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उत्तर प्रदेश में प्रेक्टिस करने वाले एडवोकेट के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के कड़े निर्देश

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      इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने निर्णय दिया है कि  शैक्षणिक सत्र 2009-10 या उसके बाद उत्तीर्ण होने वाले लॉ ग्रेजुएट, जो अनंतिम (प्रोविजनल) नामांकन के दो वर्षों के भीतर ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास करने में विफल रहते हैं, उन्हें किसी भी अदालत, ट्रिब्यूनल या राजस्व प्राधिकरण के समक्ष वकालत करने का अधिकार नहीं है।  अधिवक्ताओं के नामांकन और प्रैक्टिस से जुड़े प्रक्रियात्मक व वैधानिक पहलुओं को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि  अधिवक्ता पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद भी तब तक बिना नवीनीकृत प्रैक्टिस प्रमाण पत्र (COP) के प्रैक्टिस जारी रख सकते हैं, जब तक कि राज्य बार काउंसिल बार काउंसिल ऑफ इंडिया सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) रूल्स, 2015 के नियम 20.4 के तहत गैर-प्रैक्टिसिंग वकीलों की सूची आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं कर देती। 1️⃣ . 2009-10 के बाद प्रैक्टिस का अधिकार:  2009-10 के शैक्षणिक सत्र से लॉ पास करने वाले ग्रेजुएट राज्य बार काउंसिल द्वारा जारी प्रोविजनल नामांकन प...

वंदे मातरम भी अब कानूनी संरक्षण में

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 संसद के मानसून सत्र में Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 की धारा 3 में संशोधन किया गया है। जिस के अनुसार,  " यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत के गायन में बाधा डालता है या ऐसे किसी समारोह में व्यवधान उत्पन्न करता है, तो उसे तीन साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।  पहले यह प्रावधान केवल राष्ट्रीय गान " जन-गण-मन" के लिए लागू था, लेकिन अब राष्ट्रीय गीत "वंदे मातरम्" को भी इसी दायरे में शामिल कर लिया गया है। द्वारा  शालिनी कौशिक एडवोकेट कैराना (शामली) 

वकीलों के अवैध चेम्बर हटाने से पहले नगर निगम दे नया नोटिस-हाईकोर्ट ऑफ जुडिकेचर एट इलाहाबाद (लखनऊ पीठ)

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  सार्वजनिक जमीन पर अवैध कब्जे और अधिवक्ताओं द्वारा अदालती कामकाज के गैर-कानूनी बहिष्कार से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ऑफ जुडिकेचर एट इलाहाबाद (लखनऊ पीठ) के जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस राजीव भारती की पीठ ने लखनऊ नगर निगम को निर्देश दिया है कि  स्वास्थ्य भवन के पास सार्वजनिक उपयोग की जमीन और रास्तों पर काबिज 72 अतिक्रमणकारियों-जिनमें मुख्य रूप से अधिवक्ता शामिल हैं-को अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई से पहले नए सिरे से लिखित नोटिस दिए जाएं।  हाईकोर्ट ने दोहराया कि  अधिवक्ताओं द्वारा हड़ताल और काम से विरत रहना प्रत्यक्ष रूप से आपराधिक अवमानना है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी अधिवक्ता या बार एसोसिएशन को न्यायिक कार्यवाही को बाधित करने या सार्वजनिक रास्तों को अवरुद्ध करने का अधिकार नहीं है। ➡️ मामले का शीर्षक:  अनुराधा सिंह और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य वाद संख्याः क्रिमिनल रिट-पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन नंबर 4 / 2026 पीठः जस्टिस राजेश सिंह चौहान, जस्टिस राजीव भारती निर्णय की तिथिः 4 अगस्त 2026 स्रोत-LAW. TREND प्रस्तुति  शा...

LADC कान्ट्रेक्ट रिन्यू नहीं होंगे-NALSA

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  नेशनल लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी (NALSA) ने निर्देश दिया है कि पंजाब, हरियाणा और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में 'लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम' (LADCS) स्कीम के तहत नियुक्त 'लीगल एड डिफेंस काउंसिल्स' (LADCs) के कॉन्ट्रैक्ट सितंबर 2026 से आगे रिन्यू नहीं किए जाएंगे। 4 अगस्त 2026 को सभी राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों (State Legal Services Authorities) के सदस्य सचिवों को भेजे गए एक पत्र में NALSA के सदस्य सचिव संजीव पांडे ने बताया कि यह फ़ैसला 3 अगस्त 2026 को पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ के बार एसोसिएशन के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक के बाद लिया गया। इन प्रतिनिधियों ने LADCS स्कीम को लागू करने के तरीके पर चिंता जताई थी। पत्र के अनुसार, सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) ने बार प्रतिनिधियों से स्कीम के कामकाज में मौजूद कमियों पर ठोस और रचनात्मक सुझाव देने का आग्रह किया। साथ ही यह भी बताया गया कि LADCS स्कीम की समीक्षा के लिए पहले से ही एक समिति गठित की जा चुकी है। इस समीक्षा के लंबित रहने के दौरान, सक्षम प्राधिकारी ने निर्देश दिया: 1. पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ...

