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पहली पत्नी के भरण पोषण मामले में दूसरी पत्नी जरूरी पक्षकार नहीं - दिल्ली हाई कोर्ट

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 दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि   CrPC की धारा 125 के तहत पहली पत्नी और बच्चों द्वारा शुरू की गई भरण-पोषण की कार्यवाही में दूसरी पत्नी न तो ज़रूरी पक्षकार है और न ही उचित पक्षकार। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी कार्यवाही को बेवजह उन सभी लोगों को शामिल करके नहीं बढ़ाया जा सकता, जो पति पर निर्भर होने का दावा करते हैं। जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने महिला द्वारा दायर अर्जी खारिज की, जिसमें उसने पहली पत्नी द्वारा अपने पति के खिलाफ दायर भरण-पोषण की पुनरीक्षण याचिका में खुद को पक्षकार बनाने की मांग की थी। पहली पत्नी ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भरण-पोषण देने से इनकार किया गया था, जबकि शादी से पैदा हुए दो बच्चों में से हर एक को ₹10,000 देने का आदेश दिया गया था। कार्यवाही के दौरान, पति ने फैमिली कोर्ट से अपने पक्ष में तलाक की डिक्री मिलने के बाद दूसरी शादी की थी। इसके बाद दूसरी पत्नी ने भरण-पोषण की कार्यवाही में खुद को पक्षकार बनाने की मांग की। उसने दलील दी कि वह प्रतिवादी की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। इस मामले म...

अब प्रशासनिक अधिकारी जोड़ेंगे हाथ

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उप्र राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली'  उप्र राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली' के तहत अब प्रशासनिक अधिकारी हाथ जोड़ेंगे, निम्न कार्य करेंगे -  1️⃣ प्रशासनिक अधिकारियों को अब सांसदों और विधायकों के सामने हाथ जोड़ने पड़ेंगे।  2️⃣ कार्यालय में आने पर अधिकारी सांसदों व विधायकों का उठकर सम्मान करेंगे.  3️⃣ कार्यालय में आने पर उनके आगे हाथ जोड़ेंगे.  4️⃣ कार्यालय में आने पर उनसे पानी भी पूछेंगे । 5️⃣  सांसद, विधायक का फोन आने पर उसका जवाब देंगे.  6️⃣ यदि बैठक में हैं तो सांसद, विधायक का फोन आने पर पलटकर फोन कर जवाब देंगे.       जिन प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ऐसा सम्मान जनक आचरण न किए जाने की शिकायत प्राप्त होगी ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ 'उप्र राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली' के तहत कार्रवाई की जाएगी।  द्वारा  शालिनी कौशिक  एडवोकेट कैराना (शामली) 

क्या खतना मुस्लिम महिलाओं की धार्मिक आजादी है - तीखी बहस सुप्रीम कोर्ट

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मुस्लिम समुदाय मे एक शब्द प्रचलित है - खतना, जिसे अंग्रेजी में  (Female Genital Mutilation - FGM) कहते हैं FGM का मतलब फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (Female Genital Mutilation - FGM) है, और हिंदी में 'विस्तार में इसे महिला जननांग विकृति' या 'महिला खतना' कहा जाता है। यह एक अत्यंत हानिकारक प्रथा है। ➡️ प्रक्रिया -   इसमें गैर-चिकित्सीय कारणों से महिलाओं या छोटी बच्चियों के बाहरी जननांगों को आंशिक या पूरी तरह से काट दिया जाता है या उन्हें अन्य प्रकार से चोट पहुँचाई जाती है  ➡️ आयु -  यह आमतौर पर बचपन से लेकर 15 वर्ष की आयु तक की लड़कियों पर की जाती है। ➡️ स्वास्थ्य प्रभाव:  इसका कोई स्वास्थ्य लाभ नहीं है, बल्कि यह बेहद दर्दनाक होती है। इससे गंभीर रक्तस्राव, संक्रमण, प्रसव में जटिलताएं और मानसिक आघात जैसी आजीवन समस्याएं हो सकती हैं। ➡️ मानवाधिकार उल्लंघन:  संयुक्त राष्ट्र (UN) इसे लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन मानता है। वैश्विक स्थिति: यह अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के कुछ हिस्सों में प्रचलित है। वर्तमान में, विश्व स्तर पर 23 करोड़ से अधिक मह...

किरायेदार तो फंस गए...

