मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

मुस्लिम और हिन्दू महिलाओं के विवाह-विच्छेद से सम्बंधित अधिकार

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आज मैं आप सभी को जिस विषय में बताने जा रही हूँ उस विषय पर बात करना भारतीय परंपरा में कोई उचित नहीं समझता क्योंकि मनु के अनुसार कन्या एक बार ही दान दी जाती है किन्तु जैसे जैसे समय पलटा वैसे वैसे ये स्थितियां भी परिवर्तित हो गयी .महिलाओं ने इन प्रथाओं के कारण [प्रथाओं ही कहूँगी कुप्रथा नहीं क्योंकि कितने ही घर इन प्रथाओं ने बचाएं भी हैं] बहुत कष्ट भोगा है .हिन्दू व मुस्लिम महिलाओं के अधिकार इस सम्बन्ध में अलग-अलग हैं .
  सर्वप्रथम हम मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं.पहले मुस्लिम महिलाओं को तलाक के केवल दो अधिकार प्राप्त थे १-पति की नपुन्संकता,२-परपुरुशगमन का झूठा आरोप[लियन]
किन्तु न्यायिक विवाह-विच्छेद [मुस्लिम विवाह-विच्छेद  अधिनियम१९३९]द्वारा मुस्लिम महिलाओं को ९ आधार प्राप्त हो गए हैं:
१-पति की अनुपस्थिति,
२-पत्नी के भरण-पोषण में असफलता,
३-पति को सात साल के कारावास की सजा,
४-दांपत्य दायित्वों के पालन में असफलता,
५-पति की नपुन्संकता,
६-पति का पागलपन,
७-पत्नी द्वारा विवाह की अस्वीकृति[यदि विवाह के समय लड़की १५ वर्ष से काम उम्र की हो तो वह १८ वर्ष की होने से पूर्व विवाह को अस्वीकृत  कर सकती है],
८-पति की निर्दयता,
९-मुस्लिम विधि के अंतर्गत विवाह विच्छेद के अन्य आधार,
    ऐसे ही हिन्दू विधि में विवाह विधि संशोधन अधिनियम १९७६ के लागू होने के बाद महिलाओं की स्थिति मज़बूत हुई है और पति द्वारा बहुविवाह व पति द्वारा बलात्कार,गुदा मैथुन अथवा पशुगमन  दो और आधार महिलाओं को प्राप्त हो गए हैं जबकि इससे पूर्व ११ आधार पति-पत्नी दोनों को प्राप्त थे.वे आधार हैं;
१-जारता, २-क्रूरता, ३-अभित्याग, ४ -धर्म-परिवर्तन, ५ -मस्तिष्क विकृत्त्ता  ,६--कोढ़ ,७-- रतिजन्य रोग ,८-संसार परित्याग, ९--प्रकल्पित मृत्यु ,१० -न्यायिक प्रथक्करण , ११- -दांपत्य अधिकारों के पुनर्स्थापन की आज्ञप्ति   का पालन न करना
   इस तरह अब हिन्दू महिलाओं को तलाक के १३ अधिकार प्राप्त है 
 साथ ही हिन्दू महिलाओं का विवाह विधि संशोधन अधिनियम १९७६ की धारा १३ बी में पारस्परिक सहमति से भी विवाह विच्छेद  का अधिकार है उसके विषय में और बालिका भ्रूण हत्या  और विवाह पंजीयन से सम्बंधित छोटी सी जानकारी-
  1. -उपरोक्त अधिनियम की धारा १३ बी में पारस्परिक सहमति से भी विवाह विच्छेद किया जा सकता है.उसकी याचिका जिला अदालत में दायर की जाती है और याचिका प्रस्तुत किये जाने के ६ माह या १८ माह पश्चात् यदि वापस नहीं ली गयी तो न्यायालय सुनवाई व जाँच के पश्चात् जो उचित समझे वह निर्णय करता है.
  2. -देश में बालिका भ्रूण हत्या रोकने हेतु मादा भ्रूण का पता लगाने को रोकने के लिए प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम १९९४ बनाकर लागू कर दिया गया है.इसका उल्लंघन करने वालों पर १०-१५ हज़ार रूपये तक जुर्माना तथा ३ से ५ साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है.
-विवाह पंजीयन अनिवार्य विधेयक २००५ द्वारा प्रत्येक विवाह का पंजीकरण  अनिवार्य बनाकर महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने हेतु राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा विधेयक तैयार किया गया है.


किन्तु जैसा की मैं आपसे पहले भी कह चुकी हूँ कि महिलाओं में अपने अधिकारों को लेकर कोई जागरूकता नहीं है वे घर बचाने के नाम पर पिटती रहती  हैं,मरती रहती हैं,सिसक सिसक कर सारी जिंदगी गुज़ार देती हैं यदि एक बार वे पुरुषों  को अपनी ताक़त का अहसास करा दें तो शायद इन घटनाओ पर कुछ रोक लग सकती है क्योंकि इससे पुरुषों  के  निर्दयी रवैय्ये को कुछ चुनौती तो मिलेगी.मैं नहीं चाहती आपका घर टूटे किन्तु मैं महिलाओं को भी टूटते नहीं देख सकती इसीलिए आपको ये जानकारी दे रही हूँ ताकि आपकी हिम्मत बढे और आप अपना और अपनी और बहनों का जीवन प्यार व विश्वास से सजा सकें...
    शालिनी कौशिक 

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

आत्महत्या-प्रयास सफल तो आज़ाद असफल तो अपराध .

आत्महत्या-प्रयास सफल तो आज़ाद असफल तो अपराध .
 

   भारतीय दंड सहिंता की धारा ३०९ कहती है -''जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा ओर उस अपराध को करने के लिए कोई कार्य करेगा वह सादा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .''
सम्पूर्ण दंड सहिंता में ये ही एक ऐसी धारा है जिसमे अपराध के होने पर कोई सजा नहीं है ओर अपराध के पूर्ण न हो पाने पर इसे करने वाला सजा काटता है.ये धारा आज तक न्यायविदों के गले से नीचे नहीं उतरी है क्योंकि ये ही ऐसी धारा है जिसे न्याय की कसौटी पर खरी नहीं कहा जा सकता है .आये दिन समाचार पत्रों में ऐसे समाचार आते हैं -''जैसे अभी हाल में मुज़फ्फरनगर में एक महिला द्वारा अपने व् अपने तीन बच्चों पर तेल छिड़ककर आत्महत्या के प्रयास करने पर पुलिस द्वारा उसे पकड़ा गया .ऐसे ही एक समाचार के अनुसार आत्मदाह के प्रयास पर मुकदमा ,ये ऐसे समाचार हैं जो हमारी न्याय व्यवस्था पर ऊँगली उठाने के लिए पर्याप्त हैं .
पी.रथिनम नागभूषण पट्नायिक बनाम भारत संघ ए.आई.आर. १९९४ एस.सी. १८४४ के वाद में दिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय   ने दंड विधि का मानवीकरण करते हुए अभिकथन किया है कि ''व्यक्ति को मरने का अधिकार प्राप्त है .''इस न्यायालय  की खंडपीठ ने [न्यायमूर्ति आर एम् सहाय एवं न्यायमूर्ति बी एल हंसारिया द्वारा गठित ]दंड सहिंता की धारा ३०९ को जो कि आत्महत्या के प्रयास को अपराध निरुपित करती है ,असंवैधानिक घोषित कर दिया क्योंकि यह धारा संविधान के अनुच्छेद २१ के प्रावधानों से विसंगत थी .
     उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय में अभिकथन किया है कि'' किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन के अधिकार का उपभोग स्वयं के अहित ,अलाभ या नापसन्दी से करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता .आत्महत्या का कृत्यधर्म नैतिकता या लोकनीति के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता है तथा आत्महत्या के प्रयास के कृत्य का समाज पर कोई हानिकारक या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है इसके आलावा आत्महत्या या आत्महत्या के प्रयास से अन्यों को कोई हानि कारित नहीं होती  इसीलिए व्यक्ति की इस व्यैतिक स्वतंत्रता में राज्य द्वारा हस्तक्षेप किये जाने का कोई औचित्य नहीं है .
          दंड सहिंता की धारा ३०९ को संविधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत व्यक्ति को प्राप्त स्वतंत्रता का अतिक्रमण निरूपत करते हुए  उच्चतम न्यायालय ने कहा -
''इस धारा का दंड विधि से विलोपन होना चाहिए ताकि दंड विधि का मानवीकरण हो सके .''
विद्वान न्यायाधीशों ने इस धारा को क्रूर व् अनुचित बताया और  कहा कि इस धारा के कारण व्यक्ति दोहरा दंड भुगतता है प्रथम तो वह आत्महत्या की यंत्रणा भुगतता है और आत्महत्या करने में असफल रहने पर उसे समाज में अपकीर्ति या बदनामी भुगतनी पड़ती है जो काफी पीड़ा दायक होती है ऐसी स्थिति को स्वयं न्यायालय भी अनुचित मानते हैं और इस धारा को विलोपित किया जाना आवश्यक मानते हैं .

