीं देते जिसके संरक्षण व् विकास के लिए जनता उन्हें वहां भेजती है .और तो और दोषी हमारी जनता हम सभी हैं क्योंकि नेता ही नहीं हम भी तब जागते हैं जब पानी सिर के ऊपर  से गुजर जाता है .
  और अंत में ,अफ़रोज़ को यदि मुसलमान होना की वजह से बचाया जा रहा है तो ऐसा कहने वाले बुद्धिजीवियों से मेरा यही कहना  है कि कसाब भी एक मुसलमान था और उसे भले  ही दूसरे  राज्य में फांसी पर लटकाया गया हो पर सरकार वहां भी कॉंग्रेस की ही है इसलिए इस संकीर्ण मानसिकता में वे देश के  सर्वाधिक प्रभावशाली दल को न लपेटें तो देश हित में उत्तम कार्य होगा .साथ ही  वर्तमान सरकार की आलोचना कर आलेखों के जरिये अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करने वाले प्रबुद्ध जन यदि अफ़रोज़ का बालिग होना  साबित कर उसे दामिनी के साथ किया गए वीभत्स कृत्य करने की सही सजा दिला दें तो शायद अपनी लेखन क्षमता के साथ भी न्याय करेंगे और दामिनी की आत्मा व् समस्त नारी समुदाय के साथ भी .
              शालिनी कौशिक                 [कानूनी ज्ञान ]