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होम मेकर राष्ट्र निर्माता - सुप्रीम कोर्ट

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  सड़क हादसे में गृहणी (होममेकर) की मृत्यु होने पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उनके घरेलू योगदान का मूल्य कम से कम ₹30,000 प्रतिमाह तय किया है।  मोटर दुर्घटना के दावों से जुड़ी अपील पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने कहा कि  होममेकर का योगदान घर से कहीं आगे तक जाता है और देश-निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवज़ा तय करते समय होममेकर की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को होने वाले घरेलू देखभाल के नुकसान को अलग से मान्यता दी जानी चाहिए। ➡️ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु: ⚫ घरेलू देखभाल का नुकसान:  सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) के तहत दुर्घटना का मुआवजा तय करते समय, 'घरेलू देखभाल के नुकसान' (Loss of Domestic Care) को मुआवजे की एक अलग और स्वतंत्र श्रेणी माना जाएगा। ⚫ न्यूनतम आय का निर्धारण:  गृहणी द्वारा परिवार के लिए किए जाने वाले कार्य (खाना बनाना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, घर का प्रबंधन आद...

एलआईसी कर्मी नहीं करेंगे जनगणना ड्यूटी - इलाहाबाद हाई कोर्ट

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  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एलआईसी नॉर्थ सेंट्रल जोन की याचिका पर सुनवाई की। जस्टिस सलील कुमार राय और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के करते हुए कहा कि जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 7(सी) के तहत किसी संस्थान के कर्मचारियों से केवल उसी संस्थान के परिसर के भीतर जनगणना कार्य में सहायता ली जा सकती है। संस्थान के बाहर वहां के कर्मचारियों से सहायता नहीं ली जा सकती है।  जनगणना अधिनियम की धारा 7(सी) मे कहा गया है कि  राज्य सरकार या उसके अधिकृत अधिकारी किसी संस्थान, फर्म या फैक्ट्री के कर्मचारियों से जनगणना कार्य में सहायता ले सकते हैं, लेकिन यह सहायता केवल उस संस्थान या प्रतिष्ठान के परिसर के भीतर की जनगणना गतिविधियों तक सीमित है। प्रस्तुति  शालिनी कौशिक  एडवोकेट  कैराना (शामली) 

विवाहित पुत्री को अनुकम्पा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता -सुप्रीम कोर्ट

इस ऐतिहासिक मामले ( मामले का शीर्षक: कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) में मुख्य याचिकाकर्ता कुलसुम निशा थीं और प्रतिवादी उत्तर प्रदेश सरकार ( एवं संबंधित प्राधिकरण ) थे। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था। ➡️ मामले के मुख्य पक्षकार (Parties): ⚫ याचिकाकर्ता (Petitioner):  कुलसुम निशा ( Kulsum Nisha ) ⚫ प्रतिवादी (Respondents):  उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य ( State of Uttar Pradesh & Ors. ) ⚫ विवाद का मुख्य कारण: उत्तर प्रदेश सरकार के वर्ष 2019 के शासनादेश में अनुकंपा नियुक्ति के लिए "परिवार" की परिभाषा में अविवाहित, तलाकशुदा और विधवा बेटियों को तो शामिल किया गया था, लेकिन विवाहित बेटियों को बाहर रखा गया था। याचिकाकर्ता कुलसुम निशा (जिनकी माता की मृत्यु के बाद उन्हें उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस नहीं दिया गया था) ने इसी नियम को चुनौती दी थी।सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय:न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के इस नियम को रद्द कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि मात्र विवाह हो जाने के आधार ...

राजनीतिक आकाओं को खुश करने में लगी यू पी पुलिस - इलाहाबाद हाई कोर्ट

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि  राज्य के पुलिस अधिकारी संविधान के प्रति वफादार होने के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए काम करते हैं। अदालत ने यूपी गैंगस्टर एक्ट के दुरुपयोग और बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के की जाने वाली गिरफ्तारियों पर गहरी चिंता जताई। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर द्वारा गाजियाबाद के एक मामले की सुनवाई करते हुए 31 पन्नों के विस्तृत फैसले में दी गई ।     मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने यह कड़ी टिप्पणियां गाजियाबाद के निवासी राजेंद्र त्यागी द्वारा उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986 के संबंध में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं। सुप्रीम कोर्ट भी इस 1986 के अधिनियम से जुड़े मुद्दों पर विचार कर रही है, इसलिए जस्टिस दिवाकर ने इस मामले में कोई अंतिम फैसला सुनाने से परहेज किया। इस मामले से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं: ⚫ संविधान से ऊपर सत्ता: कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की निष्ठा संविधान के प्रति न होकर सत्ताधारी द...

तब्लीगी जमात को लेकर यू पी में हाई अलर्ट

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 उत्तर प्रदेश में सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों ने तब्लीगी जमात की गतिविधियों और मस्जिदों में बाहर से आने वाले लोगों की आवाजाही पर कड़ी निगरानी रखी हुई है। संवेदनशील जिलों में बिना पूर्व सूचना के आने वाली जमातों को वापस भेजने तथा पुलिस थानों में उनका पूरा सत्यापन (Verification) अनिवार्य करने के सख्त निर्देश जारी किए गए हैं। ➡️ जमात और बाहरी लोगों को लेकर यूपी में क्या निर्देश हैं? 1️⃣ 24 घण्टे मे अनिवार्य सत्यापन (Verification): मस्जिदों या धार्मिक स्थलों में बाहर से आने वाले किसी भी जमाती या समूह को ठहरने से पहले स्थानीय पुलिस या खुफिया विभाग (LIU) को पूरी जानकारी देनी होगी। राज्य में आने वाली सभी जमातों और उनमें शामिल होने वाले लोगों का 24 घंटे के भीतर अनिवार्य रूप से सत्यापन (Verification) किया जाएगा. 2️⃣ जानकारी देना आवश्यक: रुकने वाले लोगों का नाम, पूरा पता, आधार कार्ड या पहचान पत्र, और ठहरने का कारण पुलिस को बताना होगा। जमात से जुड़े हर व्यक्ति को अपने पहचान पत्र और जरूरी दस्तावेज दिखाने होंगे. पुलिस यह जांच करेगी कि वे किस उद्देश्य से आए हैं और कितने दिनों तक रुकेंगे.  3...

वैवाहिक विवादों में पाक्सो ऐक्ट का दुरुपयोग वैवाहिक मुकदमों का बदसूरत पहलू - सुप्रीम कोर्ट

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 सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पति और उसके परिवार को फंसाने के लिए पॉक्सो (POCSO) एक्ट का दुरुपयोग करने की बढ़ती प्रवृत्ति को "वैवाहिक मुकदमों का बदसूरत पहलू" (Uglier Side Of Matrimonial Litigation) करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कई मामलों में नाबालिग बच्चों, विशेषकर बेटियों, का इस्तेमाल प्रतिशोध लेने, अधिक आर्थिक समझौता हासिल करने या दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है। बच्चों का इस्तेमाल प्रतिशोध लेने या दबाव बनाने के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। ➡️ केस की डिटेल्स और पार्टी का विवरण (Case Details): ⚫ केस का नाम : ईश्वर चंद शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Ishwar Chand Sharma vs State Of U.P.) ⚫ फैसले की तारीख: 29 मई 2026 ⚫ बेंच: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां ⚫ पार्टियां (Parties Involved): ✒️ अपीलकर्ता (Appellants / आरोपी): ईश्वर चंद शर्मा (पति) और उनके परिवार के सदस्य ✒️ प्रतिवादी (Respondents): उत्तर प्रदेश राज्य और उनकी पत्नी (शिकायतकर्ता) ⚫ मामले के मुख्य बिंदु: पत्नी ने अपने पति और ससुराल वालों पर अपनी 14 वर्षीय नाबाल...

दूसरे वकील को आवंटित चैंबर का इस्तेमाल करने वाले वकील का कैसा अधिकार -सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले में दखल देने से इनकार किया, जिसमें कहा गया था कि  बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" या राज्य की कोई संस्था नहीं है, क्योंकि यह वकीलों का एक निजी निकाय है जो सार्वजनिक कार्य नहीं करता। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने वकील संगीता राय द्वारा दायर SLP (विशेष अनुमति याचिका) को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि पटियाला कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन को दी जाए। कोर्ट ने एक चैंबर पर कब्ज़े को लेकर हुए विवाद पर रिट याचिका दायर करने के लिए राय की आलोचना की। जस्टिस नरसिम्हा ने टिप्पणी की, "सिर्फ़ इसलिए कि आपको वकील होने का विशेषाधिकार मिला है, आपके हर काम को अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाएगा। हम किसी अन्य मुवक्किल की याचिका पर भी विचार नहीं करते। वकीलों को दो कदम पीछे और दो कदम नीचे रहना चाहिए, इस अर्थ में कि आप वकील होने के विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए आपके कंधों पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी ...