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ऐसा पति अग्रिम जमानत का हकदार नहीं - सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा के आरोपी एक व्यक्ति को अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि  पति अपनी पत्नी के साथ जानवरों जैसा व्यवहार नहीं कर सकता और उसे सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। आरोप गंभीर हैं, इसलिए आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की खंडपीठ आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। आरोपी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज है।  मामले में आरोप है कि  आरोपी पति ने शराब के नशे में अपनी पहली पत्नी के साथ मारपीट की। उसने पत्नी को जमीन पर फेंक दिया, जिससे उसका सिर ईंट से टकरा गया,उसके बाद पति ने लाठी से हमला किया। अभियोजन का यह भी कहना है कि आरोपी ने तीन शादियां की हैं और पहली पत्नी को कोई खर्च भी नहीं दिया। हालांकि, आरोपी ने शिकायतकर्ता से शादी होने से ही इनकार किया है। पटना हाईकोर्ट ने पहले ही आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि आरोपी ने तीन विवाह किए हैं और पहली पत्नी के साथ मारपीट करने के बाद भी उसका भरण-पोषण नहीं किया।  सुप्रीम को...

मौ अहसान के अनिल पंडित बनने पर रोक लगाने वाले ADM को नया आदेश पारित करने का निर्देश - इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गैरकानूनी धर्मांतरण प्रतिषेध कानून के तहत एक मुस्लिम व्यक्ति के हिंदू धर्म अपनाने के मामले में ADM की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराज़गी जताई है। कोर्ट ने कहा कि ADM ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बार-बार पुलिस जांच करवाई और आपराधिक मामले को आधार बनाकर धर्मांतरण प्रमाणन आवेदन खारिज कर दिया।  जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने फिलहाल प्रयागराज के ADM (प्रशासन) द्वारा पारित उस आदेश को स्थगित कर दिया है, जिसमें याचिकाकर्ता के 'सनातन धर्म' अपनाने की घोषणा को स्वीकार करने से इनकार किया गया था। कोर्ट ने ADM को तीन सप्ताह के भीतर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया है। मामला इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर अनिल पंडित (पूर्व नाम मोहम्मद अहसान) से जुड़ा है। उन्होंने 12 जनवरी 2022 को यूपी धर्मांतरण कानून की धारा 8 के तहत धर्म परिवर्तन की घोषणा दी थी। बाद में आर्य समाज मंदिर में 14 मार्च 2022 को विधिवत धर्मांतरण की प्रक्रिया पूरी हुई। 2022 और 2023 में पुलिस की दो जांच रिपोर्टों में स्पष्ट कहा गया कि धर्मांतरण स्वेच्छा ...

ADVOCATE"S POWER

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  सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक एडवोकेट के खिलाफ बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा की गई प्रतिकूल टिप्पणी (Adverse Remark) को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब संबंधित राज्य बार काउंसिल ने पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) की शिकायत को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया था और उस फैसले की पुष्टि खुद BCI ने भी कर दी थी, तब अधिवक्ता को चेतावनी देना पूरी तरह अनुचित था। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिला अदालतों में प्रैक्टिस करने वाले एक अधिवक्ता से जुड़ा था। अधिवक्ता के खिलाफ Advocates Act, 1961 की धारा 35 के तहत पेशेवर कदाचार की शिकायत दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता अधिवक्ता की बहन का पति था, जिसने आरोप लगाया था कि पारिवारिक विवाद और वैवाहिक तनाव के चलते अधिवक्ता ने उसे जान से मारने की धमकी दी और डराने-धमकाने का प्रयास किया। हालांकि, Uttar Pradesh State Bar Council ने शिकायत को झूठा और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए खारिज कर दिया था। राज्य बार काउंसिल ने माना कि शिकायत केवल अधिवक्ता को परेशान करने ...

