सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

तेजाबी मौत या हमला : केवल फांसी ही सही दंड


    अभी हाल ही में हुए दंड विधि [ संशोधन] अधिनियम ,२०१३ में तेजाब सम्बंधित मामलों के लिए धारा ३२६ -क व् धारा ३२६-ख  अन्तः स्थापित की गयी हैं जिसमे धारा ३२६-क '' स्वेच्छ्या तेजाब ,इत्यादि के प्रयोग से घोर उपहति कारित करना  ''को ही अपने घेरे में लेती है जिसमे कारावास ,जो दस वर्ष से कम नहीं किन्तु जो आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ज़ुर्माना जिसका भुगतान पीड़िता को किया जायेगा ......और धारा ३२६ -ख स्वेच्छ्या तेजाब फेंकने या फेंकने के प्रयत्न को ही अपने घेरे में लेती है जिसमे ५ वर्ष का कारावास ,किन्तु जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माने का दंड मिलेगा .इन दोनों ही धाराओं की व्यवस्था करते समय हमारे कानून विदों ने इस तरह की घटना की कल्पना नहीं की कि अगर तेजाबी हमले में पीड़िता की मृत्यु हो जाती है तो जुर्माने का भुगतान किसे किया जायेगा क्योंकि आज तक हुई अधिकांश घटनाओं में तेजाब पीड़िताओं की ज़िंदगी झुलसी है मौत नहीं किन्तु अभी हाल में गुजरात में एक घटना ने  तेजाब पीड़िता की ज़िंदगी ही नहीं मौत को भी झुलसा दिया और उसे मौत का शिकार बना दिया किन्तु अब कानून उन्हें ज्यादा से ज्यादा क्या देगा ३२६-क और ३०२ का अंतर्गत सजा जो कि फांसी हो भी सकती है और नहीं भी जबकि इस तरह के मामलों में निश्चित रूप से फांसी होनी चाहिए क्योंकि तेजाब ने यहाँ मात्र घोर उपहति नहीं कि वरन मौत दी है और इस सम्बन्ध में कानून को नयी व्यवस्थाएं भूतलक्षी संशोधन करते हुए लागू करनी ही होंगी .


शालिनी कौशिक
      [कानूनी ज्ञान ]


रविवार, 15 फ़रवरी 2015

''उफ़ - डी.जे.''


अभी पिछले दिनों की बात है घर के पीछे स्थित एक धर्मशाला में विवाह समारोह था और जैसा कि आजकल का प्रचलन है वहाँ डी.जे. बज रहा था और शायद full volume में बज रहा था और जैसा कि डी.जे. का प्रभाव होता है वही हो रहा था ,उथल-पुथल मचा रहा था ,मानसिक शांति भंग कर रहा था और आश्चर्य की बात है कि हमारे कमरों के किवाड़ भी हिले जा रहे थे ,हमारे कमरों के किवाड़ जो कि ऐसी दीवारों में लगे हैं जो लगभग दो फुट मोटी हैं और जब हमारे घर की ये हालत थी तो आजकल के डेढ़ ईंट के दीवार वाले घरों की हालत समझी जा सकती है .बहुत मन किया कि जाकर डी.जे. बंद करा दूँ किन्तु किसी की ख़ुशी में भंग डालना न हमारी संस्कृति है न स्वभाव इसलिए तब किसी तरह बर्दाश्त किया किन्तु आगे से ऐसा न हो इसके लिए कानून में हमें मिले अधिकारों की तरफ ध्यान गया .
भारतीय दंड सहिंता का अध्याय १४ लोक स्वास्थ्य ,क्षेम ,सुविधा ,शिष्टता और सदाचार पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषय में है और इस तरह से शोर मचाकर जो असुविधा जन सामान्य के लिए उत्पन्न की जाती है वह दंड सहिंता के इसी अध्याय के अंतर्गत अपराध मानी जायेगी और लोक न्यूसेंस के अंतर्गत आएगी .भारतीय दंड सहिंता की धारा २६८ कहती है -
''वह व्यक्ति लोक न्यूसेंस का दोषी है जो कोई ऐसा कार्य करता है ,या किसी ऐसे अवैध लोप का दोषी है ,जिससे लोक को या जन साधारण को जो आस-पास रहते हों या आस-पास की संपत्ति पर अधिभोग रखते हों ,कोई सामान्य क्षति ,संकट या क्षोभ कारित हो या जिसमे उन व्यक्तियों का ,जिन्हें किसी लोक अधिकार को उपयोग में लाने का मौका पड़े ,क्षति ,बाधा ,संकट या क्षोभ कारित होना अवश्यम्भावी हो .''
कोई सामान्य न्यूसेंस इस आधार पर माफ़ी योग्य नहीं है कि उससे कुछ सुविधा या भलाई कारित होती है .
इस प्रकार न्यूसेंस या उपताप से आशय ऐसे काम से है जो किसी भी प्रकार की असुविधा ,परेशानी ,खतरा,क्षोभ [खीझ ]उत्पन्न करे या क्षति पहुंचाए .यह कोई काम करने या कोई कार्य न करने के द्वारा भी हो सकता है और धारा २९० भारतीय दंड सहिंता में इसके लिए दंड भी दिया जा सकता है .धारा २९० कहती है -
''जो कोई किसी ऐसे मामले में लोक न्यूसेंस करेगा जो इस सहिंता द्वारा अन्यथा दंडनीय नहीं है वह जुर्माने से जो दो सौ रूपये तक का हो सकेगा दण्डित किया जायेगा .''
और न केवल दाण्डिक कार्यवाही का विकल्प है बल्कि इसके लिए सिविल कार्यवाही भी हो सकती है क्योंकि यह एक अपकृत्य है और यह पीड़ित पक्ष पर निर्भर है कि वह दाण्डिक कार्यवाही संस्थित करे या क्षतिपूर्ति के लिए सिविल दावा दायर करे .
और चूँकि किसी विशिष्ट समय पर रेडियो .लाउडस्पीकर ,डीजे आदि को लोक न्यूसेंस नहीं माना जा सकता इसका मतलब यह नहीं कि इन्हें हमेशा ही इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता .वर्त्तमान में अनेक राज्यों ने अपने पुलिस अधिनियमों में इन यंत्रों से शोर मचाने को एक दंडनीय अपराध माना है क्योंकि यह लोक स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करता है तथा इससे जनसाधारण को क्षोभ या परेशानी उत्पन्न होती है [बम्बई पुलिस अधिनियम १९५१ की धाराएं ३३,३६ एवं ३८ तथा कलकत्ता पुलिस अधिनियम १८६६ की धारा ६२ क [ड़]आदि ]
इसी तरह उ०प्र० पुलिस अधिनयम १८६१ की धारा ३०[४] में यह उल्लेख है कि वह त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर मार्गों में कितना संगीत है उसको भी विनियमित कर सकेगा .
''शंकर सिंह बनाम एम्परर ए.आई.आर. १९२९ all .२०१ के अनुसार त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर पुलिस को यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि वह संगीत के आवाज़ की तीव्रता को सुनिश्चित करे .त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर लोक मार्गों पर गाये गए गाने एवं संगीत की सीमा सुनिश्चित करना पुलिस का अधिकार है .''
और यहाँ मार्ग से तात्पर्य सार्वजनिक मार्ग व् स्थान से है जहाँ जनता का जमाव विधिपूर्ण रूप में होता है और इसलिए ऐसे में पुलिस भी इस तरह के समारोहों में इन यंत्रों की ध्वनि तीव्रता का विनियमन कर सकती है .
साथ ही कानून द्वारा मिले हुए इस अधिकार के रहते ऐसे स्थानों की प्रबंध समिति का भी यह दायित्व बन जाता है कि वह जन सुविधा व् स्वास्थ्य को देखते हुए ध्वनि तीव्रता के सम्बन्ध में नियम बनाये अन्यथा वह भी भारतीय दंड सहिंता के अंतर्गत दंड के भागी हो सकते हैं क्योंकि वे प्रबंधक की हैसियत से प्रतिनिधायी दायित्व के अधीन आते हैं .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

राज्यपाल को नितीश को बिहार सौंपने की पूरी शक्ति .



पीएम से मिलकर बोले मांझी, 'मैं ही हूं बिहार का सीएम'

कहा, 20 तारीख को साबित कर देंगे बहुमत


बोले मांझी, नीतीश सत्ता के भूखे

 संविधान की अनुसूची ६ के अनुच्छेद ९ [२] तथा अनुच्छेद ३७१ अ [१] [बी] और [डी] और २ [बी] और [ऍफ़] अनुच्छेद २३९ के अधीन राज्यपाल को अपने स्वविवेक का प्रयोग करने का स्पष्ट उल्लेख है .सामान्यतया वह एक संविधानिक प्रधान की हैसियत से मंत्रिपरिषद के परामर्शनुसार कार्य करेगा किन्तु ऐसी परिस्थितियों में वह संविधानिक एवं प्रभावी रूप से अपने विवेक का प्रयोग कर सकता है जहाँ पर मंत्रिपरिषद तथा उसके बीच किसी मामले पर मतभेद उठ खड़ा हुआ हो .इसबात में उसका निर्णय अंतिम होना इस बात का द्द्योतक है कि राज्यपाल उन विषयों पर मंत्रिपरिषद की राय के बिना परिस्थितियों के अनुसार अपना विवेक से कार्य कर सकता है , भले ही उनका संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख न किया गया हो .ऐसी परिस्थितियां जिनमे राज्यपाल अपनी वैवेकिक शक्ति का प्रयोग कर सकता है , निम्नलिखित हैं -
[१] मुख्यमंत्री की नियुक्ति
[२] मंत्री को अपदस्थ करना
[३] विधान सभा को भंग करना
[४] अनुच्छेद ३५६ के अंतर्गत राष्ट्रपति को संकटकालीन स्थिति की घोषणा की सिफारिश करना .
                 ऐसे ही अनुच्छेद १७४ के अनुसार राज्यपाल विधान सभा को आहूत भी करता है तथा उसे भंग भी करता है .सामान्य परिस्थितियों में राज्यपाल विधान सभा को तब तक भंग नहीं करता जब तक कि उसकी सामान्य अवधि [५ वर्ष ]समाप्त न हो जाये किन्तु जहाँ पर मंत्रिमंडल सदन का विश्वास खो चूका है और किसी स्थायी वैकल्पिक मंत्रिमंडल की स्थापना संभव नहीं है तो वह सदन को विघटित कर देगा .क्या राज्यपाल पराजित मंत्रिमंडल की विधान सभा भंग की सिफारिश को मानने के लिए बाध्य है ऐसे में यही बात सामने आती है कि वह ऐसी मंत्रणा को मानने के लिए बाध्य नहीं है वह अपने विवेक के अनुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र है .एक मत यह है कि राज्यपाल सर्वदा पराजित मुख्यमंत्री की सलाह को मानने के लिए बाध्य है और उसे राज्य विधानसभा को भंग करना ही पड़ेगा -दूसरा मत यह है कि यदि वह चाहे तो विधान सभा को विघटित करे या ऐसे व्यक्ति की खोज करे जो प्रदेश में पराजित मंत्रिपरिषद के स्थान पर वैकल्पिक मंत्रिमंडल का संगठन कर सके .भारत में संविधानशास्त्रियों का समर्थन दूसरे मत के पक्ष में है .सन १९५३ में त्रावणकोर-कोचीन में पराजित मंत्रिमंडल ने सदन को भंग करने का परामर्श राज्यपाल को दिया था ;किन्तु राज्यपाल ने उस परामर्श को स्वीकार नहीं किया .इससे स्पष्ट है कि राज्यपाल ऐसी स्थितियों में अपने विवेक का प्रयोग कर सकता है .
 अब एक तरफ तो मांझी का मंत्रिमंडल उन्हें विधान सभा भंग की सिफारिश करने को अधिकृत कर रहा है और एक तरफ वे २० तारीख को विश्वास मत साबित करने की बात कर रहे हैं जबकि जिस दल से वे ताल्लुक रखते हैं वह दल ही अब नितीश कुमार को विधायक दल का नेता चुन चुका है और मांझी का मुख्यमंत्री पद अब यदि संविधानिक रूप से देखा जाये तो जद [यू] के प्रसादपर्यन्त ही रह गया है क्योंकि इसी दल के बहुमत के आधार पर वे बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए थे और जहाँ तक मांझी के दावों का सवाल है वे इसीलिए खोखले नज़र आ रहे हैं क्योंकि सन १९९५ में जब मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की सरकार से मुख्य घटक दल बसपा ने समर्थन वापस लिया तब राज्यपाल ने उन्हें बहुमत साबित करने का मौका न देकर उनकी सरकार को बर्खास्त किया था और मायावती को सरकार बनाने का निमंत्रण, ऐसे में अब जद [यू] में यदि मतभेद उभरे हैं और वह राज्यपाल  को मांझी को हटाने सम्बन्धी पत्र  देकर नितीश को विधायक दल का नेता चुने जाने सम्बन्धी पत्र  देती है तो मांझी का दावा बेकार हो जायेगा जो कि वैसे भी बेकार होने लग रहा है क्योंकि अभी अभी प्राप्त समाचारों के अनुसार नितीश कुमार को बिहार विधानसभा के स्पीकर ने भी जद[यु ] के विधायक दल का नेता स्वीकार किया है .
     साथ ही यहाँ राज्यपाल का विवेक उन्हें राज्य में लोकतान्त्रिक सरकार बनाये रखने का एक मजबूत आधार नितीश के दावे के रूप में दे रही है जिसे स्वीकार करते हुए राज्यपाल को मांझी को हटाते हुए नितीश को सरकार बनाने का निमंत्रण देने में अपने विवेक का प्रयोग करने में तनिक भी विलम्ब नहीं करने की संवैधानिक शक्ति भी मिल रही है .

शालिनी कौशिक
   [कानूनी ज्ञान ]

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

कानून साथ है नारी के


विमान में छेड़छाड़, कैमरे में कैद
मुंबई से भुवनेश्वर जाने वाली फ्लाईट में एक 60 वर्षीय उद्यमी ने एक युवती से छेड़छाड़ की। बुजुर्ग की ये हरकत कैमरे में कैद भी हो गई जो सोशल मीडिया में वायरल है।
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनसार, युवती ने शख्स की इस गंदी हरकत पर पुलिस से शिकायत करने की धमकी दी तो बुजुर्ग गिड़गिड़ाने लगा और कैमरे को देख अपन चेहरा छुपाने लगा।
महिला ने शख्स का मोबाइल छीन कर उसी से वीडियो बनाया और इसके बाद फ्लाइट भुवनेश्वर पहुंचने पर पुलिस से शिकायत की जिसके बाद छेड़छाड़ करने वाले शख्स को गिरफ्तार किया गया।[अमर उजाला से साभार ]


ये समाचार और ये वीडियो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि आदमी सुधरने वाले नहीं हैं .जिस तरह से आये दिन महिलाओं के साथ अभद्रता और बलात्कार की ख़बरें आ रही हैं और जिस तरह से कानून में महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं को देखते हुए दंड की अवधि और दंड के तरीके में परिवर्तन कर उन्हें कठोर किया जा रहा है उसका अगर जरा सा भी असर माना जाये तो ऐसे अपराधों की संख्या में कमी आनी चाहिए किन्तु हो क्या रहा है ये घटनाएँ उतनी ही तेजी से बढ़ती जा रही हैं हाँ इतना अवश्य है कि महिलाओं में ज़रूर गुस्सा बढ़ रहा है और अपने प्रति ऐसे व्यवहार करने वालों को सबक सीखने की प्रवर्ति  भी  और यही कारण है कि आज ऐसी नापाक हरकते करने वाले अपना मुंह छिपाते भी नज़र आने लगे हैं .
   आज ये घटनाएँ इतनी तेजी से बढ़ रही हैं कि इनके खिलाफ कड़े कदम उठाये जाने ज़रूरी हो गए हैं आंकड़े कहते हैं -
 ये आंकड़े इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आज ये घटनाएँ किस कदर नारी जीवन को गहरे अंधकार में धकेल रही हैं -
     अश्लीलता का असर -
राज्य                २०१२              २०१३
आंध्र प्रदेश          २८                  २३४
केरल                 १४७                १७७
उत्तर प्रदेश         २६                  १५९
महाराष्ट्र            ७६                  १२२
असम                ०                    १११
भारत               ५८९                  १२०३
      -सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम के तहत दर्ज मामले [पोर्नोग्राफी के चलते जहाँ महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा बढ़ रही है वहीं मासूम भी इसके दुष्प्रभाव से बचे हुए नहीं हैं .आंकड़े लोकसभा ]
आज की नारी सब पर भारी 
     साक्षी नाम की १५ वर्षीय लड़की और उत्तर प्रदेश का सी.ओ.स्तर का अधिकारी अमरजीत शाही ,कोई सोच भी नहीं सकता था कि एक १५ वर्षीय नाजुक कोमल सी लड़की उसका मुकाबला कर पायेगी पर उसने किया और अपना नाम तक नहीं बदला क्योंकि उसका मानना है कि मुजरिम वह नहीं उसका उत्पीड़न करने वाला  है और उसी की हिम्मत का परिणाम है कि १४ अगस्त को शाही को अपहरण ,बलात्कार और आतंकित करने के जुर्म में दोषी पाया गया और तीन दिन बाद उसे १० साल की सख्त कारावास और ६५,००० रूपये का अर्थ दंड भरने की  सजा सुनाई गयी.
    शामली में ९० वर्षीय वृद्धा ने कोर्ट में रेप की दास्तान बयान की और उसके दुष्कर्मी को १० साल का कारावास मिला .
        बंगलुरु में महिला अधिकारी की इज़्ज़त लूटने के प्रयास में जवान बर्खास्त .
   कंकरखेड़ा मेरठ की आशा कहती हैं कि महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को रोकने के लिए सिर्फ कानून से काम चलने वाला नहीं .कानून की कमी नहीं पर इसके लिए समाज को भूमिका निभानी होगी .लाडलो पर अंकुश लगाना होगा .
  नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में २०१३ में दर्ज किये गए रेप के मामले में प्रत्येक १०० मामलों में ९५ दोषी व्यक्ति पीड़िताओं के परिचित ही थे .अभी हाल ही में घटित लखनऊ निर्भया गैंगरेप में भी दोषी मृतका का परिचित ही था .इसलिए ऐसे में महिलाओं की जिम्मेदारी  बनती है कि वे सतर्क रहे और संबंधों को एक सीमा में ही रखें .
   आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है .
कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं करती हैं और इसके लिए विधि बनाने में काफी समय लगेगा ;अतः जब तक विधान मंडल समुचित विधि नहीं बनाता है न्यायालय द्वारा विहित मार्गदर्शक सिद्धांत को लागू किया जायेगा .
न्यायालय ने ये भी निर्णय दिया कि ''प्रत्येक नियोक्ता या अन्य व्यक्तियों का यह कि काम के स्थान या अन्य स्थानों में चाहे प्राईवेट हो या पब्लिक ,श्रमजीवी महिलाओं के यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित उपाय करे .इस मामले में महिलाओं के अनु.१४,१९ और २१ में प्रदत्त मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विशाखा नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने लोकहित वाद न्यायालय में फाईल किया था .याचिका फाईल करने का तत्कालीन कारण राजस्थान राज्य में एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना थी .न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये-
[१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं - सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींटाकशी करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम [१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शारीरिक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी  छींटाकशी करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम या विनियमों में यौन उत्पीडन रोकने सम्बन्धी नियम शामिल किये जाने चाहिए और ऐसे नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए समुचित दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए .
[स] प्राईवेट क्षेत्र के नियोक्ताओं के सम्बन्ध में औद्योगिक नियोजन [standing order  ]अधिनियम १९४६ के अधीन ऐसे निषेधों को शामिल किया जाना चाहिए.
[द] महिलाओं को काम,आराम,स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञानं के सम्बन्ध में समुचित परिस्थितियों का प्रावधान होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया  जाना चाहिए  कि महिलाओं को काम के स्थान में कोई विद्वेष पूर्ण वातावरण न हो उनके मन में ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि वे नियोजन आदि के मामले में अलाभकारी स्थिति में हैं .
[२] जहाँ ऐसा आचरण भारतीय दंड सहिंता या किसी अन्य विधि के अधीन विशिष्ट अपराध होता हो तो नियोक्ता को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को शिकायत करके समुचित कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए .
[३]यौन उत्पीडन की शिकार महिला को अपना या उत्पीडनकर्ता  का स्थानांतरण करवाने का विकल्प होना चाहिए.
न्यायालय ने कहा कि ''किसी वृत्ति ,व्यापर या पेशा के चलाने के लिए सुरक्षित काम का वातावरण होना चाहिए .''प्राण के अधिकार का तात्पर्य मानव गरिमा से जीवन जीना है ऐसी सुरक्षा और गरिमा की सुरक्षा को समुचित कानून द्वारा सुनिश्चित कराने तथा लागू करने का प्रमुख दायित्व विधान मंडल और कार्यपालिका का है किन्तु जब कभी न्यायालय के समक्ष अनु.३२ के अधीन महिलाओं के यौन उत्पीडन का मामला लाया जाता है तो उनके मूल अधिकारों की संरक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना ,जब तक कि  समुचित विधान नहीं बनाये जाते उच्चतम न्यायालय का संविधानिक कर्त्तव्य है.
- -इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने  दिल्ली डेमोक्रेटिक वर्किंग विमेंस फोरम बनाम भारत संघ [१९९५] एस.सी.१४ में पुलिस स्टेशन पर पीड़िता को विधिक सहायता की उपलब्धता की जानकारी दिया जाना ,पीड़ित व्यक्ति की पहचान गुप्त रखा जाना और आपराधिक क्षति प्रतिकर बोर्ड के गठन का प्रस्ताव रखा है .
-भारतीय दंड सहिंता की धारा ३७६ में विभिन्न प्रकार के बलात्कार के लिए कठोर कारावास जिसकी अवधि १० वर्ष से काम नहीं होगी किन्तु जो आजीवन तक हो सकेगी और जुर्माने का प्रावधान भी रखा गया है .
-महिलाओं की मदद के लिए विभिन्न तरह के और भी उपाय हैं -
-आज की  सबसे लोकप्रिय वेबसाइट फेसबुक पर महिलाओं की मदद के लिए पेज है -
helpnarishakti@yahoo.com
-राष्ट्रीय महिला आयोग से भी महिलाएं इस सम्बन्ध में संपर्क कर सकती हैं उसका नंबर है -
  011-23237166,23236988
-राष्ट्रीय महिला आयोग को शिकायत इस नंबर पर की जा सकती है -
 23219750
-दिल्ली निवासी महिलाएं दिल्ली राज्य महिला आयोग से इस नंबर पर संपर्क कर सकती हैं -
011 -23379150  ,23378044
-उत्तर प्रदेश की महिलाएं अपने राज्य के महिला आयोग से इस नंबर पर संपर्क कर सकती हैं -
0522 -2305870 और ईमेल आई डी है -up.mahilaayog@yahoo.com
     आज सरकार भी नारी सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है और उसकी यह प्रतिबद्धता दिखती है अब दुष्कर्म पीड़िताओं की मदद के लिए निर्भया केंद्र खुलेंगे जिसमे पीड़िताओं को २४ घंटे चिकित्सीय सहायता मिलेगी और जहाँ डाक्टर ,नर्स के अलावा वकील भी केन्द्रों पर मौजूद रहेंगे .यही नहीं अब सरकार गावों में खुले में शौच को भी इस समस्या से जोड़ रही है और मोदी जी ने स्वतंत्रता दिवस पर इस सम्बन्ध में त्वरित प्रबंध किये जाने के प्रति अपना दृढ संकल्प दिखाया है .
   अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने क्लिंटन फाउंडेशन के कार्यक्रम में कहा कि महिलाओं और लड़कियों में आर्थिक व् सामाजिक रूप से आगे बढ़ने की असीमित क्षमता है इसके लिए ज़रूरी है कि वे अपने निर्णय खुद लें और आज उन्हें दिखाना ही होगा कि ये कहर भी झेलकर वे आगे बढ़ती रहेंगी और इसका डटकर मुकाबला करती रहेंगी .आज महिलाएं वह सब कर रही हैं जो उनके लिए आज की स्थितियों में करना अपने जीवन को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक हो गया है किन्तु इस सबके बावजूद वे यौन उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं .दंड विधि संशोधन अधिनियम २०१३ ने उन्हें यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए धारा ३५४ भारतीय दंड विधान में कुछ प्रविष्टियाँ और भी प्रतिस्थापित की हैं जो ये हैं -
धारा ३५४- स्त्री की लज्जा भंग  करने के आशय से उस पर हमला या अपराधिक बल का प्रयोग करने में अब १ वर्ष का कारावास जो ५ वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना ,
धारा ३५४-क- अवांछनीय शारीरिक संपर्क और अंग क्रियायों की प्रकृति लैंगिक उत्पीड़न या अश्लील चित्र दर्शित करते हुए यौन स्वीकृति की मांग या अनुरोध पर कारावास जो ३ वर्ष तक का हो सकेगा या जुर्माना या दोनों
   और लैंगिक रूप से आभासी टिप्पणी करने की प्रकृति का यौन उत्पीड़न पर कारावास जो १ वर्ष तक का हो सकेगा या जुर्माना या दोनों
 धारा ३५४ ख -स्त्री को विवस्त्र करने के आशय से उसपर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग होने पर कारावास जो ३ वर्ष से कम नहीं किन्तु जो ७ वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना
धारा ३५४ ग -दृश्यरतिक्ता -में प्रथम दोषसिद्धि के लिए कारावास जो १ वर्ष से कम नहीं किन्तु जो ३ वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना .
               द्वित्य या पश्चातवर्ती दोषसिद्धि पर कारावास जो  ३ वर्ष से कम  नहीं किन्तु जो ७ वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना।
धारा ३५४ घ -पीछा करने पर प्रथम दोषसिद्धि के लिए ३ वर्ष तक का कारावास और जुर्माना
           द्वित्य या पश्चातवर्ती दोषसिद्धि के लिए ५ वर्ष तक का कारावास और जुर्माना।
   ऐसे में कानून की जानकारी और महिलाओं का अपने पर विश्वास ही उन्हें आदमियों की इस प्रवर्ति से सुरक्षित रख सकता है जो उनके दिलो-दिमाग में एक आदत बनकर बस गयी है .आज महिलाओं के लिए ज़रूरी है कि वे हर तरह से इन परिस्थितियों का मुकाबला करें और ऐसी प्रवर्ति रखने वाले पुरुषों को कड़ा सबक सिखाएं न कि उनसे डरकर घर में छिपकर बैठें क्योंकि अगर वे ये सोचती हैं कि वे घर में छिपकर ऐसी स्थितियों  से बच जाएँगी तो फिल्म 'प्रेमरोग ' को याद कर लें जिसमे हेरोइन पद्मिनी कोल्हापुरी अपने जेठ की वासना का शिकार होती है और अगर ये सोचती हैं कि घर से बाहर निकलकर वे ऐसी घटना से बच नहीं सकती तो आज की प्रगतिशील नारियों को देखकर प्रेरणा लें जो पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर अपनी शर्तों पर काम कर रही हैं और सारी दुनिया पर राज कर रही हैं इसलिए मजबूत बनें और उपरोक्त समाचार को पढ़कर उस लड़की की हिम्मत से प्रेरणा लेते हुए हर व्यभचारी को ऐसे ही सबक सिखाएं और बस यही कहती जाएँ -


मज़म्मत करनी है मिलकर बिगड़ते इस माहौल की ,
मरम्मत करनी है कसकर दरिन्दे हर शैतान की.
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हमें न खौफ मर्दों से न डर इन दहशतगर्दों से ,
मुआफी देनी नहीं है अब मुजरिमाना किसी काम की.
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मुकम्मल रखती शख्सियत नहीं चाहत मदद की है ,
मुकर्रम करनी है हालत हमें अपने सम्मान की.
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गलीज़ है वो हर इन्सां जिना का ख्याल जो रखे ,
मुखन्नस कर देना उसको ख्वाहिश ये यहाँ सब की.
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बहुत गम झेले औरत ने बहुत हासिल किये  हैं दर्द ,
फजीहत करके रख देगी मुकाबिल हर ज़ल्लाद की .
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भरी है आज गुस्से में धधकती एक वो ज्वाला है ,
खाक कर देगी ''शालिनी''सल्तनत इन हैवानों की.
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शब्दार्थ-मज़म्मत-निंदा ,मरम्मत-शारीरिक दंड ,मुकर्रम-सम्मानित,मशक्कत-कड़ी मेहनत,मुकाबिल -सामने वाला ,गलीज़-अपवित्र,मुखन्नस-नपुंसक,मुकम्मल-सम्पूर्ण ,जिना-व्यभिचार 


शालिनी कौशिक
   [कानूनी ज्ञान ]