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गुरुवार, 30 मार्च 2017

ये भी क्रूरता है संभलकर ....

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     आपका लिखा एक खत आपको क्रुर बताने और तलाक दिलाने के लिए काफी है। कोर्ट ने अपने पत्नी से अलग रह रहे एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। 

द टाइम्स ऑफ इं‌‌डिया में छपी एक खबर के मुताबिक पीड़ित व्यक्ति 28 साल से अपनी पत्नी से अलग रह रहा था। 1990 में उसकी पत्नी ने गुस्से में आकर अपने पति को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में पत्नी ने कहा कि वह तलाक चाहती है। उसे अपना एक पूर्व प्रेमी वापस मिल गया है, और वह उससे शादी करना चाहता है। 

पत्नी ने पत्र में यह भी बताया कि वह उनकी बेटी को भी अपनाने को तैयार है। उस वक्त महिला का पति विदेश में नौकरी करता था जबकि उसकी पत्नी भारत में ही थी। 

यह मामला ट्रायल कोर्ट में चल रहा था। अब इस मामले में दिल्‍ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पति को तलाक की अनुमति दे दी।
कोर्ट ने व्यक्ति को तलाक की अनुमति के साथ कहा कि एक पत्र भी जिसमें मानसिक कष्ट हो उसे भी क्रुरता का व्यवहार का आधार माना जा सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश नाजमी वजीरी ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए कहा है कि अपनी पत्नी� से दूर रह रहे एक पति के लिए काफी कष्टदेह है जब पत्नी उसे पत्र लिखकर सूचित करे कि वह वैवाहिक सम्बंध खत्म करना चाहती है और एक अन्य पुरुष से विवाह करना चाहती है। कोर्ट के फैसले के बाद पत्नी ने कहा कि उसने गुस्से में आकर अपने पति को चिट्ठी लिखी वह उनके साथ रहना चाहती थी।

महिला ने कोर्ट को बताया कि उसका कोई भी पुरूष मित्र नहीं है, और उसकी तलाक लेने की भी कोई योजना नहीं है। वह सिर्फ अपने पति को झटका देना चाहती थी। उसका ऐसा कोई इरादा नहीं था।

1995 में जब यह मामला ट्रायल कोर्ट में आया तो महिला ने वहां भी यही बयान दोहराया था। हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए उसके पति को तलाक देने की अनुमति दे दी और महिला की सभी दलीलें खारिज कर दी।

गौरतलब है कि 1980 में इस दम्पत्ति का विवाह हुआ। वर्ष 1987 में महिला का पति विदेश नौकरी करने चला गया, जबकि उसकी चार साल की बेटी और पत्नी भारत में ही रहे।[साभार -अमर उजाला ]

शालिनी कौशिक 
    [कानूनी ज्ञान ]

