बुधवार, 30 अप्रैल 2014

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -2


प्रश्न -२ क्या जिस मामले में राष्ट्रपति या राज्यपाल संविधान में मिले माफ़ी देने की शक्ति का इस्तेमाल कर चुके हों उस मामले में सरकार दंड प्रक्रिया संहिता की धरा ४३२-४३३ की शक्तियों का इस्तेमाल कर माफ़ी दे सकती है ?
कानूनी स्थिति -स्वरन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ,[१९९८]४ एससीसी.७५ उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद ७२/१६१ के अंतर्गत यदि राष्ट्रपति/राज्यपाल किसी कैदी के पक्ष में दंड के परिहार [remission] का आदेश जारी करते हैं तो उस आदेश के न्यायिक पुनर्विलोकन में न्यायालय उन आधारों के गुण-दोष के खोज नहीं करते जिनका अनुसरण करके परिहार का वह आदेश जारी किया गया है परन्तु जहाँ कतिपय सारवान तथ्यों को ,जैसे कि पिटीशनर द्वारा गंभीर अपराधों के अन्य दण्डित मामलों में अंतर्ग्रस्त होना ,पूर्व में करुणा की याचिका का अस्वीकृत कर दिया जाना ,कारागार प्राधिकारी की प्रतिकूल रिपोर्ट आदि ,राष्ट्रपति या राज्यपाल की सूचना में नहीं लाया जाता ,वहां इस निर्देश के साथ कि कानून के अनुसार फिर से दंड के परिहार का आदेश पारित किया जाये ,राष्ट्रपति या राज्यपाल के आदेश को विखंडित किया जा सकता है क्योंकि राष्ट्रपति या राज्यपाल की निरंकुश अथवा विद्वेषपूर्ण कार्यवाही न्यायिक पुनर्विलोकन से परे नहीं है .
और इस प्रकार यदि न्यायिक पुनर्विलोकन द्वारा राष्ट्रपति या राज्यपाल का आदेश विखंडित किया जाता है तो समुचित सरकार ४३२-४३३ में अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर दोषी को माफ़ी दे सकती है .

शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

रविवार, 27 अप्रैल 2014

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -1


Constitution bench to decide fate of Rajiv killers 

 राजीव गांधी के हत्यारों को फिलहाल जेल में ही रखने का उच्चतम न्यायालय ने फैसला किया है और इस सम्बन्ध में दोषियों की रिहाई का मसला संविधान पीठ को भेजते हुए अपने कुछ महत्वपूर्ण सवाल संविधान पीठ के सामने रखे हैं जिनका विवरण और उनके सम्बन्ध में कानूनी स्थिति कुछ इस प्रकार है -
*उच्चतम न्यायालय का पहला प्रश्न ये है कि -
प्रश्न-1 -क्या ताउम्र कैद की सजा भोग रहा उम्र कैदी रिहाई की मांग कर सकता है या फिर विशेष अपराधों में जिनमे फांसी की सजा ताउम्र कैद में तब्दील की गयी हो ऐसे दोषी की सजा माफ़ करने के बाद रिहा करने पर रोक लगायी जा सकती है ?
कानूनी स्थिति -ताउम्र कैद की सजा भोग रहा उम्र कैदी रिहाई की मांग नहीं कर सकता .भारतीय दंड संहिता की धारा 57  में दिए गए आजीवन कारावास के प्रावधान के विषय में अभिमत व्यक्त करते हुए उच्चतम न्यायालय ने सुभाष चन्द्र बनाम कृष्णलाल एवं अन्य ए.आई.आर .2001  एस.सी.1903 में कहा -''कि इस दंड से दण्डित व्यक्ति को उसके जीवन पर्यन्त कारावास भोगना होगा जब तक कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसकी सजा लघुकरण या परिवर्तन न कर दिया गया हो ,न्यायालय ने यह भी कहा कि यह आम धारणा पूर्णतः निराधार व् गलत है कि आजीवन कारावास का अर्थ बीस वर्ष के कारावास से अनधिक कारावास होता है और यह माना जाये कि अभियुक्त आवश्यक रूप से इस कारावधि  में ढील या छूट का अधिकारी होगा या इसके लिए पात्र होगा .
       साथ ही विशेष अपराधों में जिनमे फांसी की सजा उम्र कैद में तब्दील की गयी हो ऐसे दोषी की सजा माफ़ करने के बाद रिहा करने पर रोक नहीं लगायी जा सकती .रूदल शाह बनाम बिहार राज्य १९८३ उम.नि.प.३८७ के प्रकरण में दोषमुक्ति के बाद भी पिटीशनर को अवैध रूप से कारागार में निरुद्ध रखा गया न्यायालय द्वारा बंदी प्रत्यक्षीकरण के साथ साथ प्रतिकर का दावा भी स्वीकार किया गया और यह कहा गया कि यदि इस देश में सभ्यता का विनाश नहीं हो जाना है तो यह आवश्यक है कि हम अपने आपको यह स्वीकार करने के लिए सशक्त बनायें कि व्यक्तियों के अधिकारों का समादर गणतंत्र का एक वास्तविक स्तम्भ है .''और जब उस अपराध में उसकी सजा माफ़ कर दी गयी है तो रिहा किया जाना उसका अधिकार बनता है क्योंकि अपराधी होने के कारण वह अपने प्राण के अधिकार  से वंचित नहीं हो जाता है .इसके साथ ही मेनका गांधी बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९७८ एस.सी.५९७ में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया -''कि प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुए जीने का अधिकार है .''और ऐसे में जब सजा माफ़ हो गयी हो तो जेल में रहना उसके मानव गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है इसलिए ऐसे में उसे रिहा किया जाना चाहिए जब फांसी की सजा ताउम्र कैद में तब्दील की जाने के पश्चात माफ़ कर दी गयी हो .
अन्य प्रश्न के संबंध में कानूनी स्थिति अगली पोस्ट में ......
शालिनी कौशिक 
  [कानूनी ज्ञान ]

