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वैवाहिक विवादों में पाक्सो ऐक्ट का दुरुपयोग वैवाहिक मुकदमों का बदसूरत पहलू - सुप्रीम कोर्ट

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 सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पति और उसके परिवार को फंसाने के लिए पॉक्सो (POCSO) एक्ट का दुरुपयोग करने की बढ़ती प्रवृत्ति को "वैवाहिक मुकदमों का बदसूरत पहलू" (Uglier Side Of Matrimonial Litigation) करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कई मामलों में नाबालिग बच्चों, विशेषकर बेटियों, का इस्तेमाल प्रतिशोध लेने, अधिक आर्थिक समझौता हासिल करने या दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है। बच्चों का इस्तेमाल प्रतिशोध लेने या दबाव बनाने के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। ➡️ केस की डिटेल्स और पार्टी का विवरण (Case Details): ⚫ केस का नाम : ईश्वर चंद शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Ishwar Chand Sharma vs State Of U.P.) ⚫ फैसले की तारीख: 29 मई 2026 ⚫ बेंच: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां ⚫ पार्टियां (Parties Involved): ✒️ अपीलकर्ता (Appellants / आरोपी): ईश्वर चंद शर्मा (पति) और उनके परिवार के सदस्य ✒️ प्रतिवादी (Respondents): उत्तर प्रदेश राज्य और उनकी पत्नी (शिकायतकर्ता) ⚫ मामले के मुख्य बिंदु: पत्नी ने अपने पति और ससुराल वालों पर अपनी 14 वर्षीय नाबाल...

दूसरे वकील को आवंटित चैंबर का इस्तेमाल करने वाले वकील का कैसा अधिकार -सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले में दखल देने से इनकार किया, जिसमें कहा गया था कि  बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" या राज्य की कोई संस्था नहीं है, क्योंकि यह वकीलों का एक निजी निकाय है जो सार्वजनिक कार्य नहीं करता। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने वकील संगीता राय द्वारा दायर SLP (विशेष अनुमति याचिका) को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि पटियाला कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन को दी जाए। कोर्ट ने एक चैंबर पर कब्ज़े को लेकर हुए विवाद पर रिट याचिका दायर करने के लिए राय की आलोचना की। जस्टिस नरसिम्हा ने टिप्पणी की, "सिर्फ़ इसलिए कि आपको वकील होने का विशेषाधिकार मिला है, आपके हर काम को अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाएगा। हम किसी अन्य मुवक्किल की याचिका पर भी विचार नहीं करते। वकीलों को दो कदम पीछे और दो कदम नीचे रहना चाहिए, इस अर्थ में कि आप वकील होने के विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए आपके कंधों पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी ...

दहेज हत्या में उम्रकैद दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में ही - इलाहाबाद हाइकोर्ट लखनऊ खंडपीठ

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि  IPC की धारा 304-B ​​के तहत दहेज हत्या के अपराध के लिए अधिकतम सज़ा, यानी आजीवन कारावास, को "सामान्य प्रक्रिया" के तौर पर नहीं थोपा जाना चाहिए। इसके बजाय, यह 'कठोरतम' सज़ा केवल "दुर्लभतम से दुर्लभ" मामलों में ही दी जानी चाहिए। जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने 2012 के एक दहेज हत्या मामले में पति और उसके माता-पिता की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की। हालांकि, खंडपीठ ने 'आनुपातिक सज़ा' के सिद्धांत को लागू करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उनकी सज़ाओं को कम किया। ट्रायल कोर्ट ने सास को आजीवन कारावास और पति व ससुर को 20 साल की सज़ा सुनाई थी; खंडपीठ ने इस सज़ा को घटाकर उस अवधि के बराबर कर दिया, जितनी अवधि वे पहले ही जेल में बिता चुके थे। खंडपीठ के सामने मुख्य सवाल यह था कि  " क्या मौजूदा मामले की परिस्थितियों में आजीवन कारावास की कठोरतम सज़ा देना उचित है?" हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि  IPC की धारा 304-B ​​के तहत दोष/अपराध मुख्य रूप से साक्ष्य अधिनियम (Evide...

आशुतोष ब्रह्मचारी की याचिका पर सुनवाई से इंकार-स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की अग्रिम जमानत बरकरार-सुप्रीम कोर्ट

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 सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज पॉक्सो (POCSO) मामले में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई अग्रिम जमानत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।  जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई की। याचिका मामले के प्रथम सूचनाकर्ता (Informant) आशुतोष ब्रह्मचारी द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ लगाए गए नाबालिगों के यौन शोषण के गंभीर आरोपों पर पर्याप्त विचार किए बिना उन्हें अग्रिम जमानत प्रदान कर दी। सुनवाई के दौरान जस्टिस सुंदरेश ने याचिकाकर्ता से पूछा कि  यदि उन्हें नाबालिगों के कथित यौन शोषण की जानकारी थी, तो उन्होंने पुलिस को सूचना देने में देरी क्यों की। पीठ ने इस पहलू पर विशेष रूप से सवाल उठाया।  गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 25 मार्च को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अग्रिम जमानत प्रदान की थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि  मामले में कुछ असामान्य परिस्थितियां हैं, जिन पर विचार किया ज...

सुप्रीम कोर्ट वकीलों से वर्चुअल माध्यम अपनाने की केवल अपील कर सकती है-सुप्रीम कोर्ट

 सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह वकीलों को केवल वर्चुअल (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग) माध्यम से सुनवाई में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि  वह केवल बार के सदस्यों से अपील कर सकती है कि पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण पैदा हुए ईंधन संकट को देखते हुए अधिक से अधिक वर्चुअल माध्यम अपनाएं। अदालत ने अपने आदेश में कहा, “ याचिकाकर्ता की पहल की सराहना करते हैं। लेकिन यह उचित नहीं होगा कि सदस्यों की कठिनाइयों को जाने बिना उन्हें ऑनलाइन उपस्थित होने का न्यायिक आदेश दिया जाए। इसलिए हम कोई निर्देश जारी नहीं कर रहे हैं। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर बार के सदस्यों से वर्चुअल माध्यम से सुनवाई में शामिल होने की गंभीर अपील करते हैं।” चीफ जस्टिस ने स्पष्ट कहा कि  अदालत वर्चुअल सुनवाई के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं देने को तैयार है लेकिन इसे अनिवार्य नहीं बना सकती। उन्होंने कहा, “ यह अदालत का आदेश नहीं है। हमने केवल प्रशासनिक परिपत्र जारी कर बार के सदस्यों से घर से वर्चुअल माध्यम से जुड़ने का अनुरोध किया है। लेकिन हम ऐसा प्रतिबंध लागू नहीं कर सकते।”  कोर्ट ने यह भी कहा कि ...

वकीलों के लिए यूनिफाइड वेरिफिकेशन सिस्टम हेतु याचिका

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  वकीलों के लिए यूनिफाइड और राष्ट्रव्यापी वेरिफिकेशन सिस्टम (Unified Verification System) लागू करने की मांग वाली याचिका भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) में दायर की गई है。  ➡️ जनहित याचिका (PIL) से जुड़े कुछ मुख्य बिंदु : ⚫ याचिकाकर्ता : यह याचिका सुप्रीम कोर्ट की वकील योगमाया एम.जी. (Yogamaya M.G.) द्वारा एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड दीपक प्रकाश के माध्यम से दायर की गई है。 ⚫ मुख्य मांग : बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को एक पारदर्शी, राष्ट्रव्यापी और समान वेरिफिकेशन सिस्टम बनाने का निर्देश देने की मांग की गई है, जिसमें वकीलों की शैक्षणिक योग्यता, नामांकन रिकॉर्ड और अभ्यास की स्थिति को प्रमाणित किया जा सके。 ⚫ राष्ट्रीय डेटाबेस : इसके तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर सभी सत्यापित वकीलों का निजता-अनुपालन (privacy-compliant) वाला एक केंद्रीकृत डेटाबेस तैयार करने की भी मांग की गई है。 ⚫ पृष्ठभूमि : यह याचिका बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के उस हालिया बयान के बाद दायर की गई है, जिसमें देश में बड़ी संख्या में फर्जी वकीलों (Fake Advocates) के अभ्या...

ई-रिक्शा चालकों के लिए भी है कानून

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      वर्तमान में ई-रिक्शा नगरीय हो या ग्रामीण क्षेत्र, परिवहन के मुख्य साधन के रूप में प्रयोग की जा रही हैं. जिसके चालक यात्रियों की परेशानी को देखते हुए उनसे मनमाना किराया वसूल कर रहे हैं. जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत ई-रिक्शा के लिए अधिकतम किराया 8.30 रुपये प्रति किलोमीटर तय किया है। इसके साथ ही यह भी जान लें कि यह नियम मुख्य रूप से पूरी यात्रा (आरक्षित/बुक) के लिए लागू होता है।  ➡️ यूपी में ई-रिक्शा किराए से जुड़े मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: ⚫ पूरी गाड़ी बुक करने पर: राज्य परिवहन प्राधिकरण द्वारा जारी अधिसूचना के मुताबिक, यदि आप ई-रिक्शा को व्यक्तिगत रूप से पूरी यात्रा के लिए बुक करते हैं, तो ड्राइवर आपसे 8.30 रुपये प्रति किलोमीटर से अधिक नहीं वसूल सकता। ⚫ प्रति सवारी (शेयरिंग) व्यवस्था: सामान्य तौर पर जो ई-रिक्शा जगह-जगह सवारियां बैठाकर चलते हैं, उनका किराया स्थानीय परिवहन अधिकारियों और जिला प्रशासन द्वारा तय किया जाता है। अलग-अलग शहरों (जैसे लखनऊ, नोएडा) में यह आमतौर पर दूरी के हिसाब से 10 से 20 रुपये प्रति सवारी के बीच होता है। ⚫ स्...