संदेश

किरायेदार तो फंस गए...

चित्र
जनगणना 2027 में अपने मकान के सम्बन्ध में बहुत सारी जानकारी देनी है अब किरायेदार क्या करें? वे किस प्रकार H सहित 11 नंबर की SE ID प्राप्त करे? लगता है कि किरायेदार फंस गए, पर ऐसा नहीं है किरायेदार के लिए भी स्वगणना का प्रबन्ध सरकार ने किया है, क्या किया है अब ये जान लीजिए -  मकान मालिक की तरह ही किराएदार भी अपना पोर्टल पर जाकर स्वगणना कर सकते हैं। किराएदारों की अलग आइडी होगी। ⚫ किराएदार के रूप में पहचान:  स्वामित्व की स्थिति (Ownership Status) वाले सवाल में आपको 'किराया' (Rented) विकल्प चुनना होगा।अगर एक मकान में एक से अधिक किराएदार हैं तो अलग अलग आइडी जनरेट होगी। ⚫ स्व-गणना (Self-Enumeration):  किराएदार आधिकारिक पोर्टल se.census.gov.in पर जाकर अपना फॉर्म स्वयं भर सकते हैं और घर की सुविधाएं, जैसे बिजली, पानी, शौचालय आदि की जानकारी दे सकते हैं। ⚫ 6 महीने का नियम:  यदि आप किसी किराए के मकान में 6 महीने से अधिक समय से रह रहे हैं या आगे रहने वाले हैं, तो आपको उसी पते से फॉर्म भरना होगा। ⚫ दस्तावेजों की आवश्यकता नहीं:  जनगणना के लिए किसी रेंट एग्रीमेंट या आधार कार्ड...

माननीय...... कौन? - इलाहाबाद हाईकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि किसी भी रैंक के सिविल सेवक माननीय संबोधन के पात्र नहीं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सांसद, मंत्री, जज व अन्य ऐसे संवैधानिक पदाधिकारी ही इस सम्मानसूचक संबोधन के हकदार हैं। कोर्ट ने कहा कि संप्रभु कार्यों का निर्वहन करने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को प्रत्येक आधिकारिक संचार माध्यमों में माननीय संबोधन दिया जाना चाहिए। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने हर्षित शर्मा एवं अन्य की आपराधिक याचिका की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी नाराजगी या पारिवारिक परिचय के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी को उसके वैधानिक सम्मानसूचक संबोधन से वंचित नहीं किया जा सकता। केंद्र व राज्य सरकारों के मंत्री, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के जज, लोकसभा एवं राज्यसभा के अध्यक्ष/सभापति, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष, सांसद एवं विधायक ही माननीय संबोधन के अधिकारी हैं। खंडपीठ ने यह भी कहा कि प्रोटोकॉल के अनुसार अन्य समान पदाधिकारी भी इस सम्मान के पात्र हो सकते हैं और जो भी इसके हकदार हों, उन्हें उसी प्रकार संबोधित कि...

"I LOVE MOHAMMED" को ज़मानत - इलाहाबाद हाईकोर्ट

चित्र
  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत दी, जिस पर अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर यह पोस्ट करने का आरोप था कि वह 'I Love Mohammed' के लिए अपना सिर कटवा भी सकता है और दूसरों का सिर काट भी सकता है।  जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की बेंच ने यह टिप्पणी की कि आवेदक द्वारा की गई 'कथित आपत्तिजनक' पोस्ट में किसी खास जाति या समुदाय का नाम नहीं लिया गया। आरोपी-नदीम मुजफ्फरनगर ज़िले का रहने वाला है। उस पर पिछले साल यूपी पुलिस ने उसकी इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल पर कथित तौर पर संवेदनशील टिप्पणियाँ करने के आरोप में BNS की धारा 353(2), 192, और 152 के तहत मामला दर्ज किया। ज़मानत की गुहार लगाते हुए उसके वकील ने हाईकोर्ट में यह दलील दी कि अब चार्जशीट भी जमा की गई और निकट भविष्य में मुक़दमे के पूरा होने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। दूसरी ओर, ज़मानत की अर्ज़ी का विरोध करते हुए राज्य सरकार के अतिरिक्त सरकारी वकील ने यह दलील दी कि उसने असंवेदनशील टिप्पणी पोस्ट की थी, जिसमें कहा गया था: "I Love Mohammed के लिए गर्दन कटवा भी सकते...

मुस्लिम महिला मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1976 के अंतर्गत तलाक नहीं मांग सकती -इलाहाबाद हाइकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक डिक्री रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की कि अदालत ने ऐसे कानून के तहत तलाक दिया, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के फैसले को अत्यंत लापरवाह और अनौपचारिक बताते हुए उसकी कार्यप्रणाली पर नाराज़गी जताई। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सारन की खंडपीठ ने यह आदेश पति की अपील पर पारित किया, जिसने जनवरी 2026 में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए तलाक आदेश को चुनौती दी थी। मामले में पत्नी ने अपनी याचिका मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 के तहत दायर की थी जबकि ऐसा कोई कानून अस्तित्व में ही नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि संभवतः याचिका में मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 का उल्लेख होना चाहिए, जो मुस्लिम महिलाओं को तलाक मांगने का अधिकार देता है। अदालत ने कहा कि केवल याचिका में गलत कानून का उल्लेख होने से आदेश स्वतः अवैध नहीं हो जाता, यदि ट्रायल कोर्ट सही कानून के तहत अधिकार प्रयोग करे। हालांकि, इस मामले में फैमिली कोर्ट ने स्वयं अपने पूरे निर्णय में बार-बार उसी गैर-मौजूद कानून का उल्लेख किया और उस...

