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इस्लाम अपनाने वाली बहनों को अदालत में पेश करें - इलाहाबाद हाईकोर्ट

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 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वेच्छा से इस्लाम अपनाने और अपनी पसंद से विवाह करने की इच्छा रखने वाली दो वयस्क सगी बहनों को 6 अगस्त 2026 को अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह आदेश एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है, जिसमें उनके पिता द्वारा उन्हें अवैध रूप से कैद रखने का आरोप लगाया गया है। ➡️ पक्षकार (Parties)याचिकाकर्ता (बहनें):  ⚫ दिव्या भाटिया उर्फ जोया दीया भाटिया (आयु लगभग 20 वर्ष) और अंशु भाटिया उर्फ अमीना अंशु भाटिया (आयु लगभग 35 वर्ष)। ⚫ प्रतिवादी/अन्य पक्ष: उत्तर प्रदेश राज्य, संबंधित पुलिस अधिकारी और युवतियों के पिता (अनिल कुमार भाटिया)। ➡️ मामले के मुख्य बिंदु और आरोप स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन:  याचिकाकर्ताओं के वकील (अली बिन सैफ और कैफ हसन) ने तर्क दिया कि दोनों बहनों ने बिना किसी बल, दबाव, धोखाधड़ी या प्रलोभन के अपनी स्वतंत्र इच्छा से हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम धर्म स्वीकार किया है और वे अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करना चाहती हैं। ⚫ अवैध कैद का आरोप : याचिका में आरोप लगाया गया है कि उनके पिता इस फैसले से नाराज है...

पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है-सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने 31 जुलाई 2026 को कहा कि  CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है, अगर पति शुरुआती स्तर पर ही पत्नी के एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर (व्यभिचार) को साबित कर देता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति CrPC की धारा 125(4) के तहत शुरुआती स्तर पर ही पुख्ता सबूतों से पत्नी का व्यभिचार (एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर) साबित कर देता है, तो पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता पाने का अधिकार नहीं है।  ⚫ मामले की पृष्ठभूमि:  पति ने 2014 में शादी के बाद 2020 में अलग होने के बाद पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाया था; निचली अदालत व हाईकोर्ट ने कहा था कि एडल्टरी का मुद्दा मुख्य सुनवाई के दौरान ही परखा जाएगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बदल दिया। ➡️ मुख्य बिंदु और अदालत का फैसला पक्षकार :  ⚫ हिमांशु चौरड़िया (पति) बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (पत्नी)। ⚫ पीठ (Bench): जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली। ⚫ निर्णय का आधार: अदालत ने कहा कि निचली अदालतें और हाईकोर्ट यह मानकर गलती नहीं कर सकते कि व्यभिचार के आरोपों पर केवल अंतिम फैसले के वक्त...

You tuber फैला रहे भ्रम COP को लेकर

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     AIBE पास सभी अधिवक्ताओं की सूचना के लिए यह जानकारी दे रही हूँ कि COP FORM भरने के लिए बार काउन्सिल ऑफ उत्तर प्रदेश द्वारा कोई ऑनलाइन प्रक्रिया आरंभ नहीं की गई है. इसके लिए आपको DECLARATION FORM ही भरना होगा. बार काउन्सिल ऑफ उत्तर प्रदेश द्वारा केवल रजिस्ट्रेशन और COP कार्ड डाउनलोड करने की सुविधा वेबसाइट पर उपलब्ध करायी गयी है किन्तु वह भी तब जब आप रजिस्ट्रेशन और COP का फॉर्म भरकर बार काउन्सिल ऑफ उत्तर प्रदेश में जमा करा देते हैं. ⚫ COP FORM ऐसे भरें- AIBE पास सभी अभ्यर्थी COP NUMBER के लिए निम्न प्रक्रिया का अनुसरण करें- 🌑 हाई स्कूल से लेकर एनरोलमेंट तक सर्टिफिकेट की फोटो कॉपी. सभी को self attested कीजिए.  🌑 आधार कार्ड की कॉपी  🌑 AIBE पास सर्टिफिकेट की फोटो कॉपी.  🌑 दो पासपोर्ट साइज कलर फोटो कोट एन्ड बैंड में जिसमें से एक फॉर्म पर लगाना है और एक पन्नी में रखकर फॉर्म से संलग्न करना है.ध्यान रहे कि फोटो के ऊपर पिन न आये.  🌑 250/-रुपये एक लिफाफे मे यह लिखकर (आवेदन फीस इसमे है) भेज सकते हैं.  ⚫ आप जिस बार एसोसिएशन के सदस्य हैं उस बार एसोसिएश...