मंगलवार, 28 मार्च 2017

धारा 375-भारतीय दंड संहिता


The Indian Penal Code, 1860
CitationAct No. 45 of 1860
Territorial extentWhole of India except the State of Jammu and Kashmir
Enacted byParliament of India
Date enacted6 October 1860
Date assented to6 October 1860
Date commenced6 October 1860
भारतीय दंड संहिता १८६० का अध्याय १६ का उप-अध्याय ''यौन अपराध ''से सम्बंधित है जिसमे धारा ३७५ कहती है-
Central Government Act
Section 375 in The Indian Penal Code, 1860
375. Rape.-- A man is said to commit" rape" who, except in the case hereinafter excepted, has sexual intercourse with a woman under circumstances falling under any of the six following descriptions:-
First.- Against her will.
Secondly.- Without her consent.
Thirdly.- With her consent, when her consent has been obtained by putting her or any person in whom she is interested in fear of death or of hurt.
Fourthly.- With her consent, when the man knows that he is not her husband, and that her consent is given because she believes that he is another man to whom she is or believes herself to be lawfully married.
Fifthly.- With her consent, when, at the time of giving such consent, by reason of unsoundness of mind or intoxication or the administration by him personally or through another of any stupefying or unwholesome substance, she is unable to understand the nature and consequences of that to which she gives consent.
Sixthly.- With or without her consent, when she is under sixteen years of age.
Explanation.- Penetration is sufficient to constitute the sexual intercourse necessary to the offence of rape.
Exception.- Sexual intercourse by a man with his own wife, the wife not being under fifteen years of age, is not rape.
यौन उत्पीड़न एक ऐसा अपराध जिसमे पुरुष हमेशा शोषक व् नारी हमेशा पीड़ित की भूमिका में रहे हैं और इसी कारण कानून ने यहाँ भी इन्हें यही भूमिका दी है किन्तु विज्ञान के नए नए प्रयोग जोड़कर वर्त्तमान में कानून ने नारी की स्थिति को जो मजबूती दी है वह सुरक्षा पुरुष के व्यक्तित्व को नहीं दी या यूँ कहें कि नारी को जो सुरक्षा दी गयी है उसके कारण पुरुष की सुरक्षा आज खतरे में पड़ गयी है और कानून का काम न्याय है सभी के साथ न कि किसी एक के साथ .
नारी की प्राकृतिक दुर्बलता के कारण वह इस अपराध का शिकार बनती रही है किन्तु इसम भी दो राय नहीं कि वह इस धारा को पुरुष के खिलाफ हथियार रूप में इस्तेमाल करती भी आ रही है और इसका अवसर स्वयं कानून उसे दे रहा है इस तरह-
*यौन सम्बन्ध यदि नारी की इच्छा के विरुद्ध हैं तो यौन उत्पीड़न -किन्तु इच्छा है या नहीं इसका कोई निश्चित पैमाना नहीं .
*यौन सम्बन्ध यदि नारी की सहमति के बिना तो यौन उत्पीड़न -किन्तु सम्मति थी या नहीं इसे जानने का को तरीका नही .
इन दोनों ही तथ्यों को पुरुषों द्वारा भी नारी के विरुद्ध स्वयं के अपराध से पीछा छुड़ाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता रहा है और इस तरह नारी को अपने इस कृत्य में सहभागी दिखाया जाता रहा है किन्तु इसके साथ साथ आज नारी द्वारा भी पहले पुरुष को इसके भ्रम में डालकर और बाद में इसे हथियार बनाकर उस उत्पीड़न का दोषी बनाया जाता है जो कहीं न कहीं नारी के ही उकसावे का परिणाम था .
आज के समय में जब नारी पुरुष पर अपने फायदे के लिए यौन उत्पीड़न के झूठे इलज़ाम लगा रही है [ये कोई मनगढंत बात नहीं कर रही हूँ मैं बल्कि मैंने स्वयं ऐसी महिलाएं आज देखी हैं जो अपने प्रतिद्वंदी को दबाव में लेने के लिए कानून की इस सुरक्षा का नाजायज फायदा उठा रही हैं और उन्हें सलाखों के पीछे भिजवा रही हैं .]पूर्ण रूप से ब्याह रचाकर घर की समस्त नकदी जेवरात लेकर घर के पुरुषों को बेहोश कर फरार हो रही हैं ,अपने कैरियर को बुलंदी पर पहुँचाने के लिए स्वयं पुरुषों को अपने मोहजाल में फंसा रही हैं और आगे बढ़ रही हैं ऐसे में क्या यौन अपराध की जो स्थिति भारतीय दंड संहिता में रखी गयी है सही मानी जा सकती है ?
आज महिला सशक्तिकरण के नाम पर और हमेशा से पुरुषों के व्यभिचार के नाम पर दनादन सम्मानित शख्सियतों पर इलज़ाम लगाये जा रहे हैं और बगैर सबूत ,बगैर प्रमाणिकता के वे अपने पद त्याग को मजबूर किये जा रहे हैं जबकि अभी ये भी साफ़ नहीं कि उन्होंने वास्तव में ऐसा क्या या नहीं या उन्होंने ऐसा किया तो स्वयं किया या किसी उकसावे के परिणाम स्वरुप किया ,क्या ऐसे में भारतीय कानून में यौन अपराध की परिभाषा में परिवर्तन आवश्यक नहीं हो गया है ?
ये सत्य है कि पुरुषों के व्यभिचार का नारी को हमेशा से शिकार होना पड़ा है और इसीलिए कानून की मदद की वे पहली पात्र हैं किन्तु कानून का कार्य न्याय करना है और न्याय तभी होता है जब पीड़ित को इंसाफ मिले और दोषी को दंड .अभी हाल ही में रिटायर्ड जस्टिस गांगुली और जस्टिस स्वतंत्र कुमार पर यौन उत्पीड़न के लॉ इंटर्न द्वारा आरोप लगाये गए हैं और एकतरफा कार्यवाही झेलने के कारण जस्टिस गांगुली को तो अपने पद से इस्तीफा तक देना पड़ा है .यदि बाद में जस्टिस गांगुली दोषी साबित होते हैं तो ये सब सही कहा जायेगा किन्तु यदि वे निरपराध साबित होते हैं तो क्या कानून की इस प्रक्रिया द्वारा उन्हें उनका पद वापिस दिलवाया जा सकेगा और चलिए उन्हें उनका पद मिल भी गया तब भी क्या जो अपमान , मानसिक व् सामाजिक प्रताड़ना उन्हें व् उनके परिवारी जनों को [क्योंकि समाज में पुरुषों का एक वर्ग ऐसा भी है जो पुरुषों के द्वारा किये जा रहे इन गलत व् अभद्र कार्यों का विरोