शनिवार, 3 सितंबर 2011

श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.



   आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है .
कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं करती हैं और इसके लिए विधि बनाने में काफी समय लगेगा ;अतः जब तक विधान मंडल समुचित विधि नहीं बनाता है न्यायालय द्वारा विहित मार्गदर्शक सिद्धांत को लागू किया जायेगा .
न्यायालय ने ये भी निर्णय दिया कि ''प्रत्येक नियोक्ता या अन्य व्यक्तियों का यह कि काम के स्थान या अन्य स्थानों में चाहे प्राईवेट हो या पब्लिक ,श्रमजीवी महिलाओं के यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित उपाय करे .इस मामले में महिलाओं के अनु.१४,१९ और २१ में प्रदत्त मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विशाखा नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने लोकहित वाद न्यायालय में फाईल किया था .याचिका फाईल करने का तत्कालीन कारण राजस्थान राज्य में एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना थी .न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये-
[१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शरीक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींताकंशी  करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम [१] सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें  चाहे वे प्राईवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में ,अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीडन को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.
[अ] यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना जिसमे निम्न बातें शामिल हैं -शरीक सम्बन्ध और प्रस्ताव,उसके लिए आगे बढ़ना ,यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना ,यौन सम्बन्धी छींताकंशी  करना ,अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.
[बी]सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम या विनियमों में यौन उत्पीडन रोकने सम्बन्धी नियम शामिल किये जाने चाहिए और ऐसे नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए समुचित दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए .
[स] प्राईवेट क्षेत्र के नियोक्ताओं के सम्बन्ध में औद्योगिक नियोजन [standing order  ]अधिनयम १९४६ के अधीन ऐसे निषेधों को शामिल किया जाना चाहिए.
[द] महिलाओं को काम,आराम,स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञानं के सम्बन्ध में समुचित परिस्थितियों का प्रावधान होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया  जाना चाहिए  कि महिलाओं को काम के स्थान में कोई विद्वेष पूर्ण वातावरण न हो उनके मन में ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि वे नियोजन आदि के मामले में अलाभकारी स्थिति में हैं .
[२] जहाँ ऐसा आचरण भारतीय दंड सहिंता या किसी अन्य विधि के अधीन विशिष्ट अपराध होता हो तो नियोक्ता को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को शिकायत करके समुचित कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए .
[३]यौन उत्पीडन की शिकार महिला को अपना या उत्पीडनकर्ता  का स्थानांतरण करवाने का विकल्प होना चाहिए.
न्यायालय ने कहा कि ''किसी वृत्ति ,व्यापर या पेशा के चलाने के लिए सुरक्षित काम का वातावरण होना चाहिए .''प्राण के अधिकार का तात्पर्य मानव गरिमा से जीवन जीना है ऐसी सुरक्षा और गरिमा की सुरक्षा को समुचित कानून द्वारा सुनिश्चित कराने तथा लागू करने का प्रमुख दायित्व विधान मंडल और कार्यपालिका का है किन्तु जब कभी न्यायालय के समक्ष अनु.३२ के अधीन महिलाओं के यौन उत्पीडन का मामला लाया जाता है तो उनके मूल अधिकारों की संरक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना ,जब तक कि  समुचित विधान नहीं बनाये जाते उच्चतम न्यायालय का संविधानिक कर्त्तव्य है.
इस प्रकार यदि इस निर्णय के सिद्धांतों को नियोक्ताओं द्वारा प्रयोग में लाया जाये तो श्रमजीवी महिलाओं की स्थिति में पर्याप्त सुधार लाया जा सकता है.
शालिनी कौशिक एडवोकेट 

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

फांसी और वैधानिक स्थिति







पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी जी के हत्यारों मुरुगन,संतन,और पेरारिवलन की फाँसी की सजा ८ सप्ताह तक टालना एक  बार फिर फाँसी को लेके विवादों को जन्म दे गया इनकी फाँसी की सजा को माफ़ करने के पक्ष में तमिलनाडु के कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए कांचीपुरम में सेनकोदी[२७] नाम की महिला ने खुद को आग लगा कर जान दे दी .२९ अगस्त को कानून के करीब १०० छात्रों ने ट्रैफिक जाम कर दिया.वहीँ ''द हिन्दू गवर्नमेंट ला कॉलेज''के छात्रों ने त्रिची में ''रेल रोको'आन्दोलन किया .जबकि दंड विधि के अंतर्गत फाँसी के लिए निम्न व्यवस्थाएं की गयी हैं-

१-भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ना या युद्ध करने का प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना ;[धारा १२१]
२- सैनिक विद्रोह का दुष्प्रेरण,[धारा १३२]
३- मृत्यु दंड से दंडनीय अपराध के लिए किसी व्यक्ति  की दोषसिद्धि करने के आशय से उसके विरुद्ध मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना [धारा १९४]
४- हत्या[धारा-३०२]
५- आजीवन कारावास के दंडादेश के अधीन रहते हुए किसी व्यक्ति की हत्या करना [धारा ३०३]
६- किसी शिशु या उन्मत्त व्यक्ति को आत्महत्या करने के  लिए दुष्प्रेरित करना [धारा ३०५]
७- आजीवन सिद्धदोष अभियुक्त द्वारा हत्या का प्रयास [धारा ३०७]
८- हत्या सहित डकैती [धारा ३९६]
उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त अपराधों में से केवल क्रमांक ५ में वर्णित धारा ३०३ के अपराध को छोड़कर शेष सभी सात अपराधों के लिए मृत्युदंड के विकल्प के रूप में आजीवन   कारावास का दंड दिया जा सकता है लेकिन धारा ३०३ के अपराध के लिए केवल मृत्यु दंड की एकमात्र सजा का प्रावधान है .परन्तु सन १९८३ में मिट्ठू बनाम पंजाब राज्य ए.आई .आर.१९८३ सु.कोर्ट .४७३ के प्रावधान की वैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि उक्त धारा के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद १४ एवं २१ से विसंगत थे .उच्चतम न्यायालय की पञ्च न्यायाधीशों की खंडपीठ ने ,जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.वाई .चन्द्रचूढ़ कर रहे थे ,ने इस वाद में विनिश्चित किया की धारा ३०३ असंवैधानिक थी क्योंकि इसके अंतर्गत मृत्यु दंड दिया जाना अनिवार्य रखा गया था जबकि अन्य अपराधों के लिए आजीवन कारावास  के विकल्प रखे गए थे अतः इस निर्णय के बाद सभी प्रकार की हत्याएं चाहे वे आजीवन कारावास भोग रहे अभियुक्त के द्वारा क्यों न की गयी हों ,भारतीय दंड सहिंता की धारा ३०२ के अंतर्गत ही दंडनीय होती हैं
ये सब तो हुई कानूनी बात पर इस विषय पर यदि हम मानवीय रुख की बात करते हैं तो हम पाते  हैं कि जो अपराध फाँसी की  श्रेणी में रखे गए हैं वे सभी अपराध करने वाले अभियुक्त इसी सजा के हक़दार हैं आप खुद ही सोचिये  धारा १२१ में भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध  करने का दुष्प्रेरण करना ;क्या ये अपराध किसी माफ़ी के लायक है?
ऐसे ही यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को किसी के मिथ्या साक्षी के कारण फाँसी हो जाती है तो क्या ये अपराधी फाँसी से कम सजा का हक़दार है?
आज अपहरण एक धंधा बन गया है और इसमें क्या हत्या होने पर फाँसी नहीं मिलनी चाहिए?
ऐसे ही  कई सवाल आज के जनमानस के मन में हैं कि राजीव गाँधी जी की हत्या करने वाले अभियुक्त आज तक जिंदा घूम रहे हैं इनसे कैसी सहानुभूति दिखाई जा रही है जबकि ये फाँसी के ही हक़दार हैं क्योंकि सु.कोर्ट ने भी ''रेयरेस्ट ''मामलों में अर्थात गंभीरतम अपराध के मामले में फाँसी का प्रावधान किया है और ये मामले गंभीरतम है.
   शालिनी कौशिक 

