रविवार, 30 मार्च 2014

घुटने न टेके चुनाव आयोग .

आयोग नहीं लगाएगा बैन, बेरोकटोक जारी रहेंगे चुनाव पूर्व सर्वेक्षण

सरकार के अनुरोध को ठुकराया
अनुच्छेद ३२४ के अंतर्गत निर्वाचनों का निरीक्षण ,निर्देशन और नियंत्रण करने के लिए निर्वाचन आयोग की स्थापना की गयी है .निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र निकाय है और संविधान इस बात को सुनिश्चित करता है कि यह उच्चतम और उच्च न्यायालय की भांति कार्यपालिका के बिना किसी हस्तक्षेप के स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से अपने कार्यों को सम्पादित कर सके .
अनुच्छेद ३२४ के अनुसार निर्वाचन आयोग के निम्नलिखित कार्य होंगे -
[१] -संसद तथा राज्य विधानमंडलों के निर्वाचन के लिए निर्वाचन नामावली और राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों का अधीक्षण ,निदेशन और नियंत्रण करना .
[२] -उक्त निर्वाचनों का सञ्चालन .
[३] -संसद तथा राज्य विधानमंडलों के निर्वाचन सम्बन्धी संदेहों और विवादों के निर्णय के लिए निर्वाचन अधिकरण की नियुक्ति करना .
[४] -संसद तथा राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की अनहर्ताओं के प्रश्न पर राष्ट्रपति और राज्यपालों को परामर्श देना .
और ऐसा ही नहीं है चुनाव आयोग की चुनाव सम्बन्धी शक्तियां असीमित हैं मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयोग ,ए.आई.आर.१९७८ एस.सी.८५१ में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ''चुनाव आयोग को किसी स्थान के चुनाव को रद्द करने की शक्ति भी है .''
इस प्रकार निर्वाचन आयोग का कार्य निर्वाचन का सञ्चालन ,नियंत्रण ,निर्देशन ,निरीक्षण अर्थात निर्वाचन से जुडी सारी प्रक्रिया निर्वाचन आयोग के अधीन है ,सरकार का कार्य इसमें केवल चुनाव की तारीखों की घोषणा मात्र है .जब सरकार द्वारा चुनावों की तारीखों की घोषणा कर दी जाती है तब निर्वाचन आयोग चुनावों करने का कार्य प्रारम्भ करता है और उसे पूरा करता है ऐसे में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण पर अपना बैन न लगाने का रुख रखना चुनाव आयोग द्वारा लोकतंत्र को अपने हिसाब से चलने और मोड़ने की इच्छा रखने वालों के सामने घुटने टेकना ही कहा जायेगा क्योंकि ये पहले ही स्पष्ट हो चुका है कि ये चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सम्पूर्ण जनसंख्या के १% का भी प्रतिनिधित्व नहीं करते हाँ इतना अवश्य है कि ये अफवाहों के फ़ैलाने वालों को पूर्ण संरक्षण देते हैं क्योंकि भारतीय जनता उन अंधविश्वासियों में से है जो ''आसमान गिर रहा है ,आसमान गिर रहा है .''सुनकर भाग लेती है एक बार भी रूककर ये नहीं देखती कि आसमान अपनी जगह पर ही कायम है किन्तु जब तक वास्तविकता उसकी समझ में आती है तब तक स्थिति बेकाबू हो चुकी होती है और सिवाय अफ़सोस के और कुछ नहीं रहता .आज निर्वाचन आयोग इस सम्बन्ध में सरकार से कानून बनाने को कह रहा है और अपने को इससे अलग कर रहा है जबकि चुनाव सम्बन्धी संदेहों व् विवादों का निवारण करना चुनाव आयोग का काम है और अगर इन सर्वेक्षणों से उत्पन्न स्थिति से कोई विवाद व् संदेह उत्पन्न हो जाने पर कोई भी समर्थक किसी अन्य समर्थक के साथ कुछ गलत कर देता है तब चनाव आयोग उसे आचार संहिता का उल्लंघन मानकर कार्यवाही को बढ़ेगा किन्तु पहले ही उसपर काबू कर पाने की स्थिति में होते हुए भी संविधान द्वारा दिए गए अपने कर्त्तव्य से मुंह मोड़ रहा है ,जो कि सही नहीं है .निर्वाचन आयोग को अपने कर्त्तव्य का सही ढंग से निर्वहन करते हुए चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों पर रोक लगानी ही चाहिए .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

गुरुवार, 13 मार्च 2014

''उफ़ ये डी.जे.''

