रविवार, 27 सितंबर 2015

अपनी संपत्ति-देख-रेख व् सुख सुविधा अपने हाथ



STOP PASTING POSTERS on city walls making it look ugly.: Create online campaign to stop pasting posters on Bangalore City walls.
हमारे घर के पास अभी हाल ही में एक मकान बना है .अभी तो उसकी पुताई का काम होकर निबटा ही था कि क्या देखती हूँ कि उस पर एक किसी ''शादी विवाह ,पैम्फलेट आदि बनाना के विज्ञापन चिपक गया .बहुत अफ़सोस हो रहा था कि आखिर लोग मानते क्यों नहीं ?क्यूं नई दीवार पर पोस्टर लगाकर उसे गन्दा कर देते हैं ?
यही नहीं हमारे घर से कुछ दूर एक आटा चक्की है और जब वह चलती है तो उसके चलने से आस-पास के सभी घरों में कुछ हिलने जैसा महसूस होता है .मुझे ये भी लगता है कि जब हमारे घर के पास रूकती कोई कार हमारे सिर में दर्द कर देती है तब क्या चक्की का चलना आस-पास वालों के लिए सिर दर्द नहीं है ?फिर वे क्यूं कोई कार्यवाही नहीं करते ?
मेरे इन सभी प्रश्नों के उत्तर मेरी बहन मुझे देती है कि पहले तो लोग जानते ही नहीं कि उनके इस सम्बन्ध में भी कोई अधिकार हैं और दुसरे ये कि लोग कानूनी कार्यवाही के चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहते क्योंकि ये बहुत लम्बी व् खर्चीली हैं किन्तु ये तो समस्या का समाधान नहीं है इस तरह तो हम हर जगह अपने को झुकने पर मजबूर कर देते हैं और चलिए थोड़ी देर कोई मशीनरी चलनी हो तो बर्दाश्त की जा सकती है किन्तु सदैव के लिए तो नहीं और जहाँ तक पोस्टर आदि की बात है वे सभ्यता की सीमा में हों तो अपनी विवशता मान सह लेंगे किन्तु जैसी आजकल की फिल्मों के पोस्टर होते हैं उन्हें तो १ सेकंड के लिए भी देखना मुश्किल है फिर अपनी ही दीवार पर ,ऐसे में कार्यवाही के बिना कुछ भी संभव नहीं .
पोलक के अनुसार -'' बिना विधिक औचित्य के किसी की भूमि पर या उससे सम्बंधित किसी अधिकार में हस्तक्षेप करना उपताप कहलाता है .''
ब्लैकस्टोन के अनुसार -''उपताप ऐसा कृत्य है जिससे किसी व्यक्ति को आघात ,असुविधा या क्षति होती है .''
आप सभी उपताप जानते हों या न हों किन्तु nuisance अवश्य जानते होंगे ये दो प्रकार के होते हैं एक सार्वजानिक उपताप और एक व्यक्तिगत उपताप .सार्वजनिक उपताप भारतीय दंड सहिंता की धारा २६८ में वर्णित हैं किन्तु मैं जिस उपताप की बात कर रही हूँ वह व्यक्तिगत उपताप हैं और यह मूल रूप से व्यक्ति या व्यक्तियों को प्रभावित करता है .यह ऐसा कार्य या चूक है जिससे किसी की संपत्ति के स्वामी या अधिभोक्ता के अधिकारों पर क्षतिकारी प्रभाव पड़ता है या उनकी संपत्ति को हानि पहुँचती है या उनके सुख-सुविधा ,स्वास्थ्य में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप होता है जो कि अनुचित होता है .और इस मामले में वादी को निम्न उपचार उपलब्ध हैं -
१- उपताप का उपशमन [Abatement ]
२- क्षतिपूर्ति [damages ]
३- निषेधाज्ञा [injunction ]
पहले उपचार में वादी उपताप को स्वयं हटा सकता है जैसे किसी और के पेड़ की टहनी आदि का वादी के घर में लटकने पर उन्हें हटाने का अधिकार उसे है .
दुसरे उपचार में वादी वाद दायर कर न्यायालय से क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकता है .
तीसरे उपचार में वादी उपताप को रुकवाने के लिए न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकता है .
अब ये आप सभी के ऊपर है कि कानून से अधिकार प्राप्त होने पर भी आप उपताप को हटाते हैं या झेलते हैं .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

बुधवार, 2 सितंबर 2015

[अभी अनिवार्यता की स्थिति नहीं -मदरसों में तिरंगा ]

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मदरसों में तिरंगा फहराना अनिवार्य घोषित किया है जबकि भारतीय ध्वज संहिता ऐसा कोई कर्तव्य ऐसी किसी संस्था पर नहीं आरोपित करती जिसमे तिरंगा फहराना उसके लिए अनिवार्य हो। भारतीय ध्वज संहिता २००२ कहती है -

भारतीय ध्वज संहिता

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
लाल किला, दिल्ली की प्राचीर पर फहराता तिरंगा
भारतीय ध्वज संहिता भारतीय ध्वज को फहराने व प्रयोग करने के बारे में दिये गए निर्देश हैं। इस संहिता का आविर्भाव २००२ में किया गया था। भारत का राष्ट्रीय झंडा, भारत के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिरूप है। यह राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। सभी के मार्गदर्शन और हित के लिए भारतीय ध्वज संहिता-२००२ में सभी नियमों, रिवाजों, औपचारिकताओं और निर्देशों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया है। ध्वज संहिता-भारत के स्थान पर भारतीय ध्वज संहिता-२००२ को २६ जनवरी २००२ से लागू किया गया है।[1]
  • जब भी झंडा फहराया जाए तो उसे सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाए। उसे ऐसी जगह लगाया जाए, जहाँ से वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
  • सरकारी भवन पर झंडा रविवार और अन्य छुट्‍टियों के दिनों में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता है, विशेष अवसरों पर इसे रात को भी फहराया जा सकता है।
  • झंडे को सदा स्फूर्ति से फहराया जाए और धीरे-धीरे आदर के साथ उतारा जाए। फहराते और उतारते समय बिगुल बजाया जाता है तो इस बात का ध्यान रखा जाए कि झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।
  • जब झंडा किसी भवन की खिड़की, बालकनी या अगले हिस्से से आड़ा या तिरछा फहराया जाए तो झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।
  • झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाएगा कि जब वक्ता का मुँह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिने ओर हो।
  • झंडा किसी अधिकारी की गाड़ी पर लगाया जाए तो उसे सामने की ओर बीचोंबीच या कार के दाईं ओर लगाया जाए।
  • फटा या मैला झंडा नहीं फहराया जाता है।
  • झंडा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।
  • किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय झंडे से ऊँचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा।
  • झंडे पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।
  • जब झंडा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।

संशोधन[संपादित करें]

भारतीय नागरिक अब रात में भी राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहरा सकते हैं। इसके लिए शर्त होगी कि झंडे का पोल वास्तव में लंबा हो और झंडा खुद भी चमके।[2] गृह मंत्रालय ने उद्योगपति सांसद नवीन जिंदल द्वारा इस संबंध में रखे गये प्रस्ताव के बाद यह फैसला किया। इससे पहले जिंदल ने हर नागरिक के मूलभूत अधिकार के तौर पर तिरंगा फहराने के लिहाज से अदालती लड़ाई जीती थी। कांग्रेस नेता जिंदल को दिये गये संदेश में मंत्रालय ने कहा कि प्रस्ताव की पड़ताल की गयी है और कई स्थानों पर दिन और रात में राष्ट्रीय ध्वज को फहराने के लिए झंडे के बड़े पोल लगाने पर कोई आपत्ति नहीं है। जिंदल ने जून २००९ में मंत्रालय को दिये गये प्रस्ताव में बड़े आकार के राष्ट्रीय ध्वज को स्मारकों के पोलों पर रात में भी फहराये जाने की अनुमति मांगी थी। जिंदल ने कहा था कि भारत की झंडा संहिता के आधार पर राष्ट्रीय ध्वज जहां तक संभव है सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच फहराया जाना चाहिए, लेकिन दुनियाभर में यह सामान्य है कि बड़े राष्ट्रीय ध्वज १०० फुट या इससे उंचे पोल पर स्मारकों पर दिन और रात फहराये गये होते हैं।                            
  Image result for fundamental duties  साथ ही भारतीय संविधान के भाग-४ में अनुच्छेद ५१ क में बताये गए मूल कर्तव्यों में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो इसे अनिवार्य बनाये। अनुच्छेद ५१ क का भाग क कहता है कि -
[क]   संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों ,संस्थाओं ,राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान  का आदर करें। 
        इसलिए भारतीय कानून का वर्तमान स्वरुप इस अनिवार्यता की राह में बाधा है और यह तभी अनिवार्य हो सकता है जब सम्बंधित कानून में संशोधन हो।
शालिनी कौशिक 
[कानूनी ज्ञान  ]