सोमवार, 18 जुलाई 2011

आत्महत्या-प्रयास सफल तो आज़ाद असफल तो अपराध .

आत्महत्या-प्रयास सफल तो आज़ाद असफल तो अपराध .
 

   भारतीय दंड सहिंता की धारा ३०९ कहती है -''जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा ओर उस अपराध को करने के लिए कोई कार्य करेगा वह सादा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .''
सम्पूर्ण दंड सहिंता में ये ही एक ऐसी धारा है जिसमे अपराध के होने पर कोई सजा नहीं है ओर अपराध के पूर्ण न हो पाने पर इसे करने वाला सजा काटता है.ये धारा आज तक न्यायविदों के गले से नीचे नहीं उतरी है क्योंकि ये ही ऐसी धारा है जिसे न्याय की कसौटी पर खरी नहीं कहा जा सकता है .आये दिन समाचार पत्रों में ऐसे समाचार आते हैं -''जैसे अभी हाल में मुज़फ्फरनगर में एक महिला द्वारा अपने व् अपने तीन बच्चों पर तेल छिड़ककर आत्महत्या के प्रयास करने पर पुलिस द्वारा उसे पकड़ा गया .ऐसे ही एक समाचार के अनुसार आत्मदाह के प्रयास पर मुकदमा ,ये ऐसे समाचार हैं जो हमारी न्याय व्यवस्था पर ऊँगली उठाने के लिए पर्याप्त हैं .
पी.रथिनम नागभूषण पट्नायिक बनाम भारत संघ ए.आई.आर. १९९४ एस.सी. १८४४ के वाद में दिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय   ने दंड विधि का मानवीकरण करते हुए अभिकथन किया है कि ''व्यक्ति को मरने का अधिकार प्राप्त है .''इस न्यायालय  की खंडपीठ ने [न्यायमूर्ति आर एम् सहाय एवं न्यायमूर्ति बी एल हंसारिया द्वारा गठित ]दंड सहिंता की धारा ३०९ को जो कि आत्महत्या के प्रयास को अपराध निरुपित करती है ,असंवैधानिक घोषित कर दिया क्योंकि यह धारा संविधान के अनुच्छेद २१ के प्रावधानों से विसंगत थी .
     उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय में अभिकथन किया है कि'' किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन के अधिकार का उपभोग स्वयं के अहित ,अलाभ या नापसन्दी से करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता .आत्महत्या का कृत्यधर्म नैतिकता या लोकनीति के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता है तथा आत्महत्या के प्रयास के कृत्य का समाज पर कोई हानिकारक या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है इसके आलावा आत्महत्या या आत्महत्या के प्रयास से अन्यों को कोई हानि कारित नहीं होती  इसीलिए व्यक्ति की इस व्यैतिक स्वतंत्रता में राज्य द्वारा हस्तक्षेप किये जाने का कोई औचित्य नहीं है .
          दंड सहिंता की धारा ३०९ को संविधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत व्यक्ति को प्राप्त स्वतंत्रता का अतिक्रमण निरूपत करते हुए  उच्चतम न्यायालय ने कहा -
''इस धारा का दंड विधि से विलोपन होना चाहिए ताकि दंड विधि का मानवीकरण हो सके .''
विद्वान न्यायाधीशों ने इस धारा को क्रूर व् अनुचित बताया और  कहा कि इस धारा के कारण व्यक्ति दोहरा दंड भुगतता है प्रथम तो वह आत्महत्या की यंत्रणा भुगतता है और आत्महत्या करने में असफल रहने पर उसे समाज में अपकीर्ति या बदनामी भुगतनी पड़ती है जो काफी पीड़ा दायक होती है ऐसी स्थिति को स्वयं न्यायालय भी अनुचित मानते हैं और इस धारा को विलोपित किया जाना आवश्यक मानते हैं .

