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भारत में नया श्रमिक कल्याण

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  भारत सरकार ने पुराने 29 श्रम कानूनों को मिलाकर 4 नए लेबर कोड (श्रम संहिता) के रूप में बड़े सुधार लागू किए हैं।  ➡️ ये चार नए लेबर कोड हैं:  1️⃣ वेतन संहिता (Code on Wages),  2️⃣ सामाजिक सुरक्षा संहिता (Code on Social Security), 3️⃣ औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code), और  4️⃣ व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशाएं संहिता (Occupational Safety, Health and Working Conditions Code)। 1️⃣ वेतन संहिता (Code on Wages):    कुल वेतन (CTC) का कम से कम 50% हिस्सा मूल वेतन (Basic Salary) होना अनिवार्य।इससे पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी (Gratuity) का हिस्सा बढ़ेगा, जिससे भविष्य में मिलने वाला फंड अधिक होगा।सभी क्षेत्रों के कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन (Minimum Wage) तय करने का प्रावधान। 2️⃣ सामाजिक सुरक्षा संहिता (Code on Social Security): असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector), गिग वर्कर्स (Gig Workers) और प्लेटफॉर्म वर्कर्स (जैसे फूड डिलीवरी या कैब ड्राइवर) को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना।इनके लिए बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य कल्याणकारी य...

साप्ताहिक बंदी में बाजार - क्या कहता है कानून

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  कांधला कस्बे में साप्ताहिक बंदी के दौरान चार खंबा रोड पर बाजार लगाए जाने की समस्या स्थानीय व्यापार मंडल के समक्ष उपस्थित हुई है और इसे लेकर व्यापारी भाइयों का बैठकों का दौर जारी हो गया है.      उत्तर प्रदेश में किसी व्यापार मंडल के क्षेत्र में दूसरा व्यापार मंडल या कोई भी पक्ष कानूनी रूप से साप्ताहिक बंदी के दिन बाजार या दुकानें नहीं लगा सकता। साप्ताहिक बंदी का निर्धारण व्यापार मंडलों द्वारा नहीं, बल्कि जिला प्रशासन द्वारा उत्तर प्रदेश दुकान एवं वाणिज्यिक अधिष्ठान अधिनियम, 1962 के तहत किया जाता है। ➡️ कानूनी स्थिति और नियम: ⚫ प्रशासनिक आदेश:  जिले के जिलाधिकारी (District Magistrate) तय करते हैं कि किस क्षेत्र में बाजार या दुकानें किस दिन बंद रहेंगी। यह आदेश पूरे क्षेत्र के सभी व्यापारियों और बाजारों पर समान रूप से लागू होता है। ⚫ व्यापार मंडल की भूमिका:  व्यापार मंडल केवल व्यापारियों की संस्थाएं होती हैं। इन्हें सरकार या प्रशासन के तय किए गए साप्ताहिक बंदी के नियमों को बदलने या तोड़ने का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता है। ⚫ दूसरा व्यापार मंडल:  यदि क्ष...

बी सी आई बैकफुट पर

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  हैदराबाद की NALSAR University of Law के 2026 बैच के छात्रों के वकील के रूप में एनरोलमेंट (नामांकन) पर रोक का मामला दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को बुलाए जाने के विरोध से जुड़ा था। हालांकि, भारी विरोध और स्थिति स्पष्ट होने के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने यह रोक तुरंत वापस ले ली है और सभी छात्रों को एनरोल करने की अनुमति दे दी है। विवाद की वजह सीजेआई का विरोध: नलसार यूनिवर्सिटी के छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में CJI सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने का विरोध किया था।   बयानों से नाराजगी: छात्र दिल्ली में हुए कुछ प्रदर्शनों और मुकदमों की सुनवाई के दौरान CJI की टिप्पणियों तथा पुलिस कार्रवाई संबंधी मामलों को लेकर नाखुश थे।   विरोध पत्र: यूनिवर्सिटी के सैकड़ों छात्रों ने प्रशासन को पत्र लिखकर इस निमंत्रण पर पुनर्विचार करने की मांग की थी।   बार काउंसिल (BCI) का एक्शन और फैसला एनरोलमेंट पर रोक: इस विरोध प्रदर्शन और अभियानों का संज्ञान लेते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन ने शुरुआती आदे...

