संदेश

2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अब मुँह भी नहीं खोल पाएगा स्वतंत्र भारद्वाज - दिल्ली कोर्ट

चित्र
  मीडिया में अपने राजनीतिक दबदबे का बखान करने वाले स्वतंत्र भारद्वाज अब मुँह भी नहीं खोल पाएंगे. दिल्ली कोर्ट ने स्वतंत्र भारद्वाज को तीन हफ़्ते की अंतरिम ज़मानत देते हुए उसे सोशल मीडिया पर केस से जुड़ी कोई भी चीज़ पोस्ट या शेयर करने से रोक दिया, जिसमें उनके बचाव में कही गई बातें भी शामिल हैं। विस्तृत आदेश में जज ने कहा कि   डिजिटल युग में पीड़ित को डराने-धमकाने के लिए शारीरिक रूप से पास होना ज़रूरी नहीं है, क्योंकि सोशल मीडिया पर कथित मारपीट के बारे में सार्वजनिक बयान और डींगें ज़्यादा लोगों तक और लंबे समय तक पीड़ितों और गवाहों तक पहुँच सकती हैं।  कोर्ट ने निर्देश दिया कि  अंतरिम ज़मानत की अवधि के दौरान भारद्वाज किसी भी सार्वजनिक मंच पर केस, अपने बचाव, या शिकायतकर्ता और उसेके परिवार से संबंधित कोई भी बयान, वीडियो, पॉडकास्ट, इंटरव्यू, रील या पोस्ट न तो बनाएगा, न प्रकाशित करेगा, न अपलोड करेगा और न ही शेयर करेगा। कोर्ट ने कहा,  “रिकॉर्ड में जिस एक आशंका को बल मिलता है, वह यह है कि शिकायतकर्ता और गवाहों को प्रभावित किया जा सकता है। यह जोखिम शारीरिक रूप से संपर्क कर...

ST का दर्जा.... सबूत जरूरी-इलाहाबाद हाईकोर्ट

चित्र
  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि  किसी दूसरे धर्म में धर्म परिवर्तन करने से ही किसी व्यक्ति का 'अनुसूचित जनजाति' (ST) का दर्जा अपने आप खत्म नहीं हो जाता..... कोई व्यक्ति ST का सदस्य बना रहता है या नहीं, यह तथ्यों पर निर्भर करता है। इसका फैसला आदिवासी पहचान की ज़रूरी विशेषताओं की जांच करके किया जाएगा, जिसमें पारंपरिक रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित आदिवासी समुदाय द्वारा स्वीकार्यता शामिल है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने एक महत्वपूर्ण Nanhki @ Naimunnisha vs. State of U.P. and 3 others मामले के निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल धर्म परिवर्तन या अंतर-धार्मिक विवाह से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा स्वतः समाप्त नहीं होता है।  साक्ष्यों की आवश्यकता:  यदि किसी व्यक्ति के जनजातीय दर्जे पर विवाद होता है, तो यह जांच की जाएगी कि क्या वह व्यक्ति अभी भी उस जनजाति की संस्कृति, रीति-रिवाजों और समुदाय से जुड़ा हुआ है या नहीं. भूमि हस्तांतरण मामला: इस मामले में याची ने मुस्लिम व्यक्ति से विवाह और पहचान अपनाने के बाद कृषि भूमि की खरीद से जुड़े...

बार एसोसिएशन की सदस्यता रिट क्षेत्राधिकार नहीं - इलाहाबाद हाई कोर्ट

चित्र
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि बार एसोसिएशन (Bar Association) की सदस्यता, निलंबन या किसी सदस्य को संगठन से बाहर करने से जुड़े विवाद मूल रूप से निजी प्रकृति के होते हैं और ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय (maintainable) नहीं है।  ⚫ मुख्य पक्षकार (Parties)याचिकाकर्ता (Petitioner):  लाल बिहारी वर्मा (Lal Bihari Verma)  ⚫ प्रतिवादी (Respondents):  उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य, सेंट्रल बार एसोसिएशन (तहसील गोला गोकर्णनाथ, जिला लखीमपुर खीरी)  ⚫ पीठ (Bench):  न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ (Justice Shekhar B. Saraf) और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी (Justice Abdhesh Kumar Chaudhary) की खंडपीठ  ➡️ निर्णय की मुख्य बातें और निष्कर्ष ⚫ रिट याचिका खारिज:  अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा सेंट्रल बार एसोसिएशन के उस आदेश (प्रेस विज्ञप्ति दिनांक 12 जून 2026) को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसके तहत उन्हें एक साल के लिए बार एसोसिएशन की सदस्यता से वंचित (debar) कर दिया गया था।  ⚫ निजी प्रकृति का ...

फैमिली पेंशन कोई सरकारी खैरात या कृपा नहीं-सुप्रीम कोर्ट

चित्र
सुप्रीम कोर्ट ने Maya Banerjee v. Union of India & Ors. मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि फैमिली पेंशन कोई सरकारी खैरात या कृपा नहीं, बल्कि एक मूल्यवान कानूनी अधिकार और संपत्ति है।  ⚫ मुख्य पक्षकार (Case Parties)अपीलकर्ता (Petitioner/Widow): माया बनर्जी (Maya Banerjee), जो एक दिवंगत रेलवे कर्मचारी की विधवा हैं।  ⚫ प्रतिवादी (Respondents):  यूनियन ऑफ़ इंडिया एवं अन्य (रेलवे प्रशासन)।  ➡️ मामले से जुड़ी मुख्य डिटेल्स और कोर्ट का निर्णय ⚫ पति की मृत्यु की तिथि:  12 नवंबर 2000।  ⚫ अधिकार की तिथि:  सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि विधवा को फैमिली पेंशन सीमित अवधि के बजाय उसके पति की मृत्यु की वास्तविक तिथि (12 नवंबर 2000) से दी जानी चाहिए।  ⚫ बकाया और ब्याज:  कोर्ट ने आदेश दिया कि पूरे बकाए का भुगतान 6% वार्षिक ब्याज के साथ अगले तीन महीनों के भीतर किया जाए।  ⚫ देरी पर टिप्पणी:  अदालत ने कहा कि यदि पेंशन मिलने में देरी के लिए विधवा किसी भी प्रकार से जिम्मेदार नहीं है, तो केवल अदालतों या ट्रिब्यूनल में याचिका दायर ...

एसपी और थानाध्यक्ष (SHO) 'झूठों का झुंड'-इलाहाबाद हाईकोर्ट

चित्र
  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के गौरी बाजार थाने में चार लोगों को अवैध हिरासत में रखने के मामले में एसपी और थानाध्यक्ष (SHO) को 'झूठों का झुंड' कहा है। ➡️ केस की मुख्य बातें: ⚫ घटना : 13 से 24 अप्रैल, 2026 के बीच चार लोगों (अर्चना गौड़, नंदिनी गौड़, इन्नी और महेंद्र गौड़) को गौरी बाजार थाने में अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया था।  ⚫ याचिका : यह मामला महेंद्र गौड़ की बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका के जरिए हाई कोर्ट पहुंचा था। ⚫ सीसीटीवी फुटेज गायब: सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने थाने के सीसीटीवी फुटेज मांगे, तो पुलिस ने दलील दी कि बिजली न होने और जनरेटर खराब होने के कारण रिकॉर्डिंग नहीं हो सकी।  ⚫ कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ (न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत) ने पुलिस की इस सफाई को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जो थानेदार जनरल डायरी (GD) की सही एंट्री या सीसीटीवी का बैकअप नहीं रख सकता, उसे नौकरी में रहने का अधिकार नहीं है। जब एसपी ने माफी मांगनी चाही, तो कोर्ट ने कहा कि माफी अदालत से नहीं बल्क...

100 साल पुरानी शाही मस्जिद का एक हिस्सा सड़क चौड़ीकरण के लिए हटाने की अनुमति-मध्य प्रदेश हाई कोर्ट

चित्र
  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उज्जैन में महाकाल मंदिर के पास स्थित शाही मस्जिद के एक हिस्से को हटाकर सड़क चौड़ी करने के नगर निगम के फैसले को चुनौती देने वाली दो याचिकाएं खारिज कर दी । कोर्ट ने कहा कि  नगर निगम ने संबंधित कानूनी प्रावधानों का पालन करते हुए और मस्जिद का प्रबंधन करने वाले लोगों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर देने के बाद कार्रवाई की। जस्टिस संदीप एन. भट्ट की पीठ ने कहा कि प्रस्तावित कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300-ए का उल्लंघन नहीं करती। कोर्ट ने 2028 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ, करोड़ों श्रद्धालुओं की संभावित आवाजाही, यातायात व्यवस्था और मस्जिद की स्थिति को भी ध्यान में रखा।..... शाही मस्जिद महाकालेश्वर मंदिर के लगभग सामने और क्षिप्रा नदी के बेहद करीब स्थित है। सिंहस्थ के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही को देखते हुए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने और यातायात प्रबंधन के लिए सड़क चौड़ीकरण जरूरी है। पीठ ने कहा कि बड़े जनहित और सार्वजनिक सुरक्षा को देखते हुए नगर निगम की कार्रवाई कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के बाद की गई। मध्य प्रदेश हाईको...

सहारनपुर मस्जिद ध्वस्तीकरण

चित्र
 

अनुकम्पा नियुक्ति सदैव स्थायी-इलाहाबाद हाईकोर्ट

चित्र
  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मृतक आश्रित कोटे (अनुकम्पा नियुक्ति) के तहत मिलने वाली सरकारी नौकरी हमेशा स्थायी और नियमित प्रकृति की होती है।  विभाग द्वारा नियुक्ति पत्र (Joining Letter) में 'पूर्णतः अस्थायी सेवा' (Temporary) की शर्त जोड़ना पूरी तरह गैरकानूनी और स्थापित विधिक सिद्धांतों के विपरीत है।  ➡️ इस व्यवस्था की पूरी केस डिटेल्स और कानूनी स्थिति निम्नलिखित है: ⚖️ केस डिटेल्स (Case Details) ⚫ केस का नाम: सपना सारस्वत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य ⚫ सुनवाई करने वाली अदालत: इलाहाबाद हाईकोर्ट (माननीय न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ) ⚫ फैसले की तिथि: सितंबर 2026   ⚫ मामले की पृष्ठभूमि:  आगरा की रहने वाली सपना सारस्वत ने अपने पिता (जो कि एक सरकारी कर्मचारी थे) की सेवाकाल के दौरान मृत्यु होने के बाद मृतक आश्रित कोटे के तहत नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद विभाग ने उन्हें 27 अगस्त 2026 को नियुक्ति पत्र जारी किया।  ⚫ मुख्य विवाद :नियुक्ति पत्र की शर्त संख्या-1 में विभाग ने यह लिख दि...

उपाध्याय समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर भी रामभद्राचार्य पर FIR नहीं-इलाहाबाद हाई कोर्ट

चित्र
  जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा उपाध्याय, चौबे, पाठक और दीक्षित जैसी ब्राह्मण उपजातियों/समुदायों के संदर्भ में 'नीच' या 'अधम' जैसे शब्दों का उपयोग करने, साथ ही चारों शंकराचार्यों के खिलाफ भी आपत्तिजनक टिप्पणी के आरोप पर याचिकाकर्ता रमेश उपाध्याय एडवोकेट द्वारा FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है।  ➡️  विवाद और कानूनी केस की मुख्य बातें : ⚫ . विवाद का मुख्य कारण (विवादित बयान) सोशल मीडिया और यूट्यूब पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य का एक बयान/वीडियो प्रसारित हुआ था। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस वीडियो में उन्होंने उपाध्याय, चौबे, पाठक और दीक्षित जैसी ब्राह्मण उपजातियों/समुदायों के संदर्भ में 'नीच' या 'अधम' जैसे शब्दों का उपयोग किया था। इसके साथ ही उन पर चारों शंकराचार्यों के खिलाफ भी आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगा। इन बयानों से उपाध्याय समुदाय के लोगों की भावनाएं आहत हुईं और उन्होंने इसे समाज का अपमान माना। ⚫ . रामभद्राचार्य का स्पष्टीकरण विवाद बढ़ने पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने वृंदावन में इस पर अपना स्पष्टीकरण दिया। उन...

गैर कानूनी है न्यायालय परिसर में बार एसोसिएशन कार्यकारिणी सदस्यों का नाम फोटो सहित बैनर

चित्र
  न्यायालय परिसर में बार एसोसिएशन के कार्यकारिणी सदस्यों का नाम और फोटो सहित बड़े-बड़े बैनर या फ्लेक्स लगाना कानूनी रूप से प्रतिबंधित और नियमों के खिलाफ है। भारतीय विधिज्ञ परिषद (Bar Council of India) के नियम और विभिन्न उच्च न्यायालयों (जैसे इलाहाबाद हाईकोर्ट) के आदेशों के अनुसार,  कोर्ट परिसर की गरिमा, सुरक्षा और वकीलों के पेशेवर आचरण को बनाए रखने के लिए ऐसे किसी भी प्रकार के प्रचार या प्रदर्शन पर पूरी तरह रोक है। इस विषय पर कानूनी प्रावधान और न्यायालयों के रुख को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है: 1. बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियम (विज्ञापनों पर रोक)नियम 36 (अध्याय II, भाग VI):  इस नियम के तहत वकीलों द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी प्रकार के विज्ञापन या प्रचार (Soliciting/Advertising) पर पूर्ण प्रतिबंध है। ⚫ सीमित बोर्ड का आकार:  वकीलों को केवल अपने चेंबर या कार्यालय के बाहर एक सामान्य आकार का नेमप्लेट लगाने की अनुमति है। ⚫ पद का प्रचार वर्जित:  BCI के नियमों के अनुसार, कोई भी अधिवक्ता अपने लेटरहेड, साइन-बोर्ड या स्टेशनरी पर यह...

राहुल गांधी पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

चित्र
 इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता वाली याचिका को खारिज किया   ◆ याचिकाकर्ता राहुल गांधी के पास ब्रिटेन की नागरिकता होने का आरोप लगा रहे थे ◆ कोर्ट ने कहा- आरोप साबित करने के लिए एक भी दस्तावेज पेश नहीं किया गया  ◆ राहुल गांधी के खुद को ब्रिटिश नागरिक घोषित करने का भी कोई सबूत नहीं मिला द्वारा  शालिनी कौशिक  एडवोकेट  कैराना (शामली) 

सुप्रीम कोर्ट ने मनन मिश्रा को दे दिया अल्टीमेटम

चित्र
  सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा से कहा कि  " आप लोकतांत्रिक रूप से चुने गए पदाधिकारी नहीं हैं, बल्कि केवल एक प्रो-टेम (अस्थाई) चेयरमैन हैं."  इसी के साथ शीर्ष अदालत ने कहा कि  राज्य बार काउंसिलों का गठन जल्द पूरा होने से BCI के नए पदाधिकारियों का चुनाव भी कराया जा सकेगा और मनन मिश्रा के कार्यकाल से जुड़े उठाए गए ज्यादातर सवालों का समाधान हो सकता है। ➡️ मुख्य बातें और निर्देश ✒️ दैनिक कामकाज: अदालत ने स्पष्ट किया कि  प्रो-टेम चेयरमैन होने के नाते मनन मिश्रा केवल बीसीआई (BCI) के दिन-प्रतिदिन के कामकाज को ही संभाल सकते हैं। ✒️ नीतिगत फैसले: कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि  बड़े और महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले लेते समय भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल को शामिल किया जाएगा। ✒️ चुनाव प्रक्रिया: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों के गठन और नए पदाधिकारियों के चुनाव के लिए 5 सप्ताह की सख्त समयसीमा तय की है, ताकि जल्द से जल्द नए बीसीआई (BCI) पदाधिकारियों का चुनाव हो सके। कोर्ट ने कहा कि  राज्य बार काउंसिलों का गठन जल्द ...

जन्तर मन्तर के छात्रों से मुक़दमे वापस-सुप्रीम कोर्ट

चित्र
   सुप्रीम कोर्ट ने नीट परीक्षा और अन्य मुद्दों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर व देश के अन्य हिस्सों में प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर दर्ज सभी एफआईआर (FIR) को रद्द कर दिया है। ➡️ सुप्रीम कोर्ट का फैसला और मुख्य बातें ⚫ अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल:  सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए प्रदर्शनकारी छात्रों पर दर्ज मामलों को समाप्त करने का आदेश दिया। ⚫ गंभीर अपराधों पर लागू नहीं:  यह राहत केवल मामूली प्रदर्शन मामलों के लिए है; हत्या या गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि व हिंसा में लिप्त आरोपियों को इससे छूट नहीं मिली है। ⚫ मार्च रद्द :  इस फैसले के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 5 सितंबर को प्रस्तावित अपना विरोध मार्च रद्द कर दिया है। ⚫ सरकार का आश्वासन:  केंद्र सरकार ने पहले ही अदालत को सूचित किया था कि प्रदर्शनकारियों के पुराने केस वापस लिए जाएंगे और भविष्य में कोई नया मुकदमा दर्ज नहीं होगा। द्वारा शालिनी कौशिक एडवोकेट कैराना (शामली) 

भगवान राम और उनकी माता पर आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में ओवैसी पर कार्यवाही रद्द नहीं

चित्र
  बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) नेता अकबरुद्दीन ओवैसी के खिलाफ भगवान राम और उनकी माता के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के लिए शुरू की गई कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि 'संवैधानिक सहिष्णुता' को किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं का जानबूझकर अपमान करने की छूट नहीं माना जा सकता.  Case Title: Akbaruddin Sultan Salahuddin Owaisi vs State of Maharashtra (Criminal Application 1920 of 2022) द्वारा  शालिनी कौशिक  एडवोकेट  कैराना (शामली) 

प्रतिबंधित जनसेवक एडवोकेट

चित्र
 दिनांक 30 अगस्त 2026 की अमर उजाला मीडिया रिपोर्ट के अनुसार देश की राजधानी नई दिल्ली में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के 13वें दीक्षांत समारोह के दौरान सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ जज वीवी नागरत्ना ने एक बड़ा और गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि  " हमारी अदालतें मुकदमों के अंबार, लगातार होती देरी और वकीलों की भारी-भरकम फीस से कराह रही हैं। ऐसे में अब समय आ गया है कि देश का वकीलों का समुदाय (बार) अपने रवैये में सुधार करे, अपने कामकाज पर विचार करे और एक सुर में न्याय व्यवस्था को संभालने के लिए आगे आए।"  वकीलों से अपील करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि " वे अपनी सोच बदलें। वकालत को सिर्फ पैसा कमाने का जरिया बनाने के बजाय इसे जनता की सेवा के रूप में देखें। अगर वकील ऐसा नहीं करेंगे, तो आने वाले समय में आम जनता के बीच उनकी अहमियत खत्म हो जाएगी। उन्होंने वकीलों को लोकतंत्र का 'सेफ्टी वाल्व' बताया। उनका कहना था कि वकीलों को मिली आजादी किसी व्यक्तिगत फायदे के लिए नहीं है, बल्कि इसलिए है ताकि वे बिना किसी सरकार, बाजार या ग्राहक के दबाव के सच के लिए खड़े हो सकें।" इस प्रकार सुप्...

बार एसोसिएशन की वित्तीय अनियमितता है बार फंड का ये उपयोग

चित्र
  चुनी हुई कार्यकारिणी बार एसोसिएशन द्वारा समाचार पत्र में बार फंड (Bar Fund) का उपयोग करते हुए शुभकामना संदेश प्रकाशित कराना कानूनी और नैतिक रूप से सही नहीं माना जाता है और यह वित्तीय अनियमितता के दायरे में आ सकता है। ➡️ इस विषय को कानूनी, नैतिक और बार काउंसिल के नियमों के दृष्टिकोण से निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है: 1️⃣ बार फंड का वैधानिक उद्देश्य (Purpose of Bar Fund) बार एसोसिएशन का फंड मुख्य रूप से वकीलों के कल्याण, बार लाइब्रेरी के रखरखाव, कानूनी सहायता, चैंबर सुविधाओं और एसोसिएशन के प्रशासनिक कार्यों के लिए होता है। समाचार पत्र में व्यक्तिगत या कार्यकारिणी के नाम से शुभकामना संदेश (जैसे त्योहारों या जीत की बधाई) छपवाना एसोसिएशन का कोई आवश्यक या वैधानिक कार्य नहीं है। 2️⃣ . बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के विज्ञापन संबंधी नियम-नियम 36 (Rule 36):  बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों (Bar Council of India Rules) के भाग VI, अध्याय II के नियम 36 के तहत भारत में वकीलों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विज्ञापन करने या काम मांगने की सख्त मनाही है।यद्यपि शुभकामना सं...

स्कूलों में हिजाब की अनुमति नहीं-इलाहाबाद हाई कोर्ट

चित्र
  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्कूलों में तयशुदा यूनिफॉर्म के साथ हिजाब या सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति देने से इंकार करते हुए एक मुस्लिम छात्रा की याचिका को खारिज कर दिया है। ➡️ पक्षकार (Parties involved) ⚫ याचिकाकर्ता (Student):  सुकैना रिजवी (प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की 11वीं कक्षा की नाबालिग छात्रा, जो अपनी मां के माध्यम से पेश हुई)। ⚫ प्रतिवादी (Respondent):  टैगोर पब्लिक स्कूल, अत्तारसुइया, प्रयागराज (स्कूल प्रबंधन) और संबंधित प्रशासनिक अधिकारी। ➡️ न्यायालय पीठ (Bench):  न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ। ➡️ निर्णय की मुख्य बातें और कोर्ट की टिप्पणियां: ⚫ अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं:  अदालत ने स्पष्ट किया कि हिजाब या हेडस्कार्फ पहनना इस्लाम धर्म का कोई अनिवार्य या आवश्यक धार्मिक हिस्सा (Essential Religious Practice) नहीं है, जिसके बिना किसी व्यक्ति की आस्था खतरे में पड़ जाए। ⚫ यूनिफॉर्म की अनिवार्यता:  कोर्ट ने कहा कि स्कूल में एक समान ड्रेस कोड (यूनिफॉर्म) लागू करने का उद्देश्य अनुशासन बनाए रखना, बच्चों के बीच समान...

चमार शब्द का इस्तेमाल अपमानजनक नहीं

चित्र
  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की: "केवल 'चमार' शब्द का इस्तेमाल करने मात्र से यह साबित नहीं होता कि याचिकाकर्ताओं ने पीड़िता के अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय से होने के कारण उसका अपमान करने या नीचा दिखाने की मंशा या जानकारी के साथ इस शब्द का प्रयोग किया था।" अदालत ने आगे जोड़ा: "इसलिए, रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री याचिकाकर्ताओं की किसी विशिष्ट, स्पष्ट या पर्याप्त भूमिका को उजागर नहीं करती है।" ..................................  मामले का शीर्षक: वेगराज सिंह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य  वाद संख्याः आपराधिक अपील संख्या 4882 / 2025 पीठः जस्टिस संतोष राय निर्णय की तिथि: 13 अगस्त 2026 ................................................. द्वारा शालिनी कौशिक एडवोकेट कैराना (शामली) 

भारत में नया श्रमिक कल्याण

चित्र
  भारत सरकार ने पुराने 29 श्रम कानूनों को मिलाकर 4 नए लेबर कोड (श्रम संहिता) के रूप में बड़े सुधार लागू किए हैं।  ➡️ ये चार नए लेबर कोड हैं:  1️⃣ वेतन संहिता (Code on Wages),  2️⃣ सामाजिक सुरक्षा संहिता (Code on Social Security), 3️⃣ औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code), और  4️⃣ व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशाएं संहिता (Occupational Safety, Health and Working Conditions Code)। 1️⃣ वेतन संहिता (Code on Wages):    कुल वेतन (CTC) का कम से कम 50% हिस्सा मूल वेतन (Basic Salary) होना अनिवार्य।इससे पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी (Gratuity) का हिस्सा बढ़ेगा, जिससे भविष्य में मिलने वाला फंड अधिक होगा।सभी क्षेत्रों के कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन (Minimum Wage) तय करने का प्रावधान। 2️⃣ सामाजिक सुरक्षा संहिता (Code on Social Security): असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector), गिग वर्कर्स (Gig Workers) और प्लेटफॉर्म वर्कर्स (जैसे फूड डिलीवरी या कैब ड्राइवर) को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना।इनके लिए बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य कल्याणकारी य...

साप्ताहिक बंदी में बाजार - क्या कहता है कानून

चित्र
  कांधला कस्बे में साप्ताहिक बंदी के दौरान चार खंबा रोड पर बाजार लगाए जाने की समस्या स्थानीय व्यापार मंडल के समक्ष उपस्थित हुई है और इसे लेकर व्यापारी भाइयों का बैठकों का दौर जारी हो गया है.      उत्तर प्रदेश में किसी व्यापार मंडल के क्षेत्र में दूसरा व्यापार मंडल या कोई भी पक्ष कानूनी रूप से साप्ताहिक बंदी के दिन बाजार या दुकानें नहीं लगा सकता। साप्ताहिक बंदी का निर्धारण व्यापार मंडलों द्वारा नहीं, बल्कि जिला प्रशासन द्वारा उत्तर प्रदेश दुकान एवं वाणिज्यिक अधिष्ठान अधिनियम, 1962 के तहत किया जाता है। ➡️ कानूनी स्थिति और नियम: ⚫ प्रशासनिक आदेश:  जिले के जिलाधिकारी (District Magistrate) तय करते हैं कि किस क्षेत्र में बाजार या दुकानें किस दिन बंद रहेंगी। यह आदेश पूरे क्षेत्र के सभी व्यापारियों और बाजारों पर समान रूप से लागू होता है। ⚫ व्यापार मंडल की भूमिका:  व्यापार मंडल केवल व्यापारियों की संस्थाएं होती हैं। इन्हें सरकार या प्रशासन के तय किए गए साप्ताहिक बंदी के नियमों को बदलने या तोड़ने का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता है। ⚫ दूसरा व्यापार मंडल:  यदि क्ष...

बी सी आई बैकफुट पर

चित्र
  हैदराबाद की NALSAR University of Law के 2026 बैच के छात्रों के वकील के रूप में एनरोलमेंट (नामांकन) पर रोक का मामला दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को बुलाए जाने के विरोध से जुड़ा था। हालांकि, भारी विरोध और स्थिति स्पष्ट होने के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने यह रोक तुरंत वापस ले ली है और सभी छात्रों को एनरोल करने की अनुमति दे दी है। विवाद की वजह सीजेआई का विरोध: नलसार यूनिवर्सिटी के छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में CJI सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने का विरोध किया था।   बयानों से नाराजगी: छात्र दिल्ली में हुए कुछ प्रदर्शनों और मुकदमों की सुनवाई के दौरान CJI की टिप्पणियों तथा पुलिस कार्रवाई संबंधी मामलों को लेकर नाखुश थे।   विरोध पत्र: यूनिवर्सिटी के सैकड़ों छात्रों ने प्रशासन को पत्र लिखकर इस निमंत्रण पर पुनर्विचार करने की मांग की थी।   बार काउंसिल (BCI) का एक्शन और फैसला एनरोलमेंट पर रोक: इस विरोध प्रदर्शन और अभियानों का संज्ञान लेते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन ने शुरुआती आदे...

युवा और नए वकीलों के लिए अनिवार्य पोस्ट-एनरोलमेंट ट्रेनिंग

चित्र
  बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद देश के वकीलों के लिए अनिवार्य प्रशिक्षण (Compulsory Training) का आदेश दिया है। इसके तहत गोवा स्थित IIULER परिसर में एक नेशनल लीगल एकेडमी (National Legal Academy) बनाई जाएगी, जहां वकीलों को पेशेवर ट्रेनिंग दी जाएगी। ➡️ प्रशिक्षण से जुड़ी मुख्य बातें- ⚫ प्रशिक्षण का स्थान:  गोवा के IIULER परिसर में नेशनल लीगल एकेडमी बनेगी। ⚫ अवधि :  वकीलों के लिए यह ट्रेनिंग प्रोग्राम 10 दिन से लेकर 2 हफ्ते तक का हो सकता है। ⚫ किसे करनी होगी :  यह मुख्य रूप से देश के युवा और नए वकीलों के लिए अनिवार्य पोस्ट-एनरोलमेंट ट्रेनिंग होगी। ⚫ विशेषज्ञ :  ट्रेनिंग सत्रों में सुप्रीम कोर्ट व अन्य न्यायालयों के न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता, प्रोफेसर और कानूनी विशेषज्ञ लेक्चर देंगे। ⚫ उद्देश्य और जरूरत -  वकीलों की पेशेवर दक्षता और कानूनी कौशल को मजबूत करना।कानूनी आचरण, नैतिकता (Ethics) और आधुनिक तकनीकों (जैसे AI और डिजिटल कोर्ट प्रक्रिया) से वकीलों को अवगत कराना।जिस प्रकार न्यायाधीशों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था होती है, उसी...