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संपत्ति का अधिकार-३

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संपत्ति के अधिकार का इतिहास-
    संपत्ति का अधिकार ,चूंकि एक ऐसा अधिकार माना गया है ,जो अन्य अधिकारों को प्रभावशाली ढंग से प्रभावी करने में सहायक होता है इसलिए भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३१ अतिपरिवर्तन शील अनुच्छेद माना गया क्योंकि उसने जितना अधिक अपना रूप परिवर्तित किया उतना किसी अन्य अनुच्छेद ने नहीं किया .इसका कारण यह था कि केंद्र और राज्य ,दोनों ने ही संपत्ति के अधिकार को विनियमित करने के लिए कृषि सुधार ,राष्ट्रीय करण और राज्यों के नीति निदेशक तत्वों के क्रियान्वयन हेतु बहुत अधिक विधायन कार्य सम्पादित कर डाले .कृषि क्षेत्र में आर्थिक व्यवस्था को ठीक करने और समाजवादी ढांचे पर चलने वाले नूतन समाज के निर्माण के लिए केंद्र और राज्य दोनों की सरकारों के लिए यह आवश्यक हो गया था  कि वे विधान का निर्माण कर खेत जोतने वालों को भूमि का स्वामित्व प्रदान करें ,ज़मींदारी व्यवस्था को समाप्त करें .शहरी क्षेत्रों में गृहविहीन व्यक्तियों को आवासीय सुविधाएँ प्रदान करने ,शहरी गंदगी को समाप्त करने और विकास तथा नगरीय योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता महसूस की जाने लगी .इन्हीं स…