गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

मोदी सरकार :जीने का अधिकार दे मरने का नहीं!


धारा 309 -भारतीय दंड संहिता ,एक ऐसी धारा जो अपराध सफल होने को दण्डित न करके अपराध की असफलता को दण्डित करती है .यह धारा कहती है-
        '' जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा और उस अपराध को करने के लिए कोई कार्य करेगा ,वह सादा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .''
  और इस धारा की यही प्रकृति हमेशा से विवादास्पद रही है और इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने पी.रथिनम् नागभूषण पटनायिक बनाम भारत संघ ए .आई .आर .१९९४ एस.सी.१८४४  के वाद में दिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय में दंड विधि का मानवीयकरण करते हुए अभिकथन किया है कि-
  ''व्यक्ति को मरने का अधिकार प्राप्त है .''
इस वाद में दिए गए निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत व्यक्ति को प्राप्त वैयक्तिक स्वतंत्रता का अतिक्रमण मानते हुए इस धारा को दंड विधि से विलोपित किये जाने को कहा .विद्वान न्यायाधीशों ने धारा ३०९ के प्रावधानों को क्रूरतापूर्ण एवं अनुचित बताते हुए कहा कि इसके परिणामस्वरुप व्यक्ति को दोहरा दंड भुगतना पड़ता है .प्रथम तो यह कि वह आत्महत्या करने की यंत्रणा भुगतता है और आत्महत्या करने में असफल रहने पर उसे समाज में अपकीर्ति या बदनामी भुगतनी पड़ती है जो काफी पीड़ादायक होती है .ऐसी स्थिति में आत्महत्या के प्रयत्न में विफलता के लिए व्यक्ति को दण्डित करना उस पर एक और दंड का भार डालना होगा ,जो उचित नहीं है .अतः दंड संहिता की धारा ३०९ के उपबंध संविधान के अनुच्छेद २१ के प्रावधानों के विपरीत होने के कारण शून्य हैं .इस धारा को विलोपित किया जाना न केवल मानवीय आधार पर उचित होगा अपितु समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी वांछित है क्योंकि वह व्यक्ति जिसने आत्महत्या करने के प्रयास किया था परन्तु वह इसमें विफल रहा हो ,अपने परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध होने के लिए एक बार पुनः उपलब्ध रहता है ,जैसा कि वह पूर्व में था .
   इस निर्णय के आलोक में हम धारा ३०९ को शून्य ठहराते हैं और असंवैधानिक मानते हैं और ऐसे ही निर्णय को दृष्टिगोचर रखते हुए केंद्रीय सरकार विधि आयोग की सिफारिश पर व् १८ राज्यों व् ४ केंद्रशासित क्षेत्र की सहमति पर धारा ३०९ को ख़त्म करने का निर्णय ले रही है किन्तु यदि हम लोकेन्द्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य ए.आई .आर.१९९६ एस.सी.९४६ का अवलोकन करते हैं तो अपनी सोच को विस्तृत रूप दे पायेंगें और इस धारा को इस संहिता में स्थान देने का सही मकसद समझ पाएंगे .पी.रथिनम् का निर्णय जहाँ २ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने दिया है वहीँ इस केस का निर्णय पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने दिया है जिससे इस निर्णय की उस निर्णय पर वरीयता व् प्रमुखता स्वयं ही बढ़ जाती है .इस मामले में पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने विनिश्चित किया -''कि जब कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तब उसे कुछ सुस्पष्ट व्यक्त कार्य करने होते हैं  और उनका उद्गम अनुच्छेद २१ के अंतर्गत ''प्राण के अधिकार ''के संरक्षण में नहीं खोजा जा सकता अथवा उसमे सम्मिलित नहीं किया जा सकता .''प्राण की पवित्रता ''के महत्वपूर्ण पहलु की भी उपेक्षा नहीं की जानी होगी .अनुच्छेद २१ प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करने वाला उपबंध है तथा कल्पना की किसी भी उड़ान से प्राण के संरक्षण में ' में ''प्राण की समाप्ति '' शामिल होने का अर्थ नहीं लगाया जा सकता .किसी व्यक्ति को आत्महत्या करके अपना प्राण समाप्त करना अनुज्ञात करने का जो भी दर्शन हो ,उसमे गारंटी किया हुआ मूल अधिकार के भाग के रूप में ''मरने का अधिकार ''सम्मिलित है ,ऐसा अनुच्छेद २१ का अर्थान्व्यन करना हमारे लिए कठिन है .अनुच्छेद २१ में निश्चित रूप से व्यक्त ''प्राण का अधिकार '' नैसर्गिक अधिकार है किन्तु आत्महत्या प्राण की अनैसर्गिक समाप्ति अथवा अंत है और इसलिए प्राण के अधिकार की संकल्पना के साथ असंयोज्य और असंगत है .
       ये तो हम सभी जानते हैं कि भारत में किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है और ऐसे में इस धारा को ख़त्म करने का निर्णय लेकर यहाँ यह अधिकार भी उस अवसादग्रस्त जनता को दे रहे हैं जो प्राण की समाप्ति को उतारू है .इंग्लैण्ड में आत्महत्या अधिनियम १९६१ पारित होते ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक परिपत्र जारी करके सभी चिकित्सकों तथा सबंधित प्राधिकारियों को यह निर्देश दिया कि आत्महत्या को एक चिकित्सीय तथा सामाजिक समस्या माना जाना चाहिए और यही इस अपराध के प्रति सही कानूनी दृष्टिकोण है .आत्महत्या की ओर प्रवृत होने वाले व्यक्ति के प्रति सहानुभूति के दो शब्द तथा कुशल परामर्श की व्यवस्था होनी चाहिए न कि जेलर का पाषाणी व्यवहार या अभियोजक की सख्त कार्यवाही क्योंकि वास्तव में देखा जाये तो आत्महत्या ''सहायता के लिए पुकार  है दंड के लिए नहीं '' इसलिए इस धारा के खात्मे की सोचना लोकेन्द्र सिंह .....में दिए गए उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार जनता को प्राण की अनैसर्गिक सम्पति का अधिकार देना है जो कि संविधान के अनुच्छेद २१ के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है जबकि वास्तव में इसमें दिए गए दंड की व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है जो ऐसा कदम उठाने की सोचने वाले की सोच को मोड़कर सही दिशा दे सके इसलिए यदि वर्तमान केंद्र सरकार में पिछली सरकारों की अपेक्षा कुछ अद्भुत करने की महत्वाकांक्षा है , गुंजाईश है  तो उसे इस धारा के दंड में बदलाव करते हुए अपराधी को सहानुभूति की दो शब्द व् कुशल चिकित्सकों की देख-रेख में रहकर मानसिक स्थिति सुधरने व् मजबूत करने का दंड देने की व्यवस्था करनी चाहिए .

