संदेश

2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पत्नी पति की 25% नेट सैलरी की हर बार हकदार नहीं-इलाहाबाद हाई कोर्ट)

चित्र
 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गुज़ारा-भत्ते (मेंटेनेंस) को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि  पत्नी को पति की नेट सैलरी का 25% देना कोई तय नियम नहीं, बल्कि यह केवल एक सामान्य गाइडलाइन है। हर मामले में पति-पत्नी की आय, आर्थिक स्थिति, ज़रूरतों और परिस्थितियों के आधार पर भरण-पोषण की राशि तय की जानी चाहिए ।  इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि  तलाक के बाद भी यदि पत्नी ने दोबारा शादी नहीं की है और वह अपना गुज़ारा करने में सक्षम नहीं है, तो उसे मेंटेनेंस पाने का अधिकार बना रहता है। यह टिप्पणी कानपुर देहात के एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जहां फैमिली कोर्ट ने महिला को ₹12,000 मासिक गुज़ारा-भत्ता दिया था। हाई कोर्ट ने पाया कि पति की वास्तविक आय और महंगाई को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया था, जिसके बाद महिला का मासिक मेंटेनेंस ₹12,000 से बढ़ाकर ₹20,000 कर दिया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी को पति की नेट सैलरी का 25% हिस्सा गुजारा भत्ते (मेंटेनेंस) के रूप में देना कोई अनिवार्य नियम नहीं है। यह प्रतिशत केवल एक सामान्य दिशा-निर्देश (गाइडलाइन) है, और अदालतें दोनो...

विवादित जगह के पास जुमे की नमाज़ की इजाज़त-सुप्रीम कोर्ट

चित्र
  मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया. जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि  मामले का अंतिम फैसला होने तक मुस्लिम पक्ष को विवादित परिसर से सटी अलग खुली जगह पर हर शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच नमाज अदा करने की व्यवस्था की जाए किन्तु यह केवल अंतरिम व्यवस्था होगी और इससे मामले के अंतिम निर्णय पर कोई असर नहीं पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला मामले में निर्देश दिया है कि अंतिम फैसला आने तक मुस्लिम समुदाय को परिसर के अंदर नहीं, बल्कि उसके बाहर या उससे सटे किसी अलग खुले स्थान पर जुमे (शुक्रवार) की नमाज अदा करने की व्यवस्था की जाए。 शीर्ष अदालत ने यह अंतरिम आदेश मुस्लिम पक्ष द्वारा दायर की गई उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया है, जिसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें विवादित परिसर को देवी सरस्वती का मंदिर घोषित किया गया था。 सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: ⚫ नमाज़ के लिए समय: यह अनुमति केवल शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे ...

अगर पति पत्नि की तरह साथ रहे हैं तो भरण पोषण भी देना होगा - इलाहाबाद हाई कोर्ट

  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि  यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों और उनका वैवाहिक संबंध अन्य परिस्थितियों से स्थापित होता हो, तो भरण-पोषण (Maintenance) के दावे को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वैध विवाह का सख्त दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है। इस प्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों, तो पुरुष भरण-पोषण (Maintenance) देने से इनकार नहीं कर सकता। कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में भरण-पोषण के दावे को केवल वैध विवाह के ठोस दस्तावेजी प्रमाण न होने के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। ⚫ केस की डिटेल्स और महत्वपूर्ण बिंदु: पार्टीज के नाम: यह फैसला संतोष कुमार (पति) और उनकी पत्नी/महिला (चित्रकूट) के बीच के मामले में जस्टिस अचल सचदेव की बेंच द्वारा दिया गया। ⚫ तथ्य: महिला ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी कि 2017 में कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन के बाद वह पति के साथ रहने लगी थी, जिससे एक पुत्र भी हुआ। लेकिन फैमिली कोर्ट ने सख्त दस्तावेज (Marriage Certificate) न हो...

"लिव-इन में रह रही बेटी पिता से भरण-पोषण की हकदार नहीं - छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट

चित्र
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही बेटी द्वारा पिता से भरण-पोषण मांगने के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि  अगर कोई लड़की माता-पिता की मर्जी के खिलाफ अपने प्रेमी के साथ लिव-इन में रह रही है, तो उसे पिता से भरण-पोषण मांगने का कोई अधिकार नहीं है।  इसी आधार पर कोर्ट ने रायपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें पिता को हर महीने पांच हजार रुपये देने का निर्देश दिया गया था।  मामले के मुताबिक, रायपुर निवासी 24 वर्षीय अविवाहित युवती बिना किसी ठोस कारण के अपने परिवार से अलग रह रही है। पिता ने याचिका में बताया कि वह पेशे से ड्राइवर हैं, मासिक अड़तीस हजार रुपये कमाते हैं, और उनके अन्य बच्चे भी पढ़ाई कर रहे हैं जिनकी जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है।  पिता का कहना था कि बेटी उनकी मर्जी के खिलाफ प्रेमी के साथ लिव-इन में रहती है, इसलिए उससे उनका कोई संबंध नहीं बनता। हाईकोर्ट ने सभी साक्ष्यों और तर्कों पर विचार करते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश खारिज कर दिया और पिता के पक्ष को स्वीकार किया.  प्रस्तुति  शालिनी कौशिक  एडवोकेट...

तलाक के बाद भी घरेलू हिंसा की कार्यवाही रद्द नहीं-इलाहाबाद हाईकोर्ट

चित्र
 इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस बृज राज सिंह ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि  शादी के बाद हुआ तलाक का फैसला पति को विवाह के दौरान की गई घरेलू हिंसा के दायित्वों से मुक्त नहीं करता है। पति द्वारा घरेलू हिंसा की कार्यवाही को रद्द करने के लिए दायर याचिका को खारिज करते हुए एकल पीठ के जस्टिस बृज राज सिंह ने माना कि पत्नी अभी भी घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा और लाभ का दावा करने की हकदार है, क्योंकि यह कानून उन पुराने घरेलू संबंधों को भी शामिल करता है जहां दोनों पक्ष किसी भी समय एक साझा घर में साथ रहे हों। इस प्रकार इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादी के दौरान हुई घरेलू हिंसा के लिए पति की जिम्मेदारी तलाक की डिक्री (Decree of divorce) मिलने के बाद भी खत्म नहीं होती है。तलाक के बाद भी पत्नी घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा और राहत पाने की हकदार है。 ➡️ मामले का शीर्षक:  पुनीत रस्तोगी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, गृह विभाग के प्रमुख सचिव के माध्यम से, लखनऊ और अन्य वाद संख्याः एप्...

बिक्री विलेख पंजीकरण के लिए क्रेता-विक्रेता दोनों की व्यक्तिगत मौजूदगी अनिवार्य नही-इलाहाबाद हाई कोर्ट

चित्र
  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि उत्तर प्रदेश में बिक्री विलेख (Sale Deed) के पंजीकरण के लिए क्रेता और विक्रेता दोनों की एक साथ व्यक्तिगत मौजूदगी अनिवार्य नहीं है。  अदालत ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश में लागू पंजीकरण अधिनियम की धारा 32A केंद्रीय कानून से अलग है。 ⚫ निर्णय के पक्षकारों के नाम: यह ऐतिहासिक फैसला मीमांसा नांगिया एवं अन्य (क्रेता पक्ष) बनाम शिवानी हॉस्पिटल प्राइवेट लिमिटेड (विक्रेता पक्ष) मामले में सुनाया गया。 ⚫ निर्णय से जुड़ी मुख्य बातें: ✒️ वैकल्पिक उपस्थिति : यदि क्रेता या विक्रेता अपनी शारीरिक उपस्थिति दर्ज कराने में असमर्थ हैं, तो दस्तावेज का निष्पादन और पंजीकरण फिर भी वैध होगा。 ✒️ अनिवार्य शर्त: यदि विक्रेता (या उनके कानूनी उत्तराधिकारी) संपत्ति को फ्रीहोल्ड (Freehold) में बदलने का अपना दायित्व पूरा करते हैं और क्रेता अपनी पूरी राशि देने के लिए तैयार रहता है, तो अदालत क्रेता के पक्ष में डिक्री (Specific Performance) लागू कर सकती है。 ⚫ पंजीकरण अधिनियम, 1908 ( Registration Act, 1908) की धारा 32-क (Section 32-A) के तहत संपत्ति की रजिस्ट्री या किस...

केवल अनुबन्ध नहीं है हिन्दू विवाह, नोटरी मह्त्वहीन - मध्य प्रदेश हाई कोर्ट

चित्र
  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि  हिंदू विवाह को न तो केवल नोटरी कृत समझौते के आधार पर संपन्न माना जा सकता है और न ही ऐसे समझौते के जरिए वैध रूप से समाप्त किया जा सकता है। हिंदू कानून के तहत विवाह कोई अनुबंध नहीं है, इसलिए केवल नोटरीकृत विवाह समझौते से वैध विवाह नहीं माना जाएगा।  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह कोई कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) नहीं, बल्कि एक अटूट संस्कार है। इसलिए, केवल स्टाम्प पेपर पर नोटरी द्वारा प्रमाणित (Notarized) अनुबंध के जरिए न तो कोई हिंदू विवाह वैध माना जा सकता है और न ही उसे कानूनी रूप से समाप्त (तलाक) किया जा सकता है। ⚫ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के इस महत्वपूर्ण निर्णय (जहाँ अदालत ने कहा था कि हिंदू विवाह कोई अनुबंध नहीं है और नोटरी द्वारा तलाक या विवाह वैध नहीं है) में मुख्य याचिकाकर्ता राम कृपाल सिंह थे और प्रतिवादी मध्य प्रदेश राज्य (राज्य सरकार) थी | ➡️ मूल तथ्य और पक्षकार (Parties) इस प्रकार हैं: ⚫ अपीलकर्ता /याचिकाकर्ता: राम कृपाल सिंह (इन्होंने deceased/मृतक महिला सुमन बाई के पति होने का दावा किया ...

पति के लगातार दबाव में महिला का पति की संपत्ति मे हिस्सा माँगना भी दहेज की मांग - कलकत्ता हाई कोर्ट

चित्र
  कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि " किसी महिला को अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने का कानूनी अधिकार है, लेकिन यदि वह मांग पति के लगातार दबाव, उत्पीड़न या मजबूरी में की गई हो, तो उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304बी के तहत दहेज की मांग माना जा सकता है।" ➡️ कलकत्ता हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय -  ⚫ केस का नाम: सजल पारुई बनाम पश्चिम बंगाल राज्य ✒️ मुख्य पक्षकार (Parties) निम्नलिखित थे: ⚫ अपीलकर्ता/दोषी (Appellants/Convict):  मुख्य आरोपी सजल पारुई (पति) था। इसके अलावा सजल के पिता (हरेन्द्र चंद्र पारुई) और मां (रीना पारुई) भी अपीलकर्ता थे। ⚫ प्रतिवादी/शिकायतकर्ता (Respondent/Complainant):  मृतका (पीड़िता) का भाई (जिसने पहली बार FIR दर्ज कराई थी) और पश्चिम बंगाल राज्य इस मामले में प्रतिवादी थे। कलकत्ता हाई कोर्ट की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि भले ही एक महिला को पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने का कानूनी अधिकार है, लेकिन यदि यह मांग पति के लगातार दबाव और उत्पीड़न के कारण की गई हो, तो इसे 'दहेज की मांग' माना जा सकता है। द्वारा  शालिन...

वकील के लिए मुवक्किल की स्पष्ट लिखित अनुमति आवश्यक-सुप्रीम कोर्ट

चित्र
यह महत्वपूर्ण फैसला ' कृष्णा कुमार ओझा और अन्य बनाम जितेंद्र चौधरी और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया है। इस मामले से जुड़ी मुख्य जानकारियां और पक्षकारों का विवरण निम्नलिखित है: ⚫ वादकारी (पार्टियां):  यह मामला मूल रूप से 1989 के एक संपत्ति और विभाजन विवाद से जुड़ा है, जिसमें मूल वादियों (Plaintiffs) के कानूनी वारिस अपीलकर्ता थे और दूसरे पक्ष के रूप में जितेंद्र चौधरी व अन्य प्रतिवादी थे। ⚫ मामले की पृष्ठभूमि:  1989 में संपत्ति के बंटवारे को लेकर मुकदमा शुरू हुआ था। निचली अदालत और पटना हाईकोर्ट ने एक 28 साल पुरानी समझौता डिक्री (Compromise decree) को रद्द कर दिया था, जिसके खिलाफ वादियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। ⚫ सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:  सुप्रीम कोर्ट (न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ) ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। ⚫ तथ्य :  समझौता केवल वकील के हस्ताक्षर या सहमति के आधार पर किया गया था, जिसमें पक्षकारों (Clients) की स्पष्ट लिखित अनुमति या हस्ताक्षर नहीं थे। ⚫ फैसले का आधार:  सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कि...

लव जिहाद में भी भरण पोषण-मध्य प्रदेश हाई कोर्ट

चित्र
  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और बाद में उत्पीड़न से जुड़े एक 'लव जिहाद' मामले में जून 2026 में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।  इस प्रकरण में शामिल मुख्य पक्षों के नाम निम्नलिखित हैं: याचिकाकर्ता (पीड़िता/पत्नी): एक हिंदू महिला प्रतिवादी (पति): मुस्तफा बोहरा उर्फ गब्बर (बोहरा मुस्लिम समुदाय ) मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर बेंच) के इस मामले में पीड़ित महिला (पत्नी) और उनकी नाबालिग बेटी याचिकाकर्ता (याचिकाकर्ता 1 और 2) हैं, और महिला के पति (एक मुस्लिम व्यक्ति जो हिंदू बनकर रहा था) इस मामले में प्रतिवादी (Respondent) हैं। अदालत की गोपनीयता बनाए रखने के लिए कानूनी दस्तावेजों में उनका नाम गुप्त रखा गया है। मामले से जुड़े मुख्य पक्ष और तथ्य: याचिकाकर्ता (पीड़िता और उसकी बेटी): पत्नी ने आरोप लगाया था कि 23 फरवरी 2020 को कोरोना लॉकडाउन के दौरान एक मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह किया था। पति ने खुद को हिंदू बताया था। बाद में गर्भावस्था के दौरान महिला को पता चला कि उसका पति एक मुस्लिम व्यक्ति था (कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में उसका नाम 'गब्बर उर्फ ...

कल्याणकारी योजना के तहत घर मिलना 125 के तहत गुजारा भत्ता नहीं-इलाहाबाद हाईकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि  किसी कल्याणकारी योजना के तहत महिला को घर मिलना उसकी आजीविका का साधन नहीं माना जा सकता, जिससे वह अपने पति से CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा-भत्ता मांगने के अधिकार से वंचित हो जाए।  जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने यह भी कहा कि   पति केवल यह कहकर अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने की कानूनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह बेरोज़गार है या बहुत कम कमाता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने पति द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिविज़न याचिका खारिज की।  इस याचिका में फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें उसे अपनी अलग रह रही पत्नी (प्रतिवादी नंबर 2) को 5,000 रुपये गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। रिविज़न याचिका दायर करने वाले पति का कहना था कि वह अनपढ़ है और ड्राइवर के तौर पर काम करता है, जिससे वह महीने में लगभग 5,000 रुपये कमाता है, लेकिन अभी वह बेरोज़गार है। यह भी कहा गया कि उसकी पत्नी (विपक्षी पार्टी नंबर 2) सिलाई-कढ़ाई का काम करके कमाती है और उसे प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर भी मिला है। याचिकाकर्ता पति के अनुसार,...

सदस्यता के नाम पर बार वकील को प्रेक्टिस से नहीं रोक सकती-तेलंगाना हाईकोर्ट

चित्र
  तेलंगाना हाईकोर्ट (Telangana High Court) के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, बार एसोसिएशन की सदस्यता पूरी तरह से स्वैच्छिक है। यदि कोई वकील किसी बार एसोसिएशन का सदस्य नहीं है, तो भी उसे अदालत में वकालत (practice) करने से नहीं रोका जा सकता। बार एसोसिएशन वकीलों के काम करने के अधिकार पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकते。 ➡️ इस केस से जुड़ी मुख्य बातें: ⚫ याचिकाकर्ता (Petitioner):  विजय गोपाल (Vijay Gopal), जो स्वयं एक एडवोकेट (Party-in-Person) थे。 ⚫ प्रतिवादी (Respondents): बार काउंसिल ऑफ इंडिया (Bar Council of India - Respondent No. 1)。 बार काउंसिल ऑफ स्टेट ऑफ तेलंगाना (Bar Council of Telangana - Respondent No. 2)。 ➡️ निर्णय के मुख्य बिंदु: इस मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के सर्टिफिकेट एंड प्लेस ऑफ प्रैक्टिस (वेरिफिकेशन) रूल्स, 2015 के नियम 6 (Rule 6) को सीमित करते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा कि  वकीलों के लिए बार एसोसिएशन की सदस्यता अनिवार्य नहीं की जा सकती और सदस्यता न होने पर किसी वकील को कानून की प्रैक्टिस करने से रोका या अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।  बार काउंसिल ऑफ इंडिया स...

हत्यारोपी परिवार का सदस्य अनुकम्पा नियुक्ति से वंचित नहीं - सुप्रीम कोर्ट

चित्र
 सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि   यदि किसी मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार के किसी सदस्य पर हत्या का आरोप है, तो उसे मिलने वाली 'अनुकंपा नियुक्ति' (Compassionate Appointment) को सिर्फ इस आधार पर नहीं रोका जा सकता, क्योंकि नियमों में नौकरी पर रोक का कोई प्रावधान नहीं है। मामले से जुड़े दोनों पक्षों (दोनों Parties) की विस्तृत जानकारी इस प्रकार है: 1. याचिकाकर्ता (Appellant):  अतुल चौहान परिचय :  अतुल चौहान मृतक सरकारी कर्मचारी (गजेंद्र सिंह चौहान) के बेटे हैं। मुद्दा :  उनके पिता की मृत्यु के बाद, अतुल ने अनुकंपा के आधार पर नौकरी (Compassionate Job) के लिए आवेदन किया था। विवाद की वजह:  हरियाणा सरकार के अधिकारियों ने उनकी नियुक्ति को इसलिए लंबित रखा क्योंकि अतुल की मां पर उनके पिता की हत्या की साजिश रचने का आरोप था और उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। मां और भाई द्वारा अपने अधिकार अतुल के पक्ष में छोड़ने के बावजूद अधिकारियों ने उसे नौकरी देने से मना कर दिया था। 2. प्रतिवादी (Respondent):  राज्य सरकार (हरियाणा) और अधिका...

वकीलों, दस्तावेज लेखकों और स्टाम्प वेंडर्स की रोटी छीन लेगी ई रजिस्ट्री

चित्र
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जून 2026 मे ई रजिस्ट्री प्रणाली लागू की गई है और मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पूरे उत्तर प्रदेश में इसका विरोध आरंभ हो गया है. कासगंज जिले में रजिस्ट्रीकरण की नई ई-पंजीकरण व्यवस्था का विरोध तेज हो गया है। इस व्यवस्था के लागू होने पर दस्तावेज लेखकों, अधिवक्ताओं और स्टाम्प विक्रेताओं ने आपत्ति जताई है। उन्होंने कार्य बहिष्कार शुरू कर दिया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इससे उनकी आजीविका पर संकट खड़ा हो सकता है। उनका पारंपरिक कार्य भी प्रभावित होगा। संगठन ने अधिसूचना को वापस लेने की मांग की है।   सोमवार को बार एसोसिएशन मुजफ्फरनगर जिले की बुढ़ाना तहसील के सभागार में पांच प्रमुख संघों की संयुक्त बैठक आयोजित की गई, जिसमें सर्वसम्मति से 16 जून से अनिश्चितकालीन कलमबंद हड़ताल और कार्य बहिष्कार का निर्णय लिया गया। इस आंदोलन में बार एसोसिएशन के साथ दस्तावेज लेखक संघ, स्टाम्प विक्रेता, टाइपिस्ट और फोटो स्टेट संघ भी शामिल हैं। संयुक्त प्रस्ताव के अनुसार, हड़ताल के दौरान न तो न्यायालयों में कोई कार्य होगा और न ही स्टाम्प की बिक्री की जाएगी। इसके अलावा शपथ पत्र, नोटर...

SELECTED ADVOCATES के लिए है QR CODE SYSTEM

चित्र
 बार काउन्सिल ऑफ उत्तर प्रदेश द्वारा अधिवक्ताओं के लिए रजिस्ट्रेशन और COP certificate प्राप्त करने के लिए QR CODE SYSTEM जारी किया गया है और अब इस सिस्टम को बार काउन्सिल ऑफ उत्तर प्रदेश ने अपनी official website पर भी जगह दे दी है, किन्तु कुल मिलाकर देखा जाए तो ये प्रक्रिया केवल SELECTED ADVOCATES के लिए ही तैयार की गई है. अब आप जानिए इससे अपना रजिस्ट्रेशन कार्ड और COP CERTIFICATE प्राप्त करने का तरीका. सबसे पहले आप गूगल ब्राउजर मे Upbarcouncil.com लिखकर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की official website open कीजिए.  अब आप इसके बाद वेबसाइट की RIGHT SIDE का second option देखिए जिस पर नीला तीर लगाया गया है, इस पर क्लिक कीजिए इस पर क्लिक करते ही आपके सामने ये नई window open हो जाएगी जिसमें आपको एक QR CODE और उसके नीचे UPBARCOUNCIL. COM लिखा हुआ दिखाई देता है अब आपकी सुविधा के लिए QR CODE को RED SQUARE में और VISIT UPBARCOUNCIL.COM को blue circle में कवर किया गया है  और QR CODE को 1️⃣ नंबर और UPBARCOUNCIL.COM को 2️⃣ नंबर दिया गया है.  जिन्हें SCAN या क्लिक करने पर आपको ये WI...

भरण पोषण के लिए पत्नी पति की पेंशन नहीं रुकवा सकती - मद्रास हाईकोर्ट

चित्र
मद्रास हाईकोर्ट ने अपने हालिया निर्णय (जिसमें पत्नी द्वारा पति की पेंशन रोकने की मांग को खारिज किया गया था) में कहा  "हाईकोर्ट को निष्पादन अदालत या फैमिली कोर्ट नहीं बनाया जा सकता। यदि याचिकाकर्ता भरण-पोषण मामले में सफल हुई है तो आदेश के पालन के लिए उसे उचित कानूनी कार्यवाही शुरू करनी होगी। वह इस रिट याचिका के माध्यम से न तो आदेश का क्रियान्वयन करा सकती है और न ही पति-पत्नी के विवाद का निपटारा करवा सकती है।" ➡️ प्रमुख पक्ष और विवरण : ✒️ याचिकाकर्ता (पत्नी): राजम्मल (Rajammal) ✒️ प्रतिवादी 1 (पति): एन. तमिलमणि (N. Tamilmani) ✒️ प्रतिवादी 2: तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम (Tamil Nadu State Transport Corporation ➡️ मामले से जुड़ी मुख्य बातें:विवाद:  पत्नी ने अदालत में याचिका दायर कर मांग की थी कि उसके पति के सेवानिवृत्ति लाभ (पेंशन और अन्य फंड) जारी करने पर रोक लगा दी जाए, क्योंकि पति ने अदालत द्वारा आदेशित भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की राशि का भुगतान नहीं किया था। ➡️ अदालत का निर्णय:  जस्टिस मुम्मिनेनी सुधीर कुमार ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि हाईकोर्ट को 'फैमिली कोर्ट' या...

एडवोकेट /न्यायालय कर्मचारी भी नहीं कर सकते अशोक स्तम्भ DP रूप में प्रयोग

चित्र
  आज सोशल मीडिया का युग है. ऐसे मे WhatsApp, Facebook, Instagram आदि सोशल मीडिया अकाउंट का DP अपनी पहचान के लिए सुन्दर सजाया जाता है. ऐसे में कितने ही यूजर भारत के राष्ट्रीय प्रतीक (अशोक स्तम्भ) का प्रयोग अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर DP के रूप में कर रहे हैं जबकि भारत के राष्ट्रीय प्रतीक (अशोक स्तंभ) का उपयोग आम नागरिकों द्वारा सोशल मीडिया प्रोफाइल पिक्चर (DP) के रूप में नहीं किया जा सकता है। यह प्रतीक भारत सरकार की आधिकारिक मुहर है, जिसका उपयोग State Emblem of India (Prohibition of Improper Use) Act, 2005 के तहत विनियमित होता है और निजी उपयोग के लिए प्रतिबंधित है। ➡️ एडवोकेट द्वारा अशोक स्तम्भ का DP के रूप में प्रयोग -  एक एडवोकेट (वकील) के रूप में अशोक स्तंभ (राष्ट्रीय प्रतीक) को व्यक्तिगत सोशल मीडिया अकाउंट (जैसे WhatsApp, Facebook, X आदि) की DP के रूप में इस्तेमाल करना गैर-कानूनी है।एडवोकेट होने के नाते आप इसे अपनी DP या विजिटिंग कार्ड पर इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि: ⚫ निजी पहचान: सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करने से ऐसा आभास होता है मानो आप आधिकारिक तौर पर भा...

होम मेकर राष्ट्र निर्माता - सुप्रीम कोर्ट

चित्र
  सड़क हादसे में गृहणी (होममेकर) की मृत्यु होने पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उनके घरेलू योगदान का मूल्य कम से कम ₹30,000 प्रतिमाह तय किया है।  मोटर दुर्घटना के दावों से जुड़ी अपील पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने कहा कि  होममेकर का योगदान घर से कहीं आगे तक जाता है और देश-निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवज़ा तय करते समय होममेकर की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को होने वाले घरेलू देखभाल के नुकसान को अलग से मान्यता दी जानी चाहिए। ➡️ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु: ⚫ घरेलू देखभाल का नुकसान:  सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) के तहत दुर्घटना का मुआवजा तय करते समय, 'घरेलू देखभाल के नुकसान' (Loss of Domestic Care) को मुआवजे की एक अलग और स्वतंत्र श्रेणी माना जाएगा। ⚫ न्यूनतम आय का निर्धारण:  गृहणी द्वारा परिवार के लिए किए जाने वाले कार्य (खाना बनाना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, घर का प्रबंधन आद...

एलआईसी कर्मी नहीं करेंगे जनगणना ड्यूटी - इलाहाबाद हाई कोर्ट

चित्र
  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एलआईसी नॉर्थ सेंट्रल जोन की याचिका पर सुनवाई की। जस्टिस सलील कुमार राय और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के करते हुए कहा कि जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 7(सी) के तहत किसी संस्थान के कर्मचारियों से केवल उसी संस्थान के परिसर के भीतर जनगणना कार्य में सहायता ली जा सकती है। संस्थान के बाहर वहां के कर्मचारियों से सहायता नहीं ली जा सकती है।  जनगणना अधिनियम की धारा 7(सी) मे कहा गया है कि  राज्य सरकार या उसके अधिकृत अधिकारी किसी संस्थान, फर्म या फैक्ट्री के कर्मचारियों से जनगणना कार्य में सहायता ले सकते हैं, लेकिन यह सहायता केवल उस संस्थान या प्रतिष्ठान के परिसर के भीतर की जनगणना गतिविधियों तक सीमित है। प्रस्तुति  शालिनी कौशिक  एडवोकेट  कैराना (शामली) 

विवाहित पुत्री को अनुकम्पा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता -सुप्रीम कोर्ट

इस ऐतिहासिक मामले ( मामले का शीर्षक: कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य) में मुख्य याचिकाकर्ता कुलसुम निशा थीं और प्रतिवादी उत्तर प्रदेश सरकार ( एवं संबंधित प्राधिकरण ) थे। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था। ➡️ मामले के मुख्य पक्षकार (Parties): ⚫ याचिकाकर्ता (Petitioner):  कुलसुम निशा ( Kulsum Nisha ) ⚫ प्रतिवादी (Respondents):  उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य ( State of Uttar Pradesh & Ors. ) ⚫ विवाद का मुख्य कारण: उत्तर प्रदेश सरकार के वर्ष 2019 के शासनादेश में अनुकंपा नियुक्ति के लिए "परिवार" की परिभाषा में अविवाहित, तलाकशुदा और विधवा बेटियों को तो शामिल किया गया था, लेकिन विवाहित बेटियों को बाहर रखा गया था। याचिकाकर्ता कुलसुम निशा (जिनकी माता की मृत्यु के बाद उन्हें उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस नहीं दिया गया था) ने इसी नियम को चुनौती दी थी।सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय:न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के इस नियम को रद्द कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि मात्र विवाह हो जाने के आधार ...

राजनीतिक आकाओं को खुश करने में लगी यू पी पुलिस - इलाहाबाद हाई कोर्ट

चित्र
  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि  राज्य के पुलिस अधिकारी संविधान के प्रति वफादार होने के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए काम करते हैं। अदालत ने यूपी गैंगस्टर एक्ट के दुरुपयोग और बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के की जाने वाली गिरफ्तारियों पर गहरी चिंता जताई। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर द्वारा गाजियाबाद के एक मामले की सुनवाई करते हुए 31 पन्नों के विस्तृत फैसले में दी गई ।     मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने यह कड़ी टिप्पणियां गाजियाबाद के निवासी राजेंद्र त्यागी द्वारा उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986 के संबंध में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं। सुप्रीम कोर्ट भी इस 1986 के अधिनियम से जुड़े मुद्दों पर विचार कर रही है, इसलिए जस्टिस दिवाकर ने इस मामले में कोई अंतिम फैसला सुनाने से परहेज किया। इस मामले से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं: ⚫ संविधान से ऊपर सत्ता: कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की निष्ठा संविधान के प्रति न होकर सत्ताधारी द...

तब्लीगी जमात को लेकर यू पी में हाई अलर्ट

चित्र
 उत्तर प्रदेश में सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों ने तब्लीगी जमात की गतिविधियों और मस्जिदों में बाहर से आने वाले लोगों की आवाजाही पर कड़ी निगरानी रखी हुई है। संवेदनशील जिलों में बिना पूर्व सूचना के आने वाली जमातों को वापस भेजने तथा पुलिस थानों में उनका पूरा सत्यापन (Verification) अनिवार्य करने के सख्त निर्देश जारी किए गए हैं। ➡️ जमात और बाहरी लोगों को लेकर यूपी में क्या निर्देश हैं? 1️⃣ 24 घण्टे मे अनिवार्य सत्यापन (Verification): मस्जिदों या धार्मिक स्थलों में बाहर से आने वाले किसी भी जमाती या समूह को ठहरने से पहले स्थानीय पुलिस या खुफिया विभाग (LIU) को पूरी जानकारी देनी होगी। राज्य में आने वाली सभी जमातों और उनमें शामिल होने वाले लोगों का 24 घंटे के भीतर अनिवार्य रूप से सत्यापन (Verification) किया जाएगा. 2️⃣ जानकारी देना आवश्यक: रुकने वाले लोगों का नाम, पूरा पता, आधार कार्ड या पहचान पत्र, और ठहरने का कारण पुलिस को बताना होगा। जमात से जुड़े हर व्यक्ति को अपने पहचान पत्र और जरूरी दस्तावेज दिखाने होंगे. पुलिस यह जांच करेगी कि वे किस उद्देश्य से आए हैं और कितने दिनों तक रुकेंगे.  3...

वैवाहिक विवादों में पाक्सो ऐक्ट का दुरुपयोग वैवाहिक मुकदमों का बदसूरत पहलू - सुप्रीम कोर्ट

चित्र
 सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पति और उसके परिवार को फंसाने के लिए पॉक्सो (POCSO) एक्ट का दुरुपयोग करने की बढ़ती प्रवृत्ति को "वैवाहिक मुकदमों का बदसूरत पहलू" (Uglier Side Of Matrimonial Litigation) करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कई मामलों में नाबालिग बच्चों, विशेषकर बेटियों, का इस्तेमाल प्रतिशोध लेने, अधिक आर्थिक समझौता हासिल करने या दूसरे पक्ष पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है। बच्चों का इस्तेमाल प्रतिशोध लेने या दबाव बनाने के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। ➡️ केस की डिटेल्स और पार्टी का विवरण (Case Details): ⚫ केस का नाम : ईश्वर चंद शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Ishwar Chand Sharma vs State Of U.P.) ⚫ फैसले की तारीख: 29 मई 2026 ⚫ बेंच: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां ⚫ पार्टियां (Parties Involved): ✒️ अपीलकर्ता (Appellants / आरोपी): ईश्वर चंद शर्मा (पति) और उनके परिवार के सदस्य ✒️ प्रतिवादी (Respondents): उत्तर प्रदेश राज्य और उनकी पत्नी (शिकायतकर्ता) ⚫ मामले के मुख्य बिंदु: पत्नी ने अपने पति और ससुराल वालों पर अपनी 14 वर्षीय नाबाल...

दूसरे वकील को आवंटित चैंबर का इस्तेमाल करने वाले वकील का कैसा अधिकार -सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले में दखल देने से इनकार किया, जिसमें कहा गया था कि  बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" या राज्य की कोई संस्था नहीं है, क्योंकि यह वकीलों का एक निजी निकाय है जो सार्वजनिक कार्य नहीं करता। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने वकील संगीता राय द्वारा दायर SLP (विशेष अनुमति याचिका) को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि पटियाला कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन को दी जाए। कोर्ट ने एक चैंबर पर कब्ज़े को लेकर हुए विवाद पर रिट याचिका दायर करने के लिए राय की आलोचना की। जस्टिस नरसिम्हा ने टिप्पणी की, "सिर्फ़ इसलिए कि आपको वकील होने का विशेषाधिकार मिला है, आपके हर काम को अधिकार के तौर पर नहीं देखा जाएगा। हम किसी अन्य मुवक्किल की याचिका पर भी विचार नहीं करते। वकीलों को दो कदम पीछे और दो कदम नीचे रहना चाहिए, इस अर्थ में कि आप वकील होने के विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए आपके कंधों पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी ...

दहेज हत्या में उम्रकैद दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में ही - इलाहाबाद हाइकोर्ट लखनऊ खंडपीठ

चित्र
  इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि  IPC की धारा 304-B ​​के तहत दहेज हत्या के अपराध के लिए अधिकतम सज़ा, यानी आजीवन कारावास, को "सामान्य प्रक्रिया" के तौर पर नहीं थोपा जाना चाहिए। इसके बजाय, यह 'कठोरतम' सज़ा केवल "दुर्लभतम से दुर्लभ" मामलों में ही दी जानी चाहिए। जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने 2012 के एक दहेज हत्या मामले में पति और उसके माता-पिता की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की। हालांकि, खंडपीठ ने 'आनुपातिक सज़ा' के सिद्धांत को लागू करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उनकी सज़ाओं को कम किया। ट्रायल कोर्ट ने सास को आजीवन कारावास और पति व ससुर को 20 साल की सज़ा सुनाई थी; खंडपीठ ने इस सज़ा को घटाकर उस अवधि के बराबर कर दिया, जितनी अवधि वे पहले ही जेल में बिता चुके थे। खंडपीठ के सामने मुख्य सवाल यह था कि  " क्या मौजूदा मामले की परिस्थितियों में आजीवन कारावास की कठोरतम सज़ा देना उचित है?" हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि  IPC की धारा 304-B ​​के तहत दोष/अपराध मुख्य रूप से साक्ष्य अधिनियम (Evide...