क्योंकि एक ऐसा व्यक्ति जिसने आत्महत्या का प्रयास किया ऐसी स्थिति में होता है कि वह अपने परिवार समाज से फिर से जुड़ सकता है किन्तु उसके लिए दंड का प्रावधान उसके लिए और भी मुश्किलें खड़ी कर देता है .ऐसा प्रावधान तो आत्महत्या करने वाले के लिए होना चाहिए किन्तु उसके लिए ऐसा संभव नहीं है .अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने आगे कहा कि यह कहना गलत है कि आत्महत्या करने का प्रयास करने वाले व्यक्ति को दंड नहीं मिलता है जबकि वह तो दुहरा दंड भोगता है प्रथम आत्महत्या करने के प्रयास में उसे पहुंची यंत्रणा और संत्रास ,तथा दूसरे आत्महत्या करने में विफल रहने पर उसकी बदनामी या अपकीर्ति 
मारुति श्रीपति  दूबल बनाम महाराष्ट्र राज्य १९८७ क्रि.ला.जन.७४३ बम्बई में अभियोजन कार्यवाही इसलिए निरस्त कर दी क्योंकि यह धारा असंवैधानिक है न्यायमूर्ति सांवंत ने इसे संविधान के अनुच्छेद १४ व् २१ के उल्लंघन के कारण शक्ति बाह्य [ultra vires ]मानाऔर इसके विलोपन के लिए कहा .और इसके कारण निम्न बताये -
१-अनुच्छेद २१ में व्यक्ति को जीवन का अधिकार प्राप्त है जिसमे जीवन को समाप्त करने का अधिकार विविक्षित रूप से शामिल है ऐसा इसलिए क्योंकि अनु.२१ में दिए गए मौलिक अधिकारों की व्याख्या अन्य मौलिक अधिकारों के समान की जानी चाहिए चूँकि वक् स्वतंत्रता में न बोलने के अधिकार का भी समावेश है  तथा व्यवसाय करने की स्वतंत्रता में व्यवसाय न करने के अधिकार का भी समावेश है अतः जीवन के अधिकार में जीवन को समाप्त करने का अधिकार भी शामिल है .
२- यदि इस बात पर विचार किया जाये कि साधारणतःव्यक्ति आत्महत्या की ओर प्रवृत क्यों होता है तो प्राय यह देखा जाता है कि इसके लिए मानसिक अस्वस्थता तथा अस्थिरता ,असह्य शारीरिक कष्ट .असाध्य रोग आसाधारण शारीरिक विकृति सांसारिक  सुख के प्रति विरक्ति आदि में व्यक्ति विवश होकर आत्महत्या का मार्ग अपनाता है .इस प्रकार जो व्यक्ति पहले से ही व्यथित ओर जीवन से हताश है क्या उसे आत्महत्या के प्रयास के लिए दंड दिया जाना उचित होगा ?
३- भारतवर्ष में आत्महत्या के अनेक प्रकार चिरकाल से प्रचलित रहे हैं जौहर सती प्रथा आदि प्रमुख रूप से प्रचलित थे ,इस दृष्टि से भी आत्महत्या के प्रयास को अपराध माने जाने का कोई औचित्य नहीं है .
इसलिए न्यायालय ने इस धारा को अनु.१४ व् २१ का उल्लंघन करते हैं ओर मनमाने भी हैं ये माना.
     भारत के विधि आयोग ने भी अपने ४२ वे प्रतिवेदन में १९७१ में धारा ३०९ को निरसित किये जाने की अनुशंसा की थी क्योंकि उसके विचार से इस धारा के उपबंध कठोर होने के साथ साथ न्यायोचित नहीं हैं .
तात्पर्य यह है कि पी.आर.नागभूषण पट्नायिक  बनाम भारत संघ के वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा २६ अप्रैल १९९४ को दिए गए निर्णय के परिणाम स्वरुप दंड सहिंता  की धारा ३०९ असंवैधानिक होने के कारण शून्य घोषित की गयी तथा अपीलार्थी की रिट याचिका स्वीकार करते हुए उरिसा के कोरापुट जिले के गुनपुर के सब  जज के न्यायालय में लंबित प्रकरण संख्या जी.आर.१७७ सन १९८४ की राज्य बनाम नाग भूषण पतनायिक    के वाद की कार्य वाही निरस्त कर दी गयी .अतः इस निर्णय के बाद अब आत्महत्या के प्रयास को अपराध नहीं माना जायेगा ओर इस प्रकार धारा ३०९ के प्रावधान अब निष्प्रभावी हो गए हैं.
इसी प्रकार लोकेन्द्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य  ए.आई आर.१९९६ सु.को. में न्यायालय ने कहा -जब कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तब उसे कुछ सुस्पष्ट व्यक्त कार्य करने होते हैं ओर उनका उद्गम अनु.२१ के अंतर्गत ''प्राण के अधिकार के  संरक्षण नहीं खोजा जा सकता अथवा उसमे सम्मिलित नहीं किया जा सकता .प्राण की पवित्रता के महत्वपूर्ण पहलू की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए  .अनु.२१ प्राण ओर देहिक स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करने वाला उपबंध है तथा कल्पना की किसी भी उड़ान से ''प्राण के संरक्षण '' में प्राण की समाप्ति शामिल होने का अर्थ नहीं लगाया जा सकता .किसी व्यक्ति को आत्महत्या करके अपने प्राण समाप्त करना अनुज्ञात करने का जो भी दर्शन हो उसमे गारंटी किया हुआ मूल अधिकार के भाग रूप में ''मरने का अधिकार'' सम्मिलित है ऐसा अनुच्छेद २१ का अर्थान्वयन  करना हमारे लिए कठिन है .अनुच्छेद २१ में निश्चित रूप से व्यक्त ''प्राण का अधिकार'' नैसर्गिक अधिकार है किन्तु आत्महत्या प्राण की अनैसर्गिक समाप्ति अथवा अंत है ओर इसलिए प्राण के अधिकार की संकल्पना के साथ अस्न्योज्य ओर असंगत है .हम यह अभिनिर्धारित करने में असमर्थ हैं कि भा.दंड.सहिंता की धारा ३०९ अनु.२१ की अतिक्रमण कारी है .इस वाद में पी .रथिनं नागभूषण पतनायिक बनाम भारत संघ उल्टा गया .
साथ ही कानून विदों की भी ये राय है कि आज इस धारा  को  निष्प्रभावी तो कर दिया गया है किन्तु आज भी इस पर कार्य चल रहा है और आत्महत्या के प्रयास में अब भी मुक़दमे दर्ज किये जा रहे हैं.
                                                    शालिनी कौशिक 


बुधवार, 29 जून 2011

स्वतंत्रता का अधिकार [अनुच्छेद-१९-२२]

वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार का स्थान मूल अधिकारों में सर्वोच्च माना गया है .स्वतंत्रता का हमारे जीवन में सर्वाधिक महत्व है किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है -''स्वतंत्रता ही जीवन है.''क्योंकि स्वतंत्रता के अभाव में मनुष्य के लिए व्यक्तित्व का निर्माण ,विकास दोनों कठिन कार्य हैं.भारतीय संविधान अपने अनुच्छेद १९ से लेकर २२ के द्वारा नागरिकों को स्वतंत्रता सम्बन्धी अधिकार प्रदान करता है ये स्वतंत्रताएं मूल अधिकारों के आधार स्तम्भ हैं .इनमे ६ मूलभूत स्वतंत्रताओं का स्थान सर्वप्रमुख है जो की निम्न लिखित हैं-
     [क]वाक स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य ;
     [ख]शांतिपूर्वक और निरायुद्ध सम्मलेन करने की स्वतंत्रता ;
     [ग]संगम या संघ बनाने की स्वतंत्रता ;
     [घ]भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की स्वतंत्रता ;
     [ड़] भारत के राज्य क्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने की स्वतंत्रता ;और 
     [च]४४वे संविधान संशोधन अधिनियम ,१९७८ द्वारा निरसित ;
     [छ]कोई वृत्ति ,उपजीविका ,व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता .

अनुच्छेद १९ द्वारा प्रदत्त अधिकार केवल 'नागरिकों'को ही प्राप्त हैं-अनवर बनाम जम्मू एंड कश्मीर राज्य ए .आई. आर .१९७१ ,एस.सी.३३७ के अनुसार इसमें प्रदत्त स्वतंत्रताएं केवल भारत के नागरिकों को ही उपलब्ध हैं, किसी विदेशी को नहीं .
     किन्तु ये स्वतंत्रताएं आत्यंतिक नहीं हैं क्योंकि असीमित अधिकार अव्यवस्था  के जनक हो सकते हैं और यह समस्त समाज के लिए अहितकर हो सकता है  .यदि व्यक्तियों के अधिकार पर अंकुश न लगाये  जाएँ तो यह समस्त समाज के लिए विनाशकारी परिणाम उत्पन्न कर सकता है.स्वतंत्रता का अस्तित्व तभी संभव है जब वह विधि द्वारा संयमित हो.हम अपने अधिकारों के लिए दूसरों के अधिकारों को आघात नहीं पहुंचा सकते हैं .ए.के.गोपालन ए.आई.आर १९५१ ,एस.सी .के मामले में न्यायाधिपति श्री पतंजलि शास्त्री ने यह अवलोकन किया है कि-''मनुष्य एक विचारशील प्राणी होने के नाते बहुत सी चीज़ों के करने कि इच्छा करता है ,लेकिन एक नागरिक समाज में उसे अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना पड़ता है और दूसरों का आदर करना पड़ता है .इस बात को ध्यान में रखते हुए संविधान के अनुच्छेद १९ के खंड [२] से [६] के अधीन राज्य को भारत की प्रभुता  और अखंडता की सुरक्षा ,लोक व्यवस्था ,शिष्टाचार आदि के हितों की रक्षा के लिए निर्बन्धन लगाने की शक्ति प्रदान की गयी है ,किन्तु शर्त ये है कि निर्बन्धन युक्तियुक्त हों.युक्तियुक्त निर्बन्धन के लिए दो शर्ते आवश्यक हैं-
१- निर्बन्धन केवल अनु०१९ के खंड [२] से [६] के अधीन दिए गए आधारों पर ही लगाये जा सकते हैं.
२-निर्बन्धन युक्तियुक्त होने चाहियें.
     शालिनी कौशिक एडवोकेट 

शनिवार, 21 मई 2011

धारा ४९८-क भा. द. विधान 'एक विश्लेषण '

