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सोशल मीडिया पर बैन हो " बॉडी शेमिंग "

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  आजकल सोशल मीडिया पर एक शब्द चर्चा में है " बॉडी शेमिंग "बॉडी शेमिंग (Body Shaming) जिस का अर्थ है किसी व्यक्ति के शारीरिक रूप-रंग, वजन, आकार या बनावट को लेकर नकारात्मक टिप्पणी करना, उसका मजाक उड़ाना या उसे शर्मिंदा करना। यह एक प्रकार की मानसिक बदमाशी है जो उस व्यक्ति के आत्मविश्वास को कम करती है, जिसकी बॉडी शेमिंग की जाती है मतलब जिसकी शारीरिक बनावट का उपहास उड़ाया जाता है और यह मोटापे से लेकर दुबलेपन तक, या किसी भी शारीरिक विशेषता से संबंधित हो सकती है। उत्तर प्रदेश की IPS अधिकारी अपर्णा रजत कौशिक पिछले दिनों एक इनामी बदमाश की गिरफ्तारी को लेकर सोशल मीडिया पर ब्रीफिंग कर रही थीं. अपर्णा कौशिक आईपीएस बनने से पहले गुरुग्राम में एक प्राइवेट कंपनी में बिजनेस एनालिस्ट थीं, जहां उनका सालाना पैकेज करीब 18 लाख रुपये का था. अपर्णा द्वारा बाद में यह आरामदायक नौकरी छोड़कर सिविल सेवा की तैयारी करने का फैसला लिया गया और अपनी कड़ी मेहनत के बदौलत यूपीएससी परीक्षा पास की और फिर वह 2015 बैच की आईपीएस अधिकारी बनीं. आईपीएस के तौर पर अपर्णा रजत कौशिक यूपी के अमेठी जिले में भी पुलिस अधीक्षक पद ...

गुजरात UCC 2026 -बंद हो जायेगा हलाला

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गुजरात सरकार ने बुधवार को 'गुजरात समान नागरिक संहिता (UCC), 2026' विधेयक विधानसभा में पेश कर दिया। इसके साथ ही गुजरात ने यूसीसी लागू करने वाला दूसरा राज्य बनने की ओर तेजी से कदम बढ़ा दिया है। विधानसभा से बिल के पारित होने के बाद धर्म, जाति या पंथ की परवाह किए बिना विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और सहजीवन संबंध से संबंधित कानून एक जैसे होंगे। गुजरात समान नागरिक संहिता UCC 2026 विधेयक के मसौदे में शादी, तलाक, लिव इन रिलेशनशिप जैसे मामलों में कई अहम प्रावधान किए गए हैं। बिल में मुस्लिम महिलाओं को ध्यान में रखकर भी कुछ प्रावधान किए गए हैं। खासकर हलाला प्रथा पर रोक लगाने की व्यवस्था की गई है। मसौदे में कहा गया है कि कोई दंपति तलाक के बाद बिना किसी शर्त दोबारा विवाह कर सकता है। इसमें कहा गया है, 'दोबारा विवाह के अधिकार में तलाक लेने वाले साथी से ही फिर विवाह का अधिकार शामिल है और इसके लिए किसी तरह की शर्त नहीं होगी, जैसे दोबारा मिलन से पहले किसी तीसरे से शादी करना।' सूत्रों का कहना है कि मुस्लिम समाज में प्रचलित हलाला प्रथा को रोकने के लिए इस तरह का प्रावधान किया गया है। यदि कोई इस...

नमाजियों की संख्या सीमित करने का प्रशासन को अधिकार नहीं -इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाइकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रमज़ान के दौरान एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करने के प्रशासनिक फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है और इसके नाम पर लोगों के धार्मिक अधिकारों पर रोक नहीं लगाई जा सकती। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने 27 फरवरी को सुनवाई के दौरान कहा कि यदि संभल के पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी को कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में कठिनाई महसूस होती है तो उन्हें या तो अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर स्थानांतरण मांग लेना चाहिए। अदालत ने कहा, “राज्य के वकील ने कहा कि संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति के कारण नमाज़ियों की संख्या सीमित की गई। हम इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हैं। हर परिस्थिति में कानून का शासन बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है।” खंडपीठ ने आगे कहा, “यदि स्थानीय अधिकारी यानी पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर को लगता है कि कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है, इसलिए वे नमाज़ियों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे द...

