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पहले दें सबूत आप

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लोकसभा चनाव २०१४ नज़दीक हैं और इसलिए सर्वाधिक सुर्ख़ियों में हैं हमारे राजनेता .सत्ता कौन नहीं चाहता ,कुर्सी का नशा हर किसी के सिर चढ़कर बोलता है .हर कोई जो ओखली स्वरुप राजनीति में सिर घुसा देता है वह मूसल स्वरुप किसी आरोप अस्त्र से नहीं डरता और फिर वह जिसे जैसे भी हो जैसे जनता को उसका दिल जीतकर ,उसको लुभाकर ,बहकाकर अपने लिए कुर्सी का प्रबंध कर ही लेता है .सभी जानते हैं कि नेता होने के मायने क्या हैं ,''सिकंदर हयात ''जी के शब्दों में - ''मुझे इज़ज़त की परवाह है ,न मैं ज़िल्लत से डरता हूँ , अगर हो बात दौलत की ,तो हर हद से गुज़रता हूँ , मैं नेता हूँ मुझे इस बात की है तरबियत हासिल मैं जिस थाली में खाता हूँ उसी में छेद करता हूँ .'' और नेता की यही असलियत उसे आमतौर पर जनता के व्यंग्य के तीर झेलने को मजबूर करती है .चाहे-अनचाहे उसे ऐसी बहुत सी बाते सहनी पड़ती हैं जिससे उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता भी नहीं होता किन्तु वह यह सहता है क्योंकि वह ताकत उसे राजनीति से मिलती है ,वह सामर्थ्य उसे जनता के स्नेह और कभी स्वार्थ से मिलता है और इन्ही के बल पर वह झूठे-सच्चे सभी आरोपो...

नाबालिग :उम्र की जगह अपराध की समझ व् परिपक्वता देखी जाये .

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नाबालिग :उम्र की जगह अपराध की समझ व् परिपक्वता देखी जाये . १६ दिसम्बर २०१२ की भयावह रात ,दिल्ली में हुआ गैंगरेप ,दुर्दांत रूप से हुए इस रेप में पीड़िता की मृत्यु और इस भयावहता का सबसे बड़ा दरिंदा एक नाबालिग [किशोर न्याय {बालकों की देखभाल व् संरक्षण अधिनियम २००० }के अनुसार ]था ,दामिनी कहें ,बिटिया कहें या निर्भय उसने भी मरते मरते अपने बयान में उसी की ओर इशारा किया था किन्तु भारतीय कानून उसकी उम्र को देखते हुए उसे सजा देता है मात्र ३ साल जो कि किशोर न्याय अधिनियम में अधिकतम सजा है . बिटिया के पिता इसे मौलिक अधिकार का हनन मानते हैं और उसे सख्त सजा दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करते हैं जिस पर सुप्रीम कोर्ट केंद्र से पूछता है कि ''जघन्य अपराध के मामले में १६ साल से ऊपर के आरोपी को नाबालिग माना जाये या नहीं ,क्या यह तय करने का दायित्व फौजदारी अदालत का है ,क्योंकि जो याचिका दाखिल की गयी है उसमे कहा गया है कि किशोरावस्था तय करने का दायित्व फौजदारी अदालत का है ,किशोर न्याय बोर्ड का नहीं .'' अभी तक के फौजदारी कानून में दंड प्रक्रिया सहिंता १९७३ की धारा २७ कहती है -...

अपनी संपत्ति की देख-रेख और अपनी सुख-सुविधा तो आपको खुद देखनी होगी .