QR कोड वाले जनगणना कर्मी

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  जनगणना 2027 का प्रथम चरण 1 अप्रैल 2026 से आरम्भ हो चुका है और यह 30 सितंबर 2026 तक चलने वाला है । भारत देश के इस विशाल राष्ट्रीय अभियान में लगभग 30 लाख जनगणना कर्मी शामिल किए गए हैं। जनगणना 2027 के लिए भारत सरकार द्वारा जनगणना कर्मियों को क्यूआर कोड युक्त पहचान पत्र जारी किए गए हैं। 2027 की जनगणना (जो 2026-2027 में आयोजित की जा रही है) भारत की पहली डिजिटल जनगणना है। घर-घर आने वाले प्रगणकों (Enumerators) की पहचान करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने QR कोड युक्त पहचान पत्र जारी करने के उपाय किए हैं. इस नई व्यवस्था के तहत नागरिक अपने मोबाइल फोन से क्यूआर कोड स्कैन कर गणनाकार की पहचान को सत्यापित कर सकेंगे। ➡️ QR Code वाला ID कार्ड:  प्रगणकों को क्यूआर कोड वाला आधिकारिक पहचान पत्र दिया गया है। आप इस कोड को स्कैन करके उनकी सत्यता की पुष्टि कर सकते हैं। इसका उद्देश्य जनगणना प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और डिजिटल बनाना है। ➡️ आधिकारिक दस्तावेज़:-  प्रगणकों के पास संबंधित जनगणना विभाग द्वारा जारी किया गया नियुक्ति पत्र और एक वैध फोटो पहचान पत्र हो...

.. मंदिर पर सिर्फ़ निगरानी की भूमिका निभाने और पुजारियों की नियुक्ति करने से ही मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता: सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि सिर्फ़ इस बात से कि किसी समूह ने मंदिर पर प्रबंधकीय या निगरानी का नियंत्रण रखा है, उसे अपने-आप मंदिर का मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता। कोर्ट ने कहा, "सिर्फ़ इस बात से कि किसी संस्था ने मंदिर पर कुछ निगरानी या प्रबंधकीय काम किए, या 'पुजारियों' की नियुक्ति में हिस्सा लिया है, उसे अपने-आप मालिकाना हक़ नहीं मिल जाता।" जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने राजस्थान के कोटा में स्थित मंदिर 'मूर्ति स्वरूप श्री गोवर्धन नाथ जी' पर प्रतिवादियों के मालिकाना हक़ को सही ठहराया था, जबकि वे मंदिर पर अपने मालिकाना हक़ को साबित करने वाला कोई भी दस्तावेज़ पेश नहीं कर पाए। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फ़ैसले को सही ठहराया था, जिसमें वादी-प्रतिवादी के पक्ष में मालिकाना हक़ घोषित किया गया। इसका मुख्य आधार यह था कि उन्होंने मंदिर पर प्रबंधकीय और निगरानी का नियंत्रण रखा, जिसमें पुजारियों की नियुक्ति भी शामिल थी। ऐसा करते हुए कोर्ट ने प्रतिवादी की अपील को खारिज कर दिया और यह माना कि प्रति...

पहली पत्नी के भरण पोषण मामले में दूसरी पत्नी जरूरी पक्षकार नहीं - दिल्ली हाई कोर्ट

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 दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि   CrPC की धारा 125 के तहत पहली पत्नी और बच्चों द्वारा शुरू की गई भरण-पोषण की कार्यवाही में दूसरी पत्नी न तो ज़रूरी पक्षकार है और न ही उचित पक्षकार। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी कार्यवाही को बेवजह उन सभी लोगों को शामिल करके नहीं बढ़ाया जा सकता, जो पति पर निर्भर होने का दावा करते हैं। जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने महिला द्वारा दायर अर्जी खारिज की, जिसमें उसने पहली पत्नी द्वारा अपने पति के खिलाफ दायर भरण-पोषण की पुनरीक्षण याचिका में खुद को पक्षकार बनाने की मांग की थी। पहली पत्नी ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भरण-पोषण देने से इनकार किया गया था, जबकि शादी से पैदा हुए दो बच्चों में से हर एक को ₹10,000 देने का आदेश दिया गया था। कार्यवाही के दौरान, पति ने फैमिली कोर्ट से अपने पक्ष में तलाक की डिक्री मिलने के बाद दूसरी शादी की थी। इसके बाद दूसरी पत्नी ने भरण-पोषण की कार्यवाही में खुद को पक्षकार बनाने की मांग की। उसने दलील दी कि वह प्रतिवादी की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। इस मामले म...

अब प्रशासनिक अधिकारी जोड़ेंगे हाथ

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उप्र राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली'  उप्र राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली' के तहत अब प्रशासनिक अधिकारी हाथ जोड़ेंगे, निम्न कार्य करेंगे -  1️⃣ प्रशासनिक अधिकारियों को अब सांसदों और विधायकों के सामने हाथ जोड़ने पड़ेंगे।  2️⃣ कार्यालय में आने पर अधिकारी सांसदों व विधायकों का उठकर सम्मान करेंगे.  3️⃣ कार्यालय में आने पर उनके आगे हाथ जोड़ेंगे.  4️⃣ कार्यालय में आने पर उनसे पानी भी पूछेंगे । 5️⃣  सांसद, विधायक का फोन आने पर उसका जवाब देंगे.  6️⃣ यदि बैठक में हैं तो सांसद, विधायक का फोन आने पर पलटकर फोन कर जवाब देंगे.       जिन प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ऐसा सम्मान जनक आचरण न किए जाने की शिकायत प्राप्त होगी ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ 'उप्र राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली' के तहत कार्रवाई की जाएगी।  द्वारा  शालिनी कौशिक  एडवोकेट कैराना (शामली) 