विवाह दो दिलों का मेल ,दो परिवारों का मेल ,मंगल कार्य और भी पता नहीं किस किस उपाधि से विभूषित किया जाता है किन्तु एक उपाधि जो इस मंगल कार्य को कलंक लगाने वाली है वह है ''दहेज़ का व्यापार''और यह व्यापर विवाह के लिए आरम्भ हुए कार्य से आरम्भ हो जाता है और यही व्यापार कारण है उन अनगिनत क्रूरताओं का जिन्हें झेलने  को  विवाहिता स्त्री तो विवश है और विवश हैं उसके साथ उसके मायके के प्रत्येक सदस्य.कानून ने विवाहिता स्त्री की स्थति ससुराल में मज़बूत करने हेतु कई उपाय किये और उसके ससुराल वालों व् उसके पति  पर लगाम कसने को भारतीय दंड सहिंता में धारा ४९८-क स्थापित की और ऐसी क्रूरता करने वालों को कानून के घेरे में लिया, पर जैसे की भारत में हर कानून का सदुपयोग बाद में दुरूपयोग पहले आरम्भ   हो जाता है ऐसा ही धारा ४९८-क के साथ हुआ.दहेज़ प्रताड़ना के आरोपों में गुनाहगार के साथ बेगुनाह भी जेल में ठूंसे जा रहे हैं .सुप्रीम कोर्ट इसे लेकर परेशान है ही विधि आयोग भी इसे लेकर , धारा ४९८-क को यह मानकर कि यह पत्नी के परिजनों के हाथ में दबाव का एक हथियार बन गयी है ,दो बार शमनीय बनाने की सिफारिश कर चुका है.३० जुलाई २०१० में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार से धारा ४९८-क को शमनीय बनाने को कहा है .विधि आयोग ने १५ वर्ष पूर्व १९९६  में अपनी १५४ वीं रिपोर्ट तथा उसके बाद २००१ में १७७ वीं रिपोर्ट में इस अपराध को कम्पौन्देबल   [शमनीय] बनाने की मांग की थी .आयोग का कघ्ना था ''कि यह महसूस किया जा रहा है कि धारा ४९८-क का इस्तेमाल प्रायः पति के परिजनों को परेशान करने के लिए किया जाता है और पत्नी के परिजनों के हाथ में यह धारा एक दबाव का हथियार बन गयी है जिसका प्रयोग कर वे अपनी मर्जी से पति को दबाव में लेते हैं .इसलिए आयोग की राय है कि इस अपराध को कम्पओंदेबल अपराधों की श्रेणी  में डालकर उसे सी.आर.पी.सी.की धारा ३२० के तहत कम्पओंदेबल अपराधों की सूची में रख दिया जाये.ताकि कोर्ट की अनुमति से पार्टियाँ समझौता कर सकें.''सी.आर.पी.सी. की धारा ३२० के तहत कोर्ट की अनुमति से पार्टियाँ एक दुसरे का अपराध माफ़ कर सकती हैं.कोर्ट की अनुमति लेने की वजह यह देखना है कि पार्टियों ने बिना किसी दबाव के तथा मर्जी से समझौता किया है.
                  सुप्रीम कोर्ट के अनुसार यदि इस अपराध को शमनीय बना दिया जाये तो इससे हजारों मुक़दमे आपसी समझौते होने से समाप्त हो जायेंगे और लोगो को अनावश्यक रूप से जेल नहीं जाना पड़ेगा.लेकिन यदि हम आम राय की बात करें तो वह इसे शमनीय अपराधों की श्रेणी में आने से रोकती है  क्योंकि भारतीय समाज में वैसे भी लड़की/वधू के परिजन एक भय के अन्दर ही जीवन यापन करते हैं ,ऐसे में बहुत से ऐसे मामले जिनमे वास्तविक गुनाहगार जेल के भीतर हैं वे इसके शमनीय होने का लाभ उठाकर लड़की/वधू के परिजनों को दबाव में ला सकते हैं.इसलिए आम राय इसके शमनीय होने के खिलाफ है.
                         धारा-४९८-क -किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता-जो कोई किसी स्त्री का पति या पति का नातेदार होते हुए ऐसी स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा ,वह कारावास से ,जिसकी अवधि ३ वर्ष तक की हो सकेगी ,दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डित होगा.
   दंड संहिता में यह अध्याय दंड विधि संशोधन अधिनियम ,१९८३ का ४६ वां जोड़ा गया है और इसमें केवल धारा ४९८-क ही है.इसे इसमें जोड़ने का उद्देश्य ही स्त्री के प्रति पुरुषों  द्वारा की जा रही क्रूरताओं का निवारण करना था .इसके साथ ही साक्ष्य अधिनियम में धारा ११३-क जोड़ी गयी थी जिसके अनुसार यदि किसी महिला की विवाह के ७ वर्ष के अन्दर मृत्यु हो जाती है तो घटना की अन्य परिस्थितयों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय यह उपधारना    कर  सकेगा  की उक्त मृत्यु महिला के पति या पति के नातेदारों के दुष्प्रेरण के कारण हुई है.साक्ष्य अधिनियम की धारा ११३-क में भी क्रूरता के वही अर्थ हैं जो दंड सहिंता की धारा ४९८-क में हैं.पति का रोज़ शराब पीकर देर से घर  लौटना,और इसके साथ ही पत्नी को पीटना :दहेज़ की मांग करना ,धारा ४९८-क के अंतर्गत क्रूरता पूर्ण व्यवहार माने गए हैं''पी.बी.भिक्षापक्षी बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य १९९२ क्रि०ला० जन०११८६ आन्ध्र''
विभिन्न मामले और इनसे उठे विवाद 
१-इन्द्रराज मालिक बनाम श्रीमती सुनीता मालिक १९८९ क्रि०ला0जन०१५१०दिल्ली में धारा ४९८-क के प्रावधानों को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी की यह धारा संविधान के अनुच्छेद १४ तथा २०'२' के उपबंधों का उल्लंघन करती है क्योंकि ये ही प्रावधान दहेज़ निवारण अधिनियम ,१९६१ में भी दिए गए हैं अतः  यह धारा दोहरा संकट की स्थिति उत्पन्न करती है जो अनुच्छेद २०'३' के अंतर्गत वर्जित है .दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा ''धारा ४९८-क व् दहेज़ निवारण अधिनियम की धरा ४ में पर्याप्त अंतर है .दहेज़ निवारण अधिनियम की धारा ४ के अधीन दहेज़ की मांग करना मात्र अपराध है जबकि धारा ४९८-क इस अपराध के गुरुतर रूप  को दण्डित करती है .इस मामले में पति के विरुद्ध आरोप था कि वह अपनी पत्नी को बार बार यह धमकी देता रहता था कि यदि उसने अपने माता पिता को अपनी संपत्ति बेचने के लिए विवश करके उसकी अनुचित मांगों को पूरा नहीं किया तो उसके पुत्र को उससे छीन कर अलग कर दिया जायेगा .इसे धारा ४९८-क के अंतर्गत पत्नी के प्रति क्रूरता पूर्ण व्यवहार माना गया  और पति को इस अपराध के लिए सिद्धदोष किया गया.
2-बी एस. जोशी बनाम हरियाणा राज्य २००३'४६'ए ०सी  ०सी 0779 ;२००३क्रि०ल०जन०२०२८'एस.सी.'में उच्चतम न्यायालय  ने माना कि इस धारा का उद्देश्य किसी  स्त्री का उसके पति या पति द्वारा किये जाने वाले उत्पीडन का निवारण करना था .इस धारा को इसलिए जोड़ा गया कि इसके द्वारा पति या पति के ऐसे नातेदारों को दण्डित किया जाये जो पत्नी को अपनी व् अपने नातेदारों की  दहेज़ की विधिविरुद्ध मांग की पूरा करवाने के लिए प्रपीदित करते हैं .इस मामले में पत्नी ने पति व् उसके नातेदारों के विरुद्ध दहेज़ के लिए उत्पीडन का आरोप लगाया था किन्तु बाद में उनके मध्य विवाद का समाधान हो गया और पति ने दहेज़ उत्पीडन के लिए प्रारंभ की गयी कार्यवाहियों को अभिखंडित करने के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन किया जिसे खारिज कर दिया गया था .तत्पश्चात उच्चतम न्यायालय   में अपील दाखिल की गयी थी जिसमे यह अभिनिर्धारित किया गया कि परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मामले में उच्च तकनीकी विचार उचित नहीं होगा और यह स्त्रियों के हित के विरुद्ध होगा.उच्चतम न्यायालय ने अपील स्वीकार कर कार्यवाहियों को अभिखंडित कर दिया. 
३- थातापादी वेंकट लक्ष्मी बनाम आँध्रप्रदेश राज्य १९९१ क्रि०ल०जन०७४९ आन्ध्र में इस अपराध को शमनीय निरुपित किया गया है परन्तु यदि आरोप पत्र पुलिस द्वारा फाइल किया गया है तो अभियुक्त की प्रताड़ित पत्नी उसे वापस नहीं ले सकेगी.
४-शंकर प्रसाद बनाम राज्य १९९१ क्रि० ल० जन० ६३९ कल० में दहेज़ की केवल मांग करना भी दंडनीय अपराध माना गया .
५- सरला प्रभाकर वाघमारे बनाम महाराष्ट्र राज्य १९९० क्रि०ल०जन० ४०७ बम्बई में ये कहा गया कि इसमें हर प्रकार की प्रताड़ना का समावेश नहीं है इस अपराध के लिए अभियोजन हेतु परिवादी को निश्चायक रूप से यह साबित करना आवश्यक होता है कि पति तथा उसके नातेदारों द्वारा उसके साथ मारपीट या प्रताड़ना दहेज़ की मांग की पूर्ति हेतु या उसे आत्महत्या  करने के लिए विवश करने के लिए की गयी थी .
६- वम्गाराला येदुकोंदाला बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य १९८८ क्रि०ल०जन०१५३८ आन्ध्र में धारा ४९८-क का संरक्षण  रखैल को भी प्रदान किया गया है .
७-शांति बनाम हरियाणा राज्य ए०आइ-आर०१९९१ सु०को० १२२६ में माना गया कि धारा ३०४ -ख में प्रयुक्त क्रूरता शब्द का वही अर्थ है जो धारा ४९८ के स्पष्टीकरण  में दिया गया है ........जहाँ अभियुक्त के विरुद्ध धारा ३०४-ख तथा धारा ४९८-क दोनों के अंतर्गत अपराध सिद्ध हो जाता है उसे दोनों ही धाराओं के अंतर्गत सिद्धदोष किया जायेगालेकिन उसे धारा ४९८-क केअंतर्गत पृथक दंड दिया जाना आवश्यक नहीं होगा क्योंकि  उसे धारा ३०४-ख  के अंतर्गत गुरुतर अपराध के लिए सारभूत दंड दिया जा रहा है.
८- पश्चिम बंगाल बनाम ओरिवाल जैसवाल १९९४ ,१,एस.सी.सी. ७३ '८८' के मामले में पति तथा सास की नव-वधु के प्रति क्रूरता साबित हो चुकी थी .मृतका की माता ,बड़े भाई तथा अन्य निकटस्थ रिश्तेदारों  द्वारायह साक्ष्य दी गयी  .कि अभियुक्तों द्वारा मृतका को शारीरिक व् मानसिक यातनाएं पहुंचाई  जाती थी .अभियुक्तों द्वारा बचाव में यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि उक्त साक्षी मृतका में हित रखने वाले साक्षी थे अतः उनके साक्ष्य की पुष्टि अभियुक्तों के पड़ोसियों तथा किरायेदारों के आभाव में स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है .परन्तु उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि दहेज़ प्रताड़ना के मामलो में दहेज़ की शिकार हुई महिला को निकटस्थ नातेदारों के साक्षी की अनदेखी केवल इस आधार पर नहीं की जा सकती कि उसकी संपुष्टि अन्य स्वतंत्र साक्षियों द्वारा नहीं की गयी है .
              इस प्रकार उपरोक्त मामलों का विश्लेषण यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि न्यायालय अपनी जाँच व् मामले का विश्लेषण प्रणाली से मामले की वास्तविकता को जाँच सकते हैं  और ऐसे में इस कानून का दुरूपयोग रोकना न्यायालयों के हाथ में है .यदि सरकार द्वारा इस कानून को शमनीय बना दिया गया तो पत्नी व् उसके परिजनों पर दबाव बनाने के लिए पति व् उसके परिजनों को एक कानूनी मदद रुपी हथियार दे दिया जायेगा.न्यायालयों का कार्य न्याय करना है और इसके लिए मामले को सत्य की कसौटी पर परखना न्यायालयों के हाथ में है .भारतीय समाज में जहाँ पत्नी की स्थिति पहले ही पीड़ित की है और जो काफी स्थिति ख़राब होने पर ही कार्यवाही को आगे आती है .ऐसे में इस तरह इस धारा को शमनीय बनाना उसे न्याय से और दूर करना हो जायेगा.हालाँकि कई कानूनों की तरह इसके भी दुरूपयोग के कुछ मामले हैं किन्तु न्यायालय को हंस  की भांति   दूध   से दूध   और पानी  को अलग  कर  स्त्री  का सहायक  बनना  होगा .न्यायलय  यदि सही  दृष्टिकोण  रखे  तो यह धारा कहर  से बचाने  वाली  ही कही  जाएगी  कहर   बरपाने  वाली  नहीं क्योंकि  सामाजिक  स्थिति को देखते  हुए  पत्नी व् उसके परिजनों को कानून के मजबूत  अवलंब  की आवश्यक्ता    है.
                                                                               शालिनी   कौशिक   [एडवोकेट  ]
                   http://shalinikaushikadvocate.blogspot.com

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

समता का अधिकार -२

अब आगे मैं आपको बता रही हूँ कि ये अधिकार भारत के नागरिकों व् अनागरिकों दोनों को प्राप्त है. इस प्रकार भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह भारत का नागरिक हो या नहीं ,समान विधि के अधीन होगा और उसे विधि का समान संरक्षण प्रदान किया जायेगा.इसके विपरीत अनु.१५,१६,१७,१८ आदि के उपबंधों का लाभ केवल''नागरिकों ''को प्राप्त है.साथ ही इसके अंतर्गत विधिक व्यक्ति भी सम्मिलित हैं.चिरंजीत लाल बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनु.१४ में प्रयुक्त ''व्यक्ति ''शब्द के अंतर्गत विधिक व्यक्ति भी सम्मिलित है.अतः एक निगम जो कि ''विधिक व्यक्ति''है को भी विधि के समक्ष समता का अधिकार उपलब्ध है.
नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत अनु.१४ में निहित है-
      अपने एतिहासिक महत्व के निर्णय ''सेंट्रल इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन  बनाम ब्रजोनाथ गांगुली में उच्चतम न्यायलय ने कहा-''कोई सेवा नियम जो स्थाई कर्मचारियों को बिना कारण बताये ३ माह की नोटिस या उसके बदले में ३ माह का वेतन देकर सेवा समाप्ति की शक्ति प्रदान करता है वह संविदा अधिनियम की धारा २३ के अधीन लोकनीति[PUBLIC POLICY ]के विरुद्ध होने के कारण तथा विवेक शून्य और मनमानी शक्ति प्रदान करने के कारण अनु.१४ का उल्लंघन करता है अतः अवैध है.
मनमाने कार्य से नागरिक की क्षति -राज्य नुकसानी के लिए दाई 
  लखनऊ विकास प्राधिकारी बनाम ए.के.गुप्ता के महत्वपूर्ण मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यदि राज्य द्वारा या उसके सेवकों द्वारा  मनमाने ढंग से कार्य करने से किसी नागरिक को कोई हानि पहुँचती है तो राज्य उसे नुकसानी देने के लिए दायी होगा.
बंद का आयोजन अवैध और असंवैधानिक है-
  भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी [मार्क्सवादी]बनाम भारत कुमार और अन्य के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि राजनीतिक दलों द्वारा बंद का आयोजन करना असंवैधानिक और अवैध है .
समान कार्य के लिए समान वेतन 
   रंधीर सिंह बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा ''यद्धयपि  समान कार्य के लिए समान वेतन एक मूल अधिकार नहीं है किन्तु अनु.१४,१६,और ३९ग़ के अधीन निश्चित यह एक संवैधानिक लक्ष्य है और यदि दो व्यक्तियों के बीच इस मामले में विभेद किया जाता है जिसका कोई ठोस आधार नहीं है तो इससे अनु.१४ का अतिक्रमण होता है .

