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संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -2

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प्रश्न -२ क्या जिस मामले में राष्ट्रपति या राज्यपाल संविधान में मिले माफ़ी देने की शक्ति का इस्तेमाल कर चुके हों उस मामले में सरकार दंड प्रक्रिया संहिता की धरा ४३२-४३३ की शक्तियों का इस्तेमाल कर माफ़ी दे सकती है ? कानूनी स्थिति -स्वरन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ,[१९९८]४ एससीसी.७५ उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद ७२/१६१ के अंतर्गत यदि राष्ट्रपति/राज्यपाल किसी कैदी के पक्ष में दंड के परिहार [remission] का आदेश जारी करते हैं तो उस आदेश के न्यायिक पुनर्विलोकन में न्यायालय उन आधारों के गुण-दोष के खोज नहीं करते जिनका अनुसरण करके परिहार का वह आदेश जारी किया गया है परन्तु जहाँ कतिपय सारवान तथ्यों को ,जैसे कि पिटीशनर द्वारा गंभीर अपराधों के अन्य दण्डित मामलों में अंतर्ग्रस्त होना ,पूर्व में करुणा की याचिका का अस्वीकृत कर दिया जाना ,कारागार प्राधिकारी की प्रतिकूल रिपोर्ट आदि ,राष्ट्रपति या राज्यपाल की सूचना में नहीं लाया जाता ,वहां इस निर्देश के साथ कि कानून के अनुसार फिर से दंड के परिहार का आदेश पारित किया जाये ,राष्ट्रपति या राज्यपाल के आदेश को विखंडित किया जा सकता है क्योंकि

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -1

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Constitution bench to decide fate of Rajiv killers    राजीव गांधी के हत्यारों को फिलहाल जेल में ही रखने का उच्चतम न्यायालय ने फैसला किया है और इस सम्बन्ध में दोषियों की रिहाई का मसला संविधान पीठ को भेजते हुए अपने कुछ महत्वपूर्ण सवाल संविधान पीठ के सामने रखे हैं जिनका विवरण और उनके सम्बन्ध में कानूनी स्थिति कुछ इस प्रकार है - *उच्चतम न्यायालय का पहला प्रश्न ये है कि - प्रश्न-1 -क्या ताउम्र कैद की सजा भोग रहा उम्र कैदी रिहाई की मांग कर सकता है या फिर विशेष अपराधों में जिनमे फांसी की सजा ताउम्र कैद में तब्दील की गयी हो ऐसे दोषी की सजा माफ़ करने के बाद रिहा करने पर रोक लगायी जा सकती है ? कानूनी स्थिति -ताउम्र कैद की सजा भोग रहा उम्र कैदी रिहाई की मांग नहीं कर सकता .भारतीय दंड संहिता की धारा 57  में दिए गए आजीवन कारावास के प्रावधान के विषय में अभिमत व्यक्त करते हुए उच्चतम न्यायालय ने सुभाष चन्द्र बनाम कृष्णलाल एवं अन्य ए.आई.आर .2001  एस.सी.1903 में कहा -''कि इस दंड से दण्डित व्यक्ति को उसके जीवन पर्यन्त कारावास भोगना होगा जब तक कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसकी सजा लघुकरण य

वसीयत सम्बन्धी हिन्दू विधि

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वसीयत सम्बन्धी हिन्दू विधि वसीयत अर्थात इच्छा पत्र एक हिन्दू द्वारा अपनी संपत्ति के सम्बन्ध में एक विधिक घोषणा के समान है जो वह अपनी मृत्यु के बाद सम्पन्न होने की इच्छा करता है। प्राचीन हिन्दू विधि में इस सम्बन्ध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं होती किन्तु आधुनिक विद्वानों के अनुसार  हिन्दू इच्छा पत्र द्वारा अपनी संपत्ति किसी को दे सकता है . वसीयत किसी जीवित व्यक्ति द्वारा अपनी संपत्ति के बारे में कानूनी घोषणा है जो उसके मरने के बाद प्रभावी होती है . वसीयत का पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है पर दो साक्षियों द्वारा प्रमाणित होना आवश्यक है [माधव्य बनाम अचभा २ एम.एल.जे ७१६ ] प्रत्येक स्वस्थ मस्तिष्क वाला वयस्क व्यक्ति जिसने भारतीय वयस्कता अधिनियम १८७५ के अंतर्गत वयस्कता की आयु प्राप्त की है ,इच्छापत्र द्वारा अपनी संपत्ति का निवर्तन कर सकता है अर्थात किसी को दे सकता है [हरद्वारी लाल बनाम गौरी ३३ इलाहाबाद ५२५ ] वसीयत केवल उस संपत्ति की ही की जा सकती है जिसे अपने जीवित रहते दान रीति द्वारा अंतरित किया जा सकता हो ,ऐसी संपत्ति की वसीयत नहीं की जा सकती जिससे पत्नी का कानूनी अधिकार और किसी का भरण-प

श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.

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   आज यदि देखा जाये तो महिलाओं  के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं  जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है . कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए  विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण

धारा ५०६ भारतीय दंड संहिता में दंडनीय है ये धमकी

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मोदी लहर में  ''हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुपट्टा  मलमल का '' की तर्ज़ पर लहराती इठलाती भाजपा ''यहाँ के हम सिकंदर ,चाहें तो रखें सबको अपनी जेब के अंदर ''गाने में मस्त थी की एकाएक लहर ने दिशा पलट दी ,फूलों के झौंके पत्थरों के टुकड़ों समान हो गए और भ्रम में डूबे भाजपाइयों के हंसगुल्लों की चाशनी इतनी मीठी हो गयी कि मुंह कड़वा करने लगी ऐसा हुआ तब जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार श्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव आयोग द्वारा अनिवार्य किये जाने पर बाध्य होकर अपनी वास्तविक स्थिति ,जो वैवाहिक की थी को नामांकन पत्र में भरा  ,उस वैवाहिक स्थिति को जिसे वे अपने चार विधानसभा चुनावों में नकारते आ रहे थे और जिसका खुलासा कॉंग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह जी ने किया नहीं तो संभव था कि वे अब भी चुनाव आयोग के निर्देश को दरकिनार कर स्वयं को अविवाहित दिखा देते क्योंकि चुनाव आयोग की उनके सामने क्या प्रास्थिति है सब जानते हैं और ऐसा वे और भाजपा इस बार ७ अप्रैल को अपना घोषणापत्र जारी कर दिखा चुके हैं . अब जब प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के नशे में झूमते मोदी जी द्वारा

धारा ४९८-क भा. द. विधान 'एक विश्लेषण '

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    धारा ४९८-क भा. द. विधान 'एक विश्लेषण '                                     विवाह दो दिलों का मेल ,दो परिवारों का मेल ,मंगल कार्य और भी पता नहीं किस किस उपाधि से विभूषित किया जाता है किन्तु एक उपाधि जो इस मंगल कार्य को कलंक लगाने वाली है वह है ''दहेज़ का व्यापार''और यह व्यापर विवाह के लिए आरम्भ हुए कार्य से आरम्भ हो जाता है और यही व्यापार कारण है उन अनगिनत क्रूरताओं का जिन्हें झेलने  को  विवाहिता स्त्री तो विवश है और विवश हैं उसके साथ उसके मायके के प्रत्येक सदस्य.कानून ने विवाहिता स्त्री की स्थति ससुराल में मज़बूत करने हेतु कई उपाय किये और उसके ससुराल वालों व् उसके पति  पर लगाम कसने को भारतीय दंड सहिंता में धारा ४९८-क स्थापित की और ऐसी क्रूरता करने वालों को कानून के घेरे में लिया, पर जैसे की भारत में हर कानून का सदुपयोग बाद में दुरूपयोग पहले आरम्भ   हो जाता है ऐसा ही धारा ४९८-क के साथ हुआ.दहेज़ प्रताड़ना के आरोपों में गुनाहगार के साथ बेगुनाह भी जेल में ठूंसे जा रहे हैं .सुप्रीम कोर्ट इसे लेकर परेशान है ही विधि आयोग भी इसे लेकर , धारा ४९८-क को यह मानकर कि