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जनगणना 2027-कैसे होगी चरणों मे

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हमने आपसे कहा था कि हम पहले जनगणना 2027 मे पूछे जाने वाले प्रश्न लेकर आयेंगे, किन्तु उससे पहले हम आपके लिए देश के विभिन्न राज्यों में होने वाली चरणबद्ध जनगणना की जानकारी ले आए हैं जिससे आप जान सके कि आपके क्षेत्र में जनगणना 2027 कब होने वाली है.       भारत में जनगणना (2026-27) में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तारीखें रखी गई हैं. जिस के पीछे मुख्य कारण भौगोलिक स्थितियाँ, मौसम, प्रशासनिक सुविधा और लॉजिस्टिक चुनौतियाँ हैं। यह प्रक्रिया एक साथ पूरे देश में न होकर चरणों में आयोजित की जाती है।  ➡️ अलग अलग तारीख रखने के कारण -  इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं: ✒️ मौसम और भौगोलिक स्थितियाँ (Snow-bound Areas):   लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे बर्फबारी वाले क्षेत्रों में जनगणना पहले (अक्टूबर 2026) कर ली जाती है, क्योंकि सर्दियों में वहां भारी बर्फबारी के कारण सामान्य जीवन और आवागमन रुक जाता है। ✒️ प्रशासनिक और चुनावी व्यस्तता:   कुछ राज्यों में चुनाव, स्थानीय त्योहार या अन्य प्रशासनिक कारण हो सकते हैं, जिसके चलते जनगणना की तारीखों को र...

जनगणना 2027-1 अप्रैल से शुरू

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  1 अप्रैल 2026 से जनगणना का पहला चरण आरम्भ होने जा रहा है. डिजिटल तरीके से संकलित और सम्पन्न होने वाले जनगणना कार्यक्रम में आंकड़े डिजिटल रूप से ही संग्रहित होंगे और देश के नागरिको से उनके घर जाकर जनगणना कर्मी 34 सवाल पूछेंगे.       संविधान के आर्टिकल 69 के तहत होने वाली जनगणना 16 वीं जनगणना है. ये पूरी तरीके से गोपनीय रहेगी और आरटीआई से भी इसकी जानकारी प्राप्त करने का किसी को अधिकार नहीं होगा.  ⚫ Census 2027 - जनगणना 2027 नोटिफिकेशन -  1️⃣ जनगणना 2027 गजट अधिसूचना 16 जून 2025 को जारी की गई.  2️⃣ पहले चरण (First Phase) की अवधि की अधिसूचना 07 जनवरी 2026 को जारी.  3️⃣ हाउस लिस्टिंग ऑपरेशन ( HOL) अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच 30 दिनों में पूरा किया जाएगा.  4️⃣ सेल्फ एन्यूमरेशन (Self Enumeration) हाउस लिस्टिंग से ठीक पहले 15 दिनों की अवधि में होगा.  5️⃣ पहले चरण के प्रश्नों की अधिसूचना 22 जनवरी 2026 को जारी की गई.  6️⃣ दूसरे चरण की अवधि और प्रश्नों की अधिसूचना बाद में जारी की जाएगी.  7️⃣ जाति गणना (Caste Enumeration) जनगणना के...

विवाह संस्था का स्थायित्व खत्म करते कोर्ट निर्णय -शालिनी कौशिक एडवोकेट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक बार फिर से बहस का मुद्दा छेड़ दिया है लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक अहम निर्णय देते हुए. जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कहा कि  " अदालत का काम कानून के अनुसार फैसला देना है, न कि सामाजिक या पारिवारिक नैतिकता के आधार पर। अगर कोई काम कानून के तहत अपराध नहीं है, तो सिर्फ समाज की सोच के कारण कोर्ट उसे गलत नहीं ठहरा सकता।" दैनिक जनवाणी की रिपोर्ट में कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि   "कोई शादीशुदा पुरुष यदि किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो यह अपने आप में कोई आपराधिक कृत्य नहीं है। जब तक किसी कानून का उल्लंघन नहीं हो रहा, तब तक अदालत इस तरह के रिश्ते को अपराध नहीं मानेगी। "  न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक लिव इन जोड़े ने महिला के परिवार से मिल रही धमकियों के खिलाफ सुरक्षा की मांग की थी. समाचार पत्रों की रिपोर्टिंग के अनुसार  महिला के परिवार ने प्राथमिकी दर्ज कराते हुए ...

सोशल मीडिया पर बैन हो " बॉडी शेमिंग "

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  आजकल सोशल मीडिया पर एक शब्द चर्चा में है " बॉडी शेमिंग "बॉडी शेमिंग (Body Shaming) जिस का अर्थ है किसी व्यक्ति के शारीरिक रूप-रंग, वजन, आकार या बनावट को लेकर नकारात्मक टिप्पणी करना, उसका मजाक उड़ाना या उसे शर्मिंदा करना। यह एक प्रकार की मानसिक बदमाशी है जो उस व्यक्ति के आत्मविश्वास को कम करती है, जिसकी बॉडी शेमिंग की जाती है मतलब जिसकी शारीरिक बनावट का उपहास उड़ाया जाता है और यह मोटापे से लेकर दुबलेपन तक, या किसी भी शारीरिक विशेषता से संबंधित हो सकती है। उत्तर प्रदेश की IPS अधिकारी अपर्णा रजत कौशिक पिछले दिनों एक इनामी बदमाश की गिरफ्तारी को लेकर सोशल मीडिया पर ब्रीफिंग कर रही थीं. अपर्णा कौशिक आईपीएस बनने से पहले गुरुग्राम में एक प्राइवेट कंपनी में बिजनेस एनालिस्ट थीं, जहां उनका सालाना पैकेज करीब 18 लाख रुपये का था. अपर्णा द्वारा बाद में यह आरामदायक नौकरी छोड़कर सिविल सेवा की तैयारी करने का फैसला लिया गया और अपनी कड़ी मेहनत के बदौलत यूपीएससी परीक्षा पास की और फिर वह 2015 बैच की आईपीएस अधिकारी बनीं. आईपीएस के तौर पर अपर्णा रजत कौशिक यूपी के अमेठी जिले में भी पुलिस अधीक्षक पद ...

गुजरात UCC 2026 -बंद हो जायेगा हलाला

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गुजरात सरकार ने बुधवार को 'गुजरात समान नागरिक संहिता (UCC), 2026' विधेयक विधानसभा में पेश कर दिया। इसके साथ ही गुजरात ने यूसीसी लागू करने वाला दूसरा राज्य बनने की ओर तेजी से कदम बढ़ा दिया है। विधानसभा से बिल के पारित होने के बाद धर्म, जाति या पंथ की परवाह किए बिना विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और सहजीवन संबंध से संबंधित कानून एक जैसे होंगे। गुजरात समान नागरिक संहिता UCC 2026 विधेयक के मसौदे में शादी, तलाक, लिव इन रिलेशनशिप जैसे मामलों में कई अहम प्रावधान किए गए हैं। बिल में मुस्लिम महिलाओं को ध्यान में रखकर भी कुछ प्रावधान किए गए हैं। खासकर हलाला प्रथा पर रोक लगाने की व्यवस्था की गई है। मसौदे में कहा गया है कि कोई दंपति तलाक के बाद बिना किसी शर्त दोबारा विवाह कर सकता है। इसमें कहा गया है, 'दोबारा विवाह के अधिकार में तलाक लेने वाले साथी से ही फिर विवाह का अधिकार शामिल है और इसके लिए किसी तरह की शर्त नहीं होगी, जैसे दोबारा मिलन से पहले किसी तीसरे से शादी करना।' सूत्रों का कहना है कि मुस्लिम समाज में प्रचलित हलाला प्रथा को रोकने के लिए इस तरह का प्रावधान किया गया है। यदि कोई इस...

नमाजियों की संख्या सीमित करने का प्रशासन को अधिकार नहीं -इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाइकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रमज़ान के दौरान एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या सीमित करने के प्रशासनिक फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है और इसके नाम पर लोगों के धार्मिक अधिकारों पर रोक नहीं लगाई जा सकती। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने 27 फरवरी को सुनवाई के दौरान कहा कि यदि संभल के पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी को कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में कठिनाई महसूस होती है तो उन्हें या तो अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर स्थानांतरण मांग लेना चाहिए। अदालत ने कहा, “राज्य के वकील ने कहा कि संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति के कारण नमाज़ियों की संख्या सीमित की गई। हम इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हैं। हर परिस्थिति में कानून का शासन बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है।” खंडपीठ ने आगे कहा, “यदि स्थानीय अधिकारी यानी पुलिस अधीक्षक और कलेक्टर को लगता है कि कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है, इसलिए वे नमाज़ियों की संख्या सीमित करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा दे द...

महिलाओं के रोजगार पर पड़ सकता है उल्टा असर -सुप्रीम कोर्ट

 सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सभी कार्यस्थलों में महिलाओं के लिए पेड मेंस्ट्रुअल लीव (मासिक धर्म अवकाश) की मांग करने वाली एक याचिका का निस्तारण करते हुए केंद्र सरकार से कहा कि वह याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए प्रतिनिधित्व पर सभी हितधारकों से परामर्श करके नीति बनाने पर विचार करे। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी चिंता जताई कि यदि कानून बनाकर मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य कर दिया गया तो इसका महिलाओं के रोजगार पर उल्टा असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि इससे नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से हिचक सकते हैं, जिससे कार्यबल में उनकी भागीदारी प्रभावित हो सकती है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता शैलेन्द्र मणी त्रिपाठी की लोकस स्टैंडी (याचिका दायर करने के अधिकार) पर भी सवाल उठाया और कहा कि इस मुद्दे पर स्वयं कोई महिला अदालत के सामने नहीं आई है। यह इसी मुद्दे पर याचिकाकर्ता द्वारा दायर की गई तीसरी याचिका थी। पहली याचिका फरवरी 2023 में निस्तारित की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद 2...

राहुल गाँधी के खिलाफ दायर विनायक दामोदर सावरकर मानहानि मामला खत्म

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  महाराष्ट्र के नासिक कोर्ट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर मानहानि मामले को बुधवार को समाप्त कर दिया। यह मामला हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के संबंध में दर्ज किया गया था। एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट रुपाली नरवडिया की अदालत ने यह निर्णय शिकायतकर्ता द्वारा अपनी शिकायत वापस लेने की अर्जी स्वीकार करते हुए दिया। इसके साथ ही राहुल गांधी के खिलाफ चल रही पूरी कार्यवाही समाप्त कर दी गई। मामला 'निर्भया फाउंडेशन' नामक एक गैर-सरकारी संगठन के निदेशक की शिकायत पर दर्ज हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि  2022 की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने यह कहा था कि सावरकर ने ब्रिटिश सरकार के साथ काम करने का वादा किया था।  शिकायतकर्ता का कहना था कि  इस बयान से सावरकर की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची जिन्हें वह स्वतंत्रता सेनानी बताते हैं।  राहुल गांधी की ओर से पेश वकील जयंत जैभवे और गजेंद्र सनप ने बताया कि  अदालत ने पहले इस शिकायत पर स्थानीय पुलिस से जांच कराने का आदेश दिया। पुलिस की रिपोर्ट अदालत में दाखिल होने के बाद श...

UCC से ही मिलेगा मुस्लिम महिलाओं को उत्तराधिकार-सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक जनहित याचिका पर संक्षिप्त सुनवाई की, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधानों को महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी गई है।  चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट प्रशांत भूषण से पूछा कि  क्या अदालत पर्सनल लॉ की संवैधानिक वैधता पर फैसला दे सकती है।  इसी के साथ जस्टिस बागची ने बॉम्बे हाईकोर्ट के प्रसिद्ध 'नरसू अप्पा माली' फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि  पर्सनल लॉ को संवैधानिक परीक्षण के अधीन नहीं लाया जा सकता. खंडपीठ ने यह भी सवाल उठाया कि   यदि अदालत शरीयत कानून के उत्तराधिकार संबंधी प्रावधानों को रद्द कर देती है, तो क्या इससे कानूनी शून्य (legal vacuum) पैदा नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अन्य विधिक कानून मौजूद नहीं है।  इस पर भूषण ने कहा कि  ऐसी स्थिति में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) लागू हो सकता है।  प्रशांत भूषण ने यह भी कहा कि ...

पति द्वारा भरण पोषण -सुप्रीम कोर्ट सख्त

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  सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए पति के नियोक्ता को निर्देश दिया कि  वह उसके वेतन से हर महीने 25 हजार रुपये काटकर सीधे उसकी अलग रह रही पत्नी के बैंक खाते में जमा करे। यह राशि पत्नी और उनकी नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए दी जाएगी।  जस्टिस जे.बी.पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह आदेश तब दिया, जब पाया कि पति पहले दिए गए अदालत के आदेशों का पालन नहीं कर रहा था और 2022 से अलग रहने के बावजूद उसने पत्नी और बच्ची के लिए कोई भरण-पोषण राशि नहीं दी. अदालत ने कहा कि  दम्पत्ति की चार साल की एक बेटी है, जिसकी देखभाल पूरी तरह मां कर रही है।  खंडपीठ ने यह भी दर्ज किया कि पिछले चार वर्षों में पति ने न तो बच्ची के पालन-पोषण में कोई योगदान दिया और न ही उससे मिलने का प्रयास किया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजा था और विवाह समाप्त करने के लिए एकमुश्त समझौते की संभावना तलाशने को कहा था। अंतरिम व्यवस्था के रूप में पति को पत्नी और बच्ची के मध्यस्थता में आने-जाने के खर्च के लिए 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश दिया ...

भरण-पोषण बकाया वसूली के साथ गिरफ्तारी वारंट जारी करना अवैध: इलाहाबाद हाइकोर्ट

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  इलाहाबाद हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट में प्रचलित उस प्रक्रिया पर सख्त आपत्ति जताई, जिसके तहत भरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली के लिए एक ही समय पर वसूली वारंट और गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए जाते हैं। हाइकोर्ट ने इस प्रथा को अवैध और अमानवीय बताते हुए कहा है कि इसे तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए।  जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि  भरण-पोषण देने के दायित्व में चूक करने वाले व्यक्ति को किसी आपराधिक मामले के अभियुक्त की तरह नहीं माना जा सकता। अदालतों को यह ध्यान रखना होगा कि भरण-पोषण आदेश के प्रवर्तन के नाम पर किसी व्यक्ति की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि   यदि अदालत यह भी मान ले कि भरण-पोषण की बकाया राशि जानबूझकर अदा नहीं की गई, तब भी कानून अदालतों को यह अधिकार नहीं देता कि वे अत्यधिक उत्साह में व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दें।  इस मामले में हाइकोर्ट ने अलीगढ़ की एडिशनल प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता मोहम्मद शहज़ाद के खिलाफ भरण-पोषण की ...

मुस्लिम क़ानून के तहत वैध तलाक को मान्यता देना फैमिली कोर्ट का दायित्व :राजस्थान हाईकोर्ट

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राजस्थान हाइकोर्ट ने कहा कि  यदि मुस्लिम व्यक्तिगत क़ानून के अंतर्गत तलाक-उल-हसन या मुबारात के माध्यम से विवाह का विधिवत विघटन पहले ही हो चुका है तो फैमिली कोर्ट ऐसे तलाक को मान्यता देने और विवाह विच्छेद की घोषणा करने के लिए बाध्य है।  अदालत ने स्पष्ट किया कि  इस प्रकार की राहत को केवल अत्यधिक तकनीकी आधारों पर नकारा नहीं जा सकता ।  जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जो फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी की विवाह विच्छेद की घोषणा संबंधी याचिका खारिज किए जाने के आदेश के खिलाफ दायर की गई। याचिकाकर्ता पत्नी का कहना था कि   उसका विवाह मुस्लिम क़ानून के तहत पहले ही समाप्त हो चुका है। उसने यह दलील दी कि पति द्वारा तलाक-उल-हसन के माध्यम से तीन चरणों में तलाक दिया गया। इसके अतिरिक्त दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से मुबारात का लिखित समझौता भी हुआ था।  रिकॉर्ड के अनुसार, पति ने विवाह के दौरान तीन अलग-अलग तहर अवधियों में तलाक का उच्चारण किया पहला 8 जून 2024, दूसरा 8 जुलाई 2024 और तीसरा 8 अगस्त 2024 को जिसे ...

सड़क सुरक्षा माह -सीट बेल्ट चालान और गुड सेमेरिटन स्कीम

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  भारत में राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह/सप्ताह 2026, 1 जनवरी से 31 जनवरी 2026 तक मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य यातायात नियमों, जैसे हेलमेट/सीट बेल्ट के अनिवार्य उपयोग और नशे में वाहन न चलाने के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह राष्ट्रीय अभियान सड़क दुर्घटनाओं को कम करने और सुरक्षित परिवहन को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।  ➡️ सड़क सुरक्षा माह 2026 के प्रमुख विवरण: ✒️ अवधि : 1 जनवरी 2026 से 31 जनवरी 2026 तक (राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह)। ✒️ मुख्य विषय (Theme): "सीख से सुरक्षा" (Learning to Safety)। अन्य संदर्भों में, 2026 के लिए “परवाह से कर्तव्य तक” (From Care to Duty) और "सड़क सुरक्षा नायक" (Road Safety Heroes) भी शामिल हैं। ✒️ उद्देश्य : ओवरस्पीडिंग पर नियंत्रण, हेलमेट/सीट बेल्ट का अनिवार्य उपयोग, और नशे में वाहन न चलाने के बारे में जागरूकता बढ़ाना। ✒️ गतिविधियाँ : जागरूकता रथ, सड़क सुरक्षा प्रतिज्ञा, पोस्टर/स्लोगन प्रतियोगिताएं, और वाहन निरीक्षण अभियान।  ➡️ सड़क सुरक्षा के 10 आवश्यक सुझाव:  1️⃣ गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग न करें। 2️⃣ हमेशा हेलमेट और सीट बेल्ट पह...

UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर रोक:दुरूपयोग की आशंका-सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने' से संबंधित 2026 की नियमावली (UGC Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) को अगली सुनवाई तक स्थगित (abeyance) रखने का आदेश दिया। अदालत ने इन नियमों को लेकर गंभीर आपत्तियाँ जताते हुए कहा कि ये प्रथम दृष्टया अस्पष्ट (vague) हैं और दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने सुझाव दिया कि  इन नियमों की समीक्षा प्रख्यात विधिवेत्ताओं (eminent jurists) की एक समिति द्वारा की जानी चाहिए, ताकि सामाजिक मूल्यों, परिसरों के माहौल और समाज पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जा सके।  खंडपीठ ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने को कहा है। मामला 19 मार्च को फिर सूचीबद्ध होगा। तब तक UGC की 2012 की नियमावली लागू रहेगी। ➡️ अदालत की प्रमुख आपत्तियाँ  सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने 2026 नियमों को लेकर कई अहम सवाल उठाए:  1️⃣ नियमों की भाषा ...

रजिस्टर्ड सेल डीड को फर्जी कहना कठिन: सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि " एक रजिस्टर्ड सेल डीड को ज़्यादा वैध और असली माना जाता है, इसलिए बिक्री के लेन-देन का विरोध करने के लिए इसे हल्के में 'फर्जी' घोषित नहीं किया जा सकता।" जस्टिस राजेश बिंदल और मनमोहन की बेंच ने टिप्पणी की, “ यह कानून की एक तय स्थिति है कि एक रजिस्टर्ड सेल डीड अपने साथ वैधता और प्रामाणिकता की एक मज़बूत धारणा रखती है। रजिस्ट्रेशन सिर्फ़ एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक गंभीर कार्य है जो दस्तावेज़ को उच्च स्तर की पवित्रता प्रदान करता है। नतीजतन, एक कोर्ट को किसी रजिस्टर्ड दस्तावेज़ को हल्के में या लापरवाही से 'फर्जी' घोषित नहीं करना चाहिए।” बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए खरीदार की याचिका स्वीकार की, जिसमें उसके पक्ष में निष्पादित रजिस्टर्ड सेल डीड को बाद में विक्रेता ने बिना किसी विश्वसनीय सबूत के 'फर्जी' बताकर विवादित कर दिया था। यह मामला था जिसमें प्रतिवादी ने अपना कर्ज चुकाने के लिए अपीलकर्ता के पास अपना घर गिरवी रखा था। जब प्रतिवादी अपीलकर्ता की मांग पर गिरवी छुड़ाने में विफल रहा तो एक रजिस्टर्ड बिक्री समझौता किया गया...

विवाहिता पुत्री अनुकंपा नियुक्ति की हकदार-इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी सिद्धार्थ नगर को मृतक आश्रित कोटे में विवाहिता पुत्री की नियुक्ति पर दो माह में विचार कर आदेश करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि  नियुक्ति में हुई देरी की उपेक्षा करते हुए परिवार की आर्थिक स्थिति व आश्रितों की संख्या पर विचार कर आदेश दिया जाए।  कोर्ट ने नियुक्ति से इनकार करने के बीएसए के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि  संशोधित नियमावली में अविवाहित शब्द हटा देने के बाद केवल पुत्री है। जिसमें विवाहित व अविवाहित दोनों शामिल हैं इसलिए याची (विवाहित पुत्री) को आश्रित कोटे में नियुक्ति पाने का अधिकार है।  यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने नीतू अनिता देवी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। प्रस्तुति शालिनी कौशिक एडवोकेट कैराना (शामली)

बंदरों की जिम्मेदारी वन विभाग की-इलाहाबाद उच्च न्यायालय

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प्राप्त जानकारी के अनुसार बंदरों के प्रबंधन के संबंध में मा उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में पोजित पी.आई.एल. संख्या-1030/2025 विनीत शर्मा व अन्य बनाम उ0प्र0 राज्य व अन्य में दिनांक 13.01.2026 द्वारा निम्नवत आदेश पारित किये गये हैं:- 1. इस न्यायालय द्वारा दिनांक 03.12.2025 को पारित आदेश के अनुसार, जिसमें प्रतिवादियों को इस न्यायालय द्वारा बार-बार दिए गए आदेशों के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था, माननीय अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दिनांक 08.01.2006 की बैठक का कार्यवृत्त प्रस्तुत किया है, जिसमें सभी संबंधित विभागों के साथ-साथ लखनऊ नगर निगम आदि और पीपल फॉर एनिमल्स के सदस्य ने भाग लिया था। इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि बंदरों के खतरे को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग की है, जिसके लिए वह एक माह के भीतर एक व्यापक कार्य योजना तैयार करेगा और आवश्यकतानुसार अन्य विभागों को भी इसमें शामिल किया जाएगा, अतः उक्त विभाग का समर्थन करें।  2. उक्त कार्यवृत्त के आधार पर, प्रतिवादियों की ओर से बैठक में तय की गई कार्य योजना प्रस्तुत करने के लिए समय मांगा ग...

वसीयत अनुकम्पा नियुक्ति का आधार नहीं-इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का लाभ मृत सरकारी कर्मचारी की वसीयत (विल) के आधार पर नहीं दिया जा सकता। हाइकोर्ट ने कहा कि  उत्तर प्रदेश मृतक आश्रित नियम, 1974 के तहत अनुकंपा नियुक्ति का आधार केवल यह होता है कि आवेदक मृतक कर्मचारी पर वास्तव में निर्भर था या नहीं, न कि यह कि वसीयत किसके पक्ष में बनाई गई । जस्टिस मनीष माथुर ने अपने फैसले में कहा कि  नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत मृतक की वसीयत के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति की पात्रता तय की जाए। पंजीकृत वसीयत का अनुकंपा नियुक्ति से कोई संबंध नहीं है। इस प्रकार की नियुक्ति का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से उबारना होता है और इसके लिए यह देखा जाना आवश्यक है कि आवेदक वास्तव में मृतक पर निर्भर था या नहीं। साथ ही यह भी जरूरी है कि नियुक्ति से विधवा और नाबालिग बच्चों सहित पूरे परिवार का हित सुरक्षित हो। मामले में याचिकाकर्ता ने अपने भाई की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। उसका कहना था कि मृतक की पत्नी उससे अलग रह रही थी और वह स्वयं अपने भाई की देखभाल करता था। याच...

पत्नी की क्वालिफिकेशन गुजारा भत्ते में बाधक नहीं-इलाहाबाद हाई कोर्ट

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 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि  किसी पत्नी को सिर्फ़ इसलिए CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा भत्ता देने से मना नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह बहुत ज़्यादा पढ़ी-लिखी है या उसके पास वोकेशनल स्किल्स हैं, क्योंकि इससे यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि याचिकाकर्ता नंबर 1/पत्नी पैसे कमाने के लिए काम कर रही है।  जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने यह भी कहा कि   पति का अपनी पत्नी का कानूनी तौर पर भरण-पोषण करने की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए सिर्फ़ उसकी क्वालिफिकेशन पर निर्भर रहना गलत है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी की सिर्फ़ कमाने की क्षमता असल में नौकरी करके पैसे कमाने से अलग है। खास बात यह है कि बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि  यह कई महिलाओं की सच्चाई है, जो अपनी पढ़ाई-लिखाई के बावजूद, सालों तक घरेलू काम और बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारियों के बाद नौकरी पर लौटने में मुश्किल महसूस करती हैं.  इन बातों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने बुलंदशहर के एडिशनल प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें पति से गुज़ारा भत्ता मांगने के लिए CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी की ...