क्या खतना मुस्लिम महिलाओं की धार्मिक आजादी है - तीखी बहस सुप्रीम कोर्ट

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मुस्लिम समुदाय मे एक शब्द प्रचलित है - खतना, जिसे अंग्रेजी में  (Female Genital Mutilation - FGM) कहते हैं FGM का मतलब फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (Female Genital Mutilation - FGM) है, और हिंदी में 'विस्तार में इसे महिला जननांग विकृति' या 'महिला खतना' कहा जाता है। यह एक अत्यंत हानिकारक प्रथा है। ➡️ प्रक्रिया -   इसमें गैर-चिकित्सीय कारणों से महिलाओं या छोटी बच्चियों के बाहरी जननांगों को आंशिक या पूरी तरह से काट दिया जाता है या उन्हें अन्य प्रकार से चोट पहुँचाई जाती है  ➡️ आयु -  यह आमतौर पर बचपन से लेकर 15 वर्ष की आयु तक की लड़कियों पर की जाती है। ➡️ स्वास्थ्य प्रभाव:  इसका कोई स्वास्थ्य लाभ नहीं है, बल्कि यह बेहद दर्दनाक होती है। इससे गंभीर रक्तस्राव, संक्रमण, प्रसव में जटिलताएं और मानसिक आघात जैसी आजीवन समस्याएं हो सकती हैं। ➡️ मानवाधिकार उल्लंघन:  संयुक्त राष्ट्र (UN) इसे लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन मानता है। वैश्विक स्थिति: यह अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के कुछ हिस्सों में प्रचलित है। वर्तमान में, विश्व स्तर पर 23 करोड़ से अधिक मह...

किरायेदार तो फंस गए...

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जनगणना 2027 में अपने मकान के सम्बन्ध में बहुत सारी जानकारी देनी है अब किरायेदार क्या करें? वे किस प्रकार H सहित 11 नंबर की SE ID प्राप्त करे? लगता है कि किरायेदार फंस गए, पर ऐसा नहीं है किरायेदार के लिए भी स्वगणना का प्रबन्ध सरकार ने किया है, क्या किया है अब ये जान लीजिए -  मकान मालिक की तरह ही किराएदार भी अपना पोर्टल पर जाकर स्वगणना कर सकते हैं। किराएदारों की अलग आइडी होगी। ⚫ किराएदार के रूप में पहचान:  स्वामित्व की स्थिति (Ownership Status) वाले सवाल में आपको 'किराया' (Rented) विकल्प चुनना होगा।अगर एक मकान में एक से अधिक किराएदार हैं तो अलग अलग आइडी जनरेट होगी। ⚫ स्व-गणना (Self-Enumeration):  किराएदार आधिकारिक पोर्टल se.census.gov.in पर जाकर अपना फॉर्म स्वयं भर सकते हैं और घर की सुविधाएं, जैसे बिजली, पानी, शौचालय आदि की जानकारी दे सकते हैं। ⚫ 6 महीने का नियम:  यदि आप किसी किराए के मकान में 6 महीने से अधिक समय से रह रहे हैं या आगे रहने वाले हैं, तो आपको उसी पते से फॉर्म भरना होगा। ⚫ दस्तावेजों की आवश्यकता नहीं:  जनगणना के लिए किसी रेंट एग्रीमेंट या आधार कार्ड...

माननीय...... कौन? - इलाहाबाद हाईकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि किसी भी रैंक के सिविल सेवक माननीय संबोधन के पात्र नहीं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सांसद, मंत्री, जज व अन्य ऐसे संवैधानिक पदाधिकारी ही इस सम्मानसूचक संबोधन के हकदार हैं। कोर्ट ने कहा कि संप्रभु कार्यों का निर्वहन करने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को प्रत्येक आधिकारिक संचार माध्यमों में माननीय संबोधन दिया जाना चाहिए। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने हर्षित शर्मा एवं अन्य की आपराधिक याचिका की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी नाराजगी या पारिवारिक परिचय के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी को उसके वैधानिक सम्मानसूचक संबोधन से वंचित नहीं किया जा सकता। केंद्र व राज्य सरकारों के मंत्री, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के जज, लोकसभा एवं राज्यसभा के अध्यक्ष/सभापति, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष, सांसद एवं विधायक ही माननीय संबोधन के अधिकारी हैं। खंडपीठ ने यह भी कहा कि प्रोटोकॉल के अनुसार अन्य समान पदाधिकारी भी इस सम्मान के पात्र हो सकते हैं और जो भी इसके हकदार हों, उन्हें उसी प्रकार संबोधित कि...

"I LOVE MOHAMMED" को ज़मानत - इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत दी, जिस पर अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर यह पोस्ट करने का आरोप था कि वह 'I Love Mohammed' के लिए अपना सिर कटवा भी सकता है और दूसरों का सिर काट भी सकता है।  जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की बेंच ने यह टिप्पणी की कि आवेदक द्वारा की गई 'कथित आपत्तिजनक' पोस्ट में किसी खास जाति या समुदाय का नाम नहीं लिया गया। आरोपी-नदीम मुजफ्फरनगर ज़िले का रहने वाला है। उस पर पिछले साल यूपी पुलिस ने उसकी इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल पर कथित तौर पर संवेदनशील टिप्पणियाँ करने के आरोप में BNS की धारा 353(2), 192, और 152 के तहत मामला दर्ज किया। ज़मानत की गुहार लगाते हुए उसके वकील ने हाईकोर्ट में यह दलील दी कि अब चार्जशीट भी जमा की गई और निकट भविष्य में मुक़दमे के पूरा होने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। दूसरी ओर, ज़मानत की अर्ज़ी का विरोध करते हुए राज्य सरकार के अतिरिक्त सरकारी वकील ने यह दलील दी कि उसने असंवेदनशील टिप्पणी पोस्ट की थी, जिसमें कहा गया था: "I Love Mohammed के लिए गर्दन कटवा भी सकते...

मुस्लिम महिला मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1976 के अंतर्गत तलाक नहीं मांग सकती -इलाहाबाद हाइकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक डिक्री रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की कि अदालत ने ऐसे कानून के तहत तलाक दिया, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के फैसले को अत्यंत लापरवाह और अनौपचारिक बताते हुए उसकी कार्यप्रणाली पर नाराज़गी जताई। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सारन की खंडपीठ ने यह आदेश पति की अपील पर पारित किया, जिसने जनवरी 2026 में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए तलाक आदेश को चुनौती दी थी। मामले में पत्नी ने अपनी याचिका मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 के तहत दायर की थी जबकि ऐसा कोई कानून अस्तित्व में ही नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि संभवतः याचिका में मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 का उल्लेख होना चाहिए, जो मुस्लिम महिलाओं को तलाक मांगने का अधिकार देता है। अदालत ने कहा कि केवल याचिका में गलत कानून का उल्लेख होने से आदेश स्वतः अवैध नहीं हो जाता, यदि ट्रायल कोर्ट सही कानून के तहत अधिकार प्रयोग करे। हालांकि, इस मामले में फैमिली कोर्ट ने स्वयं अपने पूरे निर्णय में बार-बार उसी गैर-मौजूद कानून का उल्लेख किया और उस...

हिन्दू पति ऐसी पत्नि के भरण पोषण के लिए बाध्य नहीं - इलाहाबाद हाइकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई शिक्षित और कमाने में सक्षम पत्नी केवल पति पर आर्थिक बोझ डालने के उद्देश्य से काम करने से परहेज करती है तो अदालतें हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार कर सकती हैं। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक महिला द्वारा दायर प्रथम अपील खारिज करते हुए की। महिला पेशे से स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं और उन्होंने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके अंतरिम भरण-पोषण का आवेदन अस्वीकार किया गया था। प्रयागराज के फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत महिला की अंतरिम भरण-पोषण याचिका खारिज की थी। हालांकि बच्चों के लिए धारा 26 के तहत भरण-पोषण मंजूर किया गया। रिकॉर्ड के अनुसार महिला की आयकर विवरणियों से उसकी वार्षिक आय 31 लाख रुपये से अधिक पाई गई। हाईकोर्ट में महिला ने दलील दी कि वह फिलहाल कार्यरत नहीं हैं क्योंकि पति द्वारा मुकदमा दायर किए जाने के बाद उन्हें अस्पताल से हटा दिया गया। उनका कहना था कि अलगाव से पूर्व जिस जीवनस्तर पर वह रह रही थीं उसे बना...

