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संपत्ति की कुर्की से पूर्व नोटिस देना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि 'बीएनएसएस की धारा 106 के तहत पुलिस द्वारा संपत्ति कुर्क करने के लिए संबंधित व्यक्ति को पहले से कोई नोटिस देना ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने धारा 106 औरं धारा 107 के बीच अंतर स्पष्ट किया। धारा 107 में विशेष रूप से यह प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को नोटिस जारी करेगा, जिसकी संपत्ति बीएनएसएस की धारा 107 के तहत कुर्क की जानी है।  बीएनएसएस की धारा 106 पुलिस को ऐसी किसी भी संपत्ति को ज़ब्त करने का अधिकार देती है, जिसके बारे में यह आरोप हो या संदेह हो कि वह चोरी की है, या जो ऐसी परिस्थितियों में पाई गई हो, जिनसे किसी अपराध के होने का संदेह पैदा होता हो।  धारा 107 भी संपत्ति कुर्क करने की बात करती है, जिसके तहत पुलिस संपत्ति कुर्क करने के लिए पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त से पहले अनुमति लेने के बाद अपने अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रार्थना पत्र देती है। मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस जारी करने और उसे अपनी बात रखने का उचित अवसर देने के बाद, जिसकी संपत्ति कुर्क की जानी है, कुर्की के संबंध में आदेश कर सकता है।...

आपसी सहमति से तलाक मे वापसी नहीं : सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि   भले ही आपसी सहमति से तलाक के मामलों में कोई भी पक्ष अंतिम डिक्री से पहले अपनी सहमति वापस ले सकता है, लेकिन यदि पति-पत्नी के बीच सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम समझौता (Full & Final Settlement) हो चुका हो, तो उस समझौते की शर्तों से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं है।  जस्टिस राजेश बिंडल और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें पत्नी द्वारा अदालत-मान्य मध्यस्थता समझौते से पीछे हटने पर कड़ी नाराज़गी जताई गई। ➡️ पूरा मामला :  विवादित पक्षों की शादी वर्ष 2000 में हुई थी। वर्ष 2023 में पति ने तलाक की याचिका दायर की, जिसके बाद फैमिली कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। मध्यस्थता में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत उन्होंने आपसी सहमति से तलाक लेने और सभी विवादों का निपटारा करने पर सहमति जताई। समझौते के अनुसार, पति ने पत्नी को ₹1.5 करोड़ दो किश्तों में देने, ₹14 लाख कार खरीद के लिए देने और कुछ आभूषण सौंपने पर सहमति दी। वहीं, पत्नी ने संयुक्त व्यवसाय खाते से ₹2.5 करोड़ पति को ट्रांसफ...

अविवाहित सरकारी कर्मचारी-मृत्यु - अनुकम्पा नियुक्ति

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  अविवाहित सरकारी कर्मचारी की मृत्यु होने पर, अनुकंपा नियुक्ति उनके परिवार के आश्रित सदस्य को मिलती है। प्राथमिकता के क्रम में आमतौर पर माता-पिता या भाई-बहन (यदि अविवाहित सरकारी कर्मचारी पर पूरी तरह आश्रित हों) हकदार होते हैं या यदि मृतक व्यक्ति द्वारा किसी को अपने वारिस के तौर पर नामांकित किया गया हो तो वह हकदार होता है. यह नियुक्ति परिवार की आर्थिक मदद के लिए दी जाती है, न कि अधिकार के तौर पर।  ➡️ नगर पंचायत निदेशक बनाम एम जयबाल (2025) के केस में   भारत के सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ के न्यायमूर्ति मनमोहन व न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने इस तथ्यात्मक संरचना का उपयोग करते हुए, समेकित और सशक्त तरीके से, कानून के चार केंद्रीय सिद्धांतों को दोहराया: 1️⃣ अनुकंपा नियुक्ति कोई निहित अधिकार नहीं है , बल्कि यह अचानक आए वित्तीय संकट से निपटने के लिए दी जाने वाली एक बार की रियायत है । 2️⃣ एक बार आश्रित व्यक्ति अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का प्रस्ताव स्वीकार कर लेता है, तो विचार करने का अधिकार "पूर्ण" हो जाता है ; दोबारा मौका नहीं मिल सकता या " अनंत करुणा " का कोई अवसर नहीं हो सक...

ग्राम न्यायालय को भरण पोषण मामले तय करने का अधिकार-इलाहाबाद हाई कोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया कि   ग्राम न्यायालयों को भरण-पोषण से जुड़े मामलों की सुनवाई और निष्पादन करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 से 128 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 से 147 के तहत आने वाले मामलों पर भी ग्राम न्यायालय निर्णय ले सकते हैं। जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने यह टिप्पणी एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें उसने अपने भरण-पोषण आदेश के क्रियान्वयन के लिए लंबित प्रार्थना पत्र के शीघ्र निस्तारण की मांग की थी। मामले के अनुसार  महिला ने वर्ष 2018 में भरण-पोषण के लिए आवेदन किया, जिस पर 30 नवंबर 2024 को ग्राम न्यायालय के न्यायाधिकारी ने उसके पक्ष में आदेश दिया। इसके बाद महिला ने उसी न्यायालय में BNSS की धारा 147 के तहत आदेश के क्रियान्वयन के लिए याचिका दाखिल की, जो लंबित है। हाईकोर्ट ने कहा कि  भरण-पोषण से जुड़े मामलों के लिए दो कानून प्रावधान करते हैं, फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 और ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008। अदालत ने विशेष रूप से ग्राम न्यायालय अधिनियम की धारा 12 का ...