क्योंकि एक ऐसा व्यक्ति जिसने आत्महत्या का प्रयास किया ऐसी स्थिति में होता है कि वह अपने परिवार समाज से फिर से जुड़ सकता है किन्तु उसके लिए दंड का प्रावधान उसके लिए और भी मुश्किलें खड़ी कर देता है .ऐसा प्रावधान तो आत्महत्या करने वाले के लिए होना चाहिए किन्तु उसके लिए ऐसा संभव नहीं है .अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने आगे कहा कि यह कहना गलत है कि आत्महत्या करने का प्रयास करने वाले व्यक्ति को दंड नहीं मिलता है जबकि वह तो दुहरा दंड भोगता है प्रथम आत्महत्या करने के प्रयास में उसे पहुंची यंत्रणा और संत्रास ,तथा दूसरे आत्महत्या करने में विफल रहने पर उसकी बदनामी या अपकीर्ति 
मारुति श्रीपति  दूबल बनाम महाराष्ट्र राज्य १९८७ क्रि.ला.जन.७४३ बम्बई में अभियोजन कार्यवाही इसलिए निरस्त कर दी क्योंकि यह धारा असंवैधानिक है न्यायमूर्ति सांवंत ने इसे संविधान के अनुच्छेद १४ व् २१ के उल्लंघन के कारण शक्ति बाह्य [ultra vires ]मानाऔर इसके विलोपन के लिए कहा .और इसके कारण निम्न बताये -
१-अनुच्छेद २१ में व्यक्ति को जीवन का अधिकार प्राप्त है जिसमे जीवन को समाप्त करने का अधिकार विविक्षित रूप से शामिल है ऐसा इसलिए क्योंकि अनु.२१ में दिए गए मौलिक अधिकारों की व्याख्या अन्य मौलिक अधिकारों के समान की जानी चाहिए चूँकि वक् स्वतंत्रता में न बोलने के अधिकार का भी समावेश है  तथा व्यवसाय करने की स्वतंत्रता में व्यवसाय न करने के अधिकार का भी समावेश है अतः जीवन के अधिकार में जीवन को समाप्त करने का अधिकार भी शामिल है .
२- यदि इस बात पर विचार किया जाये कि साधारणतःव्यक्ति आत्महत्या की ओर प्रवृत क्यों होता है तो प्राय यह देखा जाता है कि इसके लिए मानसिक अस्वस्थता तथा अस्थिरता ,असह्य शारीरिक कष्ट .असाध्य रोग आसाधारण शारीरिक विकृति सांसारिक  सुख के प्रति विरक्ति आदि में व्यक्ति विवश होकर आत्महत्या का मार्ग अपनाता है .इस प्रकार जो व्यक्ति पहले से ही व्यथित ओर जीवन से हताश है क्या उसे आत्महत्या के प्रयास के लिए दंड दिया जाना उचित होगा ?
३- भारतवर्ष में आत्महत्या के अनेक प्रकार चिरकाल से प्रचलित रहे हैं जौहर सती प्रथा आदि प्रमुख रूप से प्रचलित थे ,इस दृष्टि से भी आत्महत्या के प्रयास को अपराध माने जाने का कोई औचित्य नहीं है .
इसलिए न्यायालय ने इस धारा को अनु.१४ व् २१ का उल्लंघन करते हैं ओर मनमाने भी हैं ये माना.
     भारत के विधि आयोग ने भी अपने ४२ वे प्रतिवेदन में १९७१ में धारा ३०९ को निरसित किये जाने की अनुशंसा की थी क्योंकि उसके विचार से इस धारा के उपबंध कठोर होने के साथ साथ न्यायोचित नहीं हैं .
तात्पर्य यह है कि पी.आर.नागभूषण पट्नायिक  बनाम भारत संघ के वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा २६ अप्रैल १९९४ को दिए गए निर्णय के परिणाम स्वरुप दंड सहिंता  की धारा ३०९ असंवैधानिक होने के कारण शून्य घोषित की गयी तथा अपीलार्थी की रिट याचिका स्वीकार करते हुए उरिसा के कोरापुट जिले के गुनपुर के सब  जज के न्यायालय में लंबित प्रकरण संख्या जी.आर.१७७ सन १९८४ की राज्य बनाम नाग भूषण पतनायिक    के वाद की कार्य वाही निरस्त कर दी गयी .अतः इस निर्णय के बाद अब आत्महत्या के प्रयास को अपराध नहीं माना जायेगा ओर इस प्रकार धारा ३०९ के प्रावधान अब निष्प्रभावी हो गए हैं.
इसी प्रकार लोकेन्द्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य  ए.आई आर.१९९६ सु.को. में न्यायालय ने कहा -जब कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तब उसे कुछ सुस्पष्ट व्यक्त कार्य करने होते हैं ओर उनका उद्गम अनु.२१ के अंतर्गत ''प्राण के अधिकार के  संरक्षण नहीं खोजा जा सकता अथवा उसमे सम्मिलित नहीं किया जा सकता .प्राण की पवित्रता के महत्वपूर्ण पहलू की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए  .अनु.२१ प्राण ओर देहिक स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करने वाला उपबंध है तथा कल्पना की किसी भी उड़ान से ''प्राण के संरक्षण '' में प्राण की समाप्ति शामिल होने का अर्थ नहीं लगाया जा सकता .किसी व्यक्ति को आत्महत्या करके अपने प्राण समाप्त करना अनुज्ञात करने का जो भी दर्शन हो उसमे गारंटी किया हुआ मूल अधिकार के भाग रूप में ''मरने का अधिकार'' सम्मिलित है ऐसा अनुच्छेद २१ का अर्थान्वयन  करना हमारे लिए कठिन है .अनुच्छेद २१ में निश्चित रूप से व्यक्त ''प्राण का अधिकार'' नैसर्गिक अधिकार है किन्तु आत्महत्या प्राण की अनैसर्गिक समाप्ति अथवा अंत है ओर इसलिए प्राण के अधिकार की संकल्पना के साथ अस्न्योज्य ओर असंगत है .हम यह अभिनिर्धारित करने में असमर्थ हैं कि भा.दंड.सहिंता की धारा ३०९ अनु.२१ की अतिक्रमण कारी है .इस वाद में पी .रथिनं नागभूषण पतनायिक बनाम भारत संघ उल्टा गया .
साथ ही कानून विदों की भी ये राय है कि आज इस धारा  को  निष्प्रभावी तो कर दिया गया है किन्तु आज भी इस पर कार्य चल रहा है और आत्महत्या के प्रयास में अब भी मुक़दमे दर्ज किये जा रहे हैं.
                                                    शालिनी कौशिक 


गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

स्वतंत्रता और अवमान कानून का सार्वभौमिक स्वरुप

---------- Forwarded message ----------
From: Mani Ram Sharma <maniramsharma@gmail.com>
Date: 2012/12/5
Subject: for kind perusal and publication -
To: kaushik_shalini@hotmail.com



नाम: मनीराम शर्मा
पता: नकुल निवास, रोडवेज डिपो के पीछे
     सरदारशहर -331403                                 
     जिला: चुरू (राजस्थान) 
संपर्क: 919460605417 , 919001025852
शैक्षणिक योग्यता : बी कोम , सी ए आई आई बी , एल एल बी
एडवोकेट
वर्तमान में, 22 वर्ष से अधिक स्टेट बैंक समूह में अधिकारी संवर्ग
में  सेवा करने के पश्चात स्वेच्छिक सेवा निवृति प्राप्त, एवं समाज
सेवा में विशेषतः न्यायिक सुधारों हेतु प्रयासरत
ई-मेल :maniramsharma@gmail.com


Name: Mani Ram Sharma
Address: Nakul Niwas , Behind Roadways Depot
Sardarshahar -331403
Distt. Churu (Raj)
M- 919460605417,919001025852
Qualifications: B. Com., CAIIB, LL B
Advocate
Presently Busy Bee in Serving Societal Interests especially
for Judicial Reforms, after taking  voluntary retirement on
completion of 22 years services in Officer Grade in State
Bank Group