कुछ वकील काली भेड़-इलाहाबाद हाई कोर्ट

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 इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने वकीलों के वेश में मौजूद उन लोगों को "काली भेड़" (Black Sheep) कहा है जो हिंसा, मारपीट या अवैध गतिविधियों में शामिल होकर न्याय व्यवस्था और न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान पहुँचाते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने वकीलों के वेश में मौजूद कुछ भ्रष्ट और हिंसक आचरण वाले वकीलों को "काली भेड़ें" (Black Sheep) कहा है। यह टिप्पणी लखनऊ जिला अदालत परिसर के अंदर एक वादकारी (मुवक्किल) और बाहर से आए वकीलों के साथ मारपीट तथा न्यायिक कार्य में बाधा डालने के मामले में की गई है। ➡️ मामले से जुड़े मुख्य विवरण ⚫ घटना की तिथि : 21 जुलाई 2026, जब दिल्ली के कुछ अधिवक्ता अपने मुवक्किल मोहम्मद शाकिर के संपत्ति विवाद के सिलसिले में लखनऊ जिला न्यायालय पहुंचे थे। ⚫ आरोप : स्थानीय विपक्षी वकीलों द्वारा अदालत में पेश होने से रोकना, गाली-गलौज और मारपीट करना। ⚫ हाईकोर्ट की कार्रवाई :न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की विशेष पीठ ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया। ⚫ हाई कोर्ट की सख्ती: Allahabad High Court की पीठ (न्यायमूर्ति राजन राय और न...

मातृत्व अवकाश रोका नहीं जा सकता-इलाहाबाद हाई कोर्ट

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि  दूसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि पहली बार मिले मातृत्व अवकाश के बाद दो वर्ष पूरे नहीं हुए हैं।...... सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security, 2020) के प्रावधान उत्तर प्रदेश फाइनेंशियल हैंडबुक के नियमों पर प्रभावी होंगे । इस प्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि दो प्रसवों (गर्भधारण) के बीच दो साल का अंतराल न होने के आधार पर महिला कर्मचारी को मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) देने से इनकार नहीं किया जा सकता है। ➡️ वाद विवरण एवं मुख्य पक्षकार (Case Details) ⚫ अदालत :  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ( Allahabad High Court ) ⚫ न्यायाधीश :  न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन (एकल पीठ) ⚫ मुख्य पक्षकार (याचिकाकर्ता):  शिखा यादव और अन्य (कानपुर नगर की स्टाफ नर्स) ⚫ विपक्षी प्राधिकारी:  चिकित्सा शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार ➡️ निर्णय के मुख्य बिंदु ⚫ दो साल की शर्त का खंडन:  अदालत ने स्पष्ट किया कि यूपी वित्तीय हैंडबुक या पुराने...

पहली शादी छिपाकर शादी करने वाला दूसरी पत्नी को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य-इलाहाबाद हाई कोर्ट

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 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि  जिस महिला को पति की पहले से मौजूद शादी की बात छिपाकर शादी के लिए राजी किया गया, वह CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा-भत्ता पाने की हकदार है, भले ही दोनों के बीच हुई शादी कानूनी रूप से अमान्य (void) हो। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पहली शादी की बात छिपाकर दूसरी शादी करता है, तो वह महिला (दूसरी पत्नी) CrPC की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।  कोर्ट ने कहा कि  पति अपने धोखाधड़ी वाले आचरण का लाभ नहीं उठा सकता। ➡️ निर्णय की मुख्य बातें धोखाधड़ी का बचाव नहीं: कोर्ट ने माना कि यदि पत्नी को पहले से मौजूद विवाह की जानकारी नहीं थी और उसे धोखे में रखकर शादी के लिए राजी किया गया, तो विवाह शून्य (void) होने के बावजूद पति भरण-पोषण देने से मना नहीं कर सकता। ⚫ सुप्रीम कोर्ट के दृष्टांत:  जस्टिस प्रसाद ने 'बादशाह बनाम सौ उर्मिला बादशाह गोडसे (2013)' और 'कमला व अन्य बनाम एमआर मोहन कुमार (2018)' में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का हवाला देते हुए कहा कि  जब कोई पति अपनी ...

12 वर्ष बाद अनुकम्पा नियुक्ति रद्द नहीं की जा सकती-इलाहाबाद हाईकोर्ट

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 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि   यदि अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) देते समय विभाग को आवेदक के पिता की सरकारी नौकरी की जानकारी थी और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद नियुक्ति दी गई थी, तो लगभग 12 वर्ष बाद यह कहते हुए सेवा समाप्त नहीं की जा सकती कि आवेदक ने तथ्य छिपाए थे। इस प्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 12 साल पहले मां की मृत्यु के बाद मिली अनुकंपा नियुक्ति को इस आधार पर नहीं छीना जा सकता कि पिता की सरकारी नौकरी की जानकारी छिपाई गई थी, क्योंकि विभाग को नियुक्ति के समय ही यह तथ्य पता था। ⚫ निर्णय के पक्षकार (Parties) याचिकाकर्ता: उपासना अग्रवाल (वरिष्ठ लिपिक पद पर कार्यरत कर्मचारी) विपक्ष/प्रतिवादी: उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य संबंधित जिला अधिकारी/जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी मामले का विवरण नियुक्ति का वर्ष: याचिकाकर्ता को करीब 12 वर्ष पूर्व अपनी माता की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गई थी।सेवा समाप्ति का आदेश: जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा 11 अगस्त 2025 को एक शिकायत के आधार पर याचिकाकर्ता की सेवा यह कहते हुए समाप्त...