शालिनी कौशिक
       [कानूनी ज्ञान ]

 

   

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

साध्वी निरंजन ज्योति -दण्डित होने योग्य



खाद्य एवं प्रसंस्करण राज्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के अमर्यादित बोल संसद के दोनों सदनों में कोहराम मचाते हैं और राजनीतिक कार्यप्रणाली के रूप में विपक्ष् उन पर कार्यवाही चाहता है ,उनका इस्तीफा चाहता है और उन पर एफ.आई.आर. दर्ज़ करने की अपेक्षा रखता है और सत्ता वही पुराने ढंग में घुटने टेके खड़ी रहती है . अपने मंत्री के माफ़ी मांगने को आधार बना उनका बचाव करती है जबकि साध्वी निरंजन ज्योति ने जो कुछ कहा वह सामान्य नहीं था .भारतीय कानून की दृष्टि में अपराध था .वे दिल्ली की एक जनसभा के दौरान लोगों को ''रामजादे-हरामजादे में से एक को चुनने को कहती हैं ''   वे कहती हैं -''कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में मतदाताओं को तय करना है कि वह रामजादों की सरकार बनायेंगें या हरामजादों की .''राम के नाम पर ६ दिसंबर १९९२ की उथल-पुथल आज भी भारतीय जनमानस के मन से नहीं उतर पाई है और २२ वर्ष बाद फिर ये देश को उसी रंग में रंगने को उतर रहे हैं और ऐसे में इनके वेंकैय्या नायडू निरंजन ज्योति के माफ़ी मांगने को पर्याप्त कह मामले को रफा-दफा करने की कोशिश कर रहे हैं जबकि यह सीधे तौर पर राष्ट्र की अखंड़ता पर हमला है जिसके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा १५३-ख कहती है -
१५३-ख- [1] जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा -
[क] ऐसा कोई लांछन लगाएगा या प्रकाशित करेगा कि किसी वर्ग के व्यक्ति इस कारण से ही कि वे किसी धार्मिक ,मूलवंशीय ,भाषाई या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं ,विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठां नहीं रख सकते या भारत की प्रभुता और अखंडता की मर्यादा नहीं बनाये रख सकते ,अथवा
[ख] यह प्राख्यान करेगा ,परामर्श देगा ,सलाह देगा ,प्रचार करेगा या प्रकाशित करेगा कि किसी वर्ग के व्यक्तियों को इस कारण से कि वे किसी धार्मिक ,मूलवंशीय ,भाषाई या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं ,भारत के नागरिक के रूप में उनके अधिकार न दिए जाएँ या उन्हें उनसे वंचित किया जाये ,अथवा
[ग] किसी वर्ग के व्यक्तियों की बाध्यता के सम्बन्ध में इस कारण कि वे किसी धार्मिक ,मूलवंशीय ,भाषाई या प्रादेशिक समूह या जाति या समुदाय के सदस्य हैं ,कोई प्राख्यान करेगा ,परामर्श देगा ,अभिवाक करेगा या अपील करेगा अथवा प्रकाशित करेगा और ऐसे प्राख्यान ,परामर्श ,अभिवाक या अपील से ऐसे सदस्यों तथा अन्य व्यक्तियों के बीच असामंजस्य अथवा शत्रुता या घृणा या वैमनस्य की भावनाएं उत्पन्न होती हैं या उत्पन्न होनी सम्भाव्य हैं ,
वह कारावास से ,जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा ,या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जायेगा .
   और यहाँ साध्वी निरंजन ज्योति के ये बोल भारत की एकता व् अखंडता के प्रतिकूल हैं और इस धारा के अधीन दण्डित होने योग्य .

शालिनी कौशिक
     [कानूनी ज्ञान ]



रविवार, 30 नवंबर 2014

इच्छा मृत्यु व् आत्महत्या



इच्छा मृत्यु व् आत्महत्या :नियति व् मजबूरी



Suicide  : Young woman sitting on railroadhospital bedDisappointed : Side view of a frustrated young Indian man. Isolated against white background.
अरुणा रामचंद्र शानबाग ,एक नर्स ,जिस पर हॉस्पिटल के एक सफाई कर्मचारी द्वारा दुष्कर्म की नीयत से बर्बर हमला किया गया जिसके कारण गला घुटने के कारण उसके मस्तिष्क को ऑक्सिजन  की आपूर्ति बंद हो गयी और उसका कार्टेक्स क्षतिग्रस्त हो गया ,ग्रीवा रज्जु में चोट के साथ ही मस्तिष्क नलिकाओं में भी चोट पहुंची और फलस्वरूप एक जिंदगी जिसे न केवल अपने लिए बल्कि इस समाज देश के लिए सेवा के नए आयाम स्थापित करने थे स्वयं सेवा कराने के लिए मुंबई के के.ई.एम्.अस्पताल के बिस्तर पर पसर गयी और ३६ साल से वहीँ टुकुर टुकुर जिंदगी के दिन गिन रही है .पिंकी वीरानी ,जिसने अरुणा की दर्दनाक  कहानी अपनी पुस्तक में बयां की ,ने उसकी जिंदगी को संविधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत जीवन के अधिकार में मिले सम्मान से जीने के हक़ के अनुरूप नहीं माना .और उसके लिए ''इच्छा मृत्यु ''की मांग की ,जिसे सर्वोच्च  न्यायालय के न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा ने सिरे से ख़ारिज कर दिया .अपने १४१ पन्नों के फैसले में न्यायालय ने कहा -
''देश में इच्छा मृत्यु पर कोई कानून नहीं है .जब तक संसद कानून नहीं बनाती है ,न्यायालय का फैसला पैसिव व् एक्टिव यूथनेसिया के तहत लागू रहेगा .देश में एक्टिव यूथनेसिया गैर कानूनी है लेकिन विशेष परिस्थितियों में पैसिव यूथनेसिया की इज़ाज़त  दी जा सकती है .भविष्य में हाईकोर्ट द्वारा तीन प्रमुख डाक्टरों की राय लेने और सरकार व् मरीज के करीबी रिश्तेदारों की राय जानने के बाद पैसिव यूथनेसिया की मंजूरी दे सकेगा .''
पैसिव व् एक्टिव यूथनेसिया -यूनान में इच्छा मृत्यु [यूथनेसिया ]को [गुड   डेथ]यानि अच्छी मौत कहा जाता था .यूथनेसिया मूलतः यूनानी शब्द है इसका अर्थ इयू अच्छी ,थानातोस मृत्यु से होता है .इच्छा मृत्यु वह है जब कोई मरीज अपने लिए मृत्यु खुद मांगता  है ,मर्सी किलिंग वह है जब कोई अन्य मरीज के लिए मृत्यु  की गुहार लगाता है .
भारत  में इच्छा मृत्यु अवैधानिक है क्योंकि आत्महत्या का प्रयास भारतीय दंड विधान आई.पी.सी.की धारा ३०९ के अंतर्गत अपराध है .धारा ३०९ आई.पी.सी. कहती है -
''जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा और उस अपराध के करने के लिए कोई कार्य करेगा ,वह सदा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से दण्डित किया जायेगा .''
और जहाँ तक मर्सी किलिंग की बात है भारतीय दंड विधान धारा ३०४ के अंतर्गत इसे भी अपराध मानता है .धारा ३०४ कहती है -
''जो कोई ऐसा आपराधिक मानव वध करेगा ,जो हत्या की कोटि में नहीं आता है ,यदि वह कार्य जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गयी है ,मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति ,जिससे मृत्यु होना संभाव्य है ,कारित करने के आशय से किया जाये ,तो वह आजीवन कारावास से ,या दोनों में से किसी भांति के कारावास से ,जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी ,दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .
अथवा यदि वह कार्य इस ज्ञान के साथ कि उससे मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है ,किन्तु मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति ,जिससे मृत्यु कारित करना संभाव्य है ,कारित करने के आशय के बिना किया जाये ,तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी ,या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .''
इस प्रकार भारतीय दंड विधान मर्सी किलिंग को धारा ३०४ के अंतर्गत सदोष हत्या का अपराध मानता है और इसकी मंजूरी नहीं देता है .
इस प्रकार विशेष परिस्थितियों में यदि कोई मरीज मरणासन्न  है ,उसकी हालत में सुधार की कोई गुंजाईश नहीं है तो उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार पैसिव यूथनेसिया की मंजूरी दी जा सकती है जिसके अनुसरण में मरीज को सिर्फ जीवन रक्षक प्रणाली से हटाया जा सकता है जिसके हटाने से उसकी मृत्यु संभव हो सके किन्तु भारतीय कानून एक्टिव यूथनेसिया को मंजूरी नहीं देता है जिसमे मरणासन्न मरीज को मरने  में प्रत्यक्ष सहयोग दिया जाता है यानि डाक्टरों की मौजूदगी में रोगी को मारने के लिए ड्रग्स या जहरीले इंजेक्शन दिए जाते हैं .
और ऐसे में यदि हम विचार करें तो आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से अलग करना एक्टिव यूथनेसिया की श्रेणी में ही आ जायेगा क्योंकि जिस व्यक्ति के मन में जीने की इच्छा ख़त्म हो रही है उसे निराशा के रोगी के रूप में मरणासन्न मरीज की श्रेणी में रखा जा सकता है और ऐसे में माना जा सकता है कि वह सही निर्णय नहीं ले सकता है और ऐसे में देश का कानून यदि ऐसे  प्रयास को अपराध की श्रेणी में नहीं रखता  है तो देश में एक्टिव यूथनेसिया को मंजूरी देने जैसा ही हो जायेगा .
इस प्रकार इच्छा मृत्यु व् आत्महत्या का अधिकार का वही अंतर है जो पैसिव व् एक्टिव युथनेसिया का है और देश के कानून का इनके प्रति अपनाया गया दृष्टिकोण भी इच्छा मृत्यु या मरने की नियति की मांग पर विचार कर उसकी मंजूरी दे सकता है आत्महत्या या मजबूरी गले में डालने की नहीं .
शालिनी कौशिक

