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रविवार, 20 अक्तूबर 2013

अपनी संपत्ति की देख-रेख और अपनी सुख-सुविधा तो आपको खुद देखनी होगी .

अपनी संपत्ति की देख-रेख और अपनी सुख-सुविधा तो आपको खुद देखनी होगी .
STOP PASTING POSTERS on city walls making it look ugly.: Create online campaign to stop pasting posters on Bangalore City walls.
हमारे घर के पास अभी हाल ही में एक मकान बना है .अभी तो उसकी पुताई का काम होकर निबटा ही था कि क्या देखती हूँ कि उस पर एक किसी ''शादी विवाह ,पैम्फलेट आदि बनाना के विज्ञापन चिपक गया .बहुत अफ़सोस हो रहा था कि आखिर लोग मानते क्यों नहीं ?क्यूं नई दीवार पर पोस्टर लगाकर उसे गन्दा कर देते हैं ?
यही नहीं हमारे घर से कुछ दूर एक आटा चक्की है और जब वह चलती है तो उसके चलने से आस-पास के सभी घरों में कुछ हिलने जैसा महसूस होता है .मुझे ये भी लगता है कि जब हमारे घर के पास रूकती कोई कार हमारे सिर में दर्द कर देती है तब क्या चक्की का चलना आस-पास वालों के लिए सिर दर्द नहीं है ?फिर वे क्यूं कोई कार्यवाही नहीं करते ?
मेरे इन सभी प्रश्नों के उत्तर मेरी बहन मुझे देती है कि पहले तो लोग जानते ही नहीं कि उनके इस सम्बन्ध में भी कोई अधिकार हैं और दुसरे ये कि लोग कानूनी कार्यवाही के चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहते क्योंकि ये बहुत लम्बी व् खर्चीली हैं किन्तु ये तो समस्या का समाधान नहीं है इस तरह तो हम हर जगह अपने को झुकने पर मजबूर कर देते हैं और चलिए थोड़ी देर कोई मशीनरी चलनी हो तो बर्दाश्त की जा सकती है किन्तु सदैव के लिए तो नहीं और जहाँ तक पोस्टर आदि की बात है वे सभ्यता की सीमा में हों तो अपनी विवशता मान सह लेंगे किन्तु जैसी आजकल की फिल्मों के पोस्टर होते हैं उन्हें तो १ सेकंड के लिए भी देखना मुश्किल है फिर अपनी ही दीवार पर ,ऐसे में कार्यवाही के बिना कुछ भी संभव नहीं .
पोलक के अनुसार -'' बिना विधिक औचित्य के किसी की भूमि पर या उससे सम्बंधित किसी अधिकार में हस्तक्षेप करना उपताप कहलाता है .''
ब्लैकस्टोन के अनुसार -''उपताप ऐसा कृत्य है जिससे किसी व्यक्ति को आघात ,असुविधा या क्षति होती है .''
आप सभी उपताप जानते हों या न हों किन्तु nuisance अवश्य जानते होंगे ये दो प्रकार के होते हैं एक सार्वजानिक उपताप और एक व्यक्तिगत उपताप .सार्वजनिक उपताप भारतीय दंड सहिंता की धारा २६८ में वर्णित हैं किन्तु मैं जिस उपताप की बात कर रही हूँ वह व्यक्तिगत उपताप हैं और यह मूल रूप से व्यक्ति या व्यक्तियों को प्रभावित करता है .यह ऐसा कार्य या चूक है जिससे किसी की संपत्ति के स्वामी या अधिभोक्ता के अधिकारों पर क्षतिकारी प्रभाव पड़ता है या उनकी संपत्ति को हानि पहुँचती है या उनके सुख-सुविधा ,स्वास्थ्य में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप होता है जो कि अनुचित होता है .और इस मामले में वादी को निम्न उपचार उपलब्ध हैं -
१- उपताप का उपशमन [Abatement ]
२- क्षतिपूर्ति [damages ]
३- निषेधाज्ञा [injunction ]
पहले उपचार में वादी उपताप को स्वयं हटा सकता है जैसे किसी और के पेड़ की टहनी आदि का वादी के घर में लटकने पर उन्हें हटाने का अधिकार उसे है .
दुसरे उपचार में वादी वाद दायर कर न्यायालय से क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकता है .
तीसरे उपचार में वादी उपताप को रुकवाने के लिए न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकता है .
अब ये आप सभी के ऊपर है कि कानून से अधिकार प्राप्त होने पर भी आप उपताप को हटाते हैं या झेलते हैं .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

नैना साहनी हत्याकांड -उच्चतम न्यायालय अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे .

तंदूर कांड : सुशील शर्मा की फांसी उम्रकैद में तब्दील

Updated on: Tue, 08 Oct 2013 10:26 PM (IST)
Supreme Court
नई दिल्ली [माला दीक्षित]। पत्नी नैना साहनी की हत्या कर उसका शव तंदूर में जलाने वाले दिल्ली युवक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुशील शर्मा की मौत की सजा सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दी। करीब 18 साल से जेल में बंद सुशील की सजा-ए-मौत जरूर माफ हुई है, लेकिन उसे ताउम्र अब कालकोठरी में गुजारनी होगी।
नैना दिल्ली युवक कांग्रेस की महिला शाखा की महासचिव भी थी। अवैध संबंधों के शक में सुशील ने 2/3 जुलाई, 1995 की रात गोली मारकर उसकी हत्या कर दी थी। इसके बाद उसके शव को तंदूर में जलाने की कोशिश की थी। तंदूर कांड नाम से चर्चित इस मामले में सत्र अदालत और दिल्ली हाई कोर्ट ने सुशील के अपराध को जघन्यतम मानते हुए उसे मौत की सजा सुनाई थी। सुशील ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।
मुख्य न्यायाधीश पी सतशिवम, न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ ने सुशील के मृत्युदंड को ताउम्र कैद में तब्दील करते हुए कहा, निसंदेह अपराध क्रूर है, लेकिन इस मामले में केवल क्रूरता के आधार पर मौत की सजा देना न्यायोचित नहीं होगा। हत्या खराब निजी संबंधों का नतीजा थी। यह समाज के खिलाफ अपराध नहीं था। वह घोषित अपराधी नहीं है और न ही ऐसा कोई सुबूत है जो कि अभियुक्त के दोबारा इस तरह के अपराध में शामिल होने का संकेत देता हो। मामले को देखने से नहीं लगता कि अभियुक्त के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं है।
न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई ने फैसले में लिखा, 'अभियुक्त इकलौता पुत्र है और उसके माता-पिता वृद्ध व बीमार हैं। अभियुक्त दस साल से काल कोठरी में बंद है। इन परिस्थितियों को देखते हुए मौत की सजा उम्रकैद में बदली जाती है।' कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उम्रकैद का मतलब जीवन भर की कैद है, लेकिन यह सरकार द्वारा कानून में तय माफी देने की प्रक्रिया के अधीन होगी। साथ ही सरकार को माफी देते समय अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 432 और 433ए में माफी देने के लिए तय मानक व प्रक्रिया का पालन करना होगा।
कोर्ट ने कहा, अभियोजन अभियुक्त के खिलाफ मामला साबित करने में सफल रहा। सुबूतों से साफ होता है कि सुशील शर्मा ने अकेले हत्या की थी और केशव के साथ मिलकर हत्या के सुबूत मिटाने के लिए शव को ठिकाने लगाने की कोशिश की थी।
- See more at: http://www.jagran.com/news/national-supreme-court-to-deliver-verdict-in-tandoor-case-today-10782554.html#sthash.idso8AW8.द्पुफ़


नैना साहनी हत्याकांड में उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त सुशील शर्मा की फाँसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया जबकि मृत्यु दंड के लिए स्वयं उच्चतम न्यायालय के जो निर्णय रहे हैं इस निर्णय की खिलाफत करते हैं-

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति कृष्णा अइयर ने राजेन्द्र प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ए.आई .आर .१९७९ सु.को.९१६ के वाद में जोर देकर कहा है कि जहाँ हत्या जानबूझकर ,पूर्वनियोजित ,नृशंस तथा बर्बरता पूर्वक ढंग से की गयी हो तथा इसके लिए कोई परिशमनकारी परिस्थितयां[extenuating circumstances ]न हों ,वहां सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से मृत्यु दंड अनिवार्य कर देना चाहिए .
कामता तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य ए.आई.आर. 1996 सु.को.का वाद पाशविक बलात्संग तथा हत्या का मामला है ,इस प्रकरण में अभियुक्त ने ,जो ७ वर्षीय बालिका के परिवार से घनिष्ठ था ,के साथ पाशविक बलात संग किया और तत्पश्चात गला घोंट कर उसकी हत्या करके उसके शव को कुएं में फैंककर साक्ष्य समाप्त कर दी थी .सत्र न्यायलय ने अभियुक्त को भा.दंड सहिंता की धारा ३६३ ,३७६,३०२ तथा २०१ के अधीन अपराधों के लिए सिद्धदोष ठहराया तथा धारा ३०२ के अंतर्गत मृत्युदंड तथा अन्य दोषसिद्धियों के लिए विभिन्न अवधि के लिए कठोर कारावास से दंडादिष्ट किया .उच्च न्यायालय द्वारा मृत्युदंड तथा अन्य दंडादिष्ट को कायम रखा गया .और विशेष इज़ाज़त से अपील में भी उच्चतम न्यायालय ने इसे ''विरल में से विरलतम मामले ''[rarest of rare cases ] में लिया और अपील ख़ारिज की .
Tandoor case: How Sushil Sharma murdered his wife Naina Sahni IBNLive.com | Posted on Oct 08, 2013 at 12:31pm IST Share inShare Share on Tumblr New Delhi: Nearly two decades ago on the night of July 2, 1995, in the open-air restaurant of a Delhi five-star hotel, a body was being burned in a tandoor. If it wasn't for Delhi police constable Abdul Nazir Kunju and Home Guard Chanderpal, it would have been the perfect escape, but their alertness helped expose a murder plot so foul that it sent shockwaves through the capital's power circle. Abdul Nazir and Chanderpal saw smoke rising from Bagiya Restaurant in Ashok Yatri Nivas and decided to check, suspecting a fire. What they found instead, was the body of 29-year-old Naina Sahni, wife of then Delhi Youth Congress President Sushil Sharma. The restaurant manager, Keshav Kumar who claimed he was burning old Congress banners, was arrested but Sharma managed to flee. ALSO SEE Tandoor murder case: SC commutes Sushil Sharma's death to life term Sushil Sharma suspected his wife of having an affair with Matloob Karim, her classmate and fellow Congress worker. The marriage was already strained as Sharma wanted to keep it a secret owing to his political ambitions, something that irked Sahni. As their relationship deteriorated, police allege, Sharma became violent towards his wife. If it wasn't for Delhi Police constable Abdul Nazir Kunju and Home Guard Chanderpal, it would have been the perfect escape. On the day of murder, Sushil Sharma reached his Mandir Marg flat to find Naina Sahni deep in conversation with somebody on the phone. Suspicious, Sharma redialled the number after she ended her call and found that it was Matloob Karim that she was talking to. Enraged Sharma took out his licenced revolver and shot Naina Sahni thrice, hitting her in the neck and head. The third shot missed her and hit the wall. Sahni died on the spot. Sharma then wrapped her body in a blanket and took it to the restaurant where he chopped it into small pieces and stuffed it into the tandoor. Sharma then tried to burn the body in the clay oven but when police came Sharma escaped the restaurant that he was running on lease, and hid at Gujarat Bhavan. The next day he escaped to Jaipur, and from there he went to Mumbai and Chennai. It was in Bangalore that Sharma finally surrendered on July 10, pleading innocence. He was sentenced to death on Nov 7, 2003 by the trial court. The high court on February 19, 2007 confirmed the death penalty awarded to him saying the offence was an act of extreme depravity that shook the conscience of the society.
Tandoor case: How Sushil Sharma murdered his wife Naina Sahni
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नैना साहनी को सुशील शर्मा ने इस कदर नृशंस तरीके से क़त्ल किया,टुकड़े किये और तंदूर में डाले और इस पर भी उच्चतम न्यायालय ने इसे रेयर केस नहीं माना और अभियुक्त सुशील की सजा आजीवन कारावास में बदल दी .इससे पहले भी उच्चतम न्यायालय ने अपना यह दोहरा रवैया रखा है राजेन्द्र प्रसाद के मामले में विद्वान न्यायाधीश ने कहा -''कि सन १९७२ से अब तक १९७९ तक अभियुक्त के सिर पर मृत्यु दंड का भूत निरंतर मंडराता रहने के कारण उसकी दशा मनुष्य के बजे साग सब्जी जैसी हो गयी थी और सब्जी को फाँसी पर लटकाना मृत्यु दंड नहीं है .''
फिर अभियुक्त ने यहाँ जो नैना को सब्जी की तरह काट दिया क्या वह उसके लिए मृत्युदंड के योग्य नहीं था ?उच्चतम न्यायालय को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना ही चाहिए .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

