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मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

उपभोक्ता हित :तहसील स्तर पर पीठ आवश्यक

उपभोक्ता हित :तहसील स्तर पर पीठ आवश्यक

उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम १९८६ पारित किया है .इस अधिनियम के अंतर्गत स्थापित निकाय अर्ध न्यायिक हैं और इनमे उपचार पाने की प्रक्रिया बहुत सरल व् कम खर्चीली है .इनमे वकील करने की भी आवश्यकता नहीं है .उपभोक्ता व्यक्तिगत रूप से अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकता है .यहाँ कोर्ट फीस भी नहीं लगती है .इस अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए २० लाख तक के मामले जिला स्तर के उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में ,२० लाख से ऊपर व् एक करोड़ से नीचे के मामले राज्य आयोग में व् एक करोड़ से ऊपर के मामले राष्ट्रीय आयोग में विचारित किये जाते हैं .
इस सबके बावजूद एक सबसे बड़ी कमी जो इस कानून को बनाते समय संसद ने की है वह यह है कि इसमें उपभोक्ता को अपने हितों के लिए सबसे निचली कोर्ट जिला स्तर पर उपलब्ध है और जिसमे आवेदन करने पर उपभोक्ता की दैनिक जीवन चर्या और यात्रा का कष्ट और व्यय उसे इन न्यायालयों में अपनी समस्या के लिए आवेदन करने से एक हद तक रोक देता है और वह हानि सहन कर आगे की परेशानी सोच मन मारकर घर ही बैठ जाता है और यही इस कानून की सफलता में सबसे बड़ी बाधा है .संसद को जिला पीठ से नीचे तहसील स्तर पर भी एक ऐसी पीठ की स्थापना करनी चाहिए जो उपभोक्ता को उसके निकट पहुंचकर न्याय दिलाये .उसकी ऐसे वादों को ग्रहण करने की अधिकारिता पांच लाख से नीचे के मामलों में रखी जा सकती है और इस तरह उपभोक्ता के हितों की रक्षा उसके द्वार पर ही पहुंचकर की जा सकती है .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

पहले अपराध साबित हो जस्टिस गांगुली का तब इस्तीफा

पहले अपराध साबित हो जस्टिस गांगुली का तब इस्तीफा


I am not resigning, says Justice AK Ganguly, indicted in sexual harassment case
महिला सशक्तिकरण का दौर चल रहा है किन्तु क्या इसका साफ तौर पर यह मतलब लगा लेना चाहिए कि पुरुष के अशक्त होने का दौर आरम्भ हो चुका है ?क्या वास्तव में महिला तभी सशक्त हो सकती है जब पुरुष अशक्त हो फिर क्यूँ ये कहा जाता है कि ये दोनों एक ही रथ के दो पहिये हैं ?
आज हर ओर स्त्री पर हो रहे अन्यायों को लेकर ही विरोध के झंडे बुलंद किये जा रहे हैं ,होने भी चाहियें ,स्त्री आरम्भ से लेकर आज तक शोषण का शिकार रही है किन्तु इसका मतलब यह नहीं कि मात्र वही शोषण पीड़ित है ,शोषण तो पुरुषों का भी होता आया है .जैसे पुरुषों ने महिलाओं का शोषण किया वैसे ही महिलाओं ने भी पुरुषों को नहीं बख्शा .सूपर्णखा भी एक नारी थी जिसने अपनी दुर्भावना के पूरी न होने पर सम्पूर्ण लंका को युद्ध की विभीषिका में धकेल दिया .नारी जाति में आज भी ऐसी कलंक कथा मौजूद हैं जो कानून का दुरूपयोग कर कभी पुरुष को कभी दहेज़ में कभी छेड़छाड़ में तो कभी बलात्कार के मिथ्या आरोप में फंसा रही हैं मैं नहीं कहती कि जो आरोप अभी हाल ही में प्रतिष्ठित शख्सियतों पर लगाये गए हैं वे दुर्भावना से प्रेरित होकर लगाये गए हैं किन्तु कानून सबूतों और गवाहों के बयानों पर आगे की कार्यवाही करता है और उसके बाद ही किसी निर्णय पर पहुँचता है .
अभी हाल ही में हुए दो मामले प्रतिष्ठित व्यक्तियों से जुड़े हैं ,तरुण तेजपाल के मामले में तो मामला तरुण तेजपाल द्वारा अपने अपराध की स्वीकारोक्ति करने पर लगभग सुलझ गया किन्तु जस्टिस गांगुली पर लगे आरोप और तीन सदस्यीय पैनल की रिपोर्ट उनकी अपराध में संलिप्तता साबित नहीं करती और जब तक यह संलिप्तता साबित न हो या जस्टिस गांगुली स्वयं अपना अपराध स्वीकार न कर लें उन्हें अपराधी मानना और पश्चिमी बंगाल के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से उनका इस्तीफा मांगना गलत है .

लोकसभा में गूंजा जस्टिस गांगुली का मामला

इस तरह तो कोई भी किसी पर आरोप लगा दे और स्वयं के नारी होने का लाभ उठाते हुए पुरुष को शर्मसार कर दे यह गलत ही कहा जाना चाहिए .मात्र आरोप किसी को अपराधी नहीं बनाता और पहले भी ऐसे मामले आये हैं जिसमे साजिश करके सही लोगों से उनके पद छीने गए हैं इसलिए सही जाँच ज़रूरी है .
और सबसे बड़ी बात यह कि यदि स्त्री को सम्मान से जीने का अधिकार है तो पुरुष को भी गरिमामय वातावरण अपने सही आचरण पर मिलना ही चाहिए क्योंकि यदि सारी नारी पतिव्रता नहीं हैं तो सभी पुरुष भी तो कलंकित नहीं हैं .इसलिए अपराध साबित होने से पहले इस्तीफे की मांग किया जाना व्यर्थ का प्रलाप है और यह बंद होना चाहिए .
शालिनी कौशिक

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

नहीं ये नहीं हो सकता ........

नहीं ये नहीं हो सकता ........

Supreme Court says gay sex illegal, govt hints at legislative route


सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए ११ दिसंबर को भारतीय दंड सहिंता की धारा ३७७ को जायज़ ठहराया और समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध .भारतीय दंड सहिंता की धारा ३७७ जिसमे कहा गया है कि -
''जो कोई किसी पुरुष ,स्त्री या जीव-जंतु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्द्रिय भोग करेगा ,वह आजीवन कारावास से ,या दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी ,दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .''
इस प्रकार यह एक ऐसा सम्भोग को अपराध घोषित करता है जो कि एक पुरुष दुसरे पुरुष के साथ ,एक स्त्री दूसरी स्त्री के साथ या एक पुरुष या स्त्री किसी पशु या जीव-जंतु के साथ गठित करता है .
और हद है कि जिस निर्णय की सर्वत्र तारीफ होनी चाहिए वह आलोचना का शिकार हो रहा है .
लोक व्यवस्था वह मुख्य प्रतिबन्ध है जिसे बनाये रखने के लिए नागरिकों के मूल अधिकारों में स्वतंत्रता के अधिकारों पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है फिर ऐसे कृत्य को यदि विधायिका द्वारा या जनता के एक वर्ग के समर्थन द्वारा कानूनी जामा पहनाया जाने लगा तो लोक व्यवस्था की तो सोचना ही बेकार है .यह तो साफ तौर पर संविधान के अनुच्छेद २१ में प्राप्त ''प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण ''का मूल अधिकार छीनना है .
प्रकृति पुरुष मनु ने अपने शरीर से ही शतरूपा की उत्पत्ति की और उससे विवाह रचाया उद्देश्य था सृष्टि विस्तार किन्तु यह जो समलैंगिक सम्बन्धों के समर्थन का ढोल पीटा जा रहा है इसका उद्देश्य क्या है एक मात्र यही कि जो समलैंगिक है वे शांतिपूर्वक रहे और जो जैसा मन में आयें करते रहें किसी को कोई आपति नहीं होगी किन्तु यह सम्भव नहीं है और वह भी सामान्य जनता के बीचो बीच और इस तरह के समर्थन द्वारा सामान्य जनता को निरपराध होते हुए भी ऐसी दशा भुगतने के लिए तैयार किया जा रहा है जिससे मात्र व्यभिचार ही फैलेगा . दूरदर्शन पर प्रसारित चर्चा के एक कार्यक्रम में एक फादर का कहना था कि इस तरह के सम्बन्ध में भी दोनों अभियुक्त एक पुरुष बनता है और एक स्त्री ........और ये ही विश्व में एड्स के प्रसार का सबसे बड़ा कारण है .
आम तौर पर लड़के का लड़के के साथ फिरना और लड़की के साथ लड़की का फिरना कोई गलत नज़रों से नहीं देखता और न ही आम तौर पर ऐसा होता है किन्तु इस तरह से इनकी हरकतों को कानूनी सुरक्षा दिया जाना सबके वही हाल करने वाला है जो ''कल हो न हो '' फ़िल्म में अमन और रोहित की हरकतें देख कांता बेन के हो रहे थे क्योंकि आज मीडिया अपने प्रचार के लिए और नेता वोट के हथियार के लिए हमारे समाज को फ़िल्मी बनाने में जुटे हैं .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

