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वकील गारंटर नहीं - गौहाटी हाई कोर्ट

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 गौहाटी हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि याचिका दायर करने और बहस करने के बाद वकील को याचिकाकर्ता के ठिकाने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वकील अपने मुवक्किल के भौतिक ठिकाने (whereabouts) के लिए गारंटर नहीं बन सकते। इस फैसले (केस) से जुड़ी मुख्य डिटेल्स और पक्षकार निम्नलिखित हैं: 1. केस का नाम और अपील संख्या • केस का नाम: हरबिंदर सिंह कालसी और अन्य बनाम असम राज्य और 25 अन्य (Harbinder Singh Kalsi and Another v. State of Assam and 25 Others) • अपील संख्या: Writ Appeal No. WA/51/2026 2. मुख्य पक्षकार (Parties Details) • अपीलकर्ता (Advocates जिन्होंने अपील की): वकील हरबिंदर सिंह कालसी (Harbinder Singh Kalsi) और वकील रौनक सुल्ताना सादियाल (Rounak Sultana Sadial)। • मूल याचिकाकर्ता (जिनके लापता होने पर विवाद था): बेओलिन खरभीह (Beolin Kharbhih), जिन्होंने खुद को पूर्व डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) की बेटी बताते हुए अपने पिता की मौत की कोर्ट-निगरानी में जांच (Court-monitored probe) कराने के लिए 2016 में रिट याचिका दायर की थी। ...

पति "हाउस हसबैंड" - चैन्नई हाईकोर्ट

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मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ द्वारा वैवाहिक विवाद का निस्तारण करते हुए पति को "हाउस हसबैंड" कहते हुए एक ऐतिहासिक टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि "अगर समाज में 'हाउसवाइफ'(घर संभालने वाली पत्नी) हो सकती है, तो 'हाउस हसबैंड' (घर संभालने वाला पति) भी हो सकता है और इसे एक 'नया नॉर्मल' (New Normal) बनने देना चाहिए।" ➡️ इस मामले से जुड़ी पक्षकार और कोर्ट के निर्णय का पूर्ण विवरण नीचे दिया गया है: ⚖️ मामले और पक्षकार का विवरण (Case & Parties Details)केस का नाम:  वी बनाम ए (V vs A)केस नंबर: CMA(MD) No. 1257 of 2024  और  CMA(MD) No. 1446 of 2024 ⚖️ सुनवाई करने वाली पीठ: जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम.डी. सुमति की खंडपीठ (Division Bench) ⚖️ फैसले की तारीख:  23-24 सितंबर 2026 ⚖️ पक्षकार (Parties):  यह मामला तिरुवन्नामलाई के एक डॉक्टर जोड़े से जुड़ा हुआ था (पति एक सफल कार्डियोलॉजिस्ट हैं और पत्नी डेंटिस्ट हैं)। इनका विवाह वर्ष 2011 में हुआ था और इनके दो बेटे हैं। 🔍 मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case) शादी के बाद जब पति अपनी उच्च चिकित...

अब मुँह भी नहीं खोल पाएगा स्वतंत्र भारद्वाज - दिल्ली कोर्ट

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  मीडिया में अपने राजनीतिक दबदबे का बखान करने वाले स्वतंत्र भारद्वाज अब मुँह भी नहीं खोल पाएंगे. दिल्ली कोर्ट ने स्वतंत्र भारद्वाज को तीन हफ़्ते की अंतरिम ज़मानत देते हुए उसे सोशल मीडिया पर केस से जुड़ी कोई भी चीज़ पोस्ट या शेयर करने से रोक दिया, जिसमें उनके बचाव में कही गई बातें भी शामिल हैं। विस्तृत आदेश में जज ने कहा कि   डिजिटल युग में पीड़ित को डराने-धमकाने के लिए शारीरिक रूप से पास होना ज़रूरी नहीं है, क्योंकि सोशल मीडिया पर कथित मारपीट के बारे में सार्वजनिक बयान और डींगें ज़्यादा लोगों तक और लंबे समय तक पीड़ितों और गवाहों तक पहुँच सकती हैं।  कोर्ट ने निर्देश दिया कि  अंतरिम ज़मानत की अवधि के दौरान भारद्वाज किसी भी सार्वजनिक मंच पर केस, अपने बचाव, या शिकायतकर्ता और उसेके परिवार से संबंधित कोई भी बयान, वीडियो, पॉडकास्ट, इंटरव्यू, रील या पोस्ट न तो बनाएगा, न प्रकाशित करेगा, न अपलोड करेगा और न ही शेयर करेगा। कोर्ट ने कहा,  “रिकॉर्ड में जिस एक आशंका को बल मिलता है, वह यह है कि शिकायतकर्ता और गवाहों को प्रभावित किया जा सकता है। यह जोखिम शारीरिक रूप से संपर्क कर...

ST का दर्जा.... सबूत जरूरी-इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि  किसी दूसरे धर्म में धर्म परिवर्तन करने से ही किसी व्यक्ति का 'अनुसूचित जनजाति' (ST) का दर्जा अपने आप खत्म नहीं हो जाता..... कोई व्यक्ति ST का सदस्य बना रहता है या नहीं, यह तथ्यों पर निर्भर करता है। इसका फैसला आदिवासी पहचान की ज़रूरी विशेषताओं की जांच करके किया जाएगा, जिसमें पारंपरिक रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित आदिवासी समुदाय द्वारा स्वीकार्यता शामिल है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने एक महत्वपूर्ण Nanhki @ Naimunnisha vs. State of U.P. and 3 others मामले के निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल धर्म परिवर्तन या अंतर-धार्मिक विवाह से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा स्वतः समाप्त नहीं होता है।  साक्ष्यों की आवश्यकता:  यदि किसी व्यक्ति के जनजातीय दर्जे पर विवाद होता है, तो यह जांच की जाएगी कि क्या वह व्यक्ति अभी भी उस जनजाति की संस्कृति, रीति-रिवाजों और समुदाय से जुड़ा हुआ है या नहीं. भूमि हस्तांतरण मामला: इस मामले में याची ने मुस्लिम व्यक्ति से विवाह और पहचान अपनाने के बाद कृषि भूमि की खरीद से जुड़े...

बार एसोसिएशन की सदस्यता रिट क्षेत्राधिकार नहीं - इलाहाबाद हाई कोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि बार एसोसिएशन (Bar Association) की सदस्यता, निलंबन या किसी सदस्य को संगठन से बाहर करने से जुड़े विवाद मूल रूप से निजी प्रकृति के होते हैं और ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय (maintainable) नहीं है।  ⚫ मुख्य पक्षकार (Parties)याचिकाकर्ता (Petitioner):  लाल बिहारी वर्मा (Lal Bihari Verma)  ⚫ प्रतिवादी (Respondents):  उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य, सेंट्रल बार एसोसिएशन (तहसील गोला गोकर्णनाथ, जिला लखीमपुर खीरी)  ⚫ पीठ (Bench):  न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ (Justice Shekhar B. Saraf) और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी (Justice Abdhesh Kumar Chaudhary) की खंडपीठ  ➡️ निर्णय की मुख्य बातें और निष्कर्ष ⚫ रिट याचिका खारिज:  अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा सेंट्रल बार एसोसिएशन के उस आदेश (प्रेस विज्ञप्ति दिनांक 12 जून 2026) को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसके तहत उन्हें एक साल के लिए बार एसोसिएशन की सदस्यता से वंचित (debar) कर दिया गया था।  ⚫ निजी प्रकृति का ...

फैमिली पेंशन कोई सरकारी खैरात या कृपा नहीं-सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने Maya Banerjee v. Union of India & Ors. मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि फैमिली पेंशन कोई सरकारी खैरात या कृपा नहीं, बल्कि एक मूल्यवान कानूनी अधिकार और संपत्ति है।  ⚫ मुख्य पक्षकार (Case Parties)अपीलकर्ता (Petitioner/Widow): माया बनर्जी (Maya Banerjee), जो एक दिवंगत रेलवे कर्मचारी की विधवा हैं।  ⚫ प्रतिवादी (Respondents):  यूनियन ऑफ़ इंडिया एवं अन्य (रेलवे प्रशासन)।  ➡️ मामले से जुड़ी मुख्य डिटेल्स और कोर्ट का निर्णय ⚫ पति की मृत्यु की तिथि:  12 नवंबर 2000।  ⚫ अधिकार की तिथि:  सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि विधवा को फैमिली पेंशन सीमित अवधि के बजाय उसके पति की मृत्यु की वास्तविक तिथि (12 नवंबर 2000) से दी जानी चाहिए।  ⚫ बकाया और ब्याज:  कोर्ट ने आदेश दिया कि पूरे बकाए का भुगतान 6% वार्षिक ब्याज के साथ अगले तीन महीनों के भीतर किया जाए।  ⚫ देरी पर टिप्पणी:  अदालत ने कहा कि यदि पेंशन मिलने में देरी के लिए विधवा किसी भी प्रकार से जिम्मेदार नहीं है, तो केवल अदालतों या ट्रिब्यूनल में याचिका दायर ...

एसपी और थानाध्यक्ष (SHO) 'झूठों का झुंड'-इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के गौरी बाजार थाने में चार लोगों को अवैध हिरासत में रखने के मामले में एसपी और थानाध्यक्ष (SHO) को 'झूठों का झुंड' कहा है। ➡️ केस की मुख्य बातें: ⚫ घटना : 13 से 24 अप्रैल, 2026 के बीच चार लोगों (अर्चना गौड़, नंदिनी गौड़, इन्नी और महेंद्र गौड़) को गौरी बाजार थाने में अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया था।  ⚫ याचिका : यह मामला महेंद्र गौड़ की बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका के जरिए हाई कोर्ट पहुंचा था। ⚫ सीसीटीवी फुटेज गायब: सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने थाने के सीसीटीवी फुटेज मांगे, तो पुलिस ने दलील दी कि बिजली न होने और जनरेटर खराब होने के कारण रिकॉर्डिंग नहीं हो सकी।  ⚫ कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ (न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत) ने पुलिस की इस सफाई को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जो थानेदार जनरल डायरी (GD) की सही एंट्री या सीसीटीवी का बैकअप नहीं रख सकता, उसे नौकरी में रहने का अधिकार नहीं है। जब एसपी ने माफी मांगनी चाही, तो कोर्ट ने कहा कि माफी अदालत से नहीं बल्क...