मंगलवार, 18 सितंबर 2012

कोई कानूनी विषमता नहीं ३०२ व् ३०४[बी ]आई.पी.सी.में

कोई कानूनी विषमता नहीं ३०२ व् ३०४[बी ]आई.पी.सी.में 

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17 सितम्बर 2012 दैनिक जागरण में पृष्ठ २ पर माला दीक्षित ने एक दोषी की दलील दी है जिसमे दहेज़ हत्या के दोषी ने अपनी ओर से एक अहम् कानूनी मुद्दा उठाया है .दोषी की दलील है -
    ''आई.पी.सी.की धारा ३०४ बी [दहेज़ हत्या ]और धारा ३०२ [हत्या ]में एक साथ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता .दोनों धाराओं में बर्डन ऑफ़ प्रूफ को लेकर कानूनी विषमता है जो दूर होनी चाहिए .''
   धारा ३०२ ,जिसमे हत्या के लिए दंड का वर्णन है और धारा ३०४ बी आई.पी.सी.में दहेज़ मृत्यु का वर्णन है और जहाँ तक दोनों धाराओं में सबूत के भार की बात है तो दांडिक मामले जिसमे धारा ३०२ आती  है में सबूत का भार अभियोजन पर है क्योंकि दांडिक मामलों में न्यायालय यह उपधारना करता है कि अभियुक्त निर्दोष है अतः सबूत का भार अभियोजन पर है कि वह दोषी है .
   दूसरी ओर दहेज़ मृत्यु के मामले में धरा ३०४-बी जो कि सन १९८६ में १९.११.८६ अधिनियम ४३ से  जोड़ी गयी ,में न्यायालय यह उपधारना करेगा कि उस व्यक्ति ने दहेज़ मृत्यु कारित की है .
       दहेज़ मृत्यु के विषय में धारा ३०४-बी आई.पी.सी.कहती है कि जब विवाह के सात वर्ष के अन्दर किसी स्त्री की मृत्यु जल जाने से या शारीरिक क्षति से या सामान्य परिस्थितियों से भिन्न परिस्थितियों में हो जाये व् यह दर्शित किया जाता है   कि मृत्यु के ठीक पूर्व पति या पति के नातेदारों द्वारा दहेज़ के लिए मांग को लेकर परेशान  किया गया था अथवा उसके साथ निर्दयता पूर्वक व्यव्हार किया गया था तब इसे दहेज़ मृत्यु कहा जायेगा और मृत्यु का कारण पति व् पति के रिश्तेदारों को माना जायेगा .
      साथ ही साक्ष्य अधिनियम की धारा ४ में यह बताया गया है कि न्यायालय यह उपधारना करेगा अर्थात न्यायालय यह साबित मान सकेगा जब तक नासबित न किया जाये .इस प्रकार यदि अभियोजन धारा ३०२ के अंतर्गत आरोपी का अपराध साबित करने में सफल रहता है तब भी धारा ३०४-बी में दहेज़ मृत्यु कारित न करने का भार दोषी व्यक्ति पर यथावत रहता है और यदि  वह न्यायालय की इस उपधारना  को नासबित करने में असफल रहता है तो वह हत्या और दहेज़ मृत्यु दोनों का दोषी माना जायेगा किन्तु यदि वह न्यायालय की इस उपधारना को नासबित करने में सफल हो जाता है तब उसे केवल हत्या का दोषी माना जायेगा जो कि उसपर साबित हो चुका है .
                विवाह के सात वर्षों के भीतर विवाहिता की मृत्यु पर न्यायालय यह उपधारना कर लेता है कि यह दहेज़ मृत्यु है किन्तु बहुत से मामलों में न दहेज़ की मांग साबित हो पाती है न क्रूरता तब न्यायालय को अन्य धाराओं में अपराध का विश्लेषण कर दोषी को दण्डित करना होता है जैसे कि लखजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य १९९४ पूरक [१]s .c .c १७३[१७६] में अभियुक्तों के विरुद्ध मृतका को विष खिलने में प्रत्यक्ष हाथ साबित न होने के कारण उन्हें केवल ३०६ के अंतर्गत आत्महत्या के दुष्प्रेरण के लिए सिद्धदोष किया गया .
     और बहुत से ऐसे मामले जिसमे पीड़ित की मृत्यु हत्या की श्रेणी में नहीं आ पाती क्योंकि हत्या के लिए धारा ३०० कहती है कि शारीरिक क्षति इस आशय से जिससे मृत्यु कारित करना संभाव्य है या वह प्रकृति के मामूली अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त है या वह कार्य इतना आसन्न संकट है कि मृत्यु कारित कर ही देगा या ऐसी शारीरिक क्षति कारित कर देगा जिससे मृत्यु कारित होनी संभाव्य है ,ऐसे में आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय बनाम टी.बासवा पुन्नेया तथा अन्य १९८९ क्रि.ला.जन.2330 आंध्र में विवाहिता को मारने पीटने  के बाद आत्महत्या दिखाने के लिए एक बांस की सहायता से लुंगी बंधकर लटका दिया .मृत्यु दम घुटने से हुई .न्यायालय ने विवाह के तीन वर्षों के भीतर अप्राकृतिक स्थितयों में मृत्यु व् दहेज़ की मांग के तथ्य साबित होने के कारण मामले को ३०४-बी के अंतर्गत माना भले ही मृतका ने आत्महत्या की हो .
   फिर न्यायालय इस सम्बन्ध में स्वयं जागरूक है .लेखराम बनाम पंजाब राज्य १९९९ s .c .c [क्रि]१२२ में उच्चतम न्यायालय ने समुचित सबूत के आभाव में अभियोजन पक्ष द्वारा लगाये गए दहेज़ हत्या के आरोप की सत्यता पर विश्वास करते हुए निर्दोषिता की सिद्धि का भार अभियुक्त पर डालना न्यायोचित नहीं माना और अभियुक्त को ३०२ एवं ३०४-बी के आरोप से दोषमुक्त किया .
साथ ही शमन साहेब एम् .मुठानी बनाम कर्णाटक राज्य ए.आई.आर एस.सी.९२१ में अभियुक्त ३०२ के बजाय ३०४ -बी का दोषी माना किन्तु इस सम्बन्ध में अभियुक्त को पूर्व सूचना ,उसे बचाव के लिए अवसर प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक माना और विचारण न्यायालय को ३०४-बी के अपराध के विचारण के लिए निर्देश दिए. 
   ऐसे में भले ही दोनों धाराओं में सबूत का भार अलग अलग पर हो किन्तु ऐसे में अभियुक्त का बचाव का अधिकार कहीं प्रभावित नहीं होता है .यदि अभियुक्त ने हत्या की है और विवाह के सात वर्षों के अन्दर की है तो वो दोनों धाराओं में दोषी है और ऐसे में अभियोजन की सफलता है व् न्यायालय की उपधारना साबित है और यदि दहेज़ मृत्यु नहीं की है तो वह अपना बचाव करेगा और अभियोजन को विफल करेगा .ऐसा नहीं है कि हर हत्या को दहेज़ मृत्यु की श्रेणी दे दी गयी हो या हर दहेज़ मृत्यु को हत्या की.उपरोक्त निर्णयों द्वारा न्यायालयों ने अपनी न्यायप्रियता का परिचय दिया है और ऐसी किसी विषमता को कहीं कोई स्थान नहीं दिया गया है .
                                                 शालिनी कौशिक 
                                                       [कानूनी ज्ञान]


