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नमाजियों की संख्या सीमित करने का प्रशासन को अधिकार नहीं -इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाइकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रमज़ान के दौरान एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करने के प्रशासनिक फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है और इसके नाम पर लोगों के धार्मिक अधिकारों पर रोक नहीं लगाई जा सकती। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने 27 फरवरी को सुनवाई के दौरान कहा कि यदि संभल के पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी को कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में कठिनाई महसूस होती है तो उन्हें या तो अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर स्थानांतरण मांग लेना चाहिए। अदालत ने कहा, “राज्य के वकील ने कहा कि संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति के कारण नमाज़ियों की संख्या सीमित की गई। हम इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हैं। हर परिस्थिति में कानून का शासन बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है।” खंडपीठ ने आगे कहा, “यदि स्थानीय अधिकारी यानी पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर को लगता है कि कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है, इसलिए वे नमाज़ियों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे द...

महिलाओं के रोजगार पर पड़ सकता है उल्टा असर -सुप्रीम कोर्ट

 सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सभी कार्यस्थलों में महिलाओं के लिए पेड मेंस्ट्रुअल लीव (मासिक धर्म अवकाश) की मांग करने वाली एक याचिका का निस्तारण करते हुए केंद्र सरकार से कहा कि वह याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए प्रतिनिधित्व पर सभी हितधारकों से परामर्श करके नीति बनाने पर विचार करे। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी चिंता जताई कि यदि कानून बनाकर मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य कर दिया गया तो इसका महिलाओं के रोजगार पर उल्टा असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि इससे नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से हिचक सकते हैं, जिससे कार्यबल में उनकी भागीदारी प्रभावित हो सकती है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता शैलेन्द्र मणी त्रिपाठी की लोकस स्टैंडी (याचिका दायर करने के अधिकार) पर भी सवाल उठाया और कहा कि इस मुद्दे पर स्वयं कोई महिला अदालत के सामने नहीं आई है। यह इसी मुद्दे पर याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई तीसरी याचिका थी। पहली याचिका फरवरी 2023 में निस्तारित की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद 2...

राहुल गाँधी के खिलाफ दायर विनायक दामोदर सावरकर मानहानि मामला खत्म

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  महाराष्ट्र के नासिक कोर्ट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर मानहानि मामले को बुधवार को समाप्त कर दिया। यह मामला हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के संबंध में दर्ज किया गया था। एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट रुपाली नरवडिया की अदालत ने यह निर्णय शिकायतकर्ता द्वारा अपनी शिकायत वापस लेने की अर्जी स्वीकार करते हुए दिया। इसके साथ ही राहुल गांधी के खिलाफ चल रही पूरी कार्यवाही समाप्त कर दी गई। मामला 'निर्भया फाउंडेशन' नामक एक गैर-सरकारी संगठन के निदेशक की शिकायत पर दर्ज हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि  2022 की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने यह कहा था कि सावरकर ने ब्रिटिश सरकार के साथ काम करने का वादा किया था।  शिकायतकर्ता का कहना था कि  इस बयान से सावरकर की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची जिन्हें वह स्वतंत्रता सेनानी बताते हैं।  राहुल गांधी की ओर से पेश वकील जयंत जैभवे और गजेंद्र सनप ने बताया कि  अदालत ने पहले इस शिकायत पर स्थानीय पुलिस से जांच कराने का आदेश दिया। पुलिस की रिपोर्ट अदालत में दाखिल होने के बाद श...

UCC से ही मिलेगा मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार-सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक जनहित याचिका पर संक्षिप्त सुनवाई की, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधानों को महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी गई है।  चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट प्रशांत भूषण से पूछा कि  क्या अदालत पर्सनल लॉ की संवैधानिक वैधता पर फैसला दे सकती है।  इसी के साथ जस्टिस बागची ने बॉम्बे हाईकोर्ट के प्रसिद्ध 'नरसू अप्पा माली' फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि  पर्सनल लॉ को संवैधानिक परीक्षण के अधीन नहीं लाया जा सकता. खंडपीठ ने यह भी सवाल उठाया कि   यदि अदालत शरीयत कानून के उत्तराधिकार संबंधी प्रावधानों को रद्द कर देती है, तो क्या इससे कानूनी शून्य (legal vacuum) पैदा नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अन्य विधिक कानून मौजूद नहीं है।  इस पर भूषण ने कहा कि  ऐसी स्थिति में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) लागू हो सकता है।  प्रशांत भूषण ने यह भी कहा कि ...