नाबालिग :उम्र की जगह अपराध की समझ व् परिपक्वता देखी जाये .

नाबालिग :उम्र की जगह अपराध की समझ व् परिपक्वता देखी जाये .

१६ दिसम्बर २०१२ की भयावह रात ,दिल्ली में हुआ गैंगरेप ,दुर्दांत रूप से हुए इस रेप में पीड़िता की मृत्यु और इस भयावहता का सबसे बड़ा दरिंदा एक नाबालिग [किशोर न्याय {बालकों की देखभाल व् संरक्षण अधिनियम २००० }के अनुसार ]था ,दामिनी कहें ,बिटिया कहें या निर्भय उसने भी मरते मरते अपने बयान में उसी की ओर इशारा किया था किन्तु भारतीय कानून उसकी उम्र को देखते हुए उसे सजा देता है मात्र ३ साल जो कि किशोर न्याय अधिनियम में अधिकतम सजा है .
बिटिया के पिता इसे मौलिक अधिकार का हनन मानते हैं और उसे सख्त सजा दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करते हैं जिस पर सुप्रीम कोर्ट केंद्र से पूछता है कि
''जघन्य अपराध के मामले में १६ साल से ऊपर के आरोपी को नाबालिग माना जाये या नहीं ,क्या यह तय करने का दायित्व फौजदारी अदालत का है ,क्योंकि जो याचिका दाखिल की गयी है उसमे कहा गया है कि किशोरावस्था तय करने का दायित्व फौजदारी अदालत का है ,किशोर न्याय बोर्ड का नहीं .''
अभी तक के फौजदारी कानून में दंड प्रक्रिया सहिंता १९७३ की धारा २७ कहती है -
''किसी ऐसे अपराध का विचारण ,जो मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय नहीं है और जो ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाता है जिसकी आयु उस तारीख़ को जब वह न्यायालय के समक्ष हाज़िर हो या लाया जाये सोलह वर्ष से कम है ,मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय द्वारा या किसी ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसे बालक अधिनियम १९६० या किशोर अपराधियों के उपचार ,प्रशिक्षण और पुनर्वास के लिए उपबंध करने तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि के अधीन विशेष रूप से सशक्त किया गया है .''
और इधर किशोर न्याय अधिनियम की धारा २[k ]कहती है -
''किशोर या बालक से अभिप्राय उस व्यक्ति से है जिसने अठारह वर्ष की आयु पूर्ण नहीं की है .''
और उस पर कौन सा कानून लागू होगा इसके लिए लल्लन प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व् अन्य २००२ cr .l .j १२४२ :२००२ all .l .j ८४ में इलाहाबाद हाईकोर्ट का कहना है ,-
''यदि अभियुक्त के विचारण के दौरान विचारण न्यायालय यह पाये कि वह किशोर है तो मामला किशोर न्याय बोर्ड को युक्तियुक्त निर्णय हेतु भेजा जाना चाहिए .''
और इधर दंड प्रक्रिया सहिंता १९७३ की धारा ४ के अनुसार -
''दंड प्रक्रिया सहिंता सभी प्रकार के अपराधिक मामलों में विचारण की प्रक्रिया का निर्धारण करती है लेकिन यदि किसी विशिष्ट संविधि में इस सम्बन्ध में कोई अन्यथा प्रावधान किया गया है तो यह इसका अपवाद माना जायेगा.''
इस प्रकार दामिनी मामले में ही क्या सभी ऐसे मामलों में जिनमे नाबालिग अभियुक्त हैं उन पर कार्यवाही का अधिकार किशोर न्याय बोर्ड का है फौजदारी अदालत का नहीं और इसमें संशोधन कर भी दिया जाये तो उक्त कार्यवाही में उस संशोधन का कोई लाभ मिलने वाला नहीं है क्योंकि विधियां भूतलक्षी प्रभाव नहीं रखती ,वे जिस दिन से लागू होती हैं उसी दिन से होने वाले अपराधों पर प्रभावी होती है ,
किन्तु संशोधन ज़रूरी है क्योंकि न्याय की मांग है कि जब कोई किसी का जीने का अधिकार और वह भी सम्मान से जीने का अधिकार छीनता है तो वह दण्डित होना ही चाहिए किन्तु ऐसे अपराधों को उम्र की सीमा में बांधकर पूर्ण न्याय नहीं किया जा सकता जिस प्रकार आई. पी. सी . की धारा ८२ के अनुसार ७ वर्ष तक के बच्चे का कोई कार्य अपराध नहीं माना गया है किन्तु धारा ८३ के अनुसार ७ से १२ वर्ष तक के बच्चे को समझ व् परिपक्वता के आधार पर अपराधी मानने या न मानने की व्यवस्था की गयी है तो ऐसे मामले जिसमे अभियुक्त ने नृशंसता की ,जघन्यता की हदें पार की हैं उसमे उसकी उम्र न देखकर अपराध करने की उसकी समझ व् परिपक्वता को ध्यान में रखना ज़रूरी है क्योंकि जब फौजदारी कानून में १६ से कम और किशोर न्याय अधिनियम में १८ से कम वाले व्यक्ति को अपराधी मानने के मामले में नाबालिग व् व्यस्क का अंतर रखा गया तब यह नहीं सोचा गया होगा कि इतनी उम्र का व्यक्ति ऐसा अपराध भी कर सकता है किन्तु आज जैसे जैसे बच्चों की समझ व् परिपक्वता बढ़ रही है इस तरह कानून को उम्र की सीमा में बांधकर हम अपराधियों के मानवाधिकार तो सुरक्षित कर रहे हैं किन्तु उन पीड़ितों के नहीं जिन्हें संविधान के अनुच्छेद २१ के तहत सम्मानपूर्ण जीने के अधिकार की गारंटी दी जाती है .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

रविवार, 1 दिसंबर 2013

भाजपा ने धारा 370 पर बदला अपना रुख या समझ में अब आयी असलियत

भाजपा ने धारा 370 पर बदला अपना रुख या समझ में अब आयी असलियत narendra modi jammu rally

भाजपा ने धारा 370 पर अपनी घोषित नीति में बदलाव किया है। जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के इस अनुच्छेद को हटाने के बजाए पार्टी अब इस पर देशव्यापी चर्चा की बात करने लगी है।
प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जम्मू रैली में नीतियों में बदलाव के साफ संकेत दिए।
मोदी ने अनुच्छेद 370 को जम्मू कश्मीर के बिगड़े हालात के लिए जिम्मेदार तो ठहराया लेकिन इसे हटाने के मुद्दे पर फैसला जनता के जिम्मे छोड़ दिया।[
अमर उजाला, जम्मू
Updated @ 8:36 PM IST
]से साभार
संविधान का अनुच्छेद ३७० जबसे अस्तित्व में आया है विवादों में है और सम्पूर्ण भारत में जम्मू-कश्मीर को छोड़कर कोई भी इसके पक्ष में नहीं है और न ही हो सकता है पहले भाजपा नेता सैय्यद शाहनवाज़ हुसैन ने सत्ता में आने पर इसे रद्द करने की बात कही और अब इस पर संविधान की स्थिति को समझकर अपने रुख में परिवर्तन की बात कह रहे हैं -

This one's for movie buffs & friendsBJP to revoke Article 370 after coming to power: Shahnawaz Hussain

जिसके बारे में विकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार  स्थिति  ये  है -

Amendment of Article 370[edit]

Under Article 370(3), consent of state legislature and the constituent assembly of the state are also required to amend Article 370. Now the question arises, how can we amend Article 370 when the Constituent Assembly of the state no longer exists? Or whether it can be amended at all? Some jurists say it can be amended by an amendment Act under Article 368 of the Constitution and the amendment extended under Article 370(1). But it is still a mooted question .
अर्थात  अनु .370 [3] के अनुसार -
-इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी ,राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा  घोषणा कर सकेगा कि यह अनुच्छेद प्रवर्तन में नहीं रहेगा या ऐसे अपवादों और उपानतरनो सहित ही और ऐसी तारीख  से ,जो विनिर्दिष्ट करें ,प्रवर्तन में रहेगा .
परन्तु राष्ट्रपति द्वारा ऐसी अधिसूचना जारी किये जाने से पहले खंड[२] में निर्दिष्ट उस राज्य की संविधान सभा की सिफारिश आवश्यक होगी .
.और खंड [२] कहता है -
*[२] यदि खंड [१] के उपखंड [ख] के पैरा [२] में या उस खंड के उपखंड [घ] के दूसरे परन्तुक में निर्दिष्ट उस राज्य  की सरकार की सहमति ,उस राज्य का संविधान बनाने के प्रयोजन के लिए संविधान सभा के बुलाये जाने से पहले दी जाये तो उसे ऐसी संविधान सभा के समक्ष ऐसे विनिश्चय के लिए रखा जायेगा जो वह उस पर करे .
और जहाँ तक वहां की संविधान सभा की बात है तो १ मई १९५१ को जम्मू कश्मीर के लिए पृथक संविधान सभा बनाने की उद्घोषणा युवराज कर्ण सिंह ने की जो ३१ अक्टूबर १९५१ को अस्तित्व में आई और 21 अगस्त 1952 को उसने  युवराज कर्ण सिंह को सदर-ए- रियासत के रूप में निर्वाचित किया .इस प्रकार जम्मू-कश्मीर राज्य में राजाओं का शासन समाप्त  हो गया और राज्य का प्रधान निर्वाचित व्यक्ति होने लगा .संविधान सभा के गठन के उपरांत ४० हज़ार की आबादी पर एक चुनाव क्षेत्र बना .७५ चुनाव क्षेत्रों से ७५ प्रतिनिधि आये इनमे ७३ पर शेख की नॅशनल कॉन्फ्रेंस निर्विरोध जीती तथा दो पर उसने चुनाव जीते २४ सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के लिए सुरक्षित छोड़ी गयी जो अभी तक नहीं भरी जा सकी हैं .
वहां की तत्कालीन संविधान सभा के सदस्यों की सूची निम्नलिखित है -