युवा और नए वकीलों के लिए अनिवार्य पोस्ट-एनरोलमेंट ट्रेनिंग

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  बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद देश के वकीलों के लिए अनिवार्य प्रशिक्षण (Compulsory Training) का आदेश दिया है। इसके तहत गोवा स्थित IIULER परिसर में एक नेशनल लीगल एकेडमी (National Legal Academy) बनाई जाएगी, जहां वकीलों को पेशेवर ट्रेनिंग दी जाएगी। ➡️ प्रशिक्षण से जुड़ी मुख्य बातें- ⚫ प्रशिक्षण का स्थान:  गोवा के IIULER परिसर में नेशनल लीगल एकेडमी बनेगी। ⚫ अवधि :  वकीलों के लिए यह ट्रेनिंग प्रोग्राम 10 दिन से लेकर 2 हफ्ते तक का हो सकता है। ⚫ किसे करनी होगी :  यह मुख्य रूप से देश के युवा और नए वकीलों के लिए अनिवार्य पोस्ट-एनरोलमेंट ट्रेनिंग होगी। ⚫ विशेषज्ञ :  ट्रेनिंग सत्रों में सुप्रीम कोर्ट व अन्य न्यायालयों के न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता, प्रोफेसर और कानूनी विशेषज्ञ लेक्चर देंगे। ⚫ उद्देश्य और जरूरत -  वकीलों की पेशेवर दक्षता और कानूनी कौशल को मजबूत करना।कानूनी आचरण, नैतिकता (Ethics) और आधुनिक तकनीकों (जैसे AI और डिजिटल कोर्ट प्रक्रिया) से वकीलों को अवगत कराना।जिस प्रकार न्यायाधीशों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था होती है, उसी...

उत्तर प्रदेश में प्रेक्टिस करने वाले एडवोकेट के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के कड़े निर्देश

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      इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने निर्णय दिया है कि  शैक्षणिक सत्र 2009-10 या उसके बाद उत्तीर्ण होने वाले लॉ ग्रेजुएट, जो अनंतिम (प्रोविजनल) नामांकन के दो वर्षों के भीतर ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास करने में विफल रहते हैं, उन्हें किसी भी अदालत, ट्रिब्यूनल या राजस्व प्राधिकरण के समक्ष वकालत करने का अधिकार नहीं है।  अधिवक्ताओं के नामांकन और प्रैक्टिस से जुड़े प्रक्रियात्मक व वैधानिक पहलुओं को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि  अधिवक्ता पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद भी तब तक बिना नवीनीकृत प्रैक्टिस प्रमाण पत्र (COP) के प्रैक्टिस जारी रख सकते हैं, जब तक कि राज्य बार काउंसिल बार काउंसिल ऑफ इंडिया सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) रूल्स, 2015 के नियम 20.4 के तहत गैर-प्रैक्टिसिंग वकीलों की सूची आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं कर देती। 1️⃣ . 2009-10 के बाद प्रैक्टिस का अधिकार:  2009-10 के शैक्षणिक सत्र से लॉ पास करने वाले ग्रेजुएट राज्य बार काउंसिल द्वारा जारी प्रोविजनल नामांकन प...

वंदे मातरम भी अब कानूनी संरक्षण में

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 संसद के मानसून सत्र में Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 की धारा 3 में संशोधन किया गया है। जिस के अनुसार,  " यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत के गायन में बाधा डालता है या ऐसे किसी समारोह में व्यवधान उत्पन्न करता है, तो उसे तीन साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।  पहले यह प्रावधान केवल राष्ट्रीय गान " जन-गण-मन" के लिए लागू था, लेकिन अब राष्ट्रीय गीत "वंदे मातरम्" को भी इसी दायरे में शामिल कर लिया गया है। द्वारा  शालिनी कौशिक एडवोकेट कैराना (शामली) 

वकीलों के अवैध चेम्बर हटाने से पहले नगर निगम दे नया नोटिस-हाईकोर्ट ऑफ जुडिकेचर एट इलाहाबाद (लखनऊ पीठ)

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  सार्वजनिक जमीन पर अवैध कब्जे और अधिवक्ताओं द्वारा अदालती कामकाज के गैर-कानूनी बहिष्कार से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ऑफ जुडिकेचर एट इलाहाबाद (लखनऊ पीठ) के जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की पीठ ने लखनऊ नगर निगम को निर्देश दिया है कि  स्वास्थ्य भवन के पास सार्वजनिक उपयोग की जमीन और रास्तों पर काबिज 72 अतिक्रमणकारियों-जिनमें मुख्य रूप से अधिवक्ता शामिल हैं-को अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई से पहले नए सिरे से लिखित नोटिस दिए जाएं।  हाईकोर्ट ने दोहराया कि  अधिवक्ताओं द्वारा हड़ताल और काम से विरत रहना प्रत्यक्ष रूप से आपराधिक अवमानना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी अधिवक्ता या बार एसोसिएशन को न्यायिक कार्यवाही को बाधित करने या सार्वजनिक रास्तों को अवरुद्ध करने का अधिकार नहीं है। ➡️ मामले का शीर्षक:  अनुराधा सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य वाद संख्याः क्रिमिनल रिट-पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन नंबर 4 / 2026 पीठः जस्टिस राजेश सिंह चौहान, जस्टिस राजीव भारती निर्णय की तिथिः 4 अगस्त 2026 स्रोत-LAW. TREND प्रस्तुति  शा...