पति द्वारा भरण पोषण -सुप्रीम कोर्ट सख्त

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  सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए पति के नियोक्ता को निर्देश दिया कि  वह उसके वेतन से हर महीने 25 हजार रुपये काटकर सीधे उसकी अलग रह रही पत्नी के बैंक खाते में जमा करे। यह राशि पत्नी और उनकी नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए दी जाएगी।  जस्टिस जे.बी.पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह आदेश तब दिया, जब पाया कि पति पहले दिए गए अदालत के आदेशों का पालन नहीं कर रहा था और 2022 से अलग रहने के बावजूद उसने पत्नी और बच्ची के लिए कोई भरण-पोषण राशि नहीं दी. अदालत ने कहा कि  दम्पत्ति की चार साल की एक बेटी है, जिसकी देखभाल पूरी तरह मां कर रही है।  खंडपीठ ने यह भी दर्ज किया कि पिछले चार वर्षों में पति ने न तो बच्ची के पालन-पोषण में कोई योगदान दिया और न ही उससे मिलने का प्रयास किया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजा था और विवाह समाप्त करने के लिए एकमुश्त समझौते की संभावना तलाशने को कहा था। अंतरिम व्यवस्था के रूप में पति को पत्नी और बच्ची के मध्यस्थता में आने-जाने के खर्च के लिए 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश दिया ...

भरण-पोषण बकाया वसूली के साथ गिरफ्तारी वारंट जारी करना अवैध: इलाहाबाद हाइकोर्ट

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  इलाहाबाद हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट में प्रचलित उस प्रक्रिया पर सख्त आपत्ति जताई, जिसके तहत भरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली के लिए एक ही समय पर वसूली वारंट और गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए जाते हैं। हाइकोर्ट ने इस प्रथा को अवैध और अमानवीय बताते हुए कहा है कि इसे तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए।  जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि  भरण-पोषण देने के दायित्व में चूक करने वाले व्यक्ति को किसी आपराधिक मामले के अभियुक्त की तरह नहीं माना जा सकता। अदालतों को यह ध्यान रखना होगा कि भरण-पोषण आदेश के प्रवर्तन के नाम पर किसी व्यक्ति की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि   यदि अदालत यह भी मान ले कि भरण-पोषण की बकाया राशि जानबूझकर अदा नहीं की गई, तब भी कानून अदालतों को यह अधिकार नहीं देता कि वे अत्यधिक उत्साह में व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दें।  इस मामले में हाइकोर्ट ने अलीगढ़ की एडिशनल प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता मोहम्मद शहज़ाद के खिलाफ भरण-पोषण की ...

मुस्लिम क़ानून के तहत वैध तलाक को मान्यता देना फैमिली कोर्ट का दायित्व :राजस्थान हाईकोर्ट

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राजस्थान हाइकोर्ट ने कहा कि  यदि मुस्लिम व्यक्तिगत क़ानून के अंतर्गत तलाक-उल-हसन या मुबारात के माध्यम से विवाह का विधिवत विघटन पहले ही हो चुका है तो फैमिली कोर्ट ऐसे तलाक को मान्यता देने और विवाह विच्छेद की घोषणा करने के लिए बाध्य है।  अदालत ने स्पष्ट किया कि  इस प्रकार की राहत को केवल अत्यधिक तकनीकी आधारों पर नकारा नहीं जा सकता ।  जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जो फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी की विवाह विच्छेद की घोषणा संबंधी याचिका खारिज किए जाने के आदेश के खिलाफ दायर की गई। याचिकाकर्ता पत्नी का कहना था कि   उसका विवाह मुस्लिम क़ानून के तहत पहले ही समाप्त हो चुका है। उसने यह दलील दी कि पति द्वारा तलाक-उल-हसन के माध्यम से तीन चरणों में तलाक दिया गया। इसके अतिरिक्त दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से मुबारात का लिखित समझौता भी हुआ था।  रिकॉर्ड के अनुसार, पति ने विवाह के दौरान तीन अलग-अलग तहर अवधियों में तलाक का उच्चारण किया पहला 8 जून 2024, दूसरा 8 जुलाई 2024 और तीसरा 8 अगस्त 2024 को जिसे ...