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अपनी संपत्ति की देख-रेख और अपनी सुख-सुविधा तो आपको खुद देखनी होगी . हमारे घर के पास अभी हाल ही में एक मकान बना है .अभी तो उसकी पुताई का काम होकर निबटा ही था कि क्या देखती हूँ कि उस पर एक किसी ''शादी विवाह ,पैम्फलेट आदि बनाना के विज्ञापन चिपक गया .बहुत अफ़सोस हो रहा था कि आखिर लोग मानते क्यों नहीं ?क्यूं नई दीवार पर पोस्टर लगाकर उसे गन्दा कर देते हैं ? यही नहीं हमारे घर से कुछ दूर एक आटा चक्की है और जब वह चलती है तो उसके चलने से आस-पास के सभी घरों में कुछ हिलने जैसा महसूस होता है .मुझे ये भी लगता है कि जब हमारे घर के पास रूकती कोई कार हमारे सिर में दर्द कर देती है तब क्या चक्की का चलना आस-पास वालों के लिए सिर दर्द नहीं है ?फिर वे क्यूं कोई कार्यवाही नहीं करते ? मेरे इन सभी प्रश्नों के उत्तर मेरी बहन मुझे देती है कि पहले तो लोग जानते ही नहीं कि उनके इस सम्बन्ध में भी कोई अधिकार हैं और दुसरे ये कि लोग कानूनी कार्यवाही के चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहते क्योंकि ये बहुत लम्बी व् खर्चीली हैं किन्तु ये तो समस्या का समाधान नहीं है इस तरह तो हम हर जगह अपने को झुकने पर मजबूर कर देते हैं औ...

नैना साहनी हत्याकांड -उच्चतम न्यायालय अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे .

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तंदूर कांड : सुशील शर्मा की फांसी उम्रकैद में तब्दील Updated on: Tue, 08 Oct 2013 10:26 PM (IST) नई दिल्ली [माला दीक्षित]। पत्नी नैना साहनी की हत्या कर उसका शव तंदूर में जलाने वाले दिल्ली युवक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सुशील शर्मा की मौत की सजा सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दी। करीब 18 साल से जेल में बंद सुशील की सजा-ए-मौत जरूर माफ हुई है, लेकिन उसे ताउम्र अब कालकोठरी में गुजारनी होगी। पढ़ें:  तंदूर कांड में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित नैना दिल्ली युवक कांग्रेस की महिला शाखा की महासचिव भी थी। अवैध संबंधों के शक में सुशील ने 2/3 जुलाई, 1995 की रात गोली मारकर उसकी हत्या कर दी थी। इसके बाद उसके शव को तंदूर में जलाने की कोशिश की थी। तंदूर कांड नाम से चर्चित इस मामले में सत्र अदालत और दिल्ली हाई कोर्ट ने सुशील के अपराध को जघन्यतम मानते हुए उसे मौत की सजा सुनाई थी। सुशील ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। मुख्य न्यायाधीश पी सतशिवम, न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ ने सुशील के मृत्युदंड को ताउम्र कैद में तब्दील करते हुए कहा,...

नगर पालिका का अनिवार्य कर्तव्य है ये-

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नगर पालिका का अनिवार्य कर्तव्य है ये- उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम -१९१६ के अधीन नगरपालिका के दो प्रकार के कर्तव्य उपबंधित किये गए हैं अर्थात अनिवार्य और वैवेकिक और नगर पालिकाओं द्वारा अपने अन्य कर्व्याओं के साथ साथ जिस एक कर्तव्य की सबसे ज्यादा अनदेखी की जाती है वह इसी अधिनियम की धारा ७ [६] में उल्लिखित है -धारा ७ [६] कहती है - ''धारा ७ के अंतर्गत यह उपबंध किया गया है कि प्रयेक नगर पालिका का यह कर्तव्य होगा कि वह नगर पालिका क्षेत्र के भीतर निम्नलिखित की समुचित व्यवस्था करे - [६] आवारा कुत्तों तथा खतरनाक पशुओं को परिरुद्ध करना ,हटाना या नष्ट करना ; और देखा जाये तो इस कर्तव्य के प्रति नगर पालिका ने अपनी आँखें मूँद रखी हैं और सभी का तो पूरी तरह से पता नहीं किन्तु कांधला नगर पालिका अपने इस कर्तव्य को पूरा करने में पूरी तरह से उपेक्षा कर रही है . अभी लगभग २ महीने पहले एक सामान्य रेस्तरा चलाने वाले ने जैसे सभी अपने सामान को थोडा बहुत बाहर की तरफ सजाकर रख लेते हैं रख लिया था कि दो सांड जो कि दिन भर यहाँ खुले घुमते हैं लड़ते लड़ते वहां आ पहुंचे और उन्हें देख वह जैसे ही अपना सामा...

अपराध के रूप महत्वपूर्ण -अपराधी की उम्र नहीं

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http://en.wikipedia.org/wiki/2012_Delhi_gang_rape_case  अपराध के रूप महत्वपूर्ण -अपराधी की उम्र नहीं  संविधान का अनुच्छेद २१ कहता है कि     '' किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा अन्यथा नहीं .''    और इस तरह प्राण का अधिकार एक मूल मानवाधिकार है और चैयरमेन रेलवे बोर्ड बनाम चंद्रिमा दास [२०००] २ एस.सी.सी .४६५ में उच्चतम न्यायालय ने भी माना कि अनुच्छेद २१ में प्रतिष्ठापित ''प्राण ''के अधिकार में मानव गरिमा के साथ जीवित रहने का अधिकार सम्मिलित है और यदि किसी स्त्री के साथ बलात्संग किया जाता है तो वह उसके अधिकार का उल्लंघन करता है .    इसी तरह भारतीय दंड सहिंता की धारा ८३ कहती है कि -  '' कोई बात अपराध नहीं है जो सात वर्ष से ऊपर और बारह वर्ष से कम आयु के ऐसे शिशु द्वारा की जाती है जिसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह उस अवसर पर अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों का निर्णय कर सके .'' इसका साफ मतलब ये है कि जो शिशु ७ से १२ वर्ष के बीच का है और अप...

दामिनी गैंगरेप का त्वरित न्याय कहाँ ?

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दामिनी गैंगरेप का त्वरित न्याय कहाँ ?   [अमर उजाला हिंदी दैनिक से साभार ] धारा ३७६-२ -छ , भा० दंड संहिता कहती है ''कि जो कोई सामूहिक बलात्संग करेगा वह कठोर कारावास से ,जिसकी अवधि दस वर्ष से कम नहीं होगी ,किन्तु जो आजीवन हो सकेगी और जुर्माने से भी दंडनीय होगा और इसी धारा के मद्देनज़र मध्य प्रदेश के दतिया जिले की विशेष अदालत ने ३९ वर्षीय स्विस महिला के साथ हुए बलात्कार के मामले में छह दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है .         बलात्संग या बलात्कार धारा ३७६ भा.दंड.सहिंता  के अंतर्गत दंडनीय है और सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है .जिसकी प्रक्रिया दंड प्रक्रिया सहिंता की धारा २२५ से २३७ तक दी गयी है . धारा २२५ में विचारण का सञ्चालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाता है .धारा २२६ में अभियोजक अपने मामले का कथन अभियुक्त के खिलाफ लगाये गए आरोपों के बारे में  और यह बताते हुए आरम्भ करेगा कि वह अभियुक्त को किस साक्ष्य से अभियुक्त साबित करेगा .धारा २२७ में यदि सेशन जज को यह लगे कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही का पर्याप्त आधार नहीं है तो वह उसे उन्मोचि...

सन्नो व् राजेश को फाँसी की सजा मिलनी चाहिए

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अभी हाल में ही हुए दो निर्णय अपनी उस मानवता के कारण विवादों में हैं जिस मानवता के मामले के आरोपी हक़दार थे ही नहीं .समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बने ये समाचार इस कदर दिल दहला रहे हैं कि एक बार तो मन ये किया कि स्वयं न्यायिक अधिकारी की कुर्सी पर बैठकर सन्नो व् नौसेना अधिकारी राजेश कुमार भदोरिया को तुरंत फांसी की सजा सुना दूँ .मामले क्या हैं पहले एक बार आप भी ये जानिए - [1] खून पीकर बोली थी सन्नो, आज मेरी ईद हो गई बागपत। छह अप्रैल 2011 को हाजी हमीद घर के बाहर बनी दुकान पर थे। वहीं पर कातिलों ने उन्हें गोली मारी। वे गिर पड़े। फिर उनका पेट तलवार से फाड़ दिया। 20 के 20 कातिलों ने उनकी लाश पर पैर रखे और नाचने लगे। तभी सन्नो झुकी, उसने लाश पर अपने दांत गाड़ दिए। खून पिया और अगले ही पल झटके से उठी। बाल झटकते हुए जोर से एक नारा लगाया। फिर बोली, आज मेरी ईद हो गई। इसके बाद एक हाथ हमीद के खून से रंगा। उसे दीवार पर छाप दिया। इसके निशान आज भी हैं।  मिर्धानपुरा में बेदर्दी से कत्ल किए हाजी हमीद और नवाबुद्दीन उर्फ भूरा के सगे भाई रफीक इस ट्रिपल मर्डर के चश्मदीद हैं। दोनों भाइयों और भतीजे साबिर...