शनिवार, 22 नवंबर 2014

तेजाबी मौत :दंड केवल फांसी

 Gujarat: Woman killed in acid attack for resisting sexual advances

 A 30-year-old woman was killed and her two children were critically injured in Umarvada here when a man along with two of his accomplices, hurled acid on them, police said today. The incident took place last night after the woman rejected sexual advances of accused Aslam Sheikh, following which Sheikh along with his friends barged into the victim's house and threw acid on her and her children, Assistant Commissioner of Police Naresh Kanzariya said.]

घटना सूरत [गुजरात ] की है यौन प्रताड़ना का विरोध करने वाली महिला पर आरोपियों ने तेजाब फैंक दिया जिससे उसकी मौत हो गयी और ये घटना कमज़ोरी न केवल हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की ज़ाहिर करती है अपितु ज़ाहिर करती है हमारी कानूनी व्यवस्था की कमजोरी भी क्योंकि अभी हाल ही में हुए दंड विधि [ संशोधन] अधिनियम ,२०१३ में तेजाब सम्बंधित मामलों के लिए धारा ३२६ -क व् धारा ३२६-ख  अन्तः स्थापित की गयी हैं जिसमे धारा ३२६-क '' स्वेच्छ्या तेजाब ,इत्यादि के प्रयोग से घोर उपहति कारित करना  ''को ही अपने घेरे में लेती है जिसमे कारावास ,जो दस वर्ष से कम नहीं किन्तु जो आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ज़ुर्माना जिसका भुगतान पीड़िता को किया जायेगा ......और धारा ३२६ -ख स्वेच्छ्या तेजाब फेंकने या फेंकने के प्रयत्न को ही अपने घेरे में लेती है जिसमे ५ वर्ष का कारावास ,किन्तु जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माने का दंड मिलेगा .इन दोनों ही धाराओं की व्यवस्था करते समय हमारे कानून विदों ने शायद इस तरह की घटना की कल्पना नहीं की होगी क्योंकि आज तक हुई अधिकांश घटनाओं में तेजाब पीड़िताओं की ज़िंदगी झुलसी है मौत नहीं किन्तु इस घटना ने तेजाब पीड़िता की ज़िंदगी ही नहीं मौत को भी झुलसा दिया और उसे मौत का शिकार बना दिया किन्तु अब कानून उन्हें ज्यादा से ज्यादा क्या देगा ३२६-क और ३०२ का अंतर्गत सजा जो कि फांसी हो भी सकती है और नहीं भी जबकि इस तरह के मामलों में निश्चित रूप से फांसी होनी चाहिए क्योंकि तेजाब ने यहाँ मात्र घोर उपहति नहीं कि वरन मौत दी है और इस सम्बन्ध में कानून को नयी व्यवस्थाएं भूतलक्षी संशोधन करते हुए लागू करनी ही होंगी .

शालिनी कौशिक 
      [कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 10 नवंबर 2014

वोट देना जरूरी करने वाला पहला राज्य बना गुजरात-really ?

अब वोट नहीं करनेवालों की खैर नहीं। (प्रतिनिधि चित्र)

वोट देना जरूरी करने वाला पहला राज्य बना गुजरात


 भारतीय संविधान का अनुच्छेद २१ यह  उपबंधित करता है कि ''किसी व्यक्ति को उसके प्राण और दैहिक स्वाधीनता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा ,अन्यथा नहीं .''
    इस प्रकार प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार सभी अधिकारों में श्रेष्ठ है और अनुच्छेद २१ इसी अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है .
    यह अधिकार व्यक्ति को न केवल जीने का अधिकार देता है वरन मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्रदान करता है .फ्रेंसिस कोरेली बनाम भारत संघ ए.आई.आर .१९८१ एस.सी.७४६ में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनुछहद २१ के अधीन प्राण शब्द से तात्पर्य पशुवत जीवन से नहीं वरन मानव जीवन से है और इसमें मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार सम्मिलित है और इसी मानवीय गरिमा को मद्देनज़र रखते हुए उच्चतम न्यायालय ने प्रगति वर्गीज़ बनाम सिरिल जॉर्ज वर्गीज़ ए.आई.आर. १९९७ एस.सी.३४९ के मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि भारतीय तलाक अधिनियम १८६९ की धारा १० ईसाई पत्नी को ऐसे व्यक्ति के साथ रहने के लिए विवश करती है जिससे वह घृणा करती है .जिसने उसके साथ क्रूरता का व्यवहार करके उसे त्याग दिया था ऐसा जीवन पशुवत जीवन है .यह ऐसे विवाह को विच्छेद करने के अधिकार को इंकार  करता है जो विवाह असुधार्य टूट गया है .विवाह विच्छेद करने के अधिकार को इंकार करना अनुच्छेद २१ के अधीन प्राप्त प्राण के अधिकार का उल्लंघन है .
   इसी तरह आज गुजरात में पारित ''गुजरात स्थानीय निकाय कानून विधेयक 2009'' है जो वर्तमान परिस्थितियों में प्रत्येक नागरिक को वोट डालना अनिवार्य घोषित करता है .वोट डालने का अधिकार एक ऐसा अधिकार है जो लोकतंत्र की मजबूती के लिए है किन्तु हमारे देश की परिस्थितियों में यह अनिवार्य होना गलत है क्योंकि उम्मीदवार बहुत सी बार जनता की पसंद के नहीं होते और उसका कारण भी है वह यह कि वे वोट लेने तो आते हैं किन्तु उसके बाद वे जनता के हित व् आकांक्षाओं को दरकिनार कर देते हैं ऐसे में किसी को वोट दिया जाना अनिवार्य करना ऐसे ही है जैसे उससे साँस लेने का ही अधिकार छीना जा रहा हो .यह जनता से संविधान में दिए गए जीने के अधिकार को छीनना ही है कि कोई उम्मीदवार पसंद हो या न हो वोट ज़रूर दो और ऐसा तब तो कहा ही जायेगा जब यहाँ पर उम्मीदवार को वापस बुलाने का अधिकार जनता को नहीं दिया गया हो .
   इसलिए मतदान को अनिवार्य बनाने के कर्तव्य के साथ उम्मीदवार को वापस बुलाने का अधिकार भी जनता को मिलना ही चाहिए .आखिर जनता के यदि कर्तव्य बढ़ाये जा रहे हैं तो सरकार के कर्तव्य भी तो बढ़ने चाहियें तभी तो सच्चे लोकतंत्र के दर्शन संभव होंगे .
   शालिनी कौशिक
     [कौशल ]
   [कानूनी ज्ञान ] 

सोमवार, 3 नवंबर 2014

नगर पालिका क्या करे फिर ?

उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम १९१६ के अधीन नगर पालिका के दो प्रकार के कर्तव्यों का उपबंध किया गया है अर्थात [१] अनिवार्य कर्तव्य  तथा [२] वैवेकिक कर्तव्य .इस अधिनियम की धारा ७ [४] के अन्तर्गत यह उपबंध किया गया है कि प्रत्येक नगर पालिका का यह कर्तव्य होगा  -
''सार्वजनिक सड़कों तथा स्थानों और नालियों की सफाई करना ,हानिकारक वनस्पति को हटाना और समस्त लोक उपताप का उपशमन करना ;''
 किन्तु अब लगता है कि समस्त कार्य जनता के ही सिर पर पड़ने वाला है क्योंकि अब हमारे मोदी जी इसे एक जनांदोलन के रूप में देख रहे हैं और इसकी वास्तविकता को और गैर ज़रूरी बोझ को नहीं देख रहे हैं या देखते हुए भी नज़र अंदाज़ कर रहे हैं .
  वास्तविकता तो ये है कि मोदी जी के आह्वान पर सलमान खान ,प्रियंका चोपड़ा जैसी हस्तियां इससे जुडी ज़रूर किन्तु जिस तरह से वे यहाँ विशिष्ट शख्सियत बनकर सफाई कर रही हैं ये केवल गंदगी को ही समझ में आ रहा है कि फ़िलहाल थोड़ी दूर रहो क्योंकि यहाँ फोटो खिंच रहा है और ज्यादा देर की तकलीफ इस कार्यक्रम से रहने वाली नहीं है और गैर ज़रूरी इसलिए कि ये कार्य जिस विभाग को कानून द्वारा सौंपा गया है यदि कानून को प्रभावी बनाते हुए उस विभाग को उसके कार्य को करने के लिए कर्तव्यबद्ध किया जाये तो इसे ऐसे नाटकों की आवश्यकता नहीं होगी जो प्रधानमंत्री जी सोशल मीडिया के जरिये कभी गन्दा स्थान दिखाते हुए फोटो अपलोड करने को कह रहे हैं ,फिर सफाई करते फोटो फिर साफ स्थान दिखाते हुए फोटो वीडियो अपलोड करने को कहते हैं .अगर प्रधानमंत्री जी अपने इस जनांदोलन की वास्तविकता ही देखना चाहते हैं तो जनता के बीच जाकर कहीं भी देख सकते हैं जहाँ स्वयं जनता और ये सरकारी विभाग ,जो इस कार्य हेतु नियुक्त हैं इस अभियान के विपरीत अस्वच्छ अभियान को जनांदोलन बनाकर उनके पवित्र अभियान को ठेंगा दिखा रहे हैं .

शालिनी कौशिक

  [कानूनी ज्ञान ]
 

शनिवार, 13 सितंबर 2014

दुष्कर्म :नारी नहीं है बेचारी

दुष्कर्म :नारी नहीं है बेचारी
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       दुष्कर्म आज ही नहीं सदियों से नारी जीवन के लिए त्रासदी रहा है .कभी इक्का-दुक्का ही सुनाई पड़ने वाली ये घटनाएँ आज सूचना-संचार क्रांति के कारण एक सुनामी की तरह नज़र आ रही हैं और नारी जीवन पर बरपाये कहर का वास्तविक परिदृश्य दिखा रही हैं .
भारतीय दंड सहिंता में दुष्कर्म ये है -
भारतीय दंड संहिता १८६० का अध्याय १६ का उप-अध्याय ''यौन अपराध ''से सम्बंधित है जिसमे धारा ३७५ कहती है-
Central Government Act
Section 375 in The Indian Penal Code, 1860
375. Rape.-- A man is said to commit" rape" who, except in the case hereinafter excepted, has sexual intercourse with a woman under circumstances falling under any of the six following descriptions:-
First.- Against her will.
Secondly.- Without her consent.
Thirdly.- With her consent, when her consent has been obtained by putting her or any person in whom she is interested in fear of death or of hurt.
Fourthly.- With her consent, when the man knows that he is not her husband, and that her consent is given because she believes that he is another man to whom she is or believes herself to be lawfully married.
Fifthly.- With her consent, when, at the time of giving such consent, by reason of unsoundness of mind or intoxication or the administration by him personally or through another of any stupefying or unwholesome substance, she is unable to understand the nature and consequences of that to which she gives consent.
Sixthly.- With or without her consent, when she is under sixteen years of age.
Explanation.- Penetration is sufficient to constitute the sexual intercourse necessary to the offence of rape.
Exception.- Sexual intercourse by a man with his own wife, the wife not being under fifteen years of age, is not rape.
      ये आंकड़े इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आज ये घटनाएँ किस कदर नारी जीवन को गहरे अंधकार में धकेल रही हैं -
     अश्लीलता का असर -
राज्य                २०१२              २०१३
आंध्र प्रदेश          २८                  २३४
केरल                 १४७                १७७
उत्तर प्रदेश         २६                  १५९
महाराष्ट्र            ७६                  १२२
असम                ०                    १११
भारत               ५८९                  १२०३
      -सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम के तहत दर्ज मामले [पोर्नोग्राफी के चलते जहाँ महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा बढ़ रही है वहीं मासूम भी इसके दुष्प्रभाव से बचे हुए नहीं हैं .आंकड़े लोकसभा ]


       और ये हैं कुछ गंभीर मामले -
१- दामिनी गैंगरेप केस -१६ दिसंबर २०१२
२-ग्वालियर में महिला जज द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जज पर यौन उत्पीड़न का आरोप
३- विशाखापट्नम में नौसेना में महिला अफसर [सब लेफ्टिनेंट महिला अफसर ]द्वारा कमांडर रैंक के अफसर पर   यौन प्रताड़ना का आरोप
४- शामली जिले में ९० वर्षीय महिला से रिश्ते के पौत्र द्वारा रेप
५- बदायूं  में दो बहनों के साथ बलात्कार के बाद हत्या
६- बंगलुरु में शहर के एक नामी गिरामी स्कूल में एक छह साल की बच्ची के साथ बलात्कार
७- बंगलुरु में आर्मी एविएशन कॉर्प्स में तैनात एक महिला अधिकारी की इज़्ज़त लूटने का प्रयास .
         ये तो चंद घटनाएँ हैं मात्र उदाहरण उस अभिशाप का जो नारी जीवन को मर्मान्तक ,ह्रदय विदारक चोट देता है किन्तु ये समाज और ये पुरुष जाति इस घटना को मात्र संवाद सहानुभूति तक ही सीमित कर देती है .गावों में जहाँ दुष्कर्मी को कभी पांच जूते मारकर व् कभी गधे पर मुंह काला करके गावं में घुमाने तो कभी कुछ रुपयों का जुर्माने की सजा दी जाकर बरी कर दिया जाता है वहीँ इस तरह की घटना पर रक्षा मंत्री /वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली जी द्वारा 'एक छोटी सी घटना ''जैसी संवेदना हीन प्रतिक्रिया दी जाती है .
      किन्तु जैसे कि सहानुभूति कुछ देर के लिए दर्द को भुला तो सकती है खत्म नहीं कर सकती वैसे ही ऐसे में यदि इस घटना पर नारी को सहानुभूति मिल भी जाये तो उसकी अंतहीन पीड़ा का खात्मा नहीं हो सकता उसे इस सम्बन्ध में स्वयं को मजबूत करना होगा और इस ज़ुल्म के खिलाफ खड़ा होना ही होगा .


नारी नहीं है बेचारी 
     साक्षी नाम की १५ वर्षीय लड़की और उत्तर प्रदेश का सी.ओ.स्तर का अधिकारी अमरजीत शाही ,कोई सोच भी नहीं सकता था कि एक १५ वर्षीय नाजुक कोमल सी लड़की उसका मुकाबला कर पायेगी पर उसने किया और अपना नाम तक नहीं बदला क्योंकि उसका मानना है कि मुजरिम वह नहीं उसका उत्पीड़न करने वाला  है और उसी की हिम्मत का परिणाम है कि १४ अगस्त को शाही को अपहरण ,बलात्कार और आतंकित करने के जुर्म में दोषी पाया गया और तीन दिन बाद उसे १० साल की सख्त कारावास और ६५,००० रूपये का अर्थ दंड भरने की  सजा सुनाई गयी.
    शामली में ९० वर्षीय वृद्धा ने कोर्ट में रेप की दास्तान बयान की और उसके दुष्कर्मी को १० साल का कारावास मिला .
        बंगलुरु में महिला अधिकारी की इज़्ज़त लूटने के प्रयास में जवान बर्खास्त .
   कंकरखेड़ा मेरठ की आशा कहती हैं कि महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को रोकने के लिए सिर्फ कानून से काम चलने वाला नहीं .कानून की कमी नहीं पर इसके लिए समाज को भूमिका निभानी होगी .लाडलो पर अंकुश लगाना होगा .
  नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में २०१३ में दर्ज किये गए रेप के मामले में प्रत्येक १०० मामलों में ९५ दोषी व्यक्ति पीड़िताओं के परिचित ही थे .अभी हाल ही में घटित लखनऊ निर्भया गैंगरेप में भी दोषी मृतका का परिचित ही था .इसलिए ऐसे में महिलाओं की जिम्मेदारी  बनती है कि वे सतर्क रहे और संबंधों को एक सीमा में ही रखें .
      बच्चों की शिकायतों पर गौर करें और ज़रूरी कदम उठायें संबंधों को मात्र संबंध ही रहने  दें न कि अपने ऊपर बोझ बांयें  .
       सामाजिक रूप से बच्चों की और अपनी दोस्ती को घर के बाहर ही निभाने पर जोर दें और बच्चों से उनके दोस्तों के बारे में जानकारी  लेती रहें .
        यही  नहीं कानून ने भी इस संबंध में नारी का साथ निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है और भले ही यह अपराध उन्हें   तोड़ने की लाख कोशिश करे किन्तु वे टूटें नहीं बल्कि इसका डटकर मुकाबला करें .

   आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है .
कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं करती हैं और इसके लिए विधि बनाने में काफी समय लगेगा ;अतः जब तक विधान मंडल समुचित विधि नहीं बनाता है न्यायालय द्वारा विहित मार्गदर्शक सिद्धांत को लागू किया जायेगा .

न्यायालय ने ये भी निर्णय दिया कि ''प्रत्येक नियोक्ता या अन्य व्यक्तियों का यह कि काम के स्थान या अन्य स्थानों में चाहे प्राईवेट हो या पब्लिक ,श्रमजीवी महिलाओं के यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित उपाय करे .इस मामले में महिलाओं के अनु.१४,१९ और २१ में प्रदत्त मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विशाखा नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने लोकहित वाद न्यायालय में फाईल किया था .याचिका फाईल करने का तत्कालीन कारण राजस्थान राज्य में एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना थी .न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये-
[१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं - सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींटाकशी करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम [१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शारीरिक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी  छींटाकशी करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम या विनियमों में यौन उत्पीडन रोकने सम्बन्धी नियम शामिल किये जाने चाहिए और ऐसे नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए समुचित दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए .
[स] प्राईवेट क्षेत्र के नियोक्ताओं के सम्बन्ध में औद्योगिक नियोजन [standing order  ]अधिनियम १९४६ के अधीन ऐसे निषेधों को शामिल किया जाना चाहिए.
[द] महिलाओं को काम,आराम,स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञानं के सम्बन्ध में समुचित परिस्थितियों का प्रावधान होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया  जाना चाहिए  कि महिलाओं को काम के स्थान में कोई विद्वेष पूर्ण वातावरण न हो उनके मन में ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि वे नियोजन आदि के मामले में अलाभकारी स्थिति में हैं .
[२] जहाँ ऐसा आचरण भारतीय दंड सहिंता या किसी अन्य विधि के अधीन विशिष्ट अपराध होता हो तो नियोक्ता को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को शिकायत करके समुचित कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए .
[३]यौन उत्पीडन की शिकार महिला को अपना या उत्पीडनकर्ता  का स्थानांतरण करवाने का विकल्प होना चाहिए.
न्यायालय ने कहा कि ''किसी वृत्ति ,व्यापर या पेशा के चलाने के लिए सुरक्षित काम का वातावरण होना चाहिए .''प्राण के अधिकार का तात्पर्य मानव गरिमा से जीवन जीना है ऐसी सुरक्षा और गरिमा की सुरक्षा को समुचित कानून द्वारा सुनिश्चित कराने तथा लागू करने का प्रमुख दायित्व विधान मंडल और कार्यपालिका का है किन्तु जब कभी न्यायालय के समक्ष अनु.३२ के अधीन महिलाओं के यौन उत्पीडन का मामला लाया जाता है तो उनके मूल अधिकारों की संरक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना ,जब तक कि  समुचित विधान नहीं बनाये जाते उच्चतम न्यायालय का संविधानिक कर्त्तव्य है.
- -इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने  दिल्ली डेमोक्रेटिक वर्किंग विमेंस फोरम बनाम भारत संघ [१९९५] एस.सी.१४ में पुलिस स्टेशन पर पीड़िता को विधिक सहायता की उपलब्धता की जानकारी दिया जाना ,पीड़ित व्यक्ति की पहचान गुप्त रखा जाना और आपराधिक क्षति प्रतिकर बोर्ड के गठन का प्रस्ताव रखा है .
-भारतीय दंड सहिंता की धारा ३७६ में विभिन्न प्रकार के बलात्कार के लिए कठोर कारावास जिसकी अवधि १० वर्ष से काम नहीं होगी किन्तु जो आजीवन तक हो सकेगी और जुर्माने का प्रावधान भी रखा गया है .
-महिलाओं की मदद के लिए विभिन्न तरह के और भी उपाय हैं -
-आज की  सबसे लोकप्रिय वेबसाइट फेसबुक पर महिलाओं की मदद के लिए पेज है -
helpnarishakti@yahoo.com
-राष्ट्रीय महिला आयोग से भी महिलाएं इस सम्बन्ध में संपर्क कर सकती हैं उसका नंबर है -
  011-23237166,23236988
-राष्ट्रीय महिला आयोग को शिकायत इस नंबर पर की जा सकती है -
 23219750
-दिल्ली निवासी महिलाएं दिल्ली राज्य महिला आयोग से इस नंबर पर संपर्क कर सकती हैं -
011 -23379150  ,23378044
-उत्तर प्रदेश की महिलाएं अपने राज्य के महिला आयोग से इस नंबर पर संपर्क कर सकती हैं -
0522 -2305870 और ईमेल आई डी है -up.mahilaayog@yahoo.com
     आज सरकार भी नारी सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है और उसकी यह प्रतिबद्धता दिखती है अब दुष्कर्म पीड़िताओं की मदद के लिए निर्भया केंद्र खुलेंगे जिसमे पीड़िताओं को २४ घंटे चिकित्सीय सहायता मिलेगी और जहाँ डाक्टर ,नर्स के अलावा वकील भी केन्द्रों पर मौजूद रहेंगे .यही नहीं अब सरकार गावों में खुले में शौच को भी इस समस्या से जोड़ रही है और मोदी जी ने स्वतंत्रता दिवस पर इस सम्बन्ध में त्वरित प्रबंध किये जाने के प्रति अपना दृढ संकल्प दिखाया है .
   अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने क्लिंटन फाउंडेशन के कार्यक्रम में कहा कि महिलाओं और लड़कियों में आर्थिक व् सामाजिक रूप से आगे बढ़ने की असीमित क्षमता है इसके लिए ज़रूरी है कि वे अपने निर्णय खुद लें और आज उन्हें दिखाना ही होगा कि ये कहर भी झेलकर वे आगे बढ़ती रहेंगी और इसका डटकर मुकाबला करती रहेंगी .

शालिनी कौशिक
  [कौशल ]

शनिवार, 28 जून 2014

क्या पुरुषों को सम्मान से जीने का अधिकार नहीं ?

Pavitra Bandhan 20th June 2014 EpisodePavitra Bandhan 25th June 2014 Episode

[False dowry case? Man kills self

Express news service Posted: Feb 07, 2008 at 0321 hrs
Lucknow, February 6 A 30-year-old man, Pushkar Singh, committed suicide by hanging himself from a ceiling fan at his home in Jankipuram area of Vikas Nagar, on Wednesday.In a suicide note, addressed to the Allahabad High Court, Singh alleges that he was framed in a dowry case by his wife Vinita and her relatives, due to which he had to spend time in judicial custody for four months.
The Vikas Nagar police registered a case later in the day.
“During the investigation, if we find it necessary to question Vinita, we will definitely record her statement,” said BP Singh, Station Officer, Vikas Nagar.
Pleading innocence and holding his wife responsible for the extreme step he was taking, Singh’s note states: “I was sent to jail after a false dowry case was lodged against me by Vinita and her family, who had demanded Rs 14 lakh as a compensation. Neither my father nor I had seen such a big amount in our lives. We even sold our house to contest the case.”
According to reports, Singh married Vinita about two years ago and lived in Allahabad since.
Early last year, his wife left him and started living with her family.
A case under Sections 323 (voluntarily causing hurt), 498 (A) (cruelty by husband or relatives of husband) and 504 (intentional insult) was lodged by Vinita and her relatives before she left him.
In the note, Singh wrote he was in the Naini Central Jail from “September 29 to December 24, 2007”.
Shishupal Singh, Singh's brother-in-law, said he was disturbed ever since he released from jail. The court case constantly haunted him.
“After he was bailed out, he was living with his mother, younger sister and a physically-challenged brother in a rented house in Jankipuram.” The family had their own house in Indira Nagar, which was recently sold to meet the legal expenses, he added.
“While he searched for a job, he drove a three-wheeler for a living. A few days ago, he received a notice from the court and since then, he stopped stepping out of the house,” he said.
In the note, Singh further wrote: “I would also like to request Vinita not to harass my family in future. It was my mistake to marry her and I am repenting it by sacrificing my life.”]

''मुझे दहेज़ कानून की धारा ४९८-ए,३२३ और ५०४ के तहत जेल जाना पड़ा ,मेरी पत्नी विनीता ने शादी के 2 साल बाद हमारे परिवार के खिलाफ दहेज़ के रूप में 14 लाख रुपये मांगने का झूठा मुकदमा लिखाया था .इतनी रकम कभी मेरे पिता ने नहीं कमाई ,मैं इतना पैसा मांगने के बारे में कभी सोच भी नहीं सकता था ,मेरी भी बहने हैं ,इस मुक़दमे के चलते मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया है ,हम आर्थिक तंगी के शिकार हो गए ,मकान बिक गया ,अब मैं ज़िंदा नहीं रहना चाहता हूँ ख़ुदकुशी करना चाहता हूँ ,मेरी मौत के लिए मेरी ससुराल के लोग जिम्मेदार होंगे .''
       ये था उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के जानकीपुरम सेक्टर -सी में रहने वाले पुष्कर सिंह का ख़ुदकुशी से पहले लिखा गया पत्र ,जिसे लिखने के बाद ६ फरवरी २००८ को पुष्कर ने फांसी का फंदा गले में डाल कर ख़ुदकुशी कर ली .
       दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक  'पवित्र बंधन 'में एक पात्र मीनाक्षी ,जो कि एक एडवोकेट है और धारावाहिक के नायक गिरीश रॉय चौधरी की मृतक पत्नी की सहेली ,वह गिरीश राय चौधरी से एकतरफा पागलपन की हद तक प्यार करती है और उसे पाने के लिए किसी भी हद तक गुज़र जाने को तैयार है .अपने इस प्रयास में विफल रहने पर वह स्वयं को चोटें मारती है ,स्वयं के कपडे फाड़ती है और पुलिस लेकर पहुँच जाती है गिरीश राय चौधरी के घर ,ये इलज़ाम लेकर कि गिरीश ने उसके साथ 'बलात्कार का प्रयास किया है '.
     ये दोनों ही मामले ऐसे हैं जो संविधान द्वारा दिए गए प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के मूल अधिकार से एक हद तक पुरुष जाति को वंचित करते हैं .पुरुषों ने महिलाओं पर अत्याचार किये हैं ,उनके साथ बर्बर व्यवहार किये हैं किन्तु ये आंकड़ा अधिकांशतया होते हुए भी पूर्णतया के दायरे में नहीं आता .अधिकांश पुरुषों ने अधिकांश महिलाओं के जीवन को कष्ट पहुँचाया है किन्तु इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि सभी पुरुषों ने महिलाओं को कष्ट पहुँचाया है .अधिकांश महिलाएं पुरुषों के द्वारा पीड़ित रही हैं किन्तु इस बात से ये तो नहीं कहा जा सकता कि सभी महिलाएं पुरुषों के द्वारा पीड़ित रही हैं और इसीलिए अधिकांश के किये की सजा अगर सभी को दी जाती है तो ये कैसे कहा जा सकता है कि संविधान द्वारा सभी को जीने का अधिकार दिया जा रहा है .जीने का अधिकार भी वह जिसके बारे में स्वयं संविधान के संरक्षक उच्चतम न्यायालय ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९७८ एस.सी.५९७ में कहा है -
''प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुए जीने का अधिकार है .''
 फ्रेंसिसी कोरेली बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९८१ एस.सी. ७४६ में इसी निर्णय का अनुसरण करते हुए उच्चतम न्यायालय  ने कहा -''अनुच्छेद २१ के अधीन प्राण शब्द से तात्पर्य पशुवत जीवन से नहीं वरन मानव जीवन से है इसका भौतिक अस्तित्व ही नहीं वरन आध्यात्मिक अस्तित्व है .प्राण का अधिकार शरीर के अंगों की संरक्षा तक ही सीमित नहीं है जिससे जीवन का आनंद मिलता है या आत्मा वही जीवन से संपर्क स्थापित करती है वरन इसमें मानव गरिमा के साथ  जीने का अधिकार भी सम्मिलित है जो मानव जीवन को पूर्ण बनाने के लिए आवश्यक है .''
     और ऐसे मामले जहाँ कानून से मिली छूट के आधार पर शादी के सात साल के अंदर के विवाह को दहेज़ से जोड़ देना और नारी के द्वारा स्वयं ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने पर पुरुष से धिक्कार पाने पर उसे बलात्कार के प्रयास का रूप दे दिया जाना सीधे तौर पर पुरुष की गरिमा पर ,जीने के अधिकार पर हमले कहें जायेंगें क्योंकि इन मामलों में नारी का पक्ष न्यायालय के सामने मजबूत रहता है और एक यह पक्ष भी न्यायालय के सामने रहता है कि नारी ऐसे मामलों में शिकायत की पहल नहीं करती है और इसका खामियाजा पुरुषों को भुगतना पड़ता है .ऐसे मामलों में सबूतों ,गवाहों की कमी यदि महिलाओं को रहती है तो पुरुषों को भी इसका सामना करना पड़ता है और अपने मामलों को साबित करना दोनों के लिए ही कठिन हो जाता है किन्तु महिला के लिए न्यायालय का कोमल रुख यहाँ पुरुषों के लिए और भी बड़ी कठिनाई बन कर उभरता है .यूँ तो अधिकांशतया नारियों पर ही अत्याचार होते हैं किन्तु जहाँ एक तरफ ख़राब चरित्र के पुरुष हैं वहीँ ख़राब चरित्र की नारियां भी हैं और इसका फायदा वे ले जाती हैं क्योंकि ख़राब चरित्र का पुरुष ऐसे जाल में नहीं फंसता वह पहले से ही अपने बचाव के उपाय किये रहता है जबकि अच्छे चरित्र का पुरुष उन बातों के बारे में सोच भी नहीं पाता जो इस तरह की तिकड़मबाज नारियां सोचे रहती हैं और अमल में लाती हैं .
       जैसे कि हमारे ही एक परिचित के लड़के से ब्याही लड़की विवाह के कुछ समय तो अपनी ससुराल में रही और बाद में अपने मायके चली गयी और वहां से ये बात पक्की करके ही ससुराल में आई कि लड़का ससुराल से अलग घर लेकर रहेगा .लड़के के अलग रहने पर वह आई और कुछ समय रही और बाद में एक दिन जब लड़का कहीं बाहर गया था तो घर से अपना सामान उठाकर अपने भाइयों के साथ चली गयी और अपने घर जाकर अपने पति पर दहेज़ का मुकदमा दायर कर दिया ,सबसे अलग रहने के बावजूद घर के अन्य सभी को भी पति के साथ ४९८-ए के अंतर्गत क्रूरता के घेरे में ले लिया .स्थिति ये आ गयी कि लड़के के मुंह से यह निकल गया -''कि बस अब तो ऊपर जाने के मन करता है .''वह तो बस भगवान की कृपा कही जाएगी या फिर उसके घरवालों का साथ कि अपनी कोई जमीन बेचकर उन्होंने लड़की वालों को १० लाख रूपये दिए और लड़के को ख़ुदकुशी और खुद को जेल जाने से बचाया किन्तु अफ़सोस यही रहा कि कानून कहीं भी साथ में खड़ा नज़र नहीं आया .
        ऐसे ही ये बलात्कार या बलात्कार का प्रयास का आरोप है जिसमे या तो लम्बी कानूनी कार्यवाही या लम्बी जेल और या फिर ख़ुदकुशी ही बहुत सी बार निर्दोष चरित्रवान पुरुषों का भाग्य बनती है .हमारी जानकारी के ही एक महोदय का अपनी संपत्ति को लेकर एक महिला से दीवानी मुकदमा चल रहा है और वह महिला जब अपने सारे हथकंडे आज़मा कर भी उन्हें मुक़दमे में पीछे न हटा पायी तो उसने वह हथकंडा चला जिसे सभ्य समाज की कोई भी महिला कभी भी नहीं आज़माएगी .उसने इन महोदय के एकमात्र पुत्र पर जो कि उससे लगभग १५ साल छोटा होगा ,पर यह आरोप लगा दिया कि उसने मेरे घर में घुसकर मेरे साथ 'बलात्कार का प्रयास 'किया .वह तो इन महोदय का साथ समाज के लोगों ने दिया और कुछ राजनीतिक रिश्तेदारी ने जो इनका एकमात्र पुत्र जेल जाने से बच गया और उसका जीवन तबाह होने से बच गया किन्तु कानून के नारी के प्रति कोमल रुख ने इस नारी के हौसलों को ,जितने दिन भी वह इन्हें इस तरह परेशान रख सकी से इतने बुलंद कर दिए कि वह आये दिन जिस किसी से भी उसका कोई विवाद होता है उसे बलात्कार का प्रयास का आरोप लगाने की ही धमकी देती है और कानून कहीं भी उसके खिलाफ खड़ा नहीं होता बल्कि उसे और भी ज्यादा छूट देता है .भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा १४६[३] में अधिनियम संख्या ४ सं २००३ द्वारा परन्तुक अंतःस्थापित कर कानून ने ऐसी ही छूट दी है .जिसमे कहा गया है -
   [बशर्ते कि बलात्कार या बलात्कार करने के प्रयास के अभियोजन में अभियोक्त्री से प्रतिपरीक्षा में उसके सामान्य अनैतिक चरित्र के विषय में प्रश्नों को करने की  अनुज्ञा नहीं होगी .]
        क्या यही है कानून कि एक निर्दोष चरित्रवान मात्र इसलिए अपमानित हो ,जेल काटे कि वह एक पुरुष है .अगर बाद में कानूनी दांवपेंच के जरिये वह अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्ति पा भी लेता है तब भी क्या कानून उसके उस टुकड़े-टुकड़े हुए आत्मसम्मान की भरपाई कर पाता है जो उसे इस तरह के निराधार आरोपों से भुगतनी पड़ती है ?क्या ज़रूरी नहीं है ऐसे में गिरफ़्तारी से पहले उन मेडिकल परीक्षण ,सबूत ,गवाह आदि का लिया जाना जिससे ये साबित होता हो कि पीड़िता के साथ यदि कुछ भी गलत हुआ है तो वह उसी ने किया है जिस पर वह आरोप लगा रही है .ऐसे ही दहेज़ के मामले ,क्रूरता के मामले जिस तरह एकतरफा होकर महिला का पक्ष लेते हैं क्या ये कानून के अंतर्गत सही कहा जायेगा कि निर्दोष सजा पाये और दोषी खुला घूमता रहे .आज कितने ही मामलों में महिलाएं ही पहले घर वालों के द्वारा की गयी जबरदस्ती में शादी कर लेती हैं और बाद में उस विवाह को न निभा कर वापस आ जाती हैं और दहेज़ कानून का दुरूपयोग करती हैं .कानून को गंभीरता से इन मुद्दों को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों के लिए सही व्यवस्था करनी ही होगी अन्यथा इस देश में मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार पुरुषों को भी है यह बात भूलनी ही होगी .

शालिनी कौशिक 
  [कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 23 जून 2014

उपभोक्ता हित के लिए तहसील स्तर पर पीठ आवश्यक


उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम १९८६ पारित किया है .इस अधिनियम के अंतर्गत स्थापित निकाय अर्ध न्यायिक हैं और इनमे उपचार पाने की प्रक्रिया बहुत सरल व् कम खर्चीली है .इनमे वकील करने की भी आवश्यकता नहीं है .उपभोक्ता व्यक्तिगत रूप से अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकता है .यहाँ कोर्ट फीस भी नहीं लगती है .इस अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए २० लाख तक के मामले जिला स्तर के उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में ,२० लाख से ऊपर व् एक करोड़ से नीचे के मामले राज्य आयोग में व् एक करोड़ से ऊपर के मामले राष्ट्रीय आयोग में विचारित किये जाते हैं .
इस सबके बावजूद एक सबसे बड़ी कमी जो इस कानून को बनाते समय संसद ने की है वह यह है कि इसमें उपभोक्ता को अपने हितों के लिए सबसे निचली कोर्ट जिला स्तर पर उपलब्ध है और जिसमे आवेदन करने पर उपभोक्ता की दैनिक जीवन चर्या और यात्रा का कष्ट और व्यय उसे इन न्यायालयों में अपनी समस्या के लिए आवेदन करने से एक हद तक रोक देता है और वह हानि सहन कर आगे की परेशानी सोच मन मारकर घर ही बैठ जाता है और यही इस कानून की सफलता में सबसे बड़ी बाधा है .संसद को जिला पीठ से नीचे तहसील स्तर पर भी एक ऐसी पीठ की स्थापना करनी चाहिए जो उपभोक्ता को उसके निकट पहुंचकर न्याय दिलाये .उसकी ऐसे वादों को ग्रहण करने की अधिकारिता पांच लाख से नीचे के मामलों में रखी जा सकती है और इस तरह उपभोक्ता के हितों की रक्षा उसके द्वार पर ही पहुंचकर की जा सकती है .
शालिनी कौशिक

शनिवार, 21 जून 2014

ये है नगर पालिका का अनिवार्य कर्तव्य



उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम -१९१६ के अधीन नगरपालिका के दो प्रकार के कर्तव्य उपबंधित किये गए हैं अर्थात अनिवार्य और वैवेकिक और नगर पालिकाओं द्वारा अपने अन्य कर्व्याओं के साथ साथ जिस एक कर्तव्य की सबसे ज्यादा अनदेखी की जाती है वह इसी अधिनियम की धारा ७ [६] में उल्लिखित है -धारा ७ [६] कहती है -
''धारा ७ के अंतर्गत यह उपबंध किया गया है कि प्रयेक नगर पालिका का यह कर्तव्य होगा कि वह नगर पालिका क्षेत्र के भीतर निम्नलिखित की समुचित व्यवस्था करे -
[६] आवारा कुत्तों तथा खतरनाक पशुओं को परिरुद्ध करना ,हटाना या नष्ट करना ;
और देखा जाये तो इस कर्तव्य के प्रति नगर पालिका ने अपनी आँखें मूँद रखी हैं और सभी का तो पूरी तरह से पता नहीं किन्तु कांधला नगर पालिका अपने इस कर्तव्य को पूरा करने में पूरी तरह से उपेक्षा कर रही है .
अभी लगभग २ महीने पहले एक सामान्य रेस्तरा चलाने वाले ने जैसे सभी अपने सामान को थोडा बहुत बाहर की तरफ सजाकर रख लेते हैं रख लिया था कि दो सांड जो कि दिन भर यहाँ खुले घुमते हैं लड़ते लड़ते वहां आ पहुंचे और उन्हें देख वह जैसे ही अपना सामान बचाने लगा कि वह उनके पैरों के नीचे आ गया और बहुत बुरी तरह घायल हो गया और इलाज में ही उसका लाखों रुपयों का व्यय हो चूका है .
ऐसे ही अभी २९ सितम्बर २०१३ को मेरे पिताजी के मित्र के भाई अपनी धेवती को गोद में लेकर घूमने निकले ही थे कि सांड ने पीछे से टक्कर मारी और उनके हाथ से बच्ची छूटकर  सड़क पर जा गिरी और उसका इलाज कराने के लिए उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में ले जाना पड़ा जिस कारण बच्ची के इलाज में उनका काफी रुपया लग गया.
रोज आये दिन घरों में बंदरों की आवजाही बढ़ रही है और कहीं कोई छत से गिर रहा है तो किसी किसी को बन्दर के काटने के कारण इन्जेंक्शन लगवाने पर 1500-2000 रूपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं बन्दर कहाँ से बढ़ रहे हैं तो ये ही पता चलता है कि कोई छोड़ गया और नगर पालिका से इसके लिए कुछ करने को कहा जाता है तो आश्वासन दे टरका दिया जाता है .
घटनाएँ बढ़ रही हैं और किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं जाता कि आखिर इस तरह से इन पशुओं को यहाँ घूमने दिया जा रहा है तो इनके हमलों को रोकने की जिम्मेदारी किसकी बनती है ? जबकि उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम की धारा ७ [६] साफ तौर पर ये जिम्म्मेदारी नगर पालिका के माथे पर लादती है और जनता को यह हक़ देती है कि वह नगर पालिका से ऐसी घटना का मुआवजा मांग सके .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

बुधवार, 18 जून 2014

ये भी बलात्कार है -धारा ३७५ [४]

सहमत‌ि से संबंध रेप नहीं

शादी के नाम पर सहमत‌ि से बने शारीरिक संबंध रेप नहीं

 भारतीय दंड संहिता की धारा ३७५ की ६ भांति की परिस्थितियों में से चौथी में कहा गया है कि वह पुरुष बलात्संग करता है -
*जो उस स्त्री की सम्मति से ,जबकि वह पुरुष यह जानता है कि वह उस स्त्री का पति नहीं है और उस स्त्री ने सम्मति इसलिए दी है कि वह यह विश्वास करती है कि वह ऐसा पुरुष है जिससे वह विधि पूर्वक विवाहित है या विवाहित होने का विश्वास करती है ;
और यहाँ अदालत ने लगभग ऐसे ही मामले में शादी के नाम पर सहमति से बने शारीरिक संबंधों को रेप नहीं माना .आखिर क्यूँ अदालत हर बार लिखी लिखाई परिभाषा में ही उलझकर रह जाती है और उसका परिणाम यह होता है कि अपराधी उसका लाभ उठाकर आसानी से छूट जाता है .सब जानते हैं कि लड़कियां भोली होती हैं और उन्हें बहकाना या बहलाना आसान होता है ऐसे में इस परिभाषा में यह भी यदि यह भी सम्मिलित माना जाये कि विवाह का झांसा देकर सहमति से बनाये गए सम्बन्ध रेप हैं तो यह कानूनी रूप से न्याय के अंतर्गत ही आएगा क्योंकि एक हद तक ये सच्चाई भी है और न्याय के लिए आवश्यक भी .वैसे भी पुरुष सत्तात्मक समाज में पुरुष के लिए विवाह किये जाने का नाटक करना कोई मुश्किल नहीं है और लड़कियों का उसके भुलावे में आकर ऐसे सम्बन्ध के लिए सहमति देना .ऐसे में ये न्याय की मांग है कि न्यायालय अपने निर्णय का पुनर्विलोकन करे .

शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]