परिवार के सदस्य को ही मृत्यु अनुकम्पा नियुक्ति का अधिकार - इलाहाबाद हाइकोर्ट

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हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए “विधवा पुत्रवधू” की पात्रता का निर्धारण सरकारी कर्मचारी की मृत्यु की तिथि के संदर्भ में किया जाना अनिवार्य है। कोर्ट ने आदेश दिया कि जो व्यक्ति कर्मचारी की मृत्यु के समय “पारिवारिक इकाई” का सदस्य नहीं था, वह विवाह या विधवा होने जैसी बाद की घटनाओं के आधार पर पात्रता का दावा नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह फैसला दीपिका तिवारी की विशेष अपील को खारिज करके दिया। इस मामले का मुख्य बिंदु यह था कि क्या एक महिला, जिसने सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के लगभग दो साल बाद उसके बेटे से विवाह किया और बाद में विधवा हो गई, अनुकंपा नियुक्ति की हकदार हो सकती है। कोर्ट को उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम, 1921 के विनियम 103 से 107 की व्याख्या करनी थी ताकि यह तय किया जा सके कि क्या “विधवा पुत्रवधू” का दर्जा कर्मचारी के निधन के समय अस्तित्व में होना चाहिए। दरअसल, संगीता बाजपेयी जो लखनऊ के नारी शिक्षा निकेतन इंटर कॉलेज में सहायक शिक्षिका थीं, जिनका 23 अप्रैल 2021 को सेवाकाल ...

सोशल मीडिया पर BCI नियमों का पालन करें एडवोकेट - चूक भारी पड़ सकती है

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 देखने मे आ रहा है कि आज के सोशल मीडिया युग में एडवोकेट नाम कमाने के लिए, ज्यादा से ज्यादा लोगों को यह दिखाने के लिए कि मैं बार काउंसिल मे रजिस्टर्ड एडवोकेट हूं अपने सर्टिफिकेट का प्रयोग अपने सोशल मीडिया नेटवर्किंग साइट्स के अकाउंट पर कर रहे हैं. जबकि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों, विशेष रूप से BCI Rules (Part VI) के तहत, वकील द्वारा अपना सर्टिफिकेट, आईडी कार्ड या "एडवोकेट" स्टिकर का उपयोग सोशल मीडिया प्रोफाइल पिक्चर (DP) के रूप में करना पेशेवर नैतिकता और विज्ञापन के नियमों के अंतर्गत आता है। ⚫ BCI के निर्देशों के अनुसार, मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: ➡️ विज्ञापन पर रोक (Rule 36):  बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के नियम 36 के तहत, वकील सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से अपने काम का विज्ञापन नहीं कर सकते हैं। BCI ने बीसीआई नियमों के नियम 36, अध्याय II, भाग VI का उल्लंघन करने वाले विज्ञापनों को तत्काल वापस लेने की मांग की, जिसमें कहा गया: “कोई भी वकील सीधे या परोक्ष रूप से काम नहीं मांगेगा या विज्ञापन नहीं देगा, चाहे वह सर्कुलर, विज्ञापनों, दलालों, व्यक्तिगत संचार, व्यक्तिगत संबंध...

अब महिलाओं का होगा नया संसार

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   उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग ने महिला सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 9 सूत्रीय कड़े दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनमें जिम, बुटीक और डांस क्लास में महिला ट्रेनर/कर्मचारी अनिवार्य करना, सभी स्थानों पर CCTV और अनिवार्य पुलिस सत्यापन शामिल है। इन नियमों का उद्देश्य सार्वजनिक और निजी स्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को बनाए रखना है। ➡️ महिला आयोग के 9 प्रमुख निर्देश: ⚫ बुटीक में महिला कर्मचारी:  महिला ग्राहकों की नाप (Measurement) केवल महिला टेलर या कर्मचारी ही लेंगी। ⚫ जिम और योगा सेंटर में महिला ट्रेनर:  जिम, योगा सेंटर और नाट्य कला केंद्रों में महिला ट्रेनर या ट्रेनर की मौजूदगी अनिवार्य है। ⚫ डांस क्लास में महिला टीचर:  लड़कियों को डांस सिखाने के लिए केवल महिला टीचर ही नियुक्त की जाएंगी। ⚫ स्कूल बसों में महिला सुरक्षा:  स्कूल बसों में महिला टीचर या महिला सुरक्षाकर्मी की उपस्थिति अनिवार्य है। ⚫ ड्रेसिंग रूम में महिला अटेंडेंट:  कपड़ों की दुकानों और बुटीक के ड्रेसिंग रूम में महिला अटेंडेंट जरूरी हैं। ⚫ कोचिंग सेंटरों में सुरक्षा:  लड़कियों की क...

आओ स्व गणना भरें - जनगणना 2027

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जनगणना 2027 में स्व गणना कार्यक्रम आरंभ हो चुका है. स्व-गणना के लिए सबसे पहले ब्राउज़र में https://se.census.gov.in वेबसाइट खोलनी होगी। इसके बाद स्टेट में उत्तर प्रदेश चुनकर कैप्चा भरना होगा। फिर परिवार के मुखिया के नाम और मोबाइल नंबर से रजिस्ट्रेशन करना होगा। मोबाइल पर आए ओटीपी को दर्ज कर सत्यापन पूरा किया जाएगा।  इसके बाद अपनी सुविधा के अनुसार हिंदी, अंग्रेजी या अन्य 16 भाषाओं में से किसी एक भाषा का चयन किया जा सकता है। फिर पता संबंधी जानकारी जैसे राज्य, जिला, गांव या शहर और मकान का विवरण भरना होगा। लोकेशन के लिए मैप पर अपने घर को लाल निशान से चिह्नित करना होगा। फॉर्म में कुल 33 सवाल पूछे जाएंगे, जिनमें घर का प्रकार (पक्का या कच्चा), बिजली-पानी की सुविधा, शौचालय, परिवार के सदस्यों की जानकारी और टीवी, मोबाइल, इंटरनेट जैसी संपत्तियों का विवरण शामिल है। यदि किसी सवाल को समझने में दिक्कत हो तो यहां जानकारी ली जा सकती है।  जनगणना 2027 के लिए टोल फ्री नंबर 1855 है। यह नंबर रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया द्वारा लॉन्च किया गया है ताकि लोगों को जनगणना प्रक्रिया में मदद मिल सके। यह हेल्पल...

शामली जिले के व्यापारी बंधुओं की जागरुकता को सलाम

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  शामली में दिल्ली रोड स्थित एक मेटल फैक्ट्री में पर्यावरण अधिकारी बनकर वसूली करने वाले गिरोह के दो फर्जी सदस्यों, आबिद और ऋषिराज, को उद्यमियों ने पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। आरोपी प्रदूषण जांच के नाम पर फैक्ट्री संचालकों से अवैध वसूली कर रहे थे, जबकि तीसरा आरोपी जीशान फरार है। पुलिस ने मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है.  ➡️  शामली फर्जी अधिकारी प्रकरण के मुख्य विवरण: ✒️ घटनास्थल : शामली के दिल्ली रोड स्थित सुखमाल चंद मेटल इंडस्ट्रीज। ✒️ आरोपी : आबिद (कैराना निवासी) और ऋषिराज मलिक (बड़ौत, बागपत निवासी) गिरफ्तार, जीशान (कैराना) फरार। ✒️ कार्यशैली : तीनों सफेद गाड़ी में आकर खुद को पर्यावरण आयोग के अधिकारी बताकर फैक्ट्री में छापेमारी करते थे। ✒️ उद्देश्य: प्रदूषण नियमों के उल्लंघन का डर दिखाकर फैक्ट्री मालिकों से अवैध वसूली करना। ✒️ पर्दाफाश : संदिग्ध लगने पर उद्यमियों (लघु उद्योग भारती) ने उनके आई-कार्ड और पूछताछ में फर्जीवाड़े का खुलासा किया।  फर्जी अधिकारी की पहचान कैसे करें? ⚫ धैर्य और शांति बनाए रखें और वेरिफिकेशन (सत्यापन) मांगें :  आम जनता को चाहिए ...

बिजली कनेक्शन अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार - इलाहाबाद हाइकोर्ट

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  इस बात पर ज़ोर देते हुए कि बिजली कनेक्शन पाना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकार है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे वैवाहिक विवाद के बीच एक नई घरेलू बिजली कनेक्शन के लिए एक बहू द्वारा दायर आवेदन पर कार्रवाई करें। जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रीति शर्मा द्वारा दायर एक रिट याचिका पर यह आदेश पारित किया। संक्षेप में मामला याचिकाकर्ता (शर्मा) प्रतिवादी नंबर 7 की बहू है और प्रतिवादी नंबर 6 की पत्नी है। उसका पक्ष यह था कि वह रायबरेली जिले में एक साझा घर में 20 वर्षों से अधिक समय से रह रही है और उसके छोटे बच्चे हैं। हालांकि, उसके ससुराल वाले एक वैवाहिक विवाद के कारण उसे उक्त घर से अवैध तरीके से निकालने की कोशिश कर रहे हैं। हाईकोर्ट के समक्ष यह प्रस्तुत किया गया कि उसकी बिजली की आपूर्ति काट दी गई, भले ही वह नियमित रूप से बिजली के बिलों का भुगतान करती थी। इसलिए उसने फरवरी, 2026 में बिजली विभाग के पास एक नए कनेक्शन के लिए आवेदन दायर किया। चूंकि इस आव...

महिला आरक्षण कानून लागू

 केंद्र सरकार ने संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 को 16 अप्रैल 2026 से लागू कर दिया है, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण का प्रावधान है। विधि एवं न्याय मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर इस तारीख को कानून के लागू होने की तिथि घोषित किया। गौरतलब है कि इस कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी 2023 में ही मिल गई थी, लेकिन इसकी धारा 1(2) के तहत इसे लागू करने की तारीख केंद्र सरकार की अधिसूचना पर निर्भर थी, जिसके कारण यह अब तक लागू नहीं हुआ था।  यह अधिसूचना ऐसे समय में आई है जब संसद में परिसीमन (delimitation) और महिला आरक्षण के क्रियान्वयन से जुड़े नए संवैधानिक संशोधनों पर चर्चा चल रही है। 2023 के कानून के अनुसार, महिला आरक्षण अगले जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होना था। इसी बीच, केंद्र सरकार ने 16 अप्रैल को संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश किया है, जिसमें लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने और महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने वाली शर्त में बदलाव का प्रस्ताव है, ताकि इसे जल्द लागू किया जा सके। हालांकि, विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण का...

रजिस्टर्ड एडवोकेट को ही वकालत का अधिकार - इलाहाबाद हाइकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि  कोई भी व्यक्ति, भले ही उसके पास पावर ऑफ़ अटॉर्नी हो, एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए मुक़दमे लड़ने वालों की ओर से और उनकी तरफ़ से एक वकील या अटॉर्नी के तौर पर अधिकार के तौर पर पेश होकर बहस नहीं कर सकता।  एडवोकेट्स एक्ट 1961 की धारा 29 और 33 का ज़िक्र करते हुए जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने साफ़ तौर पर कहा कि   सिर्फ़ "रजिस्टर्ड वकील" ही किसी दूसरे व्यक्ति की ओर से कोर्ट के सामने पेश होकर बहस कर सकते हैं। बेंच ने आगे कहा कि  हालांकि कोई भी व्यक्ति कोर्ट की मंज़ूरी से किसी सीमित मकसद के लिए किसी दूसरे व्यक्ति का केस पेश कर सकता है और बहस कर सकता है, लेकिन अधिकार के तौर पर ऐसा नहीं कर सकता [धारा 32]।  इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने एक याचिका खारिज की, जिसमें याचिकाकर्ता ने मुक़दमे लड़ने वालों की ओर से और उनकी तरफ़ से केस लड़ने और बहस करने की इजाज़त माँगी थी, जबकि वह न तो क़ानून का जानकार ग्रेजुएट था और न ही बार काउंसिल में रजिस्टर्ड था। संक्षेप में केस -  याचिकाकर्ता [विश्राम सिंह] ने दावा किया कि व...

बाईक से पटाखा फोड़ने वाले हो जाएं सावधान

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हिन्दुस्तान दैनिक 18 अप्रैल 2026 मे प्रकाशित समाचार के अनुसार ध्वनिप्रदूषण और सड़क सुरक्षा को लेकर परिवहन - आयुक्त ने निर्देशों के क्रम में महकमे ने वाहन डीलरों व मोटर गैराज/वर्कशॉप संचालकों की बैठक बुलाकर कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि मोडिफाइड साइलेंसर, प्रेशर हॉर्न (हूटर) की बिक्री या फिटिंग करने वालों पर मोटरयान अधिनियम के तहत प्रति मामले एक, लाख रुपये तक का जुर्माना लगेगा। यही नहीं, यदि कोई वाहन स्वामी अपने वाहन में पुर्जों की फिटिंग द्वारा इस प्रकार का अवैध परिवर्तन करता है, तो उसे 6 माह तक की जेल या 5 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इसके साथ ही जो कोई व्यक्ति किसी सार्वजानिक स्थान में ऐसा मोटर यान चलाएगा, अथवा चलाने देगा जिससे सड़क सुरक्षा, शोर नियंत्रण एवं वायु प्रदूषण के सम्बन्ध में विहित मानकों का उल्लंघन होता हैं, उनके विरूद्ध भी मोटरयान अधिनियम के तहत विधिक कार्यवाही सुनिश्चित की जायेगी। इसमें संबंधित व्यक्ति, पहले अपराध के लिए ही तीन माह तक की जेल या दस हजार रूपये तक के जुमनि या दोनों से दंडित किया जाएगा और उसका लाइसेंस, तीन माह की अवधि के लिए निरर्हित कर दिया ज...

संपत्ति की कुर्की से पूर्व नोटिस देना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि 'बीएनएसएस की धारा 106 के तहत पुलिस द्वारा संपत्ति कुर्क करने के लिए संबंधित व्यक्ति को पहले से कोई नोटिस देना ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने धारा 106 औरं धारा 107 के बीच अंतर स्पष्ट किया। धारा 107 में विशेष रूप से यह प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को नोटिस जारी करेगा, जिसकी संपत्ति बीएनएसएस की धारा 107 के तहत कुर्क की जानी है।  बीएनएसएस की धारा 106 पुलिस को ऐसी किसी भी संपत्ति को ज़ब्त करने का अधिकार देती है, जिसके बारे में यह आरोप हो या संदेह हो कि वह चोरी की है, या जो ऐसी परिस्थितियों में पाई गई हो, जिनसे किसी अपराध के होने का संदेह पैदा होता हो।  धारा 107 भी संपत्ति कुर्क करने की बात करती है, जिसके तहत पुलिस संपत्ति कुर्क करने के लिए पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त से पहले अनुमति लेने के बाद अपने अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रार्थना पत्र देती है। मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस जारी करने और उसे अपनी बात रखने का उचित अवसर देने के बाद, जिसकी संपत्ति कुर्क की जानी है, कुर्की के संबंध में आदेश कर सकता है।...

आपसी सहमति से तलाक मे वापसी नहीं : सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि   भले ही आपसी सहमति से तलाक के मामलों में कोई भी पक्ष अंतिम डिक्री से पहले अपनी सहमति वापस ले सकता है, लेकिन यदि पति-पत्नी के बीच सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम समझौता (Full & Final Settlement) हो चुका हो, तो उस समझौते की शर्तों से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं है।  जस्टिस राजेश बिंडल और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें पत्नी द्वारा अदालत-मान्य मध्यस्थता समझौते से पीछे हटने पर कड़ी नाराज़गी जताई गई। ➡️ पूरा मामला :  विवादित पक्षों की शादी वर्ष 2000 में हुई थी। वर्ष 2023 में पति ने तलाक की याचिका दायर की, जिसके बाद फैमिली कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। मध्यस्थता में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत उन्होंने आपसी सहमति से तलाक लेने और सभी विवादों का निपटारा करने पर सहमति जताई। समझौते के अनुसार, पति ने पत्नी को ₹1.5 करोड़ दो किश्तों में देने, ₹14 लाख कार खरीद के लिए देने और कुछ आभूषण सौंपने पर सहमति दी। वहीं, पत्नी ने संयुक्त व्यवसाय खाते से ₹2.5 करोड़ पति को ट्रांसफ...

अविवाहित सरकारी कर्मचारी-मृत्यु - अनुकम्पा नियुक्ति

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  अविवाहित सरकारी कर्मचारी की मृत्यु होने पर, अनुकंपा नियुक्ति उनके परिवार के आश्रित सदस्य को मिलती है। प्राथमिकता के क्रम में आमतौर पर माता-पिता या भाई-बहन (यदि अविवाहित सरकारी कर्मचारी पर पूरी तरह आश्रित हों) हकदार होते हैं या यदि मृतक व्यक्ति द्वारा किसी को अपने वारिस के तौर पर नामांकित किया गया हो तो वह हकदार होता है. यह नियुक्ति परिवार की आर्थिक मदद के लिए दी जाती है, न कि अधिकार के तौर पर।  ➡️ नगर पंचायत निदेशक बनाम एम जयबाल (2025) के केस में   भारत के सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ के न्यायमूर्ति मनमोहन व न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने इस तथ्यात्मक संरचना का उपयोग करते हुए, समेकित और सशक्त तरीके से, कानून के चार केंद्रीय सिद्धांतों को दोहराया: 1️⃣ अनुकंपा नियुक्ति कोई निहित अधिकार नहीं है , बल्कि यह अचानक आए वित्तीय संकट से निपटने के लिए दी जाने वाली एक बार की रियायत है । 2️⃣ एक बार आश्रित व्यक्ति अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का प्रस्ताव स्वीकार कर लेता है, तो विचार करने का अधिकार "पूर्ण" हो जाता है ; दोबारा मौका नहीं मिल सकता या " अनंत करुणा " का कोई अवसर नहीं हो सक...