संपत्ति का अधिकार -५

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संपत्ति का अधिकार -५   वैयक्तिक विधियों में प्राप्त संपत्ति का अधिकार - भारत में विभिन्न धर्मों की वैयक्तिक विधियों द्वारा भी व्यक्ति को संपत्ति का अधिकार प्राप्त होता है ,जो निम्न है - * मुस्लिम विधि -में -  १-सुन्नी विधि के अंतर्गत तीन प्रकार के उतराधिकारी होते हैं-  क-हिस्सेदार   ख-शेषांश  ग- दूर के नातेदार      परन्तु शिया विधि के अंतर्गत दो प्रकार के उतराधिकारी होते हैं -  १-हिस्सेदार    २-शेषांश सम्बन्धी . २-सुन्नी विधि के अंतर्गत हिस्सेदार शेषांश सम्बन्धियों का अपवर्जन करते हैं और शेषांश सम्बन्धी दूर के नातेदारों का . शिया विधि के अंतर्गत हिस्सेदार और शेषांश सम्बन्धी सब मिलकर तीन वर्गों में विभाजित हैं .पहला दूसरे को और दूसरा तीसरे को दाय से अपवर्जित करता है . ३-सुन्नी विधि किसी ज्येष्ठाधिकार को मान्यता नहीं देती परन्तु शिया विधि उसे कुछ सीमा तक मान्यता देती है .जिन संपत्तियों को ज्येष्ठ पुत्र अकेले प्राप्त करने का हक़दार है वे हैं -मृतक के वस्त्र ,अंगूठी ,तलवार और कुरान . ४-सुन्नी विधि प्रतिनिधित्व...

संपत्ति का अधिकार -४

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संपत्ति का अधिकार -४   मूल अधिकार से अंतर - मूल अधिकार व् सामान्य विधिक अधिकार में अंतर यह है कि सामान्य विधिक अधिकार विधान पालिका की कृपा पर व्यक्तियों को सुलभ होते हैं ,मूल अधिकार स्वयं संविधान द्वारा उसी रूप में प्रदत्त होता है .सामान्य विधिक अधिकार विधायकों द्वारा किसी भी समय समाप्त अथवा न्यून किये जा सकते हैं परन्तु मूल अधिकार उनकी पहुँच से उस सीमा तक बाहर रहते हैं ,जिस सीमा तक अथवा जिस विधि से स्वयं संविधान उनकी पहुँच से दूर रहता है .सामान्य  विधिक अधिकारों के विपरीत सामान्य न्यायपालिका से ही उपचार प्राप्त हो सकता है परन्तु मूल अधिकार देश की सर्वोच्च विधि संविधान और सर्वोच्च न्यायलय द्वारा सुरक्षित होते हैं . संपत्ति क्या है  - संपत्ति शब्द की न्यायालयों ने बड़ी विशद व्याख्या की है .उनके मतानुसार संपत्ति शब्द में वे सभी मान्य हित शामिल हैं जिनमे स्वामित्व से सम्बंधित अधिकारों के चिन्ह या गुण पाए जाते हैं .सामान्य अर्थ में 'संपत्ति' शब्द के अंतर्गत वे सभी प्रकार के हित शामिल हैं जिनका अंतरण किया जा सकता है ;जैसे पट्टेदारी या बन्धकी [कमिश्नर हिन्दू रेल...