स्वतंत्रता और अवमान कानून का सार्वभौमिक स्वरुप
भारत के न्यायालय अवमान अधिनियम की धारा 10 के परंतुक में कहा गया है कि कोई भी उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों के संबंध में ऐसे अवमान का संज्ञान नहीं लेगा जो भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत दंडनीय हैं| न्यायाधीशों के साथ अभद्र व्यवहार, गाली गलोज, हाथापाई आदि ऐसे अपराध हैं जो स्वयं भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत  दंडनीय हैं और उच्च न्यायालयों को ऐसे प्रकरणों में संज्ञान नहीं लेना चाहिए| किन्तु उच्च न्यायालय अपनी प्रतिष्ठा और  अहम् का प्रश्न समझकर ऐसे तुच्छ मामलों में भी कार्यवाही करते हैं| इंग्लॅण्ड के अवमान कानून में तो मात्र उसी कार्य को अवमान माना गया है जो किसी मामले विशेष में प्रत्यक्षत: हस्तक्षेप करता हो जबकि भारत में तो ऐसे मामलों में कार्यवाही ही नहीं की जाती अर्थात झूठी गवाहे देने, झूठा कथन करने या झूठे दस्तावेज प्रस्तुत करने के मामले में भारत में सामान्यतया कोई कार्यवाही नहीं होती और परिणामत: न्यायिक कार्यवाहियां उलझती जाती हैं,जटिल से जटिलतर होती जाती हैं और न्याय पक्षकारों से दूर भागता रहता है|
भारत में कई उदाहरण यह गवाही देते हैं कि देश की न्यायपालिका स्वतंत्र एवं निष्पक्ष नहीं होकर स्वछन्द है| कुछ समय पूर्व माननीय कृषि मंत्री शरद पंवार के थप्पड़ मारने पर हरविन्द्र सिंह को पुलिस ने तत्काल गिरफ्तार कर लिया और उन पर कई अभियोग लगाकर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया| मजिस्ट्रेट ने भी हरविंदर सिंह को 14 दिन के लिए हिरासत में भेज दिया| देश की पुलिस एवं न्यायपालिका से यह यक्ष प्रश्न है कि क्या, संविधान के अनुच्छेद 14 की अनुपालना  में, वे एक सामान्य नागरिक के थप्पड़ मारने पर भी यही अभियोग लगाते, इतनी तत्परता दिखाते और इतनी ही अवधि के लिए हिरासत में भेज देते|
सुप्रीम कोर्ट ने ई.एम.शंकरन नंबुरीपाद बनाम टी नारायण नमीबियार (1970 एआईआर 2015) के अवमान प्रकरण में अपराध के आशय के विषय में कहा है कि उसने ऐसे किसी परिणाम का आशय नहीं रखा था यह तथ्य दण्ड देने  में विचारणीय हो सकता है किन्तु अवमान में दोष सिद्धि के लिए आशय साबित करना आवश्यक नहीं है। जबकि सामान्यतया आशय को अपराध का एक आवश्यक तत्व माना जाता है| एक अन्य प्रकरण सी के दफतरी बनाम ओ पी गुप्ता (1971 एआईआर 1132) के निर्णय में भी सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित किया है कि अवमान के अभियुक्त को मात्र शपथ-पत्र दायर करने की अनुमति है किन्तु वह कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकता| वह अवमान का औचित्य स्थापित नहीं कर सकता| यदि अवमानकारी को आरोपों का औचित्य स्थापित करने की अनुमति दी जाने लगी तो हताश और हारे हुए पक्षकार या एक न एक पक्षकार बदला लेने के लिए न्यायाधीशों को गालियाँ देने लगेंगे|
न्यायालय ने एक अन्य निर्णित वाद का सन्दर्भ देते हुए आगे कहा कि अवमान के मामले में दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधान लागू नहीं होते और इसे अपनी स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित कर सारांशिक कार्यवाही कर निपटाया जा सकता है,मात्र ऐसी प्रक्रिया उचित होनी चाहिए| यह नियम प्रिवी कोंसिल ने पोलार्ड के मामले में निर्धारित किया था और भारत व बर्मा में इसका अनुसरण किया जाता रहा है और यह आज भी कानून है| प्रतिवादी ने वकील नियुक्त करने हेतु समय मांगते हुए निवेदन किया कि वे लोग वर्तमान में चुनाव लडने में व्यस्त हैं किन्तु न्यायालय ने समय देने से मना कर दिया| इस प्रकार अवमान के अभियुक्त को देश के सर्वोच्च न्यायिक संस्थान ने बचाव का उचित अवसर दिए बिना ही दण्डित कर दिया| प्रश्न यह उठता है कि यदि दंड प्रक्रिया संहिता को छोड़कर भी अन्य प्रक्रिया उचित हो सकती है तो फिर ऐसी उचित प्रक्रिया अन्य आपराधिक कार्यवाहियों में क्यों नहीं अपनाई जाती| देश के संवैधानिक न्यायालयों को भ्रान्ति है कि वे अपनी प्रकिया के नियम स्वयं स्वतंत्र रूप से बना सकते हैं और इस भ्रान्ति के चलते वे प्रेक्टिस डायरेक्शन, सर्कुलर, हैण्ड बुक आदि बनाकर अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण का रहे हैं| जबकि देश का संविधान उन्हें ऐसा करने की कोई अनुमति नहीं देता है| संविधान के अनुच्छेद 227(3) के परंतुक के अनुसार उच्च न्यायालयों को राज्यपाल की पूर्वानुमति और अनुच्छेद 145 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से ही प्रक्रिया के नियम बनाने का अधिकार है| वैसे भी अवमान कोई गंभीर और जघन्य अपराध नहीं है जिसके लिए तुरंत दंड देना आवश्यक हो| गंभीर और जघन्य अपराधों के मामलों में विधायिका ने अधिकतम सजा मृत्यु दंड या आजीवन कारावास निर्धारित कर रखी है जबकि अवमान कानून में अधिकतम सजा छ: मास का कारावास मात्र है| 
पुराने समय से यह अवधारणा प्रचलित रही है कि राजा ईश्वरीय शक्तियों का प्रयोग करता है और न्यायाधीश उसका प्रतिनिधित्व करते हैं अत: वे संप्रभु हैं| किन्तु लोकतंत्र के नए युग के सूत्रपात से न्यायपालिका व इसकी प्रक्रियाओं को आलोचना से संरक्षण देना एक समस्या को आमंत्रित करना है| यद्यपि भारतीय अवमान कानून में वर्ष 2006 में किये गए संशोधन से तथ्य को एक बचाव के रूप में मान्य किया जा सकता है यदि ऐसा करना जनहित में हो किन्तु भारतीय न्यायपालिका इतनी उदार नहीं है और उसमें  अपनी आलोचना सुनने का साहस व संयम नहीं है चाहे यह एक तथ्य ही क्यों न हो| हाल ही में मिड-डे न्यूजपेपर के मामले में भारतीय न्यायपालिका की निष्पक्षता और बचाव पक्ष के असहायपन पर पुनः प्रश्न चिन्ह लगा जब अभियुक्तों को तथ्य को एक बचाव के रूप में अनुमत नहीं किया गया| समाचार पत्र ने एक सेवानिवृत न्यायाधीश के कृत्यों पर तथ्यों पर आधारित एक लेख और कार्टून प्रकाशित किया था जिसे न्यायालय ने अवमान माना कि इससे न्यायपालिका की छवि धूमिल हुई है| दूसरी ओर आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि वकीलों की हड़ताल, धरने, कार्य स्थगन, पक्षकारों के न्यायालय में प्रवेश को रोकने और यहाँ तक कि न्यायालय के प्रवेश द्वार के ताला लगाने तक को न्याय प्रशासन में बाधा मानकर संविधान के रक्षक न्यायालय कोई संज्ञान नहीं लेते हैं| वैसे जो प्रशंसा या आलोचना का हकदार हो उसे वह अवश्य मिलना चाहिए किन्तु कई बार मीडिया द्वारा निहित स्वार्थवश अतिशयोक्तिपूर्ण कथनों से न्यायालयों की अनावश्यक प्रशंसा भी की जाती है जिससे जन मानस में भ्रान्ति फैलती है और समान रूप से जन हित की हानि होती है| क्या न्यायालय ऐसी स्थिति में भी स्वप्रेरणा से मीडिया के विरुद्ध कोई कार्यवाही करते हैं?
इंग्लॅण्ड का एक रोचक मामला इस प्रकार है कि एक भूतपूर्व जासूस पीटर राइट ने अपने अनुभवों पर आधारित पुस्तक लिखी| ब्रिटिश सरकार  ने इसके प्रकाशन को प्रतिबंधित करने के लिए याचिका दायर की कि पुस्तक गोपनीय है और इसका  प्रकाशन राष्ट्र हित के प्रतिकूल है| हॉउस ऑफ लोर्ड्स ने 3-2  के बहुमत से पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगा दी| प्रेस इससे क्रुद्ध हुई और डेली मिरर ने न्यायाधीशों के उलटे चित्र प्रकाशित करते हुए ये मूर्खशीर्षक दिया| किन्तु इंग्लॅण्ड में न्यायाधीश व्यक्तिगत अपमान पर ध्यान नहीं देते हैं| न्यायाधीशों का विचार था कि उन्हें विश्वास है वे मूर्ख नहीं हैं किन्तु अन्य लोगों को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है|ठीक इसी प्रकार यदि न्यायाधीश वास्तव में ईमानदार हैं तो उनकी ईमानदारी पर लांछन मात्र से तथ्य मिट नहीं जायेगा और यदि ऐसा प्रकाशन तथ्यों से परे हो तो एक आम नागरिक की भांति न्यायालय या न्यायाधीश भी समाचारपत्र से ऐसी सामग्री का खंडन प्रकाशित करने की अपेक्षा कर सकता है| न्यायपालिका का गठन नागरिकों के अधिकारों और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए किया जाता है न कि स्वयं न्यायपालिका की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए| न्यायपालिका की संस्थागत छवि तो निश्चित रूप से एक लेख मात्र से धूमिल नहीं हो सकती और यदि छवि ही इतनी नाज़ुक या क्षणभंगुर हो तो स्थिति अलग हो सकती है| जहां तक न्यायाधीश की व्यक्तिगत बदनामी का प्रश्न है उसके लिए वे स्वयम कार्यवाही करने को स्वतंत्र हैं| इस प्रकार अनुदार भारतीय न्यायपालिका द्वारा अवमान कानून का अनावश्यक प्रयोग समय समय पर जन चर्चा का विषय रहा है जो मजबूत लोकतंत्र की स्थापना के मार्ग में अपने आप में एक गंभीर चुनौती है|

सुप्रीम कोर्ट का एम.आर.पाराशर बनाम डॉ. फारूक अब्दुल्ला- {1984 क्रि. ला. रि. (सु. को.)} में  कहना है कि किसी भी संस्थान या तंत्र की सद्भावनापूर्ण आलोचना उस संस्थान या तंत्र के प्रशासन को अन्दर झांकने और अपनी लोक-छवि में निखार हेतु उत्प्रेरित करती है। न्यायालय इस स्थिति की अवधारणा पसंद नहीं करते कि उनकी कार्यप्रणाली में किसी सुधार की आवश्यकता नहीं है। दिल्ली उ. न्या. ने सांसदों द्वारा प्रश्न पूछने के बदले धन लिए जाने  के प्रमुख प्रकरण अनिरूद्ध बहल बनाम राज्य में निर्णय दि. 24.09.10 में कहा है कि सजग एवं सतर्क रहते हुए राष्ट्र की आवश्यकताओं एवं अपेक्षाओं के अनुसार दिन-रात रक्षा की जानी चाहिए और उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करना चाहिए। अनुच्छेद 51 क (छ) के अन्तर्गत जांच-पड़ताल एवं सुधार की भावना विकसित करना नागरिक का कर्तव्य है। अनुच्छेद 51 क (झ) के अन्तर्गत समस्त क्षेत्रों में उत्कृष्टता के लिए अथक प्रयास करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है ताकि राष्ट्र आगे बढे। जीन्यूज के रिपोटर ने जब अहमदाबाद के एक न्यायालय से चालीस हजार रूपये में तत्कालीन राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधिपति, सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य न्यायाधीश और एक वकील के विरुद्ध अनुचित रूप से जमानती वारंट हासिल कर लिए हों तो आम नागरिक के लिए न्यायपालिका की कार्यशैली व छवि के विषय में कितना चिंतन करना शेष रह जाता है| यह उदाहरण तो समुद्र में तैरते हिमखंड के दिखाई देने वाले भाग के समान है जानकार लोग ही इसकी वास्तविक गहराई का अनुमान लगा सकते हैं| अवमान का उपयोग अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले के लिए कदाचित नहीं किया जाना चाहिए| यदि अवमान के ब्रह्माश्त्र का प्रयोग कर न्यायपालिका में व्याप्त अस्वच्छता को उजागर करने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया जाय तो फिर न्यायपालिका का शुद्धिकरण किस प्रकार संभव है जबकि देश में न्यायपालिका के विरुद्ध शिकायतों के लिए कोई अन्य मंच ही नहीं है|
गौहाटी उ.न्या. के कुछ न्यायाधीशों के प्रति असम्मानजनक भाषा में समाचार प्रकाशित करने पर स्वप्रेरणा से अवमान हेतु संज्ञान लिया गया। प्रत्यार्थियों ने बाद में असम्मानजनक शब्दों के लिए क्षमा याचना करते हुए तथ्यों की पुष्टि कायम रखी। गौहाटी उ.न्या. ने इस ललित कलिता के मामले में दिनांक 04.03.08 को दिए निर्णय में कहा कि निर्णय समालोचना हेतु असंदिग्ध रूप से खुले हैं। एक निर्णय की कोई भी समालोचना चाहे कितनी ही सशक्त हो, न्यायालय की अवमान नहीं हो सकती बशर्ते कि यह सद्भाविक एवं तर्क संगत शालीनता की सीमाओं के भीतर हो। एक निर्णय, जो लोक दस्तावेज है या न्याय-प्रशासक न्यायाधीश का लोक कृत्य है, की उचित एवं तर्क संगत आलोचना अवमान नहीं बनती है।

उधर दिनांक 01.01.1995 से लागू चीन के राज्य क्षतिपूर्ति कानून में तो राज्य के अन्य अंगों के समान ही अनुचित न्यायिक कृत्यों से व्यथित नागरिकों को क्षति पूर्ति का भी अधिकार है व सरकार को यह अधिकार है कि वह इस राशि की वसूली दोषी अधिकारी से करे| वहाँ न्यायपालिका भी राज्य के अन्य अंगों के समान ही अपने कार्यों के लिए जनता के प्रति दायीं है, और भारत की तरह किसी प्रकार भिन्न अथवा श्रेष्ठ नहीं मानी गयी है|


दूसरी ओर हमारे पडौसी देश श्रीलंका में अवमान कानून की बड़ी उदार व्याख्या की जाती है| श्रीलंका के अपीलीय न्यायालय ने सोमिन्द्र बनाम सुरेसना के अवमान प्रकरण में न्यायाधिपति गुणवर्धने ने दिनांक 29.05.98  को निर्णय देते हुए कहा कि दोष सिद्ध करने के लिए आवश्यक है कि प्रमाण का स्तर समस्त युक्तियुक्त और तर्कसंगत संदेह के दायरे से बाहर होना चाहिए| प्रकरण में न्यायालय के आदेश से सरकारी सर्वेयर अपना कार्य कर रहा था और उसने प्रकरण प्रस्तुत किया कि उसे कार्य नहीं करने दिया गया और बाधा डाली गयी| न्यायालय ने यह भी  कहा कि यदि सर्वेयर निष्पक्ष ढंग से कार्य नहीं कर रहा हो तो उससे पक्षकारों की भावनाओं को उत्तेजना मिलती है व किसी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया जाए तो गुस्सा और ऊँची आवाज स्वाभाविक परिणति है| दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत के इतिहास में अवमान के मामलों में शायद ही कभी इस वास्तविकता को स्वीकार किया गया है| मर्यादा की अपेक्षा कदापि  एक तरफा नहीं हो सकती| न्यायालय ने आगे कहा कि यद्यपि सर्वेयर के कार्य में बाधा डालना आपराधिक अवमान है| सिविल और आपराधिक अवमान दोनों का उद्देश्य सारत: एक ही है कि न्याय प्रशासन की प्रभावशीलता को कायम रखना और दोनों  ही स्थितियों में तर्कसंगत संदेह से परे प्रमाण की आवश्यकता है |

न्यायालय ने धारित किया कि  सर्वेयर के साक्ष्य के आधार पर दोषी को दंड कैसे दिया जा सकता है जबकि सर्वेयर ने अपनी रिपोर्ट में, यदि यह सत्य हो तो,  बाधा डालने का उल्लेख नहीं किया है| इस कारण उसका साक्ष्य अविश्वसनीय है व संदेह से परे न होने कारण अग्राह्य  है और दोषी को मुक्त कर दिया गया| उक्त विवेचन से बड़ा स्पष्ट है कि श्रीलंका में न्यायपालिका का अवमान के प्रति बड़ा उदार रुख है और वह भारतीय न्यायपालिका के विपरीत जनतांत्रिक अधिकारों को महत्व देती है व अपने अहम को गौण समझती है| यह भी उल्लेखनीय है कि श्रीलंका में अवमान नाम का अलग से कोई कानून नहीं है अपितु अवमान सम्बंधित प्रावधान सिविल प्रक्रिया संहिता और न्याय प्रशासन कानून में समाहित करना ही पर्याप्त समझा गया  है और वे सभी न्यायिक कार्यवाहियों के लिए समान हैं| लगता है भारत में तो न्यायपालिका को तुष्ट करने के लिए अलग से अवमान कानून बना रखा है और श्रीलंका की विधायिका ने अवमान सम्बंधित प्रावधान न्याय प्रशासन के उद्देश्य से बनाये हैं|
लोकतंत्र का मूलमन्त्र न्यायपालिका सहित शासन के समस्त अंगों का जनता के प्रति जवाबदेय होना है| चीन के संविधान के अनुच्छेद 128 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट संसद  के प्रति जवाबदेय है| इंग्लॅण्ड के कोर्ट अधिनियम, 2003 की धारा 1(1) के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का मुखिया लोर्ड चांसलर देश के समस्त न्यायालयों के दक्ष व प्रभावी संचालन के लिए जिम्मेदार है| दूसरी ओर स्वतंत्र होने का अर्थ गैर-जिम्मेदार या बेलगाम घोड़े की भांति     नियंत्रणहीन होना नहीं है| भारत में न्यायालयों व न्यायधीशों को जन-नियंत्रण से मुक्त रखा गया है और वे कानूनन किसी के प्रति भी जिम्मेदार नहीं हैं| 
प्रस्तुति -शालिनी कौशिक एडवोकेट 

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

मीडिया को सुधरना होगा .


 
''सरकार को जाँच पूरी होने तक जी न्यूज़ का लाइसेंस निलंबित कर देना चाहिए ''प्रैस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू के ये शब्द एक चेतावनी हैं हमारे मीडिया जगत के लिए जहाँ चैनल की आड़ में गैर कानूनी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है .कौंग्रेस सांसद नवीन जिंदल की कम्पनी के खिलाफ खबर न चलने के बदले १०० करोड़ रूपए की वसूली का प्रयास करने और धोखा धडी के आरोप में जी न्यूज़ के दो संपादक सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया को दिल्ली की एक अदालत ने जमानत देने से इंकार कर दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया .इन दोनों पर भारतीय दंड सहिंता की निम्न धाराओं में आरोप लगाये गए हैं जिनका विवरण निम्न प्रकार है-
https://encrypted-tbn2.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcROEFKCTbabA9-tViJTLvIIvO1lUFFnVschdNu3OXl2xftLFhMW6CrlOKs

१२०-बी आपराधिक षड्यंत्र के लिए दंड -और आपराधिक षड्यंत्र क्या है ये धारा १२०-क  में बताया गया है जो कहती है -
१२०-क -आपराधिक षड्यंत्र की परिभाषा -जबकि दो या दो से अधिक व्यक्ति -
१-कोई अवैध कार्य ,अथवा
२-कोई ऐसा कार्य ,जो अवैध नहीं है ,अवैध साधनों द्वारा ,करने या करवाने के लिए सहमत होते हैं तब ऐसी सहमति आपराधिक षड्यंत्र कहलाती है ;
और धारा १२०-बी में ऐसे अपराध के लिए मृत्यु [आजीवन कारावास ]या दो वर्ष या उससे अधिक अवधि के कठिन कारावास का दंड है .

१२०-बी के साथ इन पर धारा 384  लगायी  गयी  है जिसमे  उददापन  के लिए दंड का प्रावधान  है जो कि 3 वर्ष तक के दोनों में से किसी  प्रकार के कारावास या जुर्माने  का है ये अपराध क्या है यह  धारा 383 बताती  है -
धारा 383 -जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं  उस  
व्यक्ति की या किसी  अन्य  व्यक्ति की कोई क्षति  करने के भय  में साशय  डालता  है ,और तद्द्वारा  इस  प्रकार भय में डाले गए व्यक्ति को ,कोई सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई चीज़ ,जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके किसी व्यक्ति को परिदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करता है वह उददापन करता है .
 इसके साथ ही धारा ४२० भी इनपर लगायी गयी है जो कहती है -
धारा ४२० आई.पी.सी.-जो कोई छल करेगा और तद्द्वारा उस व्यक्ति को जिसे प्रवंचित किया गया है बेईमानी  से उत्प्रेरित करेगा कि वह कोई संपत्ति किसी व्यक्ति को परिदत्त कर दे या किसी भी मूल्यवान प्रतिभूति  को या किसी चीज़ को जो हस्ताक्षरित या मुद्रांकित हो और जो मूल्यवान प्रतिभूति में संपरिवर्तित किये जाने योग्य हो पूर्णतः या अंशतः रच दे ,परिवर्तित कर दे या नष्ट कर दे वह दोनों में से किसी भांति की कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .

 और इन सभी अपराधों को करने के लिए जो इनके प्रयत्न है ऐसे अपराधों को करने के जो आजीवन कारावास या अन्य कारावास से दंडनीय हो को करने का प्रयत्न भारतीय दंड सहिंता की धारा ५११ में दंडनीय है और वह भी इन पर लगायी गयी है .
                    उपरोक्त धाराओं के सन्दर्भ में मीडिया को अपनी कार्य प्रणाली में सुधार लाते हुए कानून का पालन कराने में सक्रिय होना होगा न कि इसकी आड़ में कानून तोड़ने वालों की पंक्ति में .
                          शालिनी कौशिक
                                [कानूनी ज्ञान ]



सोमवार, 26 नवंबर 2012

देर से ही सही प्रशासन जागा :बधाई हो बार एसोसिएशन कैराना .

                  Allahabad high court.jpg
आज मैं आपको इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे निर्णय के बारे में बताने जा रही हूँ जो हमारे देश में कपटपूर्ण  व्  न्यायालय  का समय  बर्बाद करने वाले वादों की बढ़ोतरी को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है किन्तु इसके साथ ही यह दिखता है प्रशासनिक विफलता को जिसके कारन २४-५-२०१२ को दिया गया यह निर्णय २६-११-२०१२ तक भी कार्यान्वित नहीं हो पाया है .अब क्या नहीं हो पाया है यह आप इस निर्णय व् मामले के बारे में पढ़कर जान सकते हैं .
 निर्णय -इलाहाबाद उच्च न्यायालय
तिथि -२४-५-२०१२
जज-माननीय सिबगत उल्लाह जे.
दिवित्य अपील न० -२१४ -२०१२
गुलज़ार अहमद पुत्र नियाज़ अहमद निवास पुराना बाज़ार ,जामा मस्जिद ,कैराना जिला मुज़फ्फरनगर [अब शामली ]-----वादी /अपीलार्थी  

                                               बनाम
श्रीमती अख्तरी विधवा नियाज़ अहमद निवासी पुराना बाज़ार ,जामा मस्जिद कैराना जिला मुज़फ्फरनगर [अब शामली ]---------प्रतिवादी /प्रत्यर्थी 

प्रस्तुत मामले में वादी ने अपनी माता प्रतिवादी के विरुद्ध एक वाद दायर किया कि वादी द्वारा माता /प्रतिवादी के पक्ष में २०-७-२००२ को निष्पादित किया गया विक्रय दस्तावेज क्योंकि लेनदारों को कपटवंचित   करने के आशय से निष्पादित किया गया था इस आधार पर शून्य है .प्रतिवादी के उपस्थित न होने पर वाद एकपक्षीय रूप से ख़ारिज कर दिया गया .
   १५-७-२००२ को सिविल जज सीनियर डिविजन कैराना द्वारा ख़ारिज कर दिया गया न केवल वाद ख़ारिज किया गया बल्कि यह कारण वादी व् उसके वकील के विरुद्ध सात दिन के अन्दर यह कारण दिखाने हेतु नोटिस भी जारी किया गया कि क्यों न उनके विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जाये ?
इस आज्ञप्ति  के विरुद्ध वादी ने ए.डी.जे .कोर्ट न० ९ मुज़फ्फरनगर में अपील दायर की .वादी ने इसमें कहा कि विक्रय दस्तावेज के निष्पादन के पश्चात् वह अपने ऋण अदा करा चुका था .इसके अनुसार वादी द्वारा माता के पक्ष में किया गया अंतरण वाद पात्र में वर्णित आधार पर शून्य नहीं है बल्कि केवल शून्यकरणीय    है  और वह भी केवल लेनदारों के विकल्प पर न कि स्वयं वादी के विकल्प पर .
प्रिवी कौंसिल ने ज़फरुल हसन बनाम फरीदुद्दीन ए.आई .आर .१९४६ पी.सी.१७७ में धारित किया कि पक्षों में किया गया ऐसा अंतरण उनमे से किसी के द्वारा त्यागा नहीं जा सकता है .
     ए . आई .आर. १९५४ नागपुर १२९ [डी बी ]में धारित किया गया कि धारा ५३ संपत्ति अंतरण अधिनियम में ऐसी घोषणा का प्रभाव पक्षों में ऐसे विक्रय दस्तावेज को संचालित करने का होता है न कि निरस्त  करने या ऐसे एक ओर रखने का .

ए.आई.आर.१९३९ मद्रास ८९४ ,ए,आई.आर.१९६१ पंजाब ४२३ और ए.आई.आर.१९५४ मद्रास १७३ में धारित किया गया कि जबकि ऐसा अंतरण नहीं किया गया है अपने दावे लागू करने के अधिकार केवल लेनदारों का होता है .यह भी धारित किया गया कि धारा ५३ में घोषणा का परिणाम केवल तभी निरस्त किया जा सकता है जबकि लेनदारों और उनके दावों व् दावों  के अधीन रहते हुए संतुष्ट करने से बचने के लिए किया गया हो ,पक्षों में ऐसा अंतरण विधिमान्य व् प्रवर्तनीय है .
    ए.आई.आर.१९६३ मैसूर २५७ में धारित किया गया कि धारा ५३ के अंतर्गत आने से बचने में किया गया अंतरण बचने योग्य संव्यवहार नहीं है किन्तु इसका लेनदारों को देरी कराने या पराजित करने पर कोई प्रभाव नहीं है.
मोहम्मद तकी खान बनाम जंग सिंह ए.आई.आर.१९३५ इलाहाबाद ५२९ ऍफ़.बी में धारित किया गया कि जहाँ सारभूत रूप में कपट द्वारा प्रभावित किये जाने का आशय है वहां न्यायालय किसी पक्ष को अपने दस्तावेज से बचने के क्रम में अपने कपट का कथन करने की आज्ञा न देगा .

    और उपरोक्त प्राधिकार के प्रकाश में न्यायालय ने यह वाद निरस्त कर दिया .न्यायाधीश की राय में इसमें वादी व् उसके वकील के विरुद्ध नोटिस या प्रथम सूचना रिपोर्ट का कोई अवसर नहीं था .
            इसके अनुसार गुण पर दिवित्य अपील ख़ारिज की गयी .यद्यपि निचले न्यायालय को वादी व् उसके वकील के विरुद्ध नोटिस व् प्रथम सूचना रिपोर्ट के आदेश को निरस्त किया गया .फिर भी वादी पर कपटपूर्ण ,वाद और न्यायालय का समय बर्बाद करने के कारण २५,०००/-रूपए का जुर्माना लगाया गया .जो कि वह तीन महीने में बार एसोसिएशन कैराना जिला मुज़फ्फरनगर अब शामली को अदा करेगा और यदि वह ऐसा करने में असफल रहता है तो कलेक्टर भू राजस्व की बकाया की तरह इसकी वसूली करेगा .बार एसोसिएशन कैराना इसका उपयोग किताबें खरीदने में करेगा .  

[और यह विचारणीय है कि नायालय का यह निर्णय अभी तक कार्यान्वित नहीं हुआ है .न तो वादी ने जमा किया है और न ही कलेक्टर ने इसे वसूल  किया है .चूंकि मुजफ्फरनगर की जगह अब कैराना का जिला शामली है तो ये दायित्व शामली के कलेक्टर का बनता है किन्तु बार एसोसिशन कैराना द्वारा आग्रह के बावजूद  इस पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है इसलिए इसे प्रशासन द्वारा न्याय को विफल करने का प्रयास कहना पड़ रहा  है .
            शालिनी कौशिक
                  [कानूनी ज्ञान ]


[ अभी अभी बार एसोसिएशन कैराना के अध्यक्ष श्री कौशल प्रसाद जी से २.४५ पी.एम्.पर प्राप्त सूचना के अनुसार बार एसोसिएशन  कैराना को २५.०००/-रूपए की ये राशि प्राप्त हो गयी है .चलिए देर से ही सही पर प्रशासन को सुध तो आई है. बधाई हो बार एसोसिएशन कैराना .
                                   शालिनी कौशिक एडवोकेट  

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मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

अविवाहित बेटी का भरण-पोषण अधिकार

अविवाहित बेटी का भरण-पोषण अधिकार 


दंड प्रक्रिया सहिंता १९७३ की धारा १२५ [१] के अनुसार ''यदि पर्याप्त साधनों वाला कोई व्यक्ति -
...............................................................................................................................................
[ग] -अपने धर्मज या अधर्मज संतान का [जो विवाहित पुत्री  नहीं है ],जिसने वयस्कता प्राप्त कर ली है ,जहाँ  ऐसी संतान किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण अपना भरण -पोषण करने में असमर्थ है ,..........
........................................................................................................................................................
भरण पोषण करने की उपेक्षा करता है  या भरण पोषण करने से इंकार करता है तो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट ,ऐसी उपेक्षा या इंकार साबित होने पर ,ऐसे व्यक्ति को ये निर्देश दे सकेगा कि वह अपनी ऐसी संतान को ऐसी मासिक दर पर जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे भरण पोषण मासिक भत्ता दे .
और इसी कानून का अनुसरण  करते हुए मुंबई हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति के यू चंडीवाल  ने बहरीन में रहने वाले एक व्यक्ति को उसकी सबसे बड़ी बेटी के भरण पोषण का खर्च देने का आदेश दिया है हालाँकि वह बालिग हो गयी है .अदालत द्वारा १६  अक्टूबर को फैसले में कहा गया कि इस मामले में सबसे बड़ी बेटी न सिर्फ अविवाहित है बल्कि अपनी माँ पर आश्रित है इसलिए वह भरण पोषण का खर्च पाने की हक़दार है .
                                            शालिनी कौशिक 

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

कोई कानूनी विषमता नहीं ३०२ व् ३०४[बी ]आई.पी.सी.में

कोई कानूनी विषमता नहीं ३०२ व् ३०४[बी ]आई.पी.सी.में 

Bride bur...

17 सितम्बर 2012 दैनिक जागरण में पृष्ठ २ पर माला दीक्षित ने एक दोषी की दलील दी है जिसमे दहेज़ हत्या के दोषी ने अपनी ओर से एक अहम् कानूनी मुद्दा उठाया है .दोषी की दलील है -
    ''आई.पी.सी.की धारा ३०४ बी [दहेज़ हत्या ]और धारा ३०२ [हत्या ]में एक साथ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता .दोनों धाराओं में बर्डन ऑफ़ प्रूफ को लेकर कानूनी विषमता है जो दूर होनी चाहिए .''
   धारा ३०२ ,जिसमे हत्या के लिए दंड का वर्णन है और धारा ३०४ बी आई.पी.सी.में दहेज़ मृत्यु का वर्णन है और जहाँ तक दोनों धाराओं में सबूत के भार की बात है तो दांडिक मामले जिसमे धारा ३०२ आती  है में सबूत का भार अभियोजन पर है क्योंकि दांडिक मामलों में न्यायालय यह उपधारना करता है कि अभियुक्त निर्दोष है अतः सबूत का भार अभियोजन पर है कि वह दोषी है .
   दूसरी ओर दहेज़ मृत्यु के मामले में धरा ३०४-बी जो कि सन १९८६ में १९.११.८६ अधिनियम ४३ से  जोड़ी गयी ,में न्यायालय यह उपधारना करेगा कि उस व्यक्ति ने दहेज़ मृत्यु कारित की है .
       दहेज़ मृत्यु के विषय में धारा ३०४-बी आई.पी.सी.कहती है कि जब विवाह के सात वर्ष के अन्दर किसी स्त्री की मृत्यु जल जाने से या शारीरिक क्षति से या सामान्य परिस्थितियों से भिन्न परिस्थितियों में हो जाये व् यह दर्शित किया जाता है   कि मृत्यु के ठीक पूर्व पति या पति के नातेदारों द्वारा दहेज़ के लिए मांग को लेकर परेशान  किया गया था अथवा उसके साथ निर्दयता पूर्वक व्यव्हार किया गया था तब इसे दहेज़ मृत्यु कहा जायेगा और मृत्यु का कारण पति व् पति के रिश्तेदारों को माना जायेगा .
      साथ ही साक्ष्य अधिनियम की धारा ४ में यह बताया गया है कि न्यायालय यह उपधारना करेगा अर्थात न्यायालय यह साबित मान सकेगा जब तक नासबित न किया जाये .इस प्रकार यदि अभियोजन धारा ३०२ के अंतर्गत आरोपी का अपराध साबित करने में सफल रहता है तब भी धारा ३०४-बी में दहेज़ मृत्यु कारित न करने का भार दोषी व्यक्ति पर यथावत रहता है और यदि  वह न्यायालय की इस उपधारना  को नासबित करने में असफल रहता है तो वह हत्या और दहेज़ मृत्यु दोनों का दोषी माना जायेगा किन्तु यदि वह न्यायालय की इस उपधारना को नासबित करने में सफल हो जाता है तब उसे केवल हत्या का दोषी माना जायेगा जो कि उसपर साबित हो चुका है .
                विवाह के सात वर्षों के भीतर विवाहिता की मृत्यु पर न्यायालय यह उपधारना कर लेता है कि यह दहेज़ मृत्यु है किन्तु बहुत से मामलों में न दहेज़ की मांग साबित हो पाती है न क्रूरता तब न्यायालय को अन्य धाराओं में अपराध का विश्लेषण कर दोषी को दण्डित करना होता है जैसे कि लखजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य १९९४ पूरक [१]s .c .c १७३[१७६] में अभियुक्तों के विरुद्ध मृतका को विष खिलने में प्रत्यक्ष हाथ साबित न होने के कारण उन्हें केवल ३०६ के अंतर्गत आत्महत्या के दुष्प्रेरण के लिए सिद्धदोष किया गया .
     और बहुत से ऐसे मामले जिसमे पीड़ित की मृत्यु हत्या की श्रेणी में नहीं आ पाती क्योंकि हत्या के लिए धारा ३०० कहती है कि शारीरिक क्षति इस आशय से जिससे मृत्यु कारित करना संभाव्य है या वह प्रकृति के मामूली अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त है या वह कार्य इतना आसन्न संकट है कि मृत्यु कारित कर ही देगा या ऐसी शारीरिक क्षति कारित कर देगा जिससे मृत्यु कारित होनी संभाव्य है ,ऐसे में आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय बनाम टी.बासवा पुन्नेया तथा अन्य १९८९ क्रि.ला.जन.2330 आंध्र में विवाहिता को मारने पीटने  के बाद आत्महत्या दिखाने के लिए एक बांस की सहायता से लुंगी बंधकर लटका दिया .मृत्यु दम घुटने से हुई .न्यायालय ने विवाह के तीन वर्षों के भीतर अप्राकृतिक स्थितयों में मृत्यु व् दहेज़ की मांग के तथ्य साबित होने के कारण मामले को ३०४-बी के अंतर्गत माना भले ही मृतका ने आत्महत्या की हो .
   फिर न्यायालय इस सम्बन्ध में स्वयं जागरूक है .लेखराम बनाम पंजाब राज्य १९९९ s .c .c [क्रि]१२२ में उच्चतम न्यायालय ने समुचित सबूत के आभाव में अभियोजन पक्ष द्वारा लगाये गए दहेज़ हत्या के आरोप की सत्यता पर विश्वास करते हुए निर्दोषिता की सिद्धि का भार अभियुक्त पर डालना न्यायोचित नहीं माना और अभियुक्त को ३०२ एवं ३०४-बी के आरोप से दोषमुक्त किया .
साथ ही शमन साहेब एम् .मुठानी बनाम कर्णाटक राज्य ए.आई.आर एस.सी.९२१ में अभियुक्त ३०२ के बजाय ३०४ -बी का दोषी माना किन्तु इस सम्बन्ध में अभियुक्त को पूर्व सूचना ,उसे बचाव के लिए अवसर प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक माना और विचारण न्यायालय को ३०४-बी के अपराध के विचारण के लिए निर्देश दिए. 
   ऐसे में भले ही दोनों धाराओं में सबूत का भार अलग अलग पर हो किन्तु ऐसे में अभियुक्त का बचाव का अधिकार कहीं प्रभावित नहीं होता है .यदि अभियुक्त ने हत्या की है और विवाह के सात वर्षों के अन्दर की है तो वो दोनों धाराओं में दोषी है और ऐसे में अभियोजन की सफलता है व् न्यायालय की उपधारना साबित है और यदि दहेज़ मृत्यु नहीं की है तो वह अपना बचाव करेगा और अभियोजन को विफल करेगा .ऐसा नहीं है कि हर हत्या को दहेज़ मृत्यु की श्रेणी दे दी गयी हो या हर दहेज़ मृत्यु को हत्या की.उपरोक्त निर्णयों द्वारा न्यायालयों ने अपनी न्यायप्रियता का परिचय दिया है और ऐसी किसी विषमता को कहीं कोई स्थान नहीं दिया गया है .
                                                 शालिनी कौशिक 
                                                       [कानूनी ज्ञान]


 


 

 

रविवार, 16 सितंबर 2012

श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.


... prett...
   आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है .
कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं करती हैं और इसके लिए विधि बनाने में काफी समय लगेगा ;अतः जब तक विधान मंडल समुचित विधि नहीं बनाता है न्यायालय द्वारा विहित मार्गदर्शक सिद्धांत को लागू किया जायेगा .

