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बिजली कनेक्शन अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार - इलाहाबाद हाइकोर्ट

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  इस बात पर ज़ोर देते हुए कि बिजली कनेक्शन पाना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकार है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे वैवाहिक विवाद के बीच एक नई घरेलू बिजली कनेक्शन के लिए एक बहू द्वारा दायर आवेदन पर कार्रवाई करें। जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रीति शर्मा द्वारा दायर एक रिट याचिका पर यह आदेश पारित किया। संक्षेप में मामला याचिकाकर्ता (शर्मा) प्रतिवादी नंबर 7 की बहू है और प्रतिवादी नंबर 6 की पत्नी है। उसका पक्ष यह था कि वह रायबरेली जिले में एक साझा घर में 20 वर्षों से अधिक समय से रह रही है और उसके छोटे बच्चे हैं। हालांकि, उसके ससुराल वाले एक वैवाहिक विवाद के कारण उसे उक्त घर से अवैध तरीके से निकालने की कोशिश कर रहे हैं। हाईकोर्ट के समक्ष यह प्रस्तुत किया गया कि उसकी बिजली की आपूर्ति काट दी गई, भले ही वह नियमित रूप से बिजली के बिलों का भुगतान करती थी। इसलिए उसने फरवरी, 2026 में बिजली विभाग के पास एक नए कनेक्शन के लिए आवेदन दायर किया। चूंकि इस आव...

महिला आरक्षण कानून लागू

 केंद्र सरकार ने संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 को 16 अप्रैल 2026 से लागू कर दिया है, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण का प्रावधान है। विधि एवं न्याय मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर इस तारीख को कानून के लागू होने की तिथि घोषित किया। गौरतलब है कि इस कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी 2023 में ही मिल गई थी, लेकिन इसकी धारा 1(2) के तहत इसे लागू करने की तारीख केंद्र सरकार की अधिसूचना पर निर्भर थी, जिसके कारण यह अब तक लागू नहीं हुआ था।  यह अधिसूचना ऐसे समय में आई है जब संसद में परिसीमन (delimitation) और महिला आरक्षण के क्रियान्वयन से जुड़े नए संवैधानिक संशोधनों पर चर्चा चल रही है। 2023 के कानून के अनुसार, महिला आरक्षण अगले जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होना था। इसी बीच, केंद्र सरकार ने 16 अप्रैल को संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश किया है, जिसमें लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने और महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने वाली शर्त में बदलाव का प्रस्ताव है, ताकि इसे जल्द लागू किया जा सके। हालांकि, विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण का...

रजिस्टर्ड एडवोकेट को ही वकालत का अधिकार - इलाहाबाद हाइकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि  कोई भी व्यक्ति, भले ही उसके पास पावर ऑफ़ अटॉर्नी हो, एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए मुक़दमे लड़ने वालों की ओर से और उनकी तरफ़ से एक वकील या अटॉर्नी के तौर पर अधिकार के तौर पर पेश होकर बहस नहीं कर सकता।  एडवोकेट्स एक्ट 1961 की धारा 29 और 33 का ज़िक्र करते हुए जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने साफ़ तौर पर कहा कि   सिर्फ़ "रजिस्टर्ड वकील" ही किसी दूसरे व्यक्ति की ओर से कोर्ट के सामने पेश होकर बहस कर सकते हैं। बेंच ने आगे कहा कि  हालांकि कोई भी व्यक्ति कोर्ट की मंज़ूरी से किसी सीमित मकसद के लिए किसी दूसरे व्यक्ति का केस पेश कर सकता है और बहस कर सकता है, लेकिन अधिकार के तौर पर ऐसा नहीं कर सकता [धारा 32]।  इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने एक याचिका खारिज की, जिसमें याचिकाकर्ता ने मुक़दमे लड़ने वालों की ओर से और उनकी तरफ़ से केस लड़ने और बहस करने की इजाज़त माँगी थी, जबकि वह न तो क़ानून का जानकार ग्रेजुएट था और न ही बार काउंसिल में रजिस्टर्ड था। संक्षेप में केस -  याचिकाकर्ता [विश्राम सिंह] ने दावा किया कि व...

बाईक से पटाखा फोड़ने वाले हो जाएं सावधान

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हिन्दुस्तान दैनिक 18 अप्रैल 2026 मे प्रकाशित समाचार के अनुसार ध्वनिप्रदूषण और सड़क सुरक्षा को लेकर परिवहन - आयुक्त ने निर्देशों के क्रम में महकमे ने वाहन डीलरों व मोटर गैराज/वर्कशॉप संचालकों की बैठक बुलाकर कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि मोडिफाइड साइलेंसर, प्रेशर हॉर्न (हूटर) की बिक्री या फिटिंग करने वालों पर मोटरयान अधिनियम के तहत प्रति मामले एक, लाख रुपये तक का जुर्माना लगेगा। यही नहीं, यदि कोई वाहन स्वामी अपने वाहन में पुर्जों की फिटिंग द्वारा इस प्रकार का अवैध परिवर्तन करता है, तो उसे 6 माह तक की जेल या 5 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इसके साथ ही जो कोई व्यक्ति किसी सार्वजानिक स्थान में ऐसा मोटर यान चलाएगा, अथवा चलाने देगा जिससे सड़क सुरक्षा, शोर नियंत्रण एवं वायु प्रदूषण के सम्बन्ध में विहित मानकों का उल्लंघन होता हैं, उनके विरूद्ध भी मोटरयान अधिनियम के तहत विधिक कार्यवाही सुनिश्चित की जायेगी। इसमें संबंधित व्यक्ति, पहले अपराध के लिए ही तीन माह तक की जेल या दस हजार रूपये तक के जुमनि या दोनों से दंडित किया जाएगा और उसका लाइसेंस, तीन माह की अवधि के लिए निरर्हित कर दिया ज...

संपत्ति की कुर्की से पूर्व नोटिस देना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि 'बीएनएसएस की धारा 106 के तहत पुलिस द्वारा संपत्ति कुर्क करने के लिए संबंधित व्यक्ति को पहले से कोई नोटिस देना ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने धारा 106 औरं धारा 107 के बीच अंतर स्पष्ट किया। धारा 107 में विशेष रूप से यह प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को नोटिस जारी करेगा, जिसकी संपत्ति बीएनएसएस की धारा 107 के तहत कुर्क की जानी है।  बीएनएसएस की धारा 106 पुलिस को ऐसी किसी भी संपत्ति को ज़ब्त करने का अधिकार देती है, जिसके बारे में यह आरोप हो या संदेह हो कि वह चोरी की है, या जो ऐसी परिस्थितियों में पाई गई हो, जिनसे किसी अपराध के होने का संदेह पैदा होता हो।  धारा 107 भी संपत्ति कुर्क करने की बात करती है, जिसके तहत पुलिस संपत्ति कुर्क करने के लिए पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त से पहले अनुमति लेने के बाद अपने अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रार्थना पत्र देती है। मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस जारी करने और उसे अपनी बात रखने का उचित अवसर देने के बाद, जिसकी संपत्ति कुर्क की जानी है, कुर्की के संबंध में आदेश कर सकता है।...

आपसी सहमति से तलाक मे वापसी नहीं : सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि   भले ही आपसी सहमति से तलाक के मामलों में कोई भी पक्ष अंतिम डिक्री से पहले अपनी सहमति वापस ले सकता है, लेकिन यदि पति-पत्नी के बीच सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम समझौता (Full & Final Settlement) हो चुका हो, तो उस समझौते की शर्तों से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं है।  जस्टिस राजेश बिंडल और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें पत्नी द्वारा अदालत-मान्य मध्यस्थता समझौते से पीछे हटने पर कड़ी नाराज़गी जताई गई। ➡️ पूरा मामला :  विवादित पक्षों की शादी वर्ष 2000 में हुई थी। वर्ष 2023 में पति ने तलाक की याचिका दायर की, जिसके बाद फैमिली कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। मध्यस्थता में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत उन्होंने आपसी सहमति से तलाक लेने और सभी विवादों का निपटारा करने पर सहमति जताई। समझौते के अनुसार, पति ने पत्नी को ₹1.5 करोड़ दो किश्तों में देने, ₹14 लाख कार खरीद के लिए देने और कुछ आभूषण सौंपने पर सहमति दी। वहीं, पत्नी ने संयुक्त व्यवसाय खाते से ₹2.5 करोड़ पति को ट्रांसफ...

अविवाहित सरकारी कर्मचारी-मृत्यु - अनुकम्पा नियुक्ति

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  अविवाहित सरकारी कर्मचारी की मृत्यु होने पर, अनुकंपा नियुक्ति उनके परिवार के आश्रित सदस्य को मिलती है। प्राथमिकता के क्रम में आमतौर पर माता-पिता या भाई-बहन (यदि अविवाहित सरकारी कर्मचारी पर पूरी तरह आश्रित हों) हकदार होते हैं या यदि मृतक व्यक्ति द्वारा किसी को अपने वारिस के तौर पर नामांकित किया गया हो तो वह हकदार होता है. यह नियुक्ति परिवार की आर्थिक मदद के लिए दी जाती है, न कि अधिकार के तौर पर।  ➡️ नगर पंचायत निदेशक बनाम एम जयबाल (2025) के केस में   भारत के सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ के न्यायमूर्ति मनमोहन व न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने इस तथ्यात्मक संरचना का उपयोग करते हुए, समेकित और सशक्त तरीके से, कानून के चार केंद्रीय सिद्धांतों को दोहराया: 1️⃣ अनुकंपा नियुक्ति कोई निहित अधिकार नहीं है , बल्कि यह अचानक आए वित्तीय संकट से निपटने के लिए दी जाने वाली एक बार की रियायत है । 2️⃣ एक बार आश्रित व्यक्ति अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का प्रस्ताव स्वीकार कर लेता है, तो विचार करने का अधिकार "पूर्ण" हो जाता है ; दोबारा मौका नहीं मिल सकता या " अनंत करुणा " का कोई अवसर नहीं हो सक...