सोमवार, 14 दिसंबर 2015

अमर उजाला पर कार्यवाही हो


अमर उजाला हिंदी दैनिक समाचारपत्र का पृष्ठ -13 पर आज प्रकाशित एक समाचार भारतीय दंड संहिता -१८६० के अधीन उसे अर्थात अमर उजाला को कानून के उल्लंघन का दोषी बनाने हेतु पर्याप्त है जिस पर अमर उजाला ने बाँदा चित्रकूट में हारने वाली एक प्रत्याशी शीलू को गैंगरेप पीड़ित लिख प्रचारित किया है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा २२८-क के अधीन अपराध है और जिसका अवलोकन आप सभी कर अमर उजाला के इस अपराध को स्वीकार कर सकते हैं
जिसके मुद्रण या प्रकाशन के सम्बन्ध में भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत कई पाबंदियां लगायी गयी हैं जो इस प्रकार हैं -
भारतीय दंड संहिता की धारा २२८-क कहती है -
[१] - जो कोई किसी नाम या अन्य बात को ,जिससे किसी ऐसे व्यक्ति की [ जिसे इस धारा में इसके पश्चात पीड़ित व्यक्ति कहा गया है ] पहचान हो सकती है , जिसके विरुद्ध धारा ३७६ , धारा ३७६-क ,धारा ३७६-ख , या धारा ३७६-घ के अधीन किसी अपराध का किया जाना अभिकथित है या किया गया पाया गया है , मुद्रित या प्रकाशित करेगा वह दोनों में किसी भांति के कारावास से , जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी , दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ;
[२] - उपधारा [१] की किसी भी बात का विस्तार किसी नाम या अन्य बात के मुद्रण या प्रकाशन पर , यदि उससे पीड़ित व्यक्ति की पहचान हो सकती है ,तब नहीं होता है जब ऐसा मुद्रण या प्रकाशन -
[क] -पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के या ऐसे अपराध का अन्वेषण करने वाले पुलिस अधिकारी के , जो ऐसे अन्वेषण के प्रयोजन के लिए सद्भावपूर्वक कार्य करता है , द्वारा या उसके लिखित आदेश के अधीन किया जाता है ; या
[ख]- पीड़ित व्यक्ति द्वारा या उसके लिखित प्राधिकार से किया जाता है ; या
[ग] - जहाँ पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है अथवा वह अवयस्क या विकृतचित्त है वहां , पीड़ित व्यक्ति के निकट सम्बन्धी द्वारा या उसके लिखित प्राधिकार से , किया जाता है ;
परन्तु निकट सम्बन्धी द्वारा कोई ऐसा प्राधिकार किसी मान्यता प्राप्त कल्याण संस्था या संगठन के अध्यक्ष या सचिव को ,चाहे उसका जो भी नाम हो , भिन्न किसी व्यक्ति को नहीं दिया जायेगा .
स्पष्टीकरण -इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए , ''मान्यता प्राप्त कल्याण संस्था या संगठन '' से केंद्रीय या राज्य सरकार द्वारा इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए मान्यता प्राप्त कोई समाज कल्याण संस्था या संगठन अभिप्रेत है .
[३] -जो कोई उपधारा [१] में निर्दिष्ट किसी अपराध की बाबत किसी न्यायालय के समक्ष किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में कोई बात , उस न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा के बिना मुद्रित या प्रकाशित करेगा , वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से , जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .
स्पष्टीकरण -किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के निर्णय का मुद्रण या प्रकाशन इस धारा के अर्थ में अपराध की कोटि में नहीं आता है .
इस प्रकार अमर उजाला का इस तरह से एक पीड़ित के नाम का प्रकाशन अपराध है और ऐसा मात्र रेटिंग बढ़ाने के लिए है जो कि पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं है और इसीलिए कानून द्वारा ऐसी पत्रकारिता पत्रकारिता पर रोक लगायी गयी है . ऐसी पत्रकारिता पर रोक के लिए यह आवश्यक है कि अमर उजाला के इस कृत्य को ध्यान में रखते हुए उसपर अति शीघ्र कानूनी कार्यवाही की जाये .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]