अभी पिछले दिनों की बात है घर के पीछे स्थित एक धर्मशाला में विवाह समारोह था और जैसा कि आजकल का प्रचलन है वहाँ डी.जे. बज रहा था और शायद full volume में बज रहा था और जैसा कि डी.जे. का प्रभाव होता है वही हो रहा था ,उथल-पुथल मचा रहा था ,मानसिक शांति भंग कर रहा था और आश्चर्य की बात है कि हमारे कमरों के किवाड़ भी हिले जा रहे थे ,हमारे कमरों के किवाड़ जो कि ऐसी दीवारों में लगे हैं जो लगभग दो फुट मोटी हैं और जब हमारे घर की ये हालत थी तो आजकल के डेढ़ ईंट के दीवार वाले घरों की हालत समझी जा सकती है .बहुत मन किया कि जाकर डी.जे. बंद करा दूँ किन्तु किसी की ख़ुशी में भंग डालना न हमारी संस्कृति है न स्वभाव इसलिए तब किसी तरह बर्दाश्त किया किन्तु आगे से ऐसा न हो इसके लिए कानून में हमें मिले अधिकारों की तरफ ध्यान गया .
भारतीय दंड सहिंता का अध्याय १४ लोक स्वास्थ्य ,क्षेम ,सुविधा ,शिष्टता और सदाचार पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषय में है और इस तरह से शोर मचाकर जो असुविधा जन सामान्य के लिए उत्पन्न की जाती है वह दंड सहिंता के इसी अध्याय के अंतर्गत अपराध मानी जायेगी और लोक न्यूसेंस के अंतर्गत आएगी .भारतीय दंड सहिंता की धारा २६८ कहती है -
''वह व्यक्ति लोक न्यूसेंस का दोषी है जो कोई ऐसा कार्य करता है ,या किसी ऐसे अवैध लोप का दोषी है ,जिससे लोक को या जन साधारण को जो आस-पास रहते हों या आस-पास की संपत्ति पर अधिभोग रखते हों ,कोई सामान्य क्षति ,संकट या क्षोभ कारित हो या जिसमे उन व्यक्तियों का ,जिन्हें किसी लोक अधिकार को उपयोग में लाने का मौका पड़े ,क्षति ,बाधा ,संकट या क्षोभ कारित होना अवश्यम्भावी हो .''
कोई सामान्य न्यूसेंस इस आधार पर माफ़ी योग्य नहीं है कि उससे कुछ सुविधा या भलाई कारित होती है .
इस प्रकार न्यूसेंस या उपताप से आशय ऐसे काम से है जो किसी भी प्रकार की असुविधा ,परेशानी ,खतरा,क्षोभ [खीझ ]उत्पन्न करे या क्षति पहुंचाए .यह कोई काम करने या कोई कार्य न करने के द्वारा भी हो सकता है और धारा २९० भारतीय दंड सहिंता में इसके लिए दंड भी दिया जा सकता है .धारा २९० कहती है -
''जो कोई किसी ऐसे मामले में लोक न्यूसेंस करेगा जो इस सहिंता द्वारा अन्यथा दंडनीय नहीं है वह जुर्माने से जो दो सौ रूपये तक का हो सकेगा दण्डित किया जायेगा .''
और न केवल दाण्डिक कार्यवाही का विकल्प है बल्कि इसके लिए सिविल कार्यवाही भी हो सकती है क्योंकि यह एक अपकृत्य है और यह पीड़ित पक्ष पर निर्भर है कि वह दाण्डिक कार्यवाही संस्थित करे या क्षतिपूर्ति के लिए सिविल दावा दायर करे .
और चूँकि किसी विशिष्ट समय पर रेडियो .लाउडस्पीकर ,डीजे आदि को लोक न्यूसेंस नहीं माना जा सकता इसका मतलब यह नहीं कि इन्हें हमेशा ही इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता .वर्त्तमान में अनेक राज्यों ने अपने पुलिस अधिनियमों में इन यंत्रों से शोर मचाने को एक दंडनीय अपराध माना है क्योंकि यह लोक स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करता है तथा इससे जनसाधारण को क्षोभ या परेशानी उत्पन्न होती है [बम्बई पुलिस अधिनियम १९५१ की धाराएं ३३,३६ एवं ३८ तथा कलकत्ता पुलिस अधिनियम १८६६ की धारा ६२ क [ड़]आदि ]
इसी तरह उ०प्र० पुलिस अधिनयम १८६१ की धारा ३०[४] में यह उल्लेख है कि वह त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर मार्गों में कितना संगीत है उसको भी विनियमित कर सकेगा .
''शंकर सिंह बनाम एम्परर ए.आई.आर. १९२९ all .२०१ के अनुसार त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर पुलिस को यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि वह संगीत के आवाज़ की तीव्रता को सुनिश्चित करे .त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर लोक मार्गों पर गाये गए गाने एवं संगीत की सीमा सुनिश्चित करना पुलिस का अधिकार है .''
और यहाँ मार्ग से तात्पर्य सार्वजनिक मार्ग व् स्थान से है जहाँ जनता का जमाव विधिपूर्ण रूप में होता है और इसलिए ऐसे में पुलिस भी इस तरह के समारोहों में इन यंत्रों की ध्वनि तीव्रता का विनियमन कर सकती है .
साथ ही कानून द्वारा मिले हुए इस अधिकार के रहते ऐसे स्थानों की प्रबंध समिति का भी यह दायित्व बन जाता है कि वह जन सुविधा व् स्वास्थ्य को देखते हुए ध्वनि तीव्रता के सम्बन्ध में नियम बनाये अन्यथा वह भी भारतीय दंड सहिंता के अंतर्गत दंड के भागी हो सकते हैं क्योंकि वे प्रबंधक की हैसियत से प्रतिनिधायी दायित्व के अधीन आते हैं .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