संपत्ति का अधिकार-३

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    संपत्ति के अधिकार का इतिहास-     संपत्ति का अधिकार ,चूंकि एक ऐसा अधिकार माना गया है ,जो अन्य अधिकारों को प्रभावशाली ढंग से प्रभावी करने में सहायक होता है इसलिए भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३१ अतिपरिवर्तन शील अनुच्छेद माना गया क्योंकि उसने जितना अधिक अपना रूप परिवर्तित किया उतना किसी अन्य अनुच्छेद ने नहीं किया .इसका कारण यह था कि केंद्र और राज्य ,दोनों ने ही संपत्ति के अधिकार को विनियमित करने के लिए कृषि सुधार ,राष्ट्रीय करण और राज्यों के नीति निदेशक तत्वों के क्रियान्वयन हेतु बहुत अधिक विधायन कार्य सम्पादित कर डाले .कृषि क्षेत्र में आर्थिक व्यवस्था को ठीक करने और समाजवादी ढांचे पर चलने वाले नूतन समाज के निर्माण के लिए केंद्र और राज्य दोनों की सरकारों के लिए यह आवश्यक हो गया था  कि वे विधान का निर्माण कर खेत जोतने वालों को भूमि का स्वामित्व प्रदान करें ,ज़मींदारी व्यवस्था को समाप्त करें .शहरी क्षेत्रों में गृहविहीन व्यक्तियों को आवासीय सुविधाएँ प्रदान करने ,शहरी गंदगी को समाप्त करने और विकास तथा नगरीय योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए अतिरिक्त भूमि की आवश...

संपत्ति का अधिकार-1

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संपत्ति का अधिकार-1             ''संपत्ति '' इस संसार का एक ऐसा शब्द है जहाँ सारा संसार थम जाता है .संपत्ति हो तो सब कुछ ,संपत्ति न हो तो कुछ भी नहीं की स्थिति है .संपत्ति का अधिकार ऐसा अधिकार है जिसे भारतीय संविधान ने भी मूल अधिकारों से अधिक आवश्यक समझा और ४४ वे संविधान संशोधन द्वारा १९७८ में मूल अनुच्छेद ३१ द्वारा प्रदत्त संपत्ति के मूल अधिकार को समाप्त कर इसे अध्याय ३१ अंतर्गत अनु.३०० क में सांविधानिक अधिकार के रूप में समाविष्ट किया है  .इस प्रकार यह अधिकार अब सांविधानिक अधिकार है मूल अधिकार नहीं जिसका विनियमन साधारण विधि बनाकर किया जा सकता है .इसके लिए सांविधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं होगी और इसके परिणाम स्वरुप अनु.१९[च] और ३१ को संविधान से लुप्त कर दिया गया है .इस अधिकार को एक सांविधानिक अधिकार के रूप में बनाये रखने के लिए जो नया अनुच्छेद ३००[क] जोड़ा गया है वह यह उपबंधित करता है :     ''कोई व्यक्ति विधि के प्राधिकार के बिना अपनी संपत्ति से वंचित नहीं किया जायेगा .''      नए अनुच्छेद ३००...

कोई कानूनी विषमता नहीं ३०२ व् ३०४[बी ]आई.पी.सी.में

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कोई कानूनी विषमता नहीं ३०२ व् ३०४[बी ]आई.पी.सी.में  17 सितम्बर 2012 दैनिक जागरण में पृष्ठ २ पर माला दीक्षित ने एक दोषी की दलील दी है जिसमे दहेज़ हत्या के दोषी ने अपनी ओर से एक अहम् कानूनी मुद्दा उठाया है .दोषी की दलील है -     ' 'आई.पी.सी.की धारा ३०४ बी [दहेज़ हत्या ]और धारा ३०२ [हत्या ]में एक साथ मुकदमा  नहीं चलाया जा सकता .दोनों धाराओं में  बर्डन  ऑफ़ प्रूफ को लेकर कानूनी विषमता है जो दूर होनी चाहिए .''     धारा ३०२ ,जिसमे हत्या के लिए दंड का वर्णन है और धारा ३०४ बी आई.पी.सी.में दहेज़ मृत्यु का वर्णन है और जहाँ तक दोनों धाराओं में सबूत के भार की बात है तो दांडिक मामले  जिसमे धारा ३०२ आती   है में सबूत का भार अभियोजन पर है क्योंकि दांडिक मामलों में  न्यायालय  यह उपधारना करता है  कि अभियुक्त निर्दोष है अतः सबूत का भार अभियोजन पर है कि वह दोषी है .     दूसरी ओर दहेज़ मृत्यु के मामले में धरा ३०४-बी जो कि सन १९८६ में १९.११.८६ अधिनियम ४३ से   जोड़ी गयी ,में ...

श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.

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श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.    आज यदि देखा जाये तो महिलाओं  के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं  जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है . कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए  विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्...