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मुस्लिम क़ानून के तहत वैध तलाक को मान्यता देना फैमिली कोर्ट का दायित्व :राजस्थान हाईकोर्ट

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राजस्थान हाइकोर्ट ने कहा कि  यदि मुस्लिम व्यक्तिगत क़ानून के अंतर्गत तलाक-उल-हसन या मुबारात के माध्यम से विवाह का विधिवत विघटन पहले ही हो चुका है तो फैमिली कोर्ट ऐसे तलाक को मान्यता देने और विवाह विच्छेद की घोषणा करने के लिए बाध्य है।  अदालत ने स्पष्ट किया कि  इस प्रकार की राहत को केवल अत्यधिक तकनीकी आधारों पर नकारा नहीं जा सकता ।  जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जो फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी की विवाह विच्छेद की घोषणा संबंधी याचिका खारिज किए जाने के आदेश के खिलाफ दायर की गई। याचिकाकर्ता पत्नी का कहना था कि   उसका विवाह मुस्लिम क़ानून के तहत पहले ही समाप्त हो चुका है। उसने यह दलील दी कि पति द्वारा तलाक-उल-हसन के माध्यम से तीन चरणों में तलाक दिया गया। इसके अतिरिक्त दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से मुबारात का लिखित समझौता भी हुआ था।  रिकॉर्ड के अनुसार, पति ने विवाह के दौरान तीन अलग-अलग तहर अवधियों में तलाक का उच्चारण किया पहला 8 जून 2024, दूसरा 8 जुलाई 2024 और तीसरा 8 अगस्त 2024 को जिसे ...

सड़क सुरक्षा माह -सीट बेल्ट चालान और गुड सेमेरिटन स्कीम

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  भारत में राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह/सप्ताह 2026, 1 जनवरी से 31 जनवरी 2026 तक मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य यातायात नियमों, जैसे हेलमेट/सीट बेल्ट के अनिवार्य उपयोग और नशे में वाहन न चलाने के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह राष्ट्रीय अभियान सड़क दुर्घटनाओं को कम करने और सुरक्षित परिवहन को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।  ➡️ सड़क सुरक्षा माह 2026 के प्रमुख विवरण: ✒️ अवधि : 1 जनवरी 2026 से 31 जनवरी 2026 तक (राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह)। ✒️ मुख्य विषय (Theme): "सीख से सुरक्षा" (Learning to Safety)। अन्य संदर्भों में, 2026 के लिए “परवाह से कर्तव्य तक” (From Care to Duty) और "सड़क सुरक्षा नायक" (Road Safety Heroes) भी शामिल हैं। ✒️ उद्देश्य : ओवरस्पीडिंग पर नियंत्रण, हेलमेट/सीट बेल्ट का अनिवार्य उपयोग, और नशे में वाहन न चलाने के बारे में जागरूकता बढ़ाना। ✒️ गतिविधियाँ : जागरूकता रथ, सड़क सुरक्षा प्रतिज्ञा, पोस्टर/स्लोगन प्रतियोगिताएं, और वाहन निरीक्षण अभियान।  ➡️ सड़क सुरक्षा के 10 आवश्यक सुझाव:  1️⃣ गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग न करें। 2️⃣ हमेशा हेलमेट और सीट बेल्ट पह...

UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 पर रोक:दुरूपयोग की आशंका-सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने' से संबंधित 2026 की नियमावली (UGC Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) को अगली सुनवाई तक स्थगित (abeyance) रखने का आदेश दिया। अदालत ने इन नियमों को लेकर गंभीर आपत्तियाँ जताते हुए कहा कि ये प्रथम दृष्टया अस्पष्ट (vague) हैं और दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने सुझाव दिया कि  इन नियमों की समीक्षा प्रख्यात विधिवेत्ताओं (eminent jurists) की एक समिति द्वारा की जानी चाहिए, ताकि सामाजिक मूल्यों, परिसरों के माहौल और समाज पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जा सके।  खंडपीठ ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने को कहा है। मामला 19 मार्च को फिर सूचीबद्ध होगा। तब तक UGC की 2012 की नियमावली लागू रहेगी। ➡️ अदालत की प्रमुख आपत्तियाँ  सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने 2026 नियमों को लेकर कई अहम सवाल उठाए:  1️⃣ नियमों की भाषा ...

रजिस्टर्ड सेल डीड को फर्जी कहना कठिन: सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि " एक रजिस्टर्ड सेल डीड को ज़्यादा वैध और असली माना जाता है, इसलिए बिक्री के लेन-देन का विरोध करने के लिए इसे हल्के में 'फर्जी' घोषित नहीं किया जा सकता।" जस्टिस राजेश बिंदल और मनमोहन की बेंच ने टिप्पणी की, “ यह कानून की एक तय स्थिति है कि एक रजिस्टर्ड सेल डीड अपने साथ वैधता और प्रामाणिकता की एक मज़बूत धारणा रखती है। रजिस्ट्रेशन सिर्फ़ एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक गंभीर कार्य है जो दस्तावेज़ को उच्च स्तर की पवित्रता प्रदान करता है। नतीजतन, एक कोर्ट को किसी रजिस्टर्ड दस्तावेज़ को हल्के में या लापरवाही से 'फर्जी' घोषित नहीं करना चाहिए।” बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए खरीदार की याचिका स्वीकार की, जिसमें उसके पक्ष में निष्पादित रजिस्टर्ड सेल डीड को बाद में विक्रेता ने बिना किसी विश्वसनीय सबूत के 'फर्जी' बताकर विवादित कर दिया था। यह मामला था जिसमें प्रतिवादी ने अपना कर्ज चुकाने के लिए अपीलकर्ता के पास अपना घर गिरवी रखा था। जब प्रतिवादी अपीलकर्ता की मांग पर गिरवी छुड़ाने में विफल रहा तो एक रजिस्टर्ड बिक्री समझौता किया गया...

विवाहिता पुत्री अनुकंपा नियुक्ति की हकदार-इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी सिद्धार्थ नगर को मृतक आश्रित कोटे में विवाहिता पुत्री की नियुक्ति पर दो माह में विचार कर आदेश करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि  नियुक्ति में हुई देरी की उपेक्षा करते हुए परिवार की आर्थिक स्थिति व आश्रितों की संख्या पर विचार कर आदेश दिया जाए।  कोर्ट ने नियुक्ति से इनकार करने के बीएसए के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि  संशोधित नियमावली में अविवाहित शब्द हटा देने के बाद केवल पुत्री है। जिसमें विवाहित व अविवाहित दोनों शामिल हैं इसलिए याची (विवाहित पुत्री) को आश्रित कोटे में नियुक्ति पाने का अधिकार है।  यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने नीतू अनिता देवी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। प्रस्तुति शालिनी कौशिक एडवोकेट कैराना (शामली)

बंदरों की जिम्मेदारी वन विभाग की-इलाहाबाद उच्च न्यायालय

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प्राप्त जानकारी के अनुसार बंदरों के प्रबंधन के संबंध में मा उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में पोजित पी.आई.एल. संख्या-1030/2025 विनीत शर्मा व अन्य बनाम उ0प्र0 राज्य व अन्य में दिनांक 13.01.2026 द्वारा निम्नवत आदेश पारित किये गये हैं:- 1. इस न्यायालय द्वारा दिनांक 03.12.2025 को पारित आदेश के अनुसार, जिसमें प्रतिवादियों को इस न्यायालय द्वारा बार-बार दिए गए आदेशों के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था, माननीय अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दिनांक 08.01.2006 की बैठक का कार्यवृत्त प्रस्तुत किया है, जिसमें सभी संबंधित विभागों के साथ-साथ लखनऊ नगर निगम आदि और पीपल फॉर एनिमल्स के सदस्य ने भाग लिया था। इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि बंदरों के खतरे को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग की है, जिसके लिए वह एक माह के भीतर एक व्यापक कार्य योजना तैयार करेगा और आवश्यकतानुसार अन्य विभागों को भी इसमें शामिल किया जाएगा, अतः उक्त विभाग का समर्थन करें।  2. उक्त कार्यवृत्त के आधार पर, प्रतिवादियों की ओर से बैठक में तय की गई कार्य योजना प्रस्तुत करने के लिए समय मांगा ग...

वसीयत अनुकम्पा नियुक्ति का आधार नहीं-इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का लाभ मृत सरकारी कर्मचारी की वसीयत (विल) के आधार पर नहीं दिया जा सकता। हाइकोर्ट ने कहा कि  उत्तर प्रदेश मृतक आश्रित नियम, 1974 के तहत अनुकंपा नियुक्ति का आधार केवल यह होता है कि आवेदक मृतक कर्मचारी पर वास्तव में निर्भर था या नहीं, न कि यह कि वसीयत किसके पक्ष में बनाई गई । जस्टिस मनीष माथुर ने अपने फैसले में कहा कि  नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत मृतक की वसीयत के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति की पात्रता तय की जाए। पंजीकृत वसीयत का अनुकंपा नियुक्ति से कोई संबंध नहीं है। इस प्रकार की नियुक्ति का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से उबारना होता है और इसके लिए यह देखा जाना आवश्यक है कि आवेदक वास्तव में मृतक पर निर्भर था या नहीं। साथ ही यह भी जरूरी है कि नियुक्ति से विधवा और नाबालिग बच्चों सहित पूरे परिवार का हित सुरक्षित हो। मामले में याचिकाकर्ता ने अपने भाई की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। उसका कहना था कि मृतक की पत्नी उससे अलग रह रही थी और वह स्वयं अपने भाई की देखभाल करता था। याच...

पत्नी की क्वालिफिकेशन गुजारा भत्ते में बाधक नहीं-इलाहाबाद हाई कोर्ट

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 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि  किसी पत्नी को सिर्फ़ इसलिए CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा भत्ता देने से मना नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह बहुत ज़्यादा पढ़ी-लिखी है या उसके पास वोकेशनल स्किल्स हैं, क्योंकि इससे यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि याचिकाकर्ता नंबर 1/पत्नी पैसे कमाने के लिए काम कर रही है।  जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने यह भी कहा कि   पति का अपनी पत्नी का कानूनी तौर पर भरण-पोषण करने की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए सिर्फ़ उसकी क्वालिफिकेशन पर निर्भर रहना गलत है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी की सिर्फ़ कमाने की क्षमता असल में नौकरी करके पैसे कमाने से अलग है। खास बात यह है कि बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि  यह कई महिलाओं की सच्चाई है, जो अपनी पढ़ाई-लिखाई के बावजूद, सालों तक घरेलू काम और बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारियों के बाद नौकरी पर लौटने में मुश्किल महसूस करती हैं.  इन बातों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने बुलंदशहर के एडिशनल प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें पति से गुज़ारा भत्ता मांगने के लिए CrPC की धारा 125 के तहत पत्नी की ...