रविवार, 2 मार्च 2014

मृत्युदंड की तब्दीली :प्रश्नचिन्ह अब जाकर क्यूँ ?



[Indian Parliament] मृत्युदंड को उम्रकैद में तब्दील करना गैरकानूनी :यह कहते हुए केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत के निर्णय के लिए पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की .
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ४३३ दंडादेश के लघुकरण की शक्ति के बारे में कहती है -
समुचित सरकार दण्डादिष्ट व्यक्ति को सम्मति के बिना -
[क] मृत्यु दंडादेश को भारतीय दंड संहिता [१८६० का ४५ ]द्वारा उपबंधित किसी अन्य दंड के रूप में लघुकृत कर सकेगा ;
[ख] आजीवन कारावास के दंडादेश का ,चौदह वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास में या जुर्माने में लघुकृत कर सकेगी ;
[ग] कठिन कारावास के दंडादेश का किसी ऐसी अवधि के सादा कारावास में ,जिसके लिए वह व्यक्ति दण्डादिष्ट किया जा सकता हो ,या जुर्माने के रूप में लघुकरण कर सकेगी ,
[घ] सादा कारावास के दंडादेश को लघुकरण कर सकेगी .
समुचित सरकार के सम्बन्ध में हनुमंतदास बनाम विनय कुमार और अन्य तथा स्टेट ऑफ़ हिमाचल प्रदेश बनाम विनय कुमार और अन्य ए.आई.आर .१९८२ एस.सी.१०५२ में उच्चतम न्यायालय ने कहा -पद ''समुचित सरकार ''से अभिप्राय उस सरकार [राज्य ]से है जिसमे अभियुक्त को दोषसिद्ध किया गया है ,न कि उस सरकार [राज्य] से जिसमे अपराध कारित किया गया था .
अर्थात यदि केंद्र के कानून से अभियुक्त दोषसिद्ध किया गया है तो केंद्र समुचित सरकार है और यदि राज्य के कानून से अभियुक्त दोषसिद्ध किया गया है तो राज्य समुचित सरकार है .
और इस प्रकार मृत्यु के दंडादेश का लघुकरण आजीवन कारावास में करने का अधिकार समुचित सरकार का है उच्चतम न्यायालय का नहीं किन्तु अब जब २१ जनवरी को उच्चतम न्यायालय ने १५ कैदियों की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील किया जिससे राजीव गांधी के हत्यारों के लिए भी इस तरह की राहत का रास्ता साफ हुआ तब जाकर केंद्र ने इस पर संज्ञान लिया जब कि उच्चतम न्यायालय इससे पहले भी उत्तर प्रदेश राज्य बनाम लल्लू ए.आई.आर.१९८६ सु.कोर्ट.५७६ में ,मुकुंद उर्फ़ कुंदु मिश्रा बनाम मध्य प्रदेश राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.२६२२ में भी मृत्यु दंड को आजीवन कारावास में लघुकृत कर चूका है .
सवाल उठते हैं कि आखिर कानून बनाने और उसका पालन कराने वाली ये संस्थाएं ही कानून का उल्लंघन क्यूँ करती हैं ?आखिर जब कोई मामला हद से आगे बढ़ जाता है तब ही इन संस्थाओं के द्वारा कार्यवाही के लिए कदम क्यूँ उठाया जाता है ?और जब संविधान द्वारा कानून व् न्याय की सर्वोच्च संरक्षकता उच्चतम न्यायालय को सौंपी गयी है तो यहाँ उसका अधिकार समुचित सरकार को क्यूँ सौंप दिया गया ?जिसमे शिक्षा की,अनुभव की कोई बाध्यता नहीं जबकि न्यायपालिका सँभालने वाली शख्सियत का निश्चित स्तर तक शिक्षित व् अनुभवी होना आवश्यक है .प्रशासन की व्यवस्था देखने वाली यह समुचित सरकार बस यहीं तक सीमित होनी चाहिए .कानून बनाने व् न्याय की दिशा -दशा निर्धारित करने का कार्य पूर्णरूपेण न्यायपालिका के अधीन होना चाहिए अन्यथा आपराधिक मामलों में ये खास व् आम का अंतर चलता ही रहेगा और न्याय कहीं सींखचों में पड़ा अपनी दशा पर आंसूं बहाने को विवश रहेगा .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]