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ये है नगर पालिका का अनिवार्य कर्तव्य

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उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम -१९१६ के अधीन नगरपालिका के दो प्रकार के कर्तव्य उपबंधित किये गए हैं अर्थात अनिवार्य और वैवेकिक और नगर पालिकाओं द्वारा अपने अन्य कर्व्याओं के साथ साथ जिस एक कर्तव्य की सबसे ज्यादा अनदेखी की जाती है वह इसी अधिनियम की धारा ७ [६] में उल्लिखित है -धारा ७ [६] कहती है - ''धारा ७ के अंतर्गत यह उपबंध किया गया है कि प्रयेक नगर पालिका का यह कर्तव्य होगा कि वह नगर पालिका क्षेत्र के भीतर निम्नलिखित की समुचित व्यवस्था करे - [६] आवारा कुत्तों तथा खतरनाक पशुओं को परिरुद्ध करना ,हटाना या नष्ट करना ; और देखा जाये तो इस कर्तव्य के प्रति नगर पालिका ने अपनी आँखें मूँद रखी हैं और सभी का तो पूरी तरह से पता नहीं किन्तु कांधला नगर पालिका अपने इस कर्तव्य को पूरा करने में पूरी तरह से उपेक्षा कर रही है . अभी लगभग २ महीने पहले एक सामान्य रेस्तरा चलाने वाले ने जैसे सभी अपने सामान को थोडा बहुत बाहर की तरफ सजाकर रख लेते हैं रख लिया था कि दो सांड जो कि दिन भर यहाँ खुले घुमते हैं लड़ते लड़ते वहां आ पहुंचे और उन्हें देख वह जैसे ही अपना सामान बचाने लगा कि वह उनके पैरों के नीचे आ गय...

ये भी बलात्कार है -धारा ३७५ [४]

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शादी के नाम पर सहमत‌ि से बने शारीरिक संबंध रेप नहीं   भारतीय दंड संहिता की धारा ३७५ की ६ भांति की परिस्थितियों में से चौथी में कहा गया है कि वह पुरुष बलात्संग करता है - *जो उस स्त्री की सम्मति से ,जबकि वह पुरुष यह जानता है कि वह उस स्त्री का पति नहीं है और उस स्त्री ने सम्मति इसलिए दी है कि वह यह विश्वास करती है कि वह ऐसा पुरुष है जिससे वह विधि पूर्वक विवाहित है या विवाहित होने का विश्वास करती है ; और यहाँ अदालत ने लगभग ऐसे ही मामले में शादी के नाम पर सहमति से बने शारीरिक संबंधों को रेप नहीं माना .आखिर क्यूँ अदालत हर बार लिखी लिखाई परिभाषा में ही उलझकर रह जाती है और उसका परिणाम यह होता है कि अपराधी उसका लाभ उठाकर आसानी से छूट जाता है .सब जानते हैं कि लड़कियां भोली होती हैं और उन्हें बहकाना या बहलाना आसान होता है ऐसे में इस परिभाषा में यह भी यदि यह भी सम्मिलित माना जाये कि विवाह का झांसा देकर सहमति से बनाये गए सम्बन्ध रेप हैं तो यह कानूनी रूप से न्याय के अंतर्गत ही आएगा क्योंकि एक हद तक ये सच्चाई भी है और न्याय के लिए आवश्यक भी .वैसे भी पुरुष सत्तात्मक समाज में पुरुष के लिए व...

संविधान का पालन करें राज्यपाल

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राजभवन में बैठेंगे BJP नेता, बीएल जोशी का इस्तीफा      केंद्र की तरह राज्यों में प्रशासन का स्वरुप संसदात्मक है .कार्यपालिका का प्रधान एक संवैधानिक प्रधान होता है जिसे मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना होता है .भारतीय संविधान के अनुच्छेद १५३ में राज्यपाल के पद का उपबंध किया गया है जिसके अनुसार प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होगा .दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक ही राज्यपाल हो सकता है .यही नहीं अनुच्छेद १५६ में राज्यपाल की पदावधि के विषय में भी उपबंध किया गया है और जिसमे साफ तौर पर कहा गया है कि राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त अपना पद धारण करेगा .सामान्य  रूप से राज्यपाल का कार्यकाल ५ वर्ष होता है किन्तु राष्ट्रपति किसी भी समय राज्यपाल को उसके पद से हटा सकता है और इस मामले में राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिमंडल के परामर्श के अनुसार कार्य करता है क्योंकि उसकी नियुक्ति न तो प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से होती है  और न विशेष रूप से राष्ट्रपति के लिए गठित निर्वाचक मंडल द्वारा ,जो अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति का निर्वाचन करता है .यह केंद्र सरकार द्वारा नामांक...