महिलाओं के रोजगार पर पड़ सकता है उल्टा असर -सुप्रीम कोर्ट

 सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सभी कार्यस्थलों में महिलाओं के लिए पेड मेंस्ट्रुअल लीव (मासिक धर्म अवकाश) की मांग करने वाली एक याचिका का निस्तारण करते हुए केंद्र सरकार से कहा कि वह याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए प्रतिनिधित्व पर सभी हितधारकों से परामर्श करके नीति बनाने पर विचार करे। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी चिंता जताई कि यदि कानून बनाकर मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य कर दिया गया तो इसका महिलाओं के रोजगार पर उल्टा असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि इससे नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से हिचक सकते हैं, जिससे कार्यबल में उनकी भागीदारी प्रभावित हो सकती है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता शैलेन्द्र मणी त्रिपाठी की लोकस स्टैंडी (याचिका दायर करने के अधिकार) पर भी सवाल उठाया और कहा कि इस मुद्दे पर स्वयं कोई महिला अदालत के सामने नहीं आई है। यह इसी मुद्दे पर याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई तीसरी याचिका थी। पहली याचिका फरवरी 2023 में निस्तारित की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद 2...

राहुल गाँधी के खिलाफ दायर विनायक दामोदर सावरकर मानहानि मामला खत्म

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  महाराष्ट्र के नासिक कोर्ट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर मानहानि मामले को बुधवार को समाप्त कर दिया। यह मामला हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के संबंध में दर्ज किया गया था। एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट रुपाली नरवडिया की अदालत ने यह निर्णय शिकायतकर्ता द्वारा अपनी शिकायत वापस लेने की अर्जी स्वीकार करते हुए दिया। इसके साथ ही राहुल गांधी के खिलाफ चल रही पूरी कार्यवाही समाप्त कर दी गई। मामला 'निर्भया फाउंडेशन' नामक एक गैर-सरकारी संगठन के निदेशक की शिकायत पर दर्ज हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि  2022 की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने यह कहा था कि सावरकर ने ब्रिटिश सरकार के साथ काम करने का वादा किया था।  शिकायतकर्ता का कहना था कि  इस बयान से सावरकर की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची जिन्हें वह स्वतंत्रता सेनानी बताते हैं।  राहुल गांधी की ओर से पेश वकील जयंत जैभवे और गजेंद्र सनप ने बताया कि  अदालत ने पहले इस शिकायत पर स्थानीय पुलिस से जांच कराने का आदेश दिया। पुलिस की रिपोर्ट अदालत में दाखिल होने के बाद श...

UCC से ही मिलेगा मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार-सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक जनहित याचिका पर संक्षिप्त सुनवाई की, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधानों को महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी गई है।  चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट प्रशांत भूषण से पूछा कि  क्या अदालत पर्सनल लॉ की संवैधानिक वैधता पर फैसला दे सकती है।  इसी के साथ जस्टिस बागची ने बॉम्बे हाईकोर्ट के प्रसिद्ध 'नरसू अप्पा माली' फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि  पर्सनल लॉ को संवैधानिक परीक्षण के अधीन नहीं लाया जा सकता. खंडपीठ ने यह भी सवाल उठाया कि   यदि अदालत शरीयत कानून के उत्तराधिकार संबंधी प्रावधानों को रद्द कर देती है, तो क्या इससे कानूनी शून्य (legal vacuum) पैदा नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अन्य विधिक कानून मौजूद नहीं है।  इस पर भूषण ने कहा कि  ऐसी स्थिति में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) लागू हो सकता है।  प्रशांत भूषण ने यह भी कहा कि ...

पति द्वारा भरण पोषण -सुप्रीम कोर्ट सख्त

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  सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए पति के नियोक्ता को निर्देश दिया कि  वह उसके वेतन से हर महीने 25 हजार रुपये काटकर सीधे उसकी अलग रह रही पत्नी के बैंक खाते में जमा करे। यह राशि पत्नी और उनकी नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए दी जाएगी।  जस्टिस जे.बी.पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह आदेश तब दिया, जब पाया कि पति पहले दिए गए अदालत के आदेशों का पालन नहीं कर रहा था और 2022 से अलग रहने के बावजूद उसने पत्नी और बच्ची के लिए कोई भरण-पोषण राशि नहीं दी. अदालत ने कहा कि  दम्पत्ति की चार साल की एक बेटी है, जिसकी देखभाल पूरी तरह मां कर रही है।  खंडपीठ ने यह भी दर्ज किया कि पिछले चार वर्षों में पति ने न तो बच्ची के पालन-पोषण में कोई योगदान दिया और न ही उससे मिलने का प्रयास किया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजा था और विवाह समाप्त करने के लिए एकमुश्त समझौते की संभावना तलाशने को कहा था। अंतरिम व्यवस्था के रूप में पति को पत्नी और बच्ची के मध्यस्थता में आने-जाने के खर्च के लिए 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश दिया ...