Members of J&K Constituent Assembly

Members of J&K Constituent Assembly


S.No.MembersConstituency
1.Maulana Mohammad SayeedMasudi Amira Kadal
2.Sheikh Mohammed AbdullahHazratbal
3.Bakshi Ghulam MohammedSafa Kadal
4Mirza Mohammed Afzal BegAnantnag
5Girdhari Lal DograJasmergarh
6Sham Lal Saraf HabbaKadal
7Abdul Aziz ShawlRajouri
8Abdul Gani TraliRajpora
9Abdul Gani GoniBhalesa
10Syed Abdul QadusBiruwa
11Bakshi Abdul RashidCharar-i-Sharief
12Abdul Kabir KhanBandipora (Gurez)
13Abdul KhaliqSaniwara
14Syed Allaudin GilaniHandwara
15Assad UllahMir Ramban
16Bhagat Ram LanderTikri
17Bhagat Chhajju RamRanbirsinghpora
18Sardar Chela SinghChhamb
19Chuni Lal KotwalBhaderwah
20Durga Prashad DharKulgam
21Ghulam Ahmad MirDachinpara
22Master Ghulam AhmedHaveli
23Ghulam Ahmad DevDoda
24Pirzada Ghulam GilaniPampore
25Ghulam Hassan KhanNarwah
26Ghulam Hassan BhatNandi
27Ghulam Hassan MalikDevasar
28Pir Ghulam Mohammad MasoodiTral
29Ghulam Mohammad SadiqTankipora
30Mirza Ghulam Mohammad BegNaubag Brang Valley
31Ghulam Mohammad ButtPattan
32Ghulam Mohi-ud-Din KhanKhansahib
33Ghulam Mohi-ud-Din HamdaniKhanyar
34Mirwaiz Ghulam Nabi HamdaniZaddibal
35Ghulam Nabi WaniDarihgam
36Ghulam Nabi WaniLolab
37Ghulam Qadir BhatKangan
38Ghulam Qadir MasalaDrugmulla
39Ghulam Rasool SheikhShopian
40Ghulam Rasool KarHamal
41Ghulam Rasool KraipakKishtwar
42Hakim Habibullah KhanSopore
43Hem Raj JandialRamnagar
44Sardar Harbans Singh AzadBaramulla
45Syed Ibrahim ShahKargil
46Ishar Devi MainiJammu city (Northern)
47Janki Nath KakrooKothar
48Jamal-ud-DinDrahal
49Maulvi Jamaitali ShahMendhar
50Kushak BakulaLeh
51Kishen Dev SethiNowshera
52Sardar Kulbir SinghPoonch city
53Mohammad Afzal KhanUri
54Sheikh Mohammad AkbarTangmarg
55Mohammad Anwar ShahKarnah
56Mohammad Ayub KhanArnas
57Syed Mohammad JalaliBadgam
58Pir Mohd Maqbool ShahRamhal
59Syed Mir Qasim DoruShahabad
60Mubarik ShahMagam
61Mansukh RaiReasi
62Mahant RamBasohli
63Moti Ram BaigraUdhampur
64Mahasha Nahar SinghBishnah
65Noor DarKowapora
66Noor-ud-Din SufiGanderbal
67Major Piara SinghKathua
68Ram Chand KhajuriaBillawar
69Lala Ram Piara SarafSamba
70Ram DeviJammu city (Southern)
71Ram Rakha MalKahanachak
72Wazir Ram Saran JandrahGarota
73Ram LalAkhnoor
74Sagar SinghParmandal
75Sona Ullah SheikhPulwama
एक देश में दो संविधान दो प्रधानमंत्री व् दो ध्वज को लेकर इसका विरोध भी किया गया  किन्तु  अनुच्छेद ३७० के अंतर्गत यह व्यवस्था थी और संविधान सभा चुनी हुई संस्था थी  जो राज्य के लोगों की इच्छा को दर्शा रही थी परन्तु शेख अब्दुल्लाह ने अपने लोगों को ये बताया कि संविधान सभा सर्वोच्च संस्था है जो कि भारतीय संवैधानिक बाध्यताओं से स्वतंत्र है .शेख अब्दुल्लाह की ऐसी ही बयानबाजी  व् अन्य गतिविधियों के कारण मई १९७१ में उन्हें राज्य से निष्कासित किया गया उसके बाद वे कभी विपक्ष में बोलते थे कभी पक्ष में .भारत और प्लैय्बिसित फ्रंट के प्रतिनिधियों के बीच बहुत सी वार्ताएं हुई और अंत में २४ फरवरी १९७५ को एक करार की घोषणा की गयी इस समझौते का शुद्ध राजनितिक परिणाम यह हुआ कि जनमत संग्रह की मांग को शेख अब्दुल्लाह और उनके अनुयायिओं ने त्याग दिया और यह तय किया गया कि जम्मू कश्मीर राज्य की भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३७० के उपबंधों के अधीन विशेष स्थिति बनी रहेगी
और अब रही इसके लिए अनुच्छेद ३६८ के संशोधन की बात तो ये भी सहज नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसके लिए विशेष बहुमत व् आधे से अधिक राज्यों का अनुसमर्थन आवश्यक है जो कि वर्तमान राजनीतिक विचारधारा के इन अनुयायिओं द्वारा जुटाया जाना नामुमकिन नहीं तो कठिन अवश्य कहा जा सकता है इसलिए शाहनवाज़ जी के द्वारा कही गयी बात कि ३७० को रद्द करेंगे पूरी होना असम्भव लगने पर भाजपा अपने रुख में परिवर्तन दिखा रही है क्योंकि बात यहाँ हमारे कीमती वोट की है जो हासिल करने के लिए इतना कष्ट तो उठाना ही होगा और फिर चुनाव के बाद जिन वादों को पूरा करने की भाजपा कसमें खा रही है वे तो चुनाव से पहले ही अपना दम तोड़ती नज़र आ रही हैं और उसकी घबराहट इस तरह से अपने रुख पलटकर दिखायी जा रही है ..
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]