नगर पालिका का अनिवार्य कर्तव्य है ये-

नगर पालिका का अनिवार्य कर्तव्य है ये-

उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम -१९१६ के अधीन नगरपालिका के दो प्रकार के कर्तव्य उपबंधित किये गए हैं अर्थात अनिवार्य और वैवेकिक और नगर पालिकाओं द्वारा अपने अन्य कर्व्याओं के साथ साथ जिस एक कर्तव्य की सबसे ज्यादा अनदेखी की जाती है वह इसी अधिनियम की धारा ७ [६] में उल्लिखित है -धारा ७ [६] कहती है -
''धारा ७ के अंतर्गत यह उपबंध किया गया है कि प्रयेक नगर पालिका का यह कर्तव्य होगा कि वह नगर पालिका क्षेत्र के भीतर निम्नलिखित की समुचित व्यवस्था करे -
[६] आवारा कुत्तों तथा खतरनाक पशुओं को परिरुद्ध करना ,हटाना या नष्ट करना ;
और देखा जाये तो इस कर्तव्य के प्रति नगर पालिका ने अपनी आँखें मूँद रखी हैं और सभी का तो पूरी तरह से पता नहीं किन्तु कांधला नगर पालिका अपने इस कर्तव्य को पूरा करने में पूरी तरह से उपेक्षा कर रही है .
अभी लगभग २ महीने पहले एक सामान्य रेस्तरा चलाने वाले ने जैसे सभी अपने सामान को थोडा बहुत बाहर की तरफ सजाकर रख लेते हैं रख लिया था कि दो सांड जो कि दिन भर यहाँ खुले घुमते हैं लड़ते लड़ते वहां आ पहुंचे और उन्हें देख वह जैसे ही अपना सामान बचाने लगा कि वह उनके पैरों के नीचे आ गया और बहुत बुरी तरह घायल हो गया और इलाज में ही उसका लाखों रुपयों का व्यय हो चूका है .
ऐसे ही अभी २९ सितम्बर २०१३ को मेरे पिताजी के मित्र के भाई अपनी धेवती को गोद में लेकर घूमने निकले ही थे कि सांड ने पीछे से टक्कर मारी और उनके हाथ से बच्ची छोटकर सड़क पर जा गिरी और उसका इलाज कराने के लिए उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में ले जाना पड़ा जिस कारण बच्ची के इलाज में उनका काफी रुपया लग गया.
रोज आये दिन घरों में बंदरों की आवजाही बढ़ रही है और कहीं कोई छत से गिर रहा है तो किसी किसी को बन्दर के काटने के कारण इन्जेंक्शन लगवाने पर 1500-2000 रूपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं बन्दर कहाँ से बढ़ रहे हैं तो ये ही पता चलता है कि कोई छोड़ गया और नगर पालिका से इसके लिए कुछ करने को कहा जाता है तो आश्वासन दे टरका दिया जाता है .
घटनाएँ बढ़ रही हैं और किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं जाता कि आखिर इस तरह से इन पशुओं को यहाँ घूमने दिया जा रहा है तो इनके हमलों को रोकने की जिम्मेदारी किसकी बनती है ? जबकि उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम की धारा ७ [६] साफ तौर पर ये जिम्म्मेदारी नगर पालिका के माथे पर लादती है और जनता को यह हक़ देती है कि वह नगर पालिका से ऐसी घटना का मुआवजा मांग सके .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]