हिन्दू पति ऐसी पत्नि के भरण पोषण के लिए बाध्य नहीं - इलाहाबाद हाइकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई शिक्षित और कमाने में सक्षम पत्नी केवल पति पर आर्थिक बोझ डालने के उद्देश्य से काम करने से परहेज करती है तो अदालतें हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार कर सकती हैं। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक महिला द्वारा दायर प्रथम अपील खारिज करते हुए की। महिला पेशे से स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं और उन्होंने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके अंतरिम भरण-पोषण का आवेदन अस्वीकार किया गया था। प्रयागराज के फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत महिला की अंतरिम भरण-पोषण याचिका खारिज की थी। हालांकि बच्चों के लिए धारा 26 के तहत भरण-पोषण मंजूर किया गया। रिकॉर्ड के अनुसार महिला की आयकर विवरणियों से उसकी वार्षिक आय 31 लाख रुपये से अधिक पाई गई। हाईकोर्ट में महिला ने दलील दी कि वह फिलहाल कार्यरत नहीं हैं क्योंकि पति द्वारा मुकदमा दायर किए जाने के बाद उन्हें अस्पताल से हटा दिया गया। उनका कहना था कि अलगाव से पूर्व जिस जीवनस्तर पर वह रह रही थीं उसे बना...

परिवार के सदस्य को ही मृत्यु अनुकम्पा नियुक्ति का अधिकार - इलाहाबाद हाइकोर्ट

चित्र
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए “विधवा पुत्रवधू” की पात्रता का निर्धारण सरकारी कर्मचारी की मृत्यु की तिथि के संदर्भ में किया जाना अनिवार्य है। कोर्ट ने आदेश दिया कि जो व्यक्ति कर्मचारी की मृत्यु के समय “पारिवारिक इकाई” का सदस्य नहीं था, वह विवाह या विधवा होने जैसी बाद की घटनाओं के आधार पर पात्रता का दावा नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह फैसला दीपिका तिवारी की विशेष अपील को खारिज करके दिया। इस मामले का मुख्य बिंदु यह था कि क्या एक महिला, जिसने सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के लगभग दो साल बाद उसके बेटे से विवाह किया और बाद में विधवा हो गई, अनुकंपा नियुक्ति की हकदार हो सकती है। कोर्ट को उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम, 1921 के विनियम 103 से 107 की व्याख्या करनी थी ताकि यह तय किया जा सके कि क्या “विधवा पुत्रवधू” का दर्जा कर्मचारी के निधन के समय अस्तित्व में होना चाहिए। दरअसल, संगीता बाजपेयी जो लखनऊ के नारी शिक्षा निकेतन इंटर कॉलेज में सहायक शिक्षिका थीं, जिनका 23 अप्रैल 2021 को सेवाकाल ...

सोशल मीडिया पर BCI नियमों का पालन करें एडवोकेट - चूक भारी पड़ सकती है

चित्र
 देखने मे आ रहा है कि आज के सोशल मीडिया युग में एडवोकेट नाम कमाने के लिए, ज्यादा से ज्यादा लोगों को यह दिखाने के लिए कि मैं बार काउंसिल मे रजिस्टर्ड एडवोकेट हूं अपने सर्टिफिकेट का प्रयोग अपने सोशल मीडिया नेटवर्किंग साइट्स के अकाउंट पर कर रहे हैं. जबकि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों, विशेष रूप से BCI Rules (Part VI) के तहत, वकील द्वारा अपना सर्टिफिकेट, आईडी कार्ड या "एडवोकेट" स्टिकर का उपयोग सोशल मीडिया प्रोफाइल पिक्चर (DP) के रूप में करना पेशेवर नैतिकता और विज्ञापन के नियमों के अंतर्गत आता है। ⚫ BCI के निर्देशों के अनुसार, मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: ➡️ विज्ञापन पर रोक (Rule 36):  बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के नियम 36 के तहत, वकील सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से अपने काम का विज्ञापन नहीं कर सकते हैं। BCI ने बीसीआई नियमों के नियम 36, अध्याय II, भाग VI का उल्लंघन करने वाले विज्ञापनों को तत्काल वापस लेने की मांग की, जिसमें कहा गया: “कोई भी वकील सीधे या परोक्ष रूप से काम नहीं मांगेगा या विज्ञापन नहीं देगा, चाहे वह सर्कुलर, विज्ञापनों, दलालों, व्यक्तिगत संचार, व्यक्तिगत संबंध...