यह संविदा असम्यक असर से उत्प्रेरित

कोई भी संविदा तभी विधिमान्य है जब उसके लिए सम्मति स्वतंत्र रूप से दी गयी हो परन्तु सम्मति स्वतंत्र कब होती है इस सम्बन्ध में प्रावधान भारतीय संविदा अधिनियम की धारा १४ में दिए गए हैं धारा के अनुसार सम्मति स्वतंत्र तब कही जाती है जब वह निम्लिखित ढंग से न प्राप्त की गयी हो - [१] प्रपीड़न [coercion ] [धारा १५ ] [२[ असम्यक असर [undue influence ][धारा १६ ] [३] कपट [fraud ][धारा १७] [४] दुर्व्यपदेशन [misrepresentation ][धारा १८] [५] भूल [mistake ][धारा १९ ] मुझसे एक ब्लॉगर महोदय ने ये सवाल पूछा है - मेरी नानी जो एक 65 साल की महिला है उसके तीन भाइयो ने ये कहके की कोर्ट का काम है आना जाना पड़ेगा हम तुमको तुम्हारे हिस्से का देते रहेंगे करके साइन ले लिए और फिर पैसा देने से मुकर गए बहुत परेशानी में  है ये लोग ...... 2 साल से ज्यादा हो गए जिला कोर्ट का चक्कर लगते तहसीलदार घुमाते रहता है ... शायद पैसे खिलाइये है इनको .. कोई तरीका बताइये मैम जिससे इनको इनका हक़ मिले   संपत्ति का अधिकार -५  पर सामग्री निकालें  |  हटाएं  |  अनचाहा atul soni इस शिक...

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -7

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प्रश्न 7 -सीआर.पी.सी.की धारा ४३५ में केंद्र से परामर्श करने की बात का मतलब सहमति से है ? कानूनी स्थिति-धारा ४३५ कहती है - [1] किसी दंडादेश का परिहार करने या उसके लघुकरण के बारे में धारा ४३२ या ४३३ द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियों का राज्य सरकार द्वारा प्रयोग उस दशा में केंद्रीय सरकार से परामर्श के पश्चात ही किया जायेगा जब दंडादेश किसी ऐसे अपराध के लिए हो - [क] जिसका अन्वेषण दिल्ली पुलिस स्थापन अधिनियम १९४६ [अ९४६ का २५] के अधीन गठित दिल्ली पुलिस स्थापन अधिनियम द्वारा या इस संहिता से भिन्न किसी केंद्रीय अधिनियम के अधीन अपराध का अन्वेषण करने के लिए सशक्त किसी अन्य अभिकरण द्वारा किया गया हो ,अथवा [ख] जिसमे केंद्रीय सरकार की किसी संपत्ति का दुर्विनियोग या नाश या नुकसान अंतर्ग्रस्त हो ,अथवा [ग] जो केंद्रीय सरकार की सेवा में के किसी व्यक्ति द्वारा तब किया गया हो जब वह अपने पदीय कर्तव्यों के निर्वहन में कार्य कर रहा था या उसका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित था . [२] जिस व्यक्ति को ऐसे अपराधों के लिए दोषसिद्ध किया गया हो जिसमे से कुछ उन विषयों से सम्बंधित हों जिन पर संघ की कार्यपालि...

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -6

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                          प्रश्न -६ -क्या सरकार स्वयं से माफ़ी देने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकती है या इसके लिए कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है ? कानूनी स्थिति -सरकार स्वयं से माफ़ी देने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकती है .इस सम्बन्ध में धारा ४३२ [१] में कहा गया है कि- ''जब किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए दंडादेश दिया जाये तब समुचित सरकार किसी समय ,शर्तों के बिना या ऐसी शर्तों पर जिन्हें दण्डादिष्ट व्यक्ति स्वीकार करे ,उसके दंडादेश के निष्पादन का निलंबन या जो दंडादेश उसे दिया गया है उसका पूरे का या उसके किसी भाग का परिहार कर सकती है .''       किन्तु जहाँ उसके लिए आवेदन किया गया है वहां धारा ४३२ कहती है - [२] जब कभी समुचित सरकार के दंडादेश के निलंबन या परिहार के लिए आवेदन किया जाया तब समुचित सरकार उस न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीश से ,जिसके समक्ष दोषसिद्धि हुई थी या जिसके द्वारा उसकी पुष्टि की गयी थी ,अपेक्षा कर सकेगी कि वह इस बारे में कि आवेदन मंजूर किया जाये या नामंजूर किया जाये ,अपनी रा...

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -5

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प्रश्न -५ - क्या सीआर.पी.सी.की धारा ४३२ [७] में माफ़ी देने में दो सरकारों [केंद्र और राज्य ] को उचित सरकार माना जायेगा ? कानूनी स्थिति -धारा ४३२[७] कहती है - [७] -इस धारा में और धारा ४३३ में 'समुचित सरकार '' पद से - [क] उन दशाओं में जिनमे दंडादेश ऐसे विषय से सम्बद्ध किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए है या उपधारा [६] में निर्दिष्ट आदेश ऐसे विषय से सम्बद्ध किसी विधि के अधीन पारित किया गया है ,जिस विषय पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है ,केंद्रीय सरकार अभिप्रेत है ; [२]-अन्य दशाओं में ,उस राज्य की सरकार अभिप्रेत है जिसमे अपराधी दण्डादिष्ट किया गया है या उक्त आदेश पारित किया गया है . और संविधान का  अनुच्छेद २५४ कहता है कि यदि राज्य विधानमंडल द्वारा किसी समवर्ती सूची के विषय पर कानून बनाया जाता है ,जो कि संसद द्वारा इससे पूर्व या बाद में बनाये गए नियम के विरोध में है ,तो अनुच्छेद २५४ के खंड [२] के उपबंधों के अधीन रहते हुए संसद द्वारा निर्मित विधि प्रभावी होगी तथा राज्य विधान मंडल द्वारा निर्मित विधि विरोध की मात्रा तक शून्य होगी . अनुच्छेद २५४ के खंड [२] के अनुसार...