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UCC से ही मिलेगा मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार-सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक जनहित याचिका पर संक्षिप्त सुनवाई की, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधानों को महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी गई है।  चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट प्रशांत भूषण से पूछा कि  क्या अदालत पर्सनल लॉ की संवैधानिक वैधता पर फैसला दे सकती है।  इसी के साथ जस्टिस बागची ने बॉम्बे हाईकोर्ट के प्रसिद्ध 'नरसू अप्पा माली' फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि  पर्सनल लॉ को संवैधानिक परीक्षण के अधीन नहीं लाया जा सकता. खंडपीठ ने यह भी सवाल उठाया कि   यदि अदालत शरीयत कानून के उत्तराधिकार संबंधी प्रावधानों को रद्द कर देती है, तो क्या इससे कानूनी शून्य (legal vacuum) पैदा नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अन्य विधिक कानून मौजूद नहीं है।  इस पर भूषण ने कहा कि  ऐसी स्थिति में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) लागू हो सकता है।  प्रशांत भूषण ने यह भी कहा कि ...

पति द्वारा भरण पोषण -सुप्रीम कोर्ट सख्त

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  सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए पति के नियोक्ता को निर्देश दिया कि  वह उसके वेतन से हर महीने 25 हजार रुपये काटकर सीधे उसकी अलग रह रही पत्नी के बैंक खाते में जमा करे। यह राशि पत्नी और उनकी नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए दी जाएगी।  जस्टिस जे.बी.पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह आदेश तब दिया, जब पाया कि पति पहले दिए गए अदालत के आदेशों का पालन नहीं कर रहा था और 2022 से अलग रहने के बावजूद उसने पत्नी और बच्ची के लिए कोई भरण-पोषण राशि नहीं दी. अदालत ने कहा कि  दम्पत्ति की चार साल की एक बेटी है, जिसकी देखभाल पूरी तरह मां कर रही है।  खंडपीठ ने यह भी दर्ज किया कि पिछले चार वर्षों में पति ने न तो बच्ची के पालन-पोषण में कोई योगदान दिया और न ही उससे मिलने का प्रयास किया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजा था और विवाह समाप्त करने के लिए एकमुश्त समझौते की संभावना तलाशने को कहा था। अंतरिम व्यवस्था के रूप में पति को पत्नी और बच्ची के मध्यस्थता में आने-जाने के खर्च के लिए 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश दिया ...

भरण-पोषण बकाया वसूली के साथ गिरफ्तारी वारंट जारी करना अवैध: इलाहाबाद हाइकोर्ट

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  इलाहाबाद हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट में प्रचलित उस प्रक्रिया पर सख्त आपत्ति जताई, जिसके तहत भरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली के लिए एक ही समय पर वसूली वारंट और गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए जाते हैं। हाइकोर्ट ने इस प्रथा को अवैध और अमानवीय बताते हुए कहा है कि इसे तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए।  जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि  भरण-पोषण देने के दायित्व में चूक करने वाले व्यक्ति को किसी आपराधिक मामले के अभियुक्त की तरह नहीं माना जा सकता। अदालतों को यह ध्यान रखना होगा कि भरण-पोषण आदेश के प्रवर्तन के नाम पर किसी व्यक्ति की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि   यदि अदालत यह भी मान ले कि भरण-पोषण की बकाया राशि जानबूझकर अदा नहीं की गई, तब भी कानून अदालतों को यह अधिकार नहीं देता कि वे अत्यधिक उत्साह में व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दें।  इस मामले में हाइकोर्ट ने अलीगढ़ की एडिशनल प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता मोहम्मद शहज़ाद के खिलाफ भरण-पोषण की ...

मुस्लिम क़ानून के तहत वैध तलाक को मान्यता देना फैमिली कोर्ट का दायित्व :राजस्थान हाईकोर्ट

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राजस्थान हाइकोर्ट ने कहा कि  यदि मुस्लिम व्यक्तिगत क़ानून के अंतर्गत तलाक-उल-हसन या मुबारात के माध्यम से विवाह का विधिवत विघटन पहले ही हो चुका है तो फैमिली कोर्ट ऐसे तलाक को मान्यता देने और विवाह विच्छेद की घोषणा करने के लिए बाध्य है।  अदालत ने स्पष्ट किया कि  इस प्रकार की राहत को केवल अत्यधिक तकनीकी आधारों पर नकारा नहीं जा सकता ।  जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जो फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी की विवाह विच्छेद की घोषणा संबंधी याचिका खारिज किए जाने के आदेश के खिलाफ दायर की गई। याचिकाकर्ता पत्नी का कहना था कि   उसका विवाह मुस्लिम क़ानून के तहत पहले ही समाप्त हो चुका है। उसने यह दलील दी कि पति द्वारा तलाक-उल-हसन के माध्यम से तीन चरणों में तलाक दिया गया। इसके अतिरिक्त दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से मुबारात का लिखित समझौता भी हुआ था।  रिकॉर्ड के अनुसार, पति ने विवाह के दौरान तीन अलग-अलग तहर अवधियों में तलाक का उच्चारण किया पहला 8 जून 2024, दूसरा 8 जुलाई 2024 और तीसरा 8 अगस्त 2024 को जिसे ...

सड़क सुरक्षा माह -सीट बेल्ट चालान और गुड सेमेरिटन स्कीम

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  भारत में राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह/सप्ताह 2026, 1 जनवरी से 31 जनवरी 2026 तक मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य यातायात नियमों, जैसे हेलमेट/सीट बेल्ट के अनिवार्य उपयोग और नशे में वाहन न चलाने के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह राष्ट्रीय अभियान सड़क दुर्घटनाओं को कम करने और सुरक्षित परिवहन को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।  ➡️ सड़क सुरक्षा माह 2026 के प्रमुख विवरण: ✒️ अवधि : 1 जनवरी 2026 से 31 जनवरी 2026 तक (राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह)। ✒️ मुख्य विषय (Theme): "सीख से सुरक्षा" (Learning to Safety)। अन्य संदर्भों में, 2026 के लिए “परवाह से कर्तव्य तक” (From Care to Duty) और "सड़क सुरक्षा नायक" (Road Safety Heroes) भी शामिल हैं। ✒️ उद्देश्य : ओवरस्पीडिंग पर नियंत्रण, हेलमेट/सीट बेल्ट का अनिवार्य उपयोग, और नशे में वाहन न चलाने के बारे में जागरूकता बढ़ाना। ✒️ गतिविधियाँ : जागरूकता रथ, सड़क सुरक्षा प्रतिज्ञा, पोस्टर/स्लोगन प्रतियोगिताएं, और वाहन निरीक्षण अभियान।  ➡️ सड़क सुरक्षा के 10 आवश्यक सुझाव:  1️⃣ गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग न करें। 2️⃣ हमेशा हेलमेट और सीट बेल्ट पह...

UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर रोक:दुरूपयोग की आशंका-सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने' से संबंधित 2026 की नियमावली (UGC Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) को अगली सुनवाई तक स्थगित (abeyance) रखने का आदेश दिया। अदालत ने इन नियमों को लेकर गंभीर आपत्तियाँ जताते हुए कहा कि ये प्रथम दृष्टया अस्पष्ट (vague) हैं और दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने सुझाव दिया कि  इन नियमों की समीक्षा प्रख्यात विधिवेत्ताओं (eminent jurists) की एक समिति द्वारा की जानी चाहिए, ताकि सामाजिक मूल्यों, परिसरों के माहौल और समाज पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जा सके।  खंडपीठ ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने को कहा है। मामला 19 मार्च को फिर सूचीबद्ध होगा। तब तक UGC की 2012 की नियमावली लागू रहेगी। ➡️ अदालत की प्रमुख आपत्तियाँ  सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने 2026 नियमों को लेकर कई अहम सवाल उठाए:  1️⃣ नियमों की भाषा ...

रजिस्टर्ड सेल डीड को फर्जी कहना कठिन: सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि " एक रजिस्टर्ड सेल डीड को ज़्यादा वैध और असली माना जाता है, इसलिए बिक्री के लेन-देन का विरोध करने के लिए इसे हल्के में 'फर्जी' घोषित नहीं किया जा सकता।" जस्टिस राजेश बिंदल और मनमोहन की बेंच ने टिप्पणी की, “ यह कानून की एक तय स्थिति है कि एक रजिस्टर्ड सेल डीड अपने साथ वैधता और प्रामाणिकता की एक मज़बूत धारणा रखती है। रजिस्ट्रेशन सिर्फ़ एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक गंभीर कार्य है जो दस्तावेज़ को उच्च स्तर की पवित्रता प्रदान करता है। नतीजतन, एक कोर्ट को किसी रजिस्टर्ड दस्तावेज़ को हल्के में या लापरवाही से 'फर्जी' घोषित नहीं करना चाहिए।” बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए खरीदार की याचिका स्वीकार की, जिसमें उसके पक्ष में निष्पादित रजिस्टर्ड सेल डीड को बाद में विक्रेता ने बिना किसी विश्वसनीय सबूत के 'फर्जी' बताकर विवादित कर दिया था। यह मामला था जिसमें प्रतिवादी ने अपना कर्ज चुकाने के लिए अपीलकर्ता के पास अपना घर गिरवी रखा था। जब प्रतिवादी अपीलकर्ता की मांग पर गिरवी छुड़ाने में विफल रहा तो एक रजिस्टर्ड बिक्री समझौता किया गया...