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

वसीयत सम्बन्धी हिन्दू विधि

वसीयत सम्बन्धी हिन्दू विधि
वसीयत अर्थात इच्छा पत्र एक हिन्दू द्वारा अपनी संपत्ति के सम्बन्ध में एक विधिक घोषणा के समान है जो वह अपनी मृत्यु के बाद सम्पन्न होने की इच्छा करता है। प्राचीन हिन्दू विधि में इस सम्बन्ध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं होती किन्तु आधुनिक विद्वानों के अनुसार  हिन्दू इच्छा पत्र द्वारा अपनी संपत्ति किसी को दे सकता है .
वसीयत किसी जीवित व्यक्ति द्वारा अपनी संपत्ति के बारे में कानूनी घोषणा है जो उसके मरने के बाद प्रभावी होती है .
वसीयत का पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है पर दो साक्षियों द्वारा प्रमाणित होना आवश्यक है [माधव्य बनाम अचभा २ एम.एल.जे ७१६ ]
प्रत्येक स्वस्थ मस्तिष्क वाला वयस्क व्यक्ति जिसने भारतीय वयस्कता अधिनियम १८७५ के अंतर्गत वयस्कता की आयु प्राप्त की है ,इच्छापत्र द्वारा अपनी संपत्ति का निवर्तन कर सकता है अर्थात किसी को दे सकता है [हरद्वारी लाल बनाम गौरी ३३ इलाहाबाद ५२५ ]
वसीयत केवल उस संपत्ति की ही की जा सकती है जिसे अपने जीवित रहते दान रीति द्वारा अंतरित किया जा सकता हो ,ऐसी संपत्ति की वसीयत नहीं की जा सकती जिससे पत्नी का कानूनी अधिकार और किसी का भरण-पोषण का अधिकार प्रभावित होता है .
हिन्दू विधि के अनुसार दाय की दो पद्धतियाँ है -
[१] -मिताक्षरा पद्धति
[२] -दायभाग पद्धति
दायभाग पद्धति बंगाल तथा आसाम में प्रचलित हैं और मिताक्षरा पद्धति भारत के अन्य प्रांतों में .मिताक्षरा विधि में संपत्ति का न्यागमन उत्तरजीविता व् उत्तराधिकार से होता है और दायभाग में उत्तराधिकार से .
मिताक्षरा विधि का यह उत्तरजीविता का नियम संयुक्त परिवार की संपत्ति के सम्बन्ध में लागू होता है तथा उत्तराधिकार का नियम गत स्वामी की पृथक संपत्ति के संबंध में .
मिताक्षरा पद्धति में दाय प्राप्त करने का आधार रक्त सम्बन्ध हैं और दाय भाग में पिंडदान .
और इसलिए उच्चतम न्यायालय ने एस.एन.आर्यमूर्ति बनाम एम.एल.सुब्बरैया शेट्टी ए.आई.आर.१९७२ एस.सी.१२२९ के वाद में यह निर्णय दिया की एक सहदायिक अथवा पता संयुक्त परिवार की संपत्ति को या उसमे के किसी अंश को इच्छापत्र द्वारा निवर्तित नहीं कर सकता क्योंकि उसकी मृत्यु के बाद संपत्ति अन्य सहदयिकों को उत्तरजीविता से चली जाती है और ऐसी कोई संपत्ति शेष नहीं रहती जो इच्छापत्र के परिणामस्वरूप दूसरे को जाएगी .''
किन्तु अब वर्तमान विधि में हिन्दू उत्तराधिकार में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा ३० के अनुसार प्रत्येक मिताक्षरा सहदायिक अपने अविभक्त सहदायिकी अंश को इच्छापत्र द्वारा निवर्तित करने के लिए सक्षम हो गया है .
अतः अब निम्न संपत्ति की वसीयत की जा सकती है -
[मिताक्षरा विधि से ]
[१] स्वअर्जित सम्पदा
[२] स्त्रीधन
[३] अविभाज्य सम्पदा [रूढ़ि से मना न किया गया हो ]
[ दायभाग विधि से ]
[१] वे समस्त जो मिताक्षरा विधि से अंतरित हो सकती हैं ,
[२] पिता द्वारा स्वअर्जित अथवा समस्त पैतृक संपत्ति ,
[३] सहदायिक ,अपने सहदायिकी अधिकार को .
वसीयत को कभी भी वसीयत कर्ता द्वारा परिवर्तित या परिवर्धित किया जा सकेगा .
यदि वसीयत में कोई अवैध या अनैतिक शर्त आरोपित है तब वह वसीयत तो मान्य है और शर्त शून्य है .
इसके साथ ही यदि वसीयत को पंजीकृत करा लिया जाये तो वसीयत का कानूनी रूप से महत्व भी बढ़ जाता है .

शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.



   आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है .
कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं करती हैं और इसके लिए विधि बनाने में काफी समय लगेगा ;अतः जब तक विधान मंडल समुचित विधि नहीं बनाता है न्यायालय द्वारा विहित मार्गदर्शक सिद्धांत को लागू किया जायेगा .

न्यायालय ने ये भी निर्णय दिया कि ''प्रत्येक नियोक्ता या अन्य व्यक्तियों का यह कि काम के स्थान या अन्य स्थानों में चाहे प्राईवेट हो या पब्लिक ,श्रमजीवी महिलाओं के यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित उपाय करे .इस मामले में महिलाओं के अनु.१४,१९ और २१ में प्रदत्त मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विशाखा नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने लोकहित वाद न्यायालय में फाईल किया था .याचिका फाईल करने का तत्कालीन कारण राजस्थान राज्य में एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना थी .न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये-
[१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शरीक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींटाकशी करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम [१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शारीरिक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी  छींटाकशी करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम या विनियमों में यौन उत्पीडन रोकने सम्बन्धी नियम शामिल किये जाने चाहिए और ऐसे नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए समुचित दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए .
[स] प्राईवेट क्षेत्र के नियोक्ताओं के सम्बन्ध में औद्योगिक नियोजन [standing order  ]अधिनियम १९४६ के अधीन ऐसे निषेधों को शामिल किया जाना चाहिए.
[द] महिलाओं को काम,आराम,स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञानं के सम्बन्ध में समुचित परिस्थितियों का प्रावधान होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया  जाना चाहिए  कि महिलाओं को काम के स्थान में कोई विद्वेष पूर्ण वातावरण न हो उनके मन में ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि वे नियोजन आदि के मामले में अलाभकारी स्थिति में हैं .
[२] जहाँ ऐसा आचरण भारतीय दंड सहिंता या किसी अन्य विधि के अधीन विशिष्ट अपराध होता हो तो नियोक्ता को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को शिकायत करके समुचित कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए .
[३]यौन उत्पीडन की शिकार महिला को अपना या उत्पीडनकर्ता  का स्थानांतरण करवाने का विकल्प होना चाहिए.
न्यायालय ने कहा कि ''किसी वृत्ति ,व्यापर या पेशा के चलाने के लिए सुरक्षित काम का वातावरण होना चाहिए .''प्राण के अधिकार का तात्पर्य मानव गरिमा से जीवन जीना है ऐसी सुरक्षा और गरिमा की सुरक्षा को समुचित कानून द्वारा सुनिश्चित कराने तथा लागू करने का प्रमुख दायित्व विधान मंडल और कार्यपालिका का है किन्तु जब कभी न्यायालय के समक्ष अनु.३२ के अधीन महिलाओं के यौन उत्पीडन का मामला लाया जाता है तो उनके मूल अधिकारों की संरक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना ,जब तक कि  समुचित विधान नहीं बनाये जाते उच्चतम न्यायालय का संविधानिक कर्त्तव्य है.