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जनगणना 2027 में अपने मकान के सम्बन्ध में बहुत सारी जानकारी देनी है अब किरायेदार क्या करें? वे किस प्रकार H सहित 11 नंबर की SE ID प्राप्त करे? लगता है कि किरायेदार फंस गए, पर ऐसा नहीं है किरायेदार के लिए भी स्वगणना का प्रबन्ध सरकार ने किया है, क्या किया है अब ये जान लीजिए -  मकान मालिक की तरह ही किराएदार भी अपना पोर्टल पर जाकर स्वगणना कर सकते हैं। किराएदारों की अलग आइडी होगी। ⚫ किराएदार के रूप में पहचान:  स्वामित्व की स्थिति (Ownership Status) वाले सवाल में आपको 'किराया' (Rented) विकल्प चुनना होगा।अगर एक मकान में एक से अधिक किराएदार हैं तो अलग अलग आइडी जनरेट होगी। ⚫ स्व-गणना (Self-Enumeration):  किराएदार आधिकारिक पोर्टल se.census.gov.in पर जाकर अपना फॉर्म स्वयं भर सकते हैं और घर की सुविधाएं, जैसे बिजली, पानी, शौचालय आदि की जानकारी दे सकते हैं। ⚫ 6 महीने का नियम:  यदि आप किसी किराए के मकान में 6 महीने से अधिक समय से रह रहे हैं या आगे रहने वाले हैं, तो आपको उसी पते से फॉर्म भरना होगा। ⚫ दस्तावेजों की आवश्यकता नहीं:  जनगणना के लिए किसी रेंट एग्रीमेंट या आधार कार्ड...

माननीय...... कौन? - इलाहाबाद हाईकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि किसी भी रैंक के सिविल सेवक माननीय संबोधन के पात्र नहीं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सांसद, मंत्री, जज व अन्य ऐसे संवैधानिक पदाधिकारी ही इस सम्मानसूचक संबोधन के हकदार हैं। कोर्ट ने कहा कि संप्रभु कार्यों का निर्वहन करने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को प्रत्येक आधिकारिक संचार माध्यमों में माननीय संबोधन दिया जाना चाहिए। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने हर्षित शर्मा एवं अन्य की आपराधिक याचिका की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी नाराजगी या पारिवारिक परिचय के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी को उसके वैधानिक सम्मानसूचक संबोधन से वंचित नहीं किया जा सकता। केंद्र व राज्य सरकारों के मंत्री, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के जज, लोकसभा एवं राज्यसभा के अध्यक्ष/सभापति, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष, सांसद एवं विधायक ही माननीय संबोधन के अधिकारी हैं। खंडपीठ ने यह भी कहा कि प्रोटोकॉल के अनुसार अन्य समान पदाधिकारी भी इस सम्मान के पात्र हो सकते हैं और जो भी इसके हकदार हों, उन्हें उसी प्रकार संबोधित कि...

"I LOVE MOHAMMED" को ज़मानत - इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत दी, जिस पर अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर यह पोस्ट करने का आरोप था कि वह 'I Love Mohammed' के लिए अपना सिर कटवा भी सकता है और दूसरों का सिर काट भी सकता है।  जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की बेंच ने यह टिप्पणी की कि आवेदक द्वारा की गई 'कथित आपत्तिजनक' पोस्ट में किसी खास जाति या समुदाय का नाम नहीं लिया गया। आरोपी-नदीम मुजफ्फरनगर ज़िले का रहने वाला है। उस पर पिछले साल यूपी पुलिस ने उसकी इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल पर कथित तौर पर संवेदनशील टिप्पणियाँ करने के आरोप में BNS की धारा 353(2), 192, और 152 के तहत मामला दर्ज किया। ज़मानत की गुहार लगाते हुए उसके वकील ने हाईकोर्ट में यह दलील दी कि अब चार्जशीट भी जमा की गई और निकट भविष्य में मुक़दमे के पूरा होने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। दूसरी ओर, ज़मानत की अर्ज़ी का विरोध करते हुए राज्य सरकार के अतिरिक्त सरकारी वकील ने यह दलील दी कि उसने असंवेदनशील टिप्पणी पोस्ट की थी, जिसमें कहा गया था: "I Love Mohammed के लिए गर्दन कटवा भी सकते...

मुस्लिम महिला मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1976 के अंतर्गत तलाक नहीं मांग सकती -इलाहाबाद हाइकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक डिक्री रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की कि अदालत ने ऐसे कानून के तहत तलाक दिया, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के फैसले को अत्यंत लापरवाह और अनौपचारिक बताते हुए उसकी कार्यप्रणाली पर नाराज़गी जताई। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सारन की खंडपीठ ने यह आदेश पति की अपील पर पारित किया, जिसने जनवरी 2026 में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए तलाक आदेश को चुनौती दी थी। मामले में पत्नी ने अपनी याचिका मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 के तहत दायर की थी जबकि ऐसा कोई कानून अस्तित्व में ही नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि संभवतः याचिका में मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 का उल्लेख होना चाहिए, जो मुस्लिम महिलाओं को तलाक मांगने का अधिकार देता है। अदालत ने कहा कि केवल याचिका में गलत कानून का उल्लेख होने से आदेश स्वतः अवैध नहीं हो जाता, यदि ट्रायल कोर्ट सही कानून के तहत अधिकार प्रयोग करे। हालांकि, इस मामले में फैमिली कोर्ट ने स्वयं अपने पूरे निर्णय में बार-बार उसी गैर-मौजूद कानून का उल्लेख किया और उस...