अनु.में बहुत कुछ है सभी कुछ मेरे जैसे अल्पज्ञानी आपको नहीं बता सकते हैं आप का यदि कोई प्रश्न है तो अवश्य पूछें मैं जहाँ तक संभव होगा आपके प्रश्न का उत्तर दूँगी.

बुधवार, 30 मार्च 2011

समता का अधिकार

भारतीय संविधान अनु.१४ से लेकर अनु.१८ तक प्रत्येक व्यक्ति को समता का अधिकार प्रदान करता है.ये समता का अधिकार भी दो भागो में विभक्त है .जो निम्नलिखित हैं-
[क] विधि के समक्ष समता अथवा विधियों के समान संरक्षण का अधिकार
     अनु.१४ कहता है कि''भारत राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से अथवा विधियों के समान संरक्षण से राज्य द्वारा वंचित नहीं किया जायेगा .'' ये अनुच्छेद दो वाक्यांश समेटे है जिनमे एक है-''विधि के समक्ष समता''और दूसरा है ''विधियों का समान संरक्षण''
    ''विधि के समक्ष समता''का तात्पर्य व्यक्तियों के बीच पूर्ण समानता से नहीं है क्योंकि ऐसा संभव भी नहीं है .इसका तात्पर्य केवल इतना है कि जन्म ,मूलवंश ,आदि के आधार पर व्यक्तियों के बीच विशेषाधिकारों को प्रदान करने और कर्तव्यों को अधिरोपण करने में कोई विभेद नहीं किया जायेगा.तथा प्रत्येक व्यक्ति देश की साधारण विधि के अधीन होगा.
''विधियों का समान संरक्षण''का अर्थ है कि समान परिस्थिति वाले व्यक्तियों को समान विधियों के अधीन रखना तथा समान रूप से लागू करना ;चाहे वे विशेषाधिकार हो या दायित्व हों .इस पदावली का निर्देश है कि समान परिस्थति वाले व्यक्तियों में कोई विभेद नहीं करना चाहिए और उन पर एक ही विधि लागू करनी चाहिए अर्थात यदि विधान की विषय वस्तु समान है तो विधि भी एक ही तरह की होनी चाहिए .इस प्रकार नियम यह है कि सामानों के साथ समान विधि लागू करना चाहिए न कि असमानों के साथ समान विधि लागू करना चाहिए .
''विधि शासन''विधि के समक्ष समता की गारंटी उसी के समान है जिसे इंग्लेंड में विधि शासन कहते हैं.जिसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है.प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसकी अवस्था या पद जो कुछ भी हो देश की सामान्य विधियों के अधीन है और साधारण न्यायालयों की अधिकारिता के भीतर है .राष्ट्रपति से लेकर देश का निर्धन से निर्धन व्यक्ति समान विधि के अधीन है और बिना औचित्य के किसी कृत्य के लिए समान रूप से उत्तरदायी है .इस सम्बन्ध में सरकारी अधिकारियों और साधारण नागरिकों में विभेद नहीं किया जाता है .
रघुवीर सिंह बनाम हरियाणा राज्य ए.आई.आर.१९८० एस.सी.१०८६ में कहा गया है कि विधि शासन राज्य से यह अपेक्षा करता है कि वह पुलिस द्वारा अभियुक्तों के विरुद्ध किये गए अमानवीय व्यवहार से संरक्षण प्रदान करने के लिए हर संभव उपायों को अपनाये तथा ऐसे लोगों को दंड भी दे .यदि राज्य ऐसा नहीं करता है तो विधि शासन पर से लोगो का विश्वास समाप्त हो जायेगा.
 अनु.१४ में जिस विधि शासन की संकल्पना की गयी है वह संविधान का आधारभूत ढांचा कहा जाता है और इसे अनु.३६८ के अधीन संशोधन करके नष्ट नहीं किया जा सकता है.
                अपवाद अभी पूर्व में मैंने बताया कि सभी इसके अधीन हैं किन्तु संविधान में इसके कुछ अपवाद भी प्रस्तुत किये गए हैं.जैसे कि विदेशी कूटनीतिज्ञों को न्यायालयों की अधिकारिता से विमुक्ति प्राप्त है.इसी प्रकार अनु.३६१ के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति ,राज्यों के राज्यपालों ,लोक अधिकारियों न्यायाधीशों,और भूतपूर्व राज्यों के नरेशों को ऐसी विमुक्तियाँ प्रदान की गयी हैं .ऐसा उनकी विशेष स्थिति ,विशेष पद और उन पर देश की विशेष जिम्मेदारियों को देखते हुए किया गया है ताकि देश के प्रति वे अपनी जिम्मेदारियों का भली भांति निर्वहन कर सकें..
   अनु.१४ में दिए गए अन्य अपवादों को और इससे जुडी अन्य जानकारियों को लेकर अपनी अगली पोस्ट में आपके सामने फिर आऊंगी .