इस प्रकार यदि इस निर्णय के सिद्धांतों को नियोक्ताओं द्वारा प्रयोग में लाया जाये तो श्रमजीवी महिलाओं की स्थिति में पर्याप्त सुधार लाया जा सकता है.
शालिनी कौशिक 
    एडवोकेट 

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

धारा ५०६ भारतीय दंड संहिता में दंडनीय है ये धमकी

मोदी लहर में  ''हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुपट्टा  मलमल का '' की तर्ज़ पर लहराती इठलाती भाजपा ''यहाँ के हम सिकंदर ,चाहें तो रखें सबको अपनी जेब के अंदर ''गाने में मस्त थी की एकाएक लहर ने दिशा पलट दी ,फूलों के झौंके पत्थरों के टुकड़ों समान हो गए और भ्रम में डूबे भाजपाइयों के हंसगुल्लों की चाशनी इतनी मीठी हो गयी कि मुंह कड़वा करने लगी ऐसा हुआ तब जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार श्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव आयोग द्वारा अनिवार्य किये जाने पर बाध्य होकर अपनी वास्तविक स्थिति ,जो वैवाहिक की थी को नामांकन पत्र में भरा  ,उस वैवाहिक स्थिति को जिसे वे अपने चार विधानसभा चुनावों में नकारते आ रहे थे और जिसका खुलासा कॉंग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह जी ने किया नहीं तो संभव था कि वे अब भी चुनाव आयोग के निर्देश को दरकिनार कर स्वयं को अविवाहित दिखा देते क्योंकि चुनाव आयोग की उनके सामने क्या प्रास्थिति है सब जानते हैं और ऐसा वे और भाजपा इस बार ७ अप्रैल को अपना घोषणापत्र जारी कर दिखा चुके हैं .
अब जब प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के नशे में झूमते मोदी जी द्वारा स्वयं को श्रेष्ठ ,काबिल ,ईमानदार और हर तरह से इस कुर्सी का सशक्त दावेदार दिखाया जाता है तो विरोधी पार्टी द्वारा हमले स्वाभाविक हैं और कॉंग्रेस द्वारा तो निश्चित क्योंकि इस बार मोदी न देश बनाने का मुद्दा साथ लेकर चल रहे हैं और न ही भ्रष्टाचार मिटाने का, केवल एक ही लक्ष्य उनकी जुबां पर है और वह है ''कॉंग्रेस का खात्मा ''और ऐसे में कॉंग्रेस  उन्हें कैसे छोड़ सकती है ?कॉंग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इसकी कमान संभाली और कह दिया  -
{“I don't know how many elections the Gujarat CM has fought, but first time he has written his wife's name on the affidavit,” Rahul Gandhi said while addressing a rally in Doda in Jammu & Kashmir.
The young Congress leader went on to say, “In Delhi, on posters talk is of giving respect to women, but in the affidavit there was no mention of wife till this time.” }

क्या गलत कहा उन्होंने ?एक कॉंग्रेसी या भाजपाई के दृष्टिकोण से इतर देखते हुए अगर सोचा जाये तो एक एक बात सत्य व् सार्थक है उनकी ,मोदी की तरह सभ्यता की चाशनी में डूबे पोटेशियम साइनाइड की तरह नहीं और बौखला गयी भाजपा और आ गयी खुलेआम धमकी पर जिसे चुनाव आयोग जिसपर चुनावों के निर्देशन ,नियंत्रण व् अधीक्षण की ज़िम्मेदारी है स्वयं नहीं देखेगा ,देखेगा तब जब उससे शिकायत की जाएगी और शिकायत की वजह है भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद की खुलेआम धमकी जो कि उन्होंने अपनी बौखलाई हुई मुखमुद्रा में कुछ यूँ दी है -