न्यायालय ने ये भी निर्णय दिया कि ''प्रत्येक नियोक्ता या अन्य व्यक्तियों का यह कि काम के स्थान या अन्य स्थानों में चाहे प्राईवेट हो या पब्लिक ,श्रमजीवी महिलाओं के यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित उपाय करे .इस मामले में महिलाओं के अनु.१४,१९ और २१ में प्रदत्त मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विशाखा नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने लोकहित वाद न्यायालय में फाईल किया था .याचिका फाईल करने का तत्कालीन कारण राजस्थान राज्य में एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना थी .न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये-
[१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शरीक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींताकंशी  करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम [१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शरीक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींताकंशी  करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम या विनियमों में यौन उत्पीडन रोकने सम्बन्धी नियम शामिल किये जाने चाहिए और ऐसे नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए समुचित दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए .
[स] प्राईवेट क्षेत्र के नियोक्ताओं के सम्बन्ध में औद्योगिक नियोजन [standing order  ]अधिनयम १९४६ के अधीन ऐसे निषेधों को शामिल किया जाना चाहिए.
[द] महिलाओं को काम,आराम,स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञानं के सम्बन्ध में समुचित परिस्थितियों का प्रावधान होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया  जाना चाहिए  कि महिलाओं को काम के स्थान में कोई विद्वेष पूर्ण वातावरण न हो उनके मन में ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि वे नियोजन आदि के मामले में अलाभकारी स्थिति में हैं .
[२] जहाँ ऐसा आचरण भारतीय दंड सहिंता या किसी अन्य विधि के अधीन विशिष्ट अपराध होता हो तो नियोक्ता को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को शिकायत करके समुचित कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए .
[३]यौन उत्पीडन की शिकार महिला को अपना या उत्पीडनकर्ता  का स्थानांतरण करवाने का विकल्प होना चाहिए.
न्यायालय ने कहा कि ''किसी वृत्ति ,व्यापर या पेशा के चलाने के लिए सुरक्षित काम का वातावरण होना चाहिए .''प्राण के अधिकार का तात्पर्य मानव गरिमा से जीवन जीना है ऐसी सुरक्षा और गरिमा की सुरक्षा को समुचित कानून द्वारा सुनिश्चित कराने तथा लागू करने का प्रमुख दायित्व विधान मंडल और कार्यपालिका का है किन्तु जब कभी न्यायालय के समक्ष अनु.३२ के अधीन महिलाओं के यौन उत्पीडन का मामला लाया जाता है तो उनके मूल अधिकारों की संरक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना ,जब तक कि  समुचित विधान नहीं बनाये जाते उच्चतम न्यायालय का संविधानिक कर्त्तव्य है.
इस प्रकार यदि इस निर्णय के सिद्धांतों को नियोक्ताओं द्वारा प्रयोग में लाया जाये तो श्रमजीवी महिलाओं की स्थिति में पर्याप्त सुधार लाया जा सकता है.
शालिनी कौशिक एडवोकेट   

शनिवार, 11 अगस्त 2012

प्रोन्नति में आरक्षण :सरकार झुकना छोड़े


[गूगल से साभार ]

''सियासत को लहू पीने की लत है,
    वर्ना मुल्क में सब खैरियत है .''
       ये पंक्तियाँ अक्षरश: खरी उतरती हैं सियासत पर  ,जिस आरक्षण को दुर्बल व्यक्तियों को सशक्त व्यक्तियों से  बचाकर पदों की उपलब्धता  सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया था .जिसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक,सामाजिक ,शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े लोगों को देश की मुख्य  धारा  में लाना था उसे सियासत ने सत्ता बनाये रखने  के लिए ''वोट '' की राजनीति में तब्दील  कर दिया .
    सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण इलाहाबाद उच्च न्यायालय  ने ख़ारिज कर दिया था .इसी साल अप्रैल में उच्चतम  न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के पूर्ववर्ती मायावती सरकार के निर्णय को ख़ारिज कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को बरक़रार रखा और अखिलेश यादव सरकार ने इस फैसले पर  फ़ौरन अमल  के निर्देश दिए थे किन्तु वोट कि राजनीति इतनी अहम् है कि संविधान के संरक्षक ''उच्चतम न्यायालय '' के निर्णय के प्रभाव को दूर करने के लिए विधायिका नए नए विधेयक लाती रहती है  और संविधान में अपना स्थान ऊँचा बनाने की कोशिश करती रहती है.जिस प्रोन्नति में आरक्षण को उच्चतम नयायालय  ने मंडल आयोग के मामले में ख़ारिज कर दिया था उसे नकारने के लिए संसद ने ७७ वां संशोधन अधिनियम पारित कर अनुच्छेद १६ में एक नया खंड ४ क जोड़ा जो यह उपबंधित  करता है -
 ''कि अनुच्छेद १६ में की कोई बात राज्य के अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के किसी वर्ग के लिए जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है प्रोन्नति के लिए आरक्षण के लिए कोई उपबंध करने से निवारित [वर्जित] नहीं करेगी.''
   और इसके बाद ८५ वां संविधान संशोधन अधिनियम २००१ द्वारा खंड ४क में शब्दावली ''किसी वर्ग के लिए प्रोन्नति के मामले में'' के स्थान पर ''किसी वर्ग के लिए प्रोन्नति के मामले में  परिणामिक श्रेष्ठता के साथ ''शब्दावली अंतःस्थापित की गयी जो इस संशोधन अधिनियम को १७ जून १९९५ से लागू करती है जिस दिन ७७ वां संशोधन अधिनियम लागू हुआ .इसका परिणाम यह होगा कि अनुसूचित जाति व् जनजातियों के अभ्यर्थियों की श्रेष्ठता १९९५ से लागू मानी जाएगी .पहली बार ऐसा भूतलक्षी प्रभाव का संशोधन संविधान से धोखाधड़ी का प्रत्यक्ष प्रमाण है.
के सी वसंत कुमार  के मामले में सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी थी कि अनुसूचित जाति व् अनुसूचित जनजाति का आरक्षण सन २००० तक चलाया जाये और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की कसौटी आर्थिक हो तथा प्रत्येक ५ वर्ष पर इस पर पुनर्विचार हो .
  भारत संघ बनाम वीरपाल चौहान [१९९५ ] ६ एस.सी.सी.६३४ में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया ''कि सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति के लिए ''जाति ''को आधार बनाया जाना संविधान के अनुच्छेद १६[४] का उल्लंघन है.
    अनुच्छेद १६ के अनुसार-
         ''राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से सम्बंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी.''
  जिसका एक अपवाद १६[४] है जिसके अनुसार -
    ''राज्य पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्याधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है ,नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध कर सकता है 
   इस प्रकार खंड ४ के लागू होने की दो शर्ते हैं-
  १-वर्ग पिछड़ा हो :अर्थात सामाजिक व् शैक्षिक दृष्टि से ,
 2- उसे राज्याधीन पदों पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिल सका हो.
     केवल दूसरी शर्त ही एकमात्र कसौटी नहीं हो सकती .ऐसे में सरकारी सेवा में लगे  लोगों को पिछड़ा मानना सामाजिक रूप से उन लोगों के साथ तो अन्याय ही कहा जायेगा जो इनसे अधिक योग्यता रखकर भी सरकारी नौकरियों से वंचित हैं और इसके बाद प्रोन्नति में आरक्षण के लिए केंद्र सरकार का विधेयक लाने को तैयार होना सरकार का झुकना है और इस तरह कभी ममता बैनर्जी ,कभी करूणानिधि और कभी मायावती के आगे झुक सरकार अपनी कमजोरी ही दिखा रही है .यदि अनुसूचित जाति व् अनुसूचित जनजाति देश में विकास पाने के आकांक्षी हैं तो अन्य जातियां भी उन्नति की महत्वाकांक्षा रखती  हैं और एक लोकतंत्र तभी सफल कहा जायेगा जब वह अपने सभी नागरिकों से न्याय करे .पहले तो स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी आरक्षण लागू किया जाना ही गलत है इस पर प्रोन्नति में भी आरक्षण सरासर अन्याय  ही कहा जायेगा .यदि ये जातियां अभी तक भी पिछड़ी  हैं तो केवल नौकरी पाने तक ही सहायता ठीक है आगे बढ़ने के लिए तो इन्हें अपनी योग्यता ही साबित करनी चाहिए और सरकार को चाहिए की अपनी वोट की महत्वाकांक्षा में थोड़ी जगह  ''योग्यता की उन्नति'' को भी दे.नहीं तो योग्यता अंधेरों में धकेले जाने पर यही कहती नज़र आएगी जो ''हरी सिंह जिज्ञासु ''कह रहे हैं -'
                   ''अपने ही देश में हम पनाहगीर बन गए ,
                         गरीब गुरबां देश की जागीर बन गए ,
                   समझ नहीं आता कब बदलेगा यह परिवेश 
                          दिखाते रहे जो रास्ता राहगीर बन गए.''
                                                  शालिनी कौशिक 
                                                          [कौशल ]