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

मूल अधिकार-२

मूल अधिकारों के बारे में जानकारी होने से पहले हमारा यह जानना भी जरूरी है की  ये अधिकार असीमित व् अप्रतिबंधित नहीं हैं.संविधान में इस बात का ध्यान रखा गया है की व्यक्ति को ऐसी स्वतंत्रता प्रदान न की जाये की समाज में अव्यवस्था व् अराजकता फ़ैल जाये.असीमित स्वतंत्रता एक ऐसा लाइसेंस हो जाती है जो दूसरों के अधिकारों में बाधा पहुंचती है.इन अधिकारों का प्रयोग व्यक्ति समाज में रहकर करता है और इसलिए इनपर ऐसी व्यवस्था होना आवश्यक है.अधिकारों के असीमित व् अनियमित प्रयोग से स्वयं स्वतंत्रताएं नष्ट हो जाएँगी.अतः आवश्यक है की व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रयोग के साथ दूसरों के अधिकारों के प्रति आदर भी रखे.माननीय न्यायाधीश मुखर्जी ने ए.के.गोपालन बनाम मद्रास राज्य ए.आई.आर.१९५२ एस .सी.२७ के मामले में इस सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा''की ऐसी कोई चीज़ नहीं हो सकती जिसे हम पूर्ण और असीमित स्वतंत्रता कह सकें,जिस पर सभी प्रकार के अवरोध हटा लिए जाएँ क्योंकि इसका परिणाम अराजकता और अव्यवस्था होगी .नागरिकों के अधिकारों के प्रयोग पर देश और विदेश की सरकारें ऐसे युक्तियुक्त निर्बन्धन लगा सकती हैं जिसे वे समाज की सुरक्षा ,स्वास्थ्य .शांति-व्यवस्था एवं नैतिकता के लिए उचित समझें'' किन्तु जहाँ व्यक्ति के अधिकारों पर सामाजिक हित की द्रष्टि से निर्बन्धन लगाये जा सकते हैं वहीँ राज्य की सामाजिक नियंत्रण की शक्ति की भी उचित सीमा निर्धारित होनी चाहिए.ताकि राज्य अपनी शक्ति का दुरूपयोग करके नागरिकों के अधिकारों व् स्वतंत्रताओं का हनन न कर सके.सामन्यतया हर व्यक्ति अपनी मर्जी का व्यापार कर सकता है,देश में कहीं भी रह सकता है,जैसे चाहे जीवन यापन कर सकता है जिसे वह बिना दूसरों की रूकावट के विधिपूर्वक कर सकता है.दूसरी और राज्य भी इन अधिकारों की सुरक्षा के लिए युक्तियुक्त निर्बन्धन लगा सकता है.
  जैसा की विदित है की मूल अधिकार आत्यंतिक अधिकार नहीं हैं इन पर युक्तियुक्त निर्बन्धन लगाये जा सकते है-
१-प्रतिरक्षा सेना के सदस्यों के सम्बन्ध में[अनु.३३]
२-जब सेना विधि लागू हो[अनु.३४]
३-संविधान में संशोधन द्वारा[अनु.३६८]
४-आपात उद्घोषणा के अधीन[अनु.३५२]
यह भी जान लेना चाहिए की ये अधिकार राज्य शक्ति के विरुद्ध गारंटी किये गए हैं न की सामान्य व्यक्तियों के अवैध कृत्यों के विरुद्ध क्योंकि उनके विरुद्ध साधारण विधि में अनेक उपचार उपलब्ध हैं.और राज्य शब्द में आते हैं-
१-भारत सरकार एवं संसद
२-राज्य सरकार एवं विधान मंडल
३-सभी स्थानीय प्राधिकारी
४-अन्य प्राधिकारी.
अगली पोस्ट में अधिकारों का विवरण लेकर आऊँगी...

सोमवार, 31 जनवरी 2011

मूल अधिकार

    मानव जीवन में अधिकारों का बहुत महत्व है ओर यदि वे देश के सर्वोच्च कानून ''संविधान ''द्वारा   मिले हों तो उनका महत्व कई गुना बढ़ जाता है. संविधान के भाग ३ को भारत का अधिकार पत्र [megna carta ]कहा जाता है .[megna carta ] इसलिए कि ये इंग्लेंड के संविधान से ग्रहण किये गए हैं. [megna carta ]इंग्लेंड का अधिकार पत्र है.इस अधिकार पत्र द्वारा ही अंग्रेजों ने सन १२१५ में इंग्लेंड के सम्राट जान  से नागरिकों के मूल अधिकारों की सुरक्षा प्राप्त की थी.यह अधिकार पत्र मूल अधिकारों से सम्बंधित प्रथम लिखित दस्तावेज है.इस दस्तावेज को मूल अधिकारों का जन्मदाता कहा जाता है .इसके पश्चात् समय-समय पर सम्राट ने अनेक अधिकारों को स्वीकृति प्रदान की .अंत में १६८९ में [bill of rights ]नमक दस्तावेज लिखा गया जिसमे जनता को दिए गए सभी महत्वपूर्ण अधिकारों ओर स्वतंत्रताओं को समाविष्ट कर दिया गया.
     भारतीय संविधान अपने में मूल अधिकारों की कोई परिभाषा समाविष्ट नहीं  करता क्योंकि उसका उद्देश्य इन्हें समाविष्ट करने का ये था कि एक विधि शासित सरकार की स्थापना हो न कि मनुष्य द्वारा संचालित सरकार कि-''a government of law and not of men .'' अर्थात एक ऐसी सरकार जिसमे बहुसंख्यक अल्पसंख्यक का शोषण न कर सकें.संक्षेप में यदि कहूं तो इसका उद्देश्य प्रोफ़ेसर डायेसी    के'' विधि के शासन'' की स्थापना करना है;ओर इस दिशा में भारतीय संविधान संसार के अन्य संविधानों से आगे है.न्यायाधीश सप्रू ने मूल अधिकारों के उद्देश्यों की व्याख्या करते हुए कहा किइन अधिकारों का उद्देश्य न केवल भारत में रहने वाले नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा ओर नागरिकता  को समानता प्रदान करना है जिससे कि वे भारत के नवनिर्माण की प्रक्रिया में सहयोग दे सकें वरन यह उद्देश्य भी है कि व्यवहार ,नागरिकता ,न्याय और निष्पक्षता का एक निश्चित मापदंड भी निर्धारित किया जा सके .इनका उद्देश्य यही था कि प्रत्येक नागरिक को इस बात का पूर्ण बोध हो जाये कि संविधान ने विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया है.ओर यह उपबंधित किया है कि इन सभी अधिकारों के सम्बन्ध में समाज के प्रत्येक वर्ग को पूर्ण समानता प्रदान की गयी है.
   मूल अधिकारों के विषय में और भी जानकारी लेकर जल्दी ही फिर आऊँगी.आपका सहयोग मेरे लिए सबसे बढ़कर है.बनाये रखियेगा..