{However, the BJP has reacted angrily to Congress leaders making personal attacks on its prime ministerial candidate and threatened to raise issues related to the Gandhi family.
“If Rahul Gandhi is raising personal issues of Modi ji's life, we can pick up loads of Gandhi family issues, which we don't,” Ravi Shankar Prasad of BJP said. }

भाजपा जनहित की बात करती है और अगर गांधी /नेहरू परिवार के ये मुद्दे जनता को जानने ज़रूरी हैं तो उन्हें अब तक जनता को क्यूँ नहीं बताया और जनता का इनसे कोई सरोकार नहीं है फिर मात्र गांधी /नेहरू परिवार को बदनाम करने का डर दिखाकर उन्हें चुप रहने के लिए कहना क्या वे स्वयं नहीं जानते कि ये क्या है -
धारा ५०३ भारतीय दंड संहिता कहती है -जो कोई किसी अन्य व्यक्ति के शरीर ,ख्याति या संपत्ति को ,या किसी ऐसे व्यक्ति के शरीर या ख्याति को जिससे कि वह व्यक्ति हितबद्ध हो ,कोई क्षति करने की धमकी उस अन्य व्यक्ति को इस आशय से देता है कि उसे संत्रास कारित किया जाये  ,या उससे ऐसी धमकी के निष्पादन का परिवर्जन करने के साधन स्वरुप कोई ऐसा कार्य कराया जाये ,जिसे करने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध न हो ,या किसी ऐसे कार्य करने का लोप कराया जाये ,जिसे करने के लिए वह वैध रूप से हक़दार हो ,वह ''आपराधिक अभित्रास'' करता है  .
स्पष्टीकरण-किसी ऐसे मृत व्यक्ति की ख्याति को क्षति करने की धमकी ,जिससे वह व्यक्ति ,जिसे धमकी दी गयी है ,हितबद्ध हो ,इस धारा के अंतर्गत आता है .
धारा ५०६ -जो कोई आपराधिक अभित्रास का अपराध करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से ,जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी ,या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .
तथा यदि धमकी मृत्यु या घोर उपहति कारित करने की या अग्नि द्वारा किसी संपत्ति का नाश कारित करने की या मृत्युदंड से या आजीवन कारावास से या सात वर्ष की अवधि तक के कारावास से दंडनीय अपराध कारित करने की ,ये किसी स्त्री पर असतीत्व का लांछन लगाने की हो ,तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से ,जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी ,या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .
अब ये चुनाव आयोग को देखना है कि भाजपा के रविशंकर प्रसाद की इस बौखलाहट को तवज्जो दी जाये या इस देश के कानून को .भारतीय राजनीति का स्तर गिर रहा है अब राजनीतिज्ञ टिप्पणियों से कानून के खुलेआम उल्लंघन पर आ गए हैं और ऐसे में भारतीय लोकतंत्र की गरिमा को बनाये रखना ज़्यादा ज़रूरी है और ऐसे में रविशंकर प्रसाद पर उनके द्वारा इस तरह के कथनों के इस्तेमाल पर त्वरित कार्यवाही होनी ही चाहिए क्योंकि भारतीय संविधान अभिवयक्ति की स्वतंत्रता देता है आपराधिक अभित्रास या ब्लैकमेलिंग की नहीं .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

धारा ४९८-क भा. द. विधान 'एक विश्लेषण '

   धारा ४९८-क भा. द. विधान 'एक विश्लेषण '

                                   