Enrollment के बाद एडवोकेट दो साल तक पूरी प्रेक्टिस का हकदार - BCI

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  बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) ने साफ़ किया कि प्रोविज़नल तौर पर एनरोल हुए वकील, एनरोलमेंट के तुरंत बाद और तय दो साल की अवधि के दौरान, ऑल-इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास किए बिना भी पूरी तरह से वकालत की प्रैक्टिस करने के हकदार हैं। BCI ने साफ़ किया कि स्टेट बार काउंसिल द्वारा एनरोल किए गए वकील तय दो साल की अवधि के दौरान पूरी तरह से वकालत की प्रैक्टिस कर सकते हैं - जिसमें वकालतनामा पर साइन करना और कोर्ट में पेश होना शामिल है - भले ही उन्होंने AIBE पास न किया हो। BCI ने कहा, "एक वकील एनरोलमेंट के तुरंत बाद और AIBE पास करने तक तय दो साल की अवधि के लिए वकालत का पेशा अपनाने का पूरा हकदार है। इस अधिकार में मुकदमे से जुड़े और मुकदमे से न जुड़े सभी कानूनी काम शामिल हैं। 'प्रोविज़नल' शब्द का मतलब उन दो सालों के दौरान प्रैक्टिस के दायरे को कम करना नहीं है। यह सिर्फ़ दो साल के बाद भी प्रैक्टिस करने के अधिकार को AIBE पास करने पर निर्भर बनाता है... प्रैक्टिस करने के अधिकार के अलावा, वकील के पास वोट देने का अधिकार, बार एसोसिएशन चुनाव लड़ने का अधिकार या कल्याणकारी लाभ पाने का अधिकार तब...

इस्लाम अपनाने वाली बहनों को अदालत में पेश करें - इलाहाबाद हाईकोर्ट

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 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वेच्छा से इस्लाम अपनाने और अपनी पसंद से विवाह करने की इच्छा रखने वाली दो वयस्क सगी बहनों को 6 अगस्त 2026 को अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह आदेश एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है, जिसमें उनके पिता द्वारा उन्हें अवैध रूप से कैद रखने का आरोप लगाया गया है। ➡️ पक्षकार (Parties)याचिकाकर्ता (बहनें):  ⚫ दिव्या भाटिया उर्फ जोया दीया भाटिया (आयु लगभग 20 वर्ष) और अंशु भाटिया उर्फ अमीना अंशु भाटिया (आयु लगभग 35 वर्ष)। ⚫ प्रतिवादी/अन्य पक्ष: उत्तर प्रदेश राज्य, संबंधित पुलिस अधिकारी और युवतियों के पिता (अनिल कुमार भाटिया)। ➡️ मामले के मुख्य बिंदु और आरोप स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन:  याचिकाकर्ताओं के वकील (अली बिन सैफ और कैफ हसन) ने तर्क दिया कि दोनों बहनों ने बिना किसी बल, दबाव, धोखाधड़ी या प्रलोभन के अपनी स्वतंत्र इच्छा से हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम धर्म स्वीकार किया है और वे अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करना चाहती हैं। ⚫ अवैध कैद का आरोप : याचिका में आरोप लगाया गया है कि उनके पिता इस फैसले से नाराज है...

पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है-सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने 31 जुलाई 2026 को कहा कि  CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है, अगर पति शुरुआती स्तर पर ही पत्नी के एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर (व्यभिचार) को साबित कर देता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पति CrPC की धारा 125(4) के तहत शुरुआती स्तर पर ही पुख्ता सबूतों से पत्नी का व्यभिचार (एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर) साबित कर देता है, तो पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता पाने का अधिकार नहीं है।  ⚫ मामले की पृष्ठभूमि:  पति ने 2014 में शादी के बाद 2020 में अलग होने के बाद पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाया था; निचली अदालत व हाईकोर्ट ने कहा था कि एडल्टरी का मुद्दा मुख्य सुनवाई के दौरान ही परखा जाएगा, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बदल दिया। ➡️ मुख्य बिंदु और अदालत का फैसला पक्षकार :  ⚫ हिमांशु चौरड़िया (पति) बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (पत्नी)। ⚫ पीठ (Bench): जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली। ⚫ निर्णय का आधार: अदालत ने कहा कि निचली अदालतें और हाईकोर्ट यह मानकर गलती नहीं कर सकते कि व्यभिचार के आरोपों पर केवल अंतिम फैसले के वक्त...