बुधवार, 29 जून 2011

स्वतंत्रता का अधिकार [अनुच्छेद-१९-२२]

वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार का स्थान मूल अधिकारों में सर्वोच्च माना गया है .स्वतंत्रता का हमारे जीवन में सर्वाधिक महत्व है किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है -''स्वतंत्रता ही जीवन है.''क्योंकि स्वतंत्रता के अभाव में मनुष्य के लिए व्यक्तित्व का निर्माण ,विकास दोनों कठिन कार्य हैं.भारतीय संविधान अपने अनुच्छेद १९ से लेकर २२ के द्वारा नागरिकों को स्वतंत्रता सम्बन्धी अधिकार प्रदान करता है ये स्वतंत्रताएं मूल अधिकारों के आधार स्तम्भ हैं .इनमे ६ मूलभूत स्वतंत्रताओं का स्थान सर्वप्रमुख है जो की निम्न लिखित हैं-
     [क]वाक स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य ;
     [ख]शांतिपूर्वक और निरायुद्ध सम्मलेन करने की स्वतंत्रता ;
     [ग]संगम या संघ बनाने की स्वतंत्रता ;
     [घ]भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की स्वतंत्रता ;
     [ड़] भारत के राज्य क्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने की स्वतंत्रता ;और 
     [च]४४वे संविधान संशोधन अधिनियम ,१९७८ द्वारा निरसित ;
     [छ]कोई वृत्ति ,उपजीविका ,व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता .

अनुच्छेद १९ द्वारा प्रदत्त अधिकार केवल 'नागरिकों'को ही प्राप्त हैं-अनवर बनाम जम्मू एंड कश्मीर राज्य ए .आई. आर .१९७१ ,एस.सी.३३७ के अनुसार इसमें प्रदत्त स्वतंत्रताएं केवल भारत के नागरिकों को ही उपलब्ध हैं, किसी विदेशी को नहीं .
     किन्तु ये स्वतंत्रताएं आत्यंतिक नहीं हैं क्योंकि असीमित अधिकार अव्यवस्था  के जनक हो सकते हैं और यह समस्त समाज के लिए अहितकर हो सकता है  .यदि व्यक्तियों के अधिकार पर अंकुश न लगाये  जाएँ तो यह समस्त समाज के लिए विनाशकारी परिणाम उत्पन्न कर सकता है.स्वतंत्रता का अस्तित्व तभी संभव है जब वह विधि द्वारा संयमित हो.हम अपने अधिकारों के लिए दूसरों के अधिकारों को आघात नहीं पहुंचा सकते हैं .ए.के.गोपालन ए.आई.आर १९५१ ,एस.सी .के मामले में न्यायाधिपति श्री पतंजलि शास्त्री ने यह अवलोकन किया है कि-''मनुष्य एक विचारशील प्राणी होने के नाते बहुत सी चीज़ों के करने कि इच्छा करता है ,लेकिन एक नागरिक समाज में उसे अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना पड़ता है और दूसरों का आदर करना पड़ता है .इस बात को ध्यान में रखते हुए संविधान के अनुच्छेद १९ के खंड [२] से [६] के अधीन राज्य को भारत की प्रभुता  और अखंडता की सुरक्षा ,लोक व्यवस्था ,शिष्टाचार आदि के हितों की रक्षा के लिए निर्बन्धन लगाने की शक्ति प्रदान की गयी है ,किन्तु शर्त ये है कि निर्बन्धन युक्तियुक्त हों.युक्तियुक्त निर्बन्धन के लिए दो शर्ते आवश्यक हैं-
१- निर्बन्धन केवल अनु०१९ के खंड [२] से [६] के अधीन दिए गए आधारों पर ही लगाये जा सकते हैं.
२-निर्बन्धन युक्तियुक्त होने चाहियें.
     शालिनी कौशिक एडवोकेट