 


 

 

रविवार, 16 सितंबर 2012

श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.


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   आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है .
कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं करती हैं और इसके लिए विधि बनाने में काफी समय लगेगा ;अतः जब तक विधान मंडल समुचित विधि नहीं बनाता है न्यायालय द्वारा विहित मार्गदर्शक सिद्धांत को लागू किया जायेगा .

न्यायालय ने ये भी निर्णय दिया कि ''प्रत्येक नियोक्ता या अन्य व्यक्तियों का यह कि काम के स्थान या अन्य स्थानों में चाहे प्राईवेट हो या पब्लिक ,श्रमजीवी महिलाओं के यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित उपाय करे .इस मामले में महिलाओं के अनु.१४,१९ और २१ में प्रदत्त मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विशाखा नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने लोकहित वाद न्यायालय में फाईल किया था .याचिका फाईल करने का तत्कालीन कारण राजस्थान राज्य में एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना थी .न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये-
[१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शरीक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींताकंशी  करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम [१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शरीक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींताकंशी  करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम या विनियमों में यौन उत्पीडन रोकने सम्बन्धी नियम शामिल किये जाने चाहिए और ऐसे नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए समुचित दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए .
[स] प्राईवेट क्षेत्र के नियोक्ताओं के सम्बन्ध में औद्योगिक नियोजन [standing order  ]अधिनयम १९४६ के अधीन ऐसे निषेधों को शामिल किया जाना चाहिए.
[द] महिलाओं को काम,आराम,स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञानं के सम्बन्ध में समुचित परिस्थितियों का प्रावधान होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया  जाना चाहिए  कि महिलाओं को काम के स्थान में कोई विद्वेष पूर्ण वातावरण न हो उनके मन में ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि वे नियोजन आदि के मामले में अलाभकारी स्थिति में हैं .
[२] जहाँ ऐसा आचरण भारतीय दंड सहिंता या किसी अन्य विधि के अधीन विशिष्ट अपराध होता हो तो नियोक्ता को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को शिकायत करके समुचित कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए .
[३]यौन उत्पीडन की शिकार महिला को अपना या उत्पीडनकर्ता  का स्थानांतरण करवाने का विकल्प होना चाहिए.
न्यायालय ने कहा कि ''किसी वृत्ति ,व्यापर या पेशा के चलाने के लिए सुरक्षित काम का वातावरण होना चाहिए .''प्राण के अधिकार का तात्पर्य मानव गरिमा से जीवन जीना है ऐसी सुरक्षा और गरिमा की सुरक्षा को समुचित कानून द्वारा सुनिश्चित कराने तथा लागू करने का प्रमुख दायित्व विधान मंडल और कार्यपालिका का है किन्तु जब कभी न्यायालय के समक्ष अनु.३२ के अधीन महिलाओं के यौन उत्पीडन का मामला लाया जाता है तो उनके मूल अधिकारों की संरक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना ,जब तक कि  समुचित विधान नहीं बनाये जाते उच्चतम न्यायालय का संविधानिक कर्त्तव्य है.
इस प्रकार यदि इस निर्णय के सिद्धांतों को नियोक्ताओं द्वारा प्रयोग में लाया जाये तो श्रमजीवी महिलाओं की स्थिति में पर्याप्त सुधार लाया जा सकता है.
शालिनी कौशिक एडवोकेट