बुधवार, 8 अगस्त 2012

ऑनर किलिंग:सजा-ए-मौत की दरकार नहीं


ऑनर किलिंग:सजा-ए-मौत की दरकार नहीं 


''प्रेम''जिसके विषय में शायद आज तक सबसे ज्यादा लिखा गया होगा,कहा गया होगा ,कबीर दास भी कह गए-
''ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए''
देवल आशीष कहते हैं-
''प्यार कर्म ,प्यार धर्म प्यार प्रभु नाम है.''
     प्रेम जहाँ एक ओर कवियों ,लेखकों की लेखनी का प्रिय विषय रहा है वहीँ समाज में सभ्यता की राह में कांटे की तरह महसूस किया गया है और इसी कारण प्रेमी जनों को अधिकांशतया प्रेम की कीमत बलिदान के रूप में चुकानी पड़ी है किन्तु प्रेम की भी एक सीमा होती है और जो प्रेम सीमाओं में मर्यादाओं में बंधा हो उसे बहुत सी बार सम्मान सहित स्वीकृति भी मिली है ,किन्तु आज प्रेम का एक अनोखा रूप सामने आ रहा है और इसकी परिणिति कभी भी समाज की स्वीकृति हो ही नहीं सकती क्योंकि प्रेम का यह रूप मात्र वासना का परिचायक है  इसमें प्रेम शब्द की पवित्रता का कोई स्थान नहीं है और इस प्रेम को कथित प्रेमी-प्रेमिका के परिजन कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते और इसके कारण उनकी भावनाएं इस कदर उत्तेजना का रूप ले लेती हैं जिसे ''ऑनर किलिंग ''या सम्मान के लिए हत्या कहा जाता है.
८ अगस्त २०१२ को लगभग सभी समाचार पत्रों में सुर्ख़ियों के रूप में छाये ''ऑनर किलिंग में बाप बेटे को सजा-ए-मौत ''समाचार ने एक बार फिर इस शब्द ''प्रेम''की अनैतिकता की परतों को उधेड़ा है .इस हौलनाक वारदात को अंजाम देकर फंसी की सजा पाने वाले ६६ साल के मैथलीशरण और उसके बेटे हरेन्द्र ने २८ दिसंबर २००७ की रात तीन बजे गाँव की दलित बस्ती में खली पड़े मकान में बलकटी से ताबड़तोड़ वार कर प्रेमी युगल को  मौत के घाट उतार दिया था .क़त्ल हुआ मैथलीशरण की अविवाहिता बेटी गीता[२२]और उसके घर के सामने रहने वाले विजय के शादीशुदा बेटे सुनील[३२]का .दोनों को एक साथ देखकर आपा खो बैठे मैथलीशरण ने दोनों बेटों की मदद से उनको बेरहमी से मार डाला था.
यूँ तो क़त्ल अपराध है और अपराधी को सजा हमेशा मिलनी चाहिए किन्तु ऑनर किलिंग एक ऐसा अपराध है जिसमे न्यायालय को यह हमेशा देखना होगा कि अपराधी अपराध वृति  का है या उससे ये अपराध परिस्थितिवश हो गया है .
धारा  ३०० भा .दंड .सहिंता ऐसे अपराध को हत्या कहती है जिसमे क़त्ल किया गया है किन्तु वह भी कुछ अपवादों के अध्यधीन रहकर ही -
  धारा-३०० -एतस्मिन पश्चात् अपवादित दशाओं को छोड़कर अपराधिक मानव वध हत्या है यदि वह कार्य ,जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गयी है ,मृत्यु कारित करने के आशय से की गयी हो.
          और इसी धारा के अपवाद-१ में कहा गया है -
 ''अपराधिक मानव वध हत्या नहीं है यदि अपराधी उस समय जबकि वह गंभीर व् अचानक प्रकोपन से आत्म-संयम की शक्ति से वंचित हो ,उस व्यक्ति की जिसने कि वह प्रकोपन दिया था ,मृत्यु कारित करे या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु भूल या दुर्घटना वश कारित करे.
      उपरोक्त प्रावधान की नज़र से यदि हम देखते हैं तो हम्मे से कोई भी मैथलीशरण व् उसके बेटों की हरकत को फाँसी के काबिल नहीं मान सकता .''प्रेम ''हमेशा से समाज व् परिजनों की नज़रों में खटकता रहा है किन्तु सुनील व् गीता का सम्बन्ध प्रेम कहा ही नहीं जा सकता .अभी हाल ही में अनुराधा बाली उर्फ़ फिजा की दर्दनाक मौत ऐसे प्रेम का ही परिणाम है जिसमे किसी और से विवाहित चंद्रमोहन से प्रेम करना अनुराधा को आत्म-बलिदान के रूप में भुगतना पड़ा .कोई बाप-भाई ये नहीं चाहेगा कि उनकी बेटी -बहन जीवन में ऐसे मोड़ से गुज़रे .ऐसे में गलत स्थिति में फँसी अपनी बेटी-बहन व् उसके कथित प्रेमी के प्रति उनका वही रवैया होगा जो इनका था. 
  इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट की नज़ीर पेश की गयी हैं जिनमे ९ मई २०११ की एक नज़ीर में सुप्रीम कोर्ट ने ऑनर किलिंग को ''विरल से विरलतम''की श्रैणी में माना है और ये कहा है कि मृत्यु दंड का दंडादेश सर्वथा अपेक्षित माना जाये ताकि समाज को इस वीभत्स अत्याचार से निजात दिलाई जा सके.''और एक नज़ीर में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय''धनञ्जय चटर्जी बनाम स्टेट ऑफ़ पश्चिम बंगाल १९९४'' को प्रस्तुत किया गया जिसमे कहा गया -''कि न्यायालयों को अपराधियों के अधिकारों की चिंता से कहीं अधिक चिंता सम्पूर्ण समाज की सुरक्षा की करनी चाहिए .''
ऐसे में जो प्यार सुनील व् गीता का था क्या उसे सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से सही कहा जायेगा?इसमें या तो गीता की जिंदगी उजड्नी थी या शादीशुदा सुनील की शादीशुदा जिंदगी .ऐसे मामलों को सुप्रीम कोर्ट स्वयं ''विरल से विरलतम की श्रैणी ''नहीं दे सकती .ये मामला तो उसी तरह की श्रेणी में आता है जिसमे उच्चतम न्यायालय ने ऐसे अपराध को ''हत्या की कोटि में न आने वाले अपराधिक मानव वध माना ''है.
     उत्तर प्रदेश राज्य बनाम लखमी १९९८ में लखमी ने अपनी युवा पत्नी ओमवती जो दो बच्चों की माँ थी की हत्या की .अभियुक्त ने स्वयं स्वीकार किया कि उसकी पत्नी कि मृत्यु मानव वध है .साक्ष्य दर्शाते हैं कि जब अभियुक्त खेत से अपने घर वापिस आया तो उसने अपनी पत्नी को अन्य व्यक्ति रमे के साथ कामुकता में देखा .उसने गंभीर तथा अचानक प्रकोपन में पत्नी की हत्या की .सत्र न्यायाधीश ने उसे दोषी पाया किन्तु उच्च न्यायालय ने दोषमुक्त किया .उच्चतम न्यायालय ने भी उसे धारा ३०० के अपवाद-१ का लाभ पाने का हक़दार माना और उसकी दोषसिद्धि धारा ३०० से परिवर्तित कर धारा ३०४ के भाग १ के अधीन कर दी गयी जिसमे अधिकतम सजा आजीवन कारावास या दस वर्ष की अवधि का कारावास है .
चन्दन सिंह बनाम राजस्थान राज्य में भी राजस्थान उच्च न्यायालय ने गंभीर प्रकोपन को तथ्य का विषय माना और कहा कि न्यायालय उस वर्ग ,समुदाय व् समाज के रीति रिवाजों तथा आदतों पर विचार करेगा जिसका कि अभियुक्त सदस्य है .और ऐसे में यदि हम भारतीय समाज का आकलन करें तो ये सबके सामने है कि प्रेम को धर्म परिवर्तन द्वारा निकाह में परिवर्तित करने वाले चंद्रमोहन को फिजा उर्फ़ अनुराधा बाली को छोड़कर पत्नी के पास वापस लौटना पद गया .जिस तरह का प्रेम सुनील व् गीता कर रहे थे उसे यहाँ की फ़िल्मी दुनिया ,जिसमे धर्मेन्द्र प्रकाश कौर को छड हेमा मालिनी को अपना लेते हैं या बोनी श्रीदेवी से बांध जाते हैं में या फिर कुछ उच्चवर्गीय परिवारों में ही मान्यता मिल सकती है .आम मध्यवर्गीय भारतीय जन मानस में तो प्रेम को स्वीकृति है ही नहीं और उसपर भी ऐसे प्रेम को जिसमे कथित प्रेमी प्रेमिका पहले से ही किसी और से विवाहित हैं ऐसे प्रेम को कोई स्वीकृति यहाँ क्या कहीं भी नहीं मिल सकती.और इसका परिणाम अंतत ऑनर किलिंग के रूप में सामने आता है और मैं नहीं समझती कि ऐसे प्यार के दुश्मन समाज के दुश्मन कहें जायेंगे.किसी की जिंदगी या मौत किसी के हाथ में नहीं है ऐसे में इन्होने अपराध तो किया है किन्तु सामाजिक सुरक्षा को देखता हुए इनका कदम फांसी के फंदे की ओर नहीं बढाया जा सकता है .ये धारा ३०० के अपवाद १ के लाभ के हक़दार हैं और न्यायालय को इन सभी परिस्थितियों पर विचार अवश्य करना चाहिए .
 कविवर दुष्यंत की ये पंक्तियाँ यहाँ सही कही जाएँगी-
''कैसे मंज़र नज़र आने लगे हैं ,
  गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं ,
    अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ,
     ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं .''
                           शालिनी कौशिक 
                                [कौशल]