विवाह दो दिलों का मेल ,दो परिवारों का मेल ,मंगल कार्य और भी पता नहीं किस किस उपाधि से विभूषित किया जाता है किन्तु एक उपाधि जो इस मंगल कार्य को कलंक लगाने वाली है वह है ''दहेज़ का व्यापार''और यह व्यापर विवाह के लिए आरम्भ हुए कार्य से आरम्भ हो जाता है और यही व्यापार कारण है उन अनगिनत क्रूरताओं का जिन्हें झेलने  को  विवाहिता स्त्री तो विवश है और विवश हैं उसके साथ उसके मायके के प्रत्येक सदस्य.कानून ने विवाहिता स्त्री की स्थति ससुराल में मज़बूत करने हेतु कई उपाय किये और उसके ससुराल वालों व् उसके पति  पर लगाम कसने को भारतीय दंड सहिंता में धारा ४९८-क स्थापित की और ऐसी क्रूरता करने वालों को कानून के घेरे में लिया, पर जैसे की भारत में हर कानून का सदुपयोग बाद में दुरूपयोग पहले आरम्भ   हो जाता है ऐसा ही धारा ४९८-क के साथ हुआ.दहेज़ प्रताड़ना के आरोपों में गुनाहगार के साथ बेगुनाह भी जेल में ठूंसे जा रहे हैं .सुप्रीम कोर्ट इसे लेकर परेशान है ही विधि आयोग भी इसे लेकर , धारा ४९८-क को यह मानकर कि यह पत्नी के परिजनों के हाथ में दबाव का एक हथियार बन गयी है ,दो बार शमनीय बनाने की सिफारिश कर चुका है.३० जुलाई २०१० में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार से धारा ४९८-क को शमनीय बनाने को कहा है .विधि आयोग ने १५ वर्ष पूर्व १९९६  में अपनी १५४ वीं रिपोर्ट तथा उसके बाद २००१ में १७७ वीं रिपोर्ट में इस अपराध को कम्पौन्देबल   [शमनीय] बनाने की मांग की थी .आयोग का कघ्ना था ''कि यह महसूस किया जा रहा है कि धारा ४९८-क का इस्तेमाल प्रायः पति के परिजनों को परेशान करने के लिए किया जाता है और पत्नी के परिजनों के हाथ में यह धारा एक दबाव का हथियार बन गयी है जिसका प्रयोग कर वे अपनी मर्जी से पति को दबाव में लेते हैं .इसलिए आयोग की राय है कि इस अपराध को कम्पओंदेबल अपराधों की श्रेणी  में डालकर उसे सी.आर.पी.सी.की धारा ३२० के तहत कम्पओंदेबल अपराधों की सूची में रख दिया जाये.ताकि कोर्ट की अनुमति से पार्टियाँ समझौता कर सकें.''सी.आर.पी.सी. की धारा ३२० के तहत कोर्ट की अनुमति से पार्टियाँ एक दुसरे का अपराध माफ़ कर सकती हैं.कोर्ट की अनुमति लेने की वजह यह देखना है कि पार्टियों ने बिना किसी दबाव के तथा मर्जी से समझौता किया है.
                  सुप्रीम कोर्ट के अनुसार यदि इस अपराध को शमनीय बना दिया जाये तो इससे हजारों मुक़दमे आपसी समझौते होने से समाप्त हो जायेंगे और लोगो को अनावश्यक रूप से जेल नहीं जाना पड़ेगा.लेकिन यदि हम आम राय की बात करें तो वह इसे शमनीय अपराधों की श्रेणी में आने से रोकती है  क्योंकि भारतीय समाज में वैसे भी लड़की/वधू के परिजन एक भय के अन्दर ही जीवन यापन करते हैं ,ऐसे में बहुत से ऐसे मामले जिनमे वास्तविक गुनाहगार जेल के भीतर हैं वे इसके शमनीय होने का लाभ उठाकर लड़की/वधू के परिजनों को दबाव में ला सकते हैं.इसलिए आम राय इसके शमनीय होने के खिलाफ है.
                         धारा-४९८-क -किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता-जो कोई किसी स्त्री का पति या पति का नातेदार होते हुए ऐसी स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा ,वह कारावास से ,जिसकी अवधि ३ वर्ष तक की हो सकेगी ,दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डित होगा.
   दंड संहिता में यह अध्याय दंड विधि संशोधन अधिनियम ,१९८३ का ४६ वां जोड़ा गया है और इसमें केवल धारा ४९८-क ही है.इसे इसमें जोड़ने का उद्देश्य ही स्त्री के प्रति पुरुषों  द्वारा की जा रही क्रूरताओं का निवारण करना था .इसके साथ ही साक्ष्य अधिनियम में धारा ११३-क जोड़ी गयी थी जिसके अनुसार यदि किसी महिला की विवाह के ७ वर्ष के अन्दर मृत्यु हो जाती है तो घटना की अन्य परिस्थितयों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय यह उपधारना    कर  सकेगा  की उक्त मृत्यु महिला के पति या पति के नातेदारों के दुष्प्रेरण के कारण हुई है.साक्ष्य अधिनियम की धारा ११३-क में भी क्रूरता के वही अर्थ हैं जो दंड सहिंता की धारा ४९८-क में हैं.पति का रोज़ शराब पीकर देर से घर  लौटना,और इसके साथ ही पत्नी को पीटना :दहेज़ की मांग करना ,धारा ४९८-क के अंतर्गत क्रूरता पूर्ण व्यवहार माने गए हैं''पी.बी.भिक्षापक्षी बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य १९९२ क्रि०ला० जन०११८६ आन्ध्र''
विभिन्न मामले और इनसे उठे विवाद 
१-इन्द्रराज मालिक बनाम श्रीमती सुनीता मालिक १९८९ क्रि०ला0जन०१५१०दिल्ली में धारा ४९८-क के प्रावधानों को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी की यह धारा संविधान के अनुच्छेद १४ तथा २०'२' के उपबंधों का उल्लंघन करती है क्योंकि ये ही प्रावधान दहेज़ निवारण अधिनियम ,१९६१ में भी दिए गए हैं अतः  यह धारा दोहरा संकट की स्थिति उत्पन्न करती है जो अनुच्छेद २०'३' के अंतर्गत वर्जित है .दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा ''धारा ४९८-क व् दहेज़ निवारण अधिनियम की धरा ४ में पर्याप्त अंतर है .दहेज़ निवारण अधिनियम की धारा ४ के अधीन दहेज़ की मांग करना मात्र अपराध है जबकि धारा ४९८-क इस अपराध के गुरुतर रूप  को दण्डित करती है .इस मामले में पति के विरुद्ध आरोप था कि वह अपनी पत्नी को बार बार यह धमकी देता रहता था कि यदि उसने अपने माता पिता को अपनी संपत्ति बेचने के लिए विवश करके उसकी अनुचित मांगों को पूरा नहीं किया तो उसके पुत्र को उससे छीन कर अलग कर दिया जायेगा .इसे धारा ४९८-क के अंतर्गत पत्नी के प्रति क्रूरता पूर्ण व्यवहार माना गया  और पति को इस अपराध के लिए सिद्धदोष किया गया.
2-बी एस. जोशी बनाम हरियाणा राज्य २००३'४६'ए ०सी  ०सी 0779 ;२००३क्रि०ल०जन०२०२८'एस.सी.'में उच्चतम न्यायालय  ने माना कि इस धारा का उद्देश्य किसी  स्त्री का उसके पति या पति द्वारा किये जाने वाले उत्पीडन का निवारण करना था .इस धारा को इसलिए जोड़ा गया कि इसके द्वारा पति या पति के ऐसे नातेदारों को दण्डित किया जाये जो पत्नी को अपनी व् अपने नातेदारों की  दहेज़ की विधिविरुद्ध मांग की पूरा करवाने के लिए प्रपीदित करते हैं .इस मामले में पत्नी ने पति व् उसके नातेदारों के विरुद्ध दहेज़ के लिए उत्पीडन का आरोप लगाया था किन्तु बाद में उनके मध्य विवाद का समाधान हो गया और पति ने दहेज़ उत्पीडन के लिए प्रारंभ की गयी कार्यवाहियों को अभिखंडित करने के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन किया जिसे खारिज कर दिया गया था .तत्पश्चात उच्चतम न्यायालय   में अपील दाखिल की गयी थी जिसमे यह अभिनिर्धारित किया गया कि परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मामले में उच्च तकनीकी विचार उचित नहीं होगा और यह स्त्रियों के हित के विरुद्ध होगा.उच्चतम न्यायालय ने अपील स्वीकार कर कार्यवाहियों को अभिखंडित कर दिया. 
३- थातापादी वेंकट लक्ष्मी बनाम आँध्रप्रदेश राज्य १९९१ क्रि०ल०जन०७४९ आन्ध्र में इस अपराध को शमनीय निरुपित किया गया है परन्तु यदि आरोप पत्र पुलिस द्वारा फाइल किया गया है तो अभियुक्त की प्रताड़ित पत्नी उसे वापस नहीं ले सकेगी.
४-शंकर प्रसाद बनाम राज्य १९९१ क्रि० ल० जन० ६३९ कल० में दहेज़ की केवल मांग करना भी दंडनीय अपराध माना गया .
५- सरला प्रभाकर वाघमारे बनाम महाराष्ट्र राज्य १९९० क्रि०ल०जन० ४०७ बम्बई में ये कहा गया कि इसमें हर प्रकार की प्रताड़ना का समावेश नहीं है इस अपराध के लिए अभियोजन हेतु परिवादी को निश्चायक रूप से यह साबित करना आवश्यक होता है कि पति तथा उसके नातेदारों द्वारा उसके साथ मारपीट या प्रताड़ना दहेज़ की मांग की पूर्ति हेतु या उसे आत्महत्या  करने के लिए विवश करने के लिए की गयी थी .
६- वम्गाराला येदुकोंदाला बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य १९८८ क्रि०ल०जन०१५३८ आन्ध्र में धारा ४९८-क का संरक्षण  रखैल को भी प्रदान किया गया है .
७-शांति बनाम हरियाणा राज्य ए०आइ-आर०१९९१ सु०को० १२२६ में माना गया कि धारा ३०४ -ख में प्रयुक्त क्रूरता शब्द का वही अर्थ है जो धारा ४९८ के स्पष्टीकरण  में दिया गया है ........जहाँ अभियुक्त के विरुद्ध धारा ३०४-ख तथा धारा ४९८-क दोनों के अंतर्गत अपराध सिद्ध हो जाता है उसे दोनों ही धाराओं के अंतर्गत सिद्धदोष किया जायेगालेकिन उसे धारा ४९८-क केअंतर्गत पृथक दंड दिया जाना आवश्यक नहीं होगा क्योंकि  उसे धारा ३०४-ख  के अंतर्गत गुरुतर अपराध के लिए सारभूत दंड दिया जा रहा है.
८- पश्चिम बंगाल बनाम ओरिवाल जैसवाल १९९४ ,१,एस.सी.सी. ७३ '८८' के मामले में पति तथा सास की नव-वधु के प्रति क्रूरता साबित हो चुकी थी .मृतका की माता ,बड़े भाई तथा अन्य निकटस्थ रिश्तेदारों  द्वारायह साक्ष्य दी गयी  .कि अभियुक्तों द्वारा मृतका को शारीरिक व् मानसिक यातनाएं पहुंचाई  जाती थी .अभियुक्तों द्वारा बचाव में यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि उक्त साक्षी मृतका में हित रखने वाले साक्षी थे अतः उनके साक्ष्य की पुष्टि अभियुक्तों के पड़ोसियों तथा किरायेदारों के आभाव में स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है .परन्तु उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि दहेज़ प्रताड़ना के मामलो में दहेज़ की शिकार हुई महिला को निकटस्थ नातेदारों के साक्षी की अनदेखी केवल इस आधार पर नहीं की जा सकती कि उसकी संपुष्टि अन्य स्वतंत्र साक्षियों द्वारा नहीं की गयी है .
              इस प्रकार उपरोक्त मामलों का विश्लेषण यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि न्यायालय अपनी जाँच व् मामले का विश्लेषण प्रणाली से मामले की वास्तविकता को जाँच सकते हैं  और ऐसे में इस कानून का दुरूपयोग रोकना न्यायालयों के हाथ में है .यदि सरकार द्वारा इस कानून को शमनीय बना दिया गया तो पत्नी व् उसके परिजनों पर दबाव बनाने के लिए पति व् उसके परिजनों को एक कानूनी मदद रुपी हथियार दे दिया जायेगा.न्यायालयों का कार्य न्याय करना है और इसके लिए मामले को सत्य की कसौटी पर परखना न्यायालयों के हाथ में है .भारतीय समाज में जहाँ पत्नी की स्थिति पहले ही पीड़ित की है और जो काफी स्थिति ख़राब होने पर ही कार्यवाही को आगे आती है .ऐसे में इस तरह इस धारा को शमनीय बनाना उसे न्याय से और दूर करना हो जायेगा.हालाँकि कई कानूनों की तरह इसके भी दुरूपयोग के कुछ मामले हैं किन्तु न्यायालय को हंस  की भांति   दूध   से दूध   और पानी  को अलग  कर  स्त्री  का सहायक  बनना  होगा .न्यायलय  यदि सही  दृष्टिकोण  रखे  तो यह धारा कहर  से बचाने  वाली  ही कही  जाएगी  कहर   बरपाने  वाली  नहीं क्योंकि  सामाजिक  स्थिति को देखते  हुए  पत्नी व् उसके परिजनों को कानून के मजबूत  अवलंब  की आवश्यक्ता    है.
                                                                               शालिनी   कौशिक   [एडवोकेट  ]
                   http://shalinikaushikadvocate.blogspot.com