Census 2027 मकान सूचीकरण एवं आवास जनगणना प्रश्न

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मकान की जानकारी लाइन नंबर बिल्डिंग नंबर जनगणना मकान नंबर मकान के फर्श की मुख्य सामग्री मकान की दीवार की मुख्य सामग्री मकान की छत की मुख्य सामग्री मकान का उपयोग (रहने/दुकान/अन्य) मकान की स्थिति (अच्छी/सामान्य/खराब) परिवार (Household) की जानकारी परिवार संख्या परिवार में सामान्यतः रहने वाले लोगों की कुल संख्या परिवार के मुखिया का नाम परिवार के मुखिया का लिंग क्या परिवार का मुखिया SC / ST / अन्य वर्ग से है। मकान का स्वामित्व (अपना/किराया/अन्य) परिवार के कब्जे में रहने वाले कमरों की संख्या परिवार में विवाहित जोड़ों की संख्या घर में उपलब्ध सुविधाएँ... पीने के पानी का मुख्य स्रोत पीने के पानी की उपलब्धता रोशनी का मुख्य स्रोत शौचालय की सुविधा शौचालय का प्रकार गंदे पानी की निकासी स्नानघर की सुविधा रसोई और LPG/PNG कनेक्शन की उपलब्धता खाना बनाने में उपयोग होने वाला मुख्य ईंधन परिवार की संपत्ति (Assets) रेडियो / ट्रांजिस्टर टेलीविजन इंटरनेट की सुविधा लैपटॉप / कंप्यूटर टेलीफोन / मोबाइल / स्मार्टफोन साइकिल / स्कूटर / मोटरसाइकिल / मोपेड कार / जीप / वैन अन्य जानकारी परिवार में मुख्य रूप से खाया जाने व...

दूर के ढोल सुहावने नामित सभासदों के

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 बोर्ड की मजबूती, विकास कार्यों की शपथ आदि न जाने कितनी लुभावनी राजनीतिक बयानबाजी से भरपूर हैं आजकल के नगरपालिका प्रशासन मे राज्य सरकार द्वारा मनोनीत सभासदों के शपथ ग्रहण समारोह, पहले भी होते रहे हैं आगे भी होते रहेंगे किन्तु चुनावी बेला में ऐसे समारोहों में बहुत कुछ ऐसा मनगढंत प्रचारित किया जाता है जिससे कानून भी बगलें झांकता नजर आता है. उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम 1916 की धारा 9 जिसे उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 12 सन 1994 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया की उपधारा (1) घ में कहा गया है कि ( घ) नाम निर्दिष्ट सदस्य जो राज्य सरकार द्वारा, सरकारी गजट में विज्ञप्ति द्वारा, नगरपालिका प्रशासन में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से नामित किये जायेंगे और जिनकी संख्या- (एक) नगर पंचायत की दशा में, दो से कम और तीन से अधिक नहीं होगी; (दो) नगरपालिका परिषद् की दशा में तीन से कम और पाँच से अधिक नहीं होगी। इसके साथ ही अधिनियम मे यह भी उल्लिखित किया गया है कि - "किन्तु प्रतिबंध यह है कि खण्ड (घ) में निर्दिष्ट व्यक्तियों को नगरपालिका की बैठकों में मत देने का अधिकार नहीं होगा. साथ ही, 2...

न्याय - मदुरै की सेशन कोर्ट ने 9 पुलिसकर्मियों को दी फांसी की सजा

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  तमिलनाडु में पुलिसकर्मियों का मामला तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के सातानुकुलम में 2020 में हुए एक मामले में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाई गई है। यह मामला पिता-पुत्र की पुलिस हिरासत में मौत से जुड़ा है। पीड़ित जयराज और उनके बेटे बेनिक्स को लॉकडाउन के दौरान दुकान खुली रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने दोनों के साथ बुरी तरह मारपीट की, जिससे उनकी मौत हो गई। मामले की मुख्य बातें: 1️⃣ गिरफ्तारी और मौत: जयराज और बेनिक्स को 19 जून 2020 को गिरफ्तार किया गया था और 22 जून को बेनिक्स की मौत हो गई, जबकि अगले दिन जयराज की भी मौत हो गई। 2️⃣ पुलिस पर आरोप: परिजनों ने पुलिस पर मारपीट का आरोप लगाया और जांच में यह आरोप सही पाया गया। 3️⃣ सजा : मदुरै की सेशन कोर्ट ने 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाई और मृतक परिवार को 1 करोड़ 40 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। 4️⃣ दोषी पुलिसकर्मी : इनमें इंस्पेक्टर एस. श्रीधर, सब-इंस्पेक्टर पी. रघु गणेश और के. बालकृष्णन समेत 9 पुलिसकर्मी शामिल हैं। 5️⃣ कोर्ट का फैसला: कोर्ट ने कहा कि यह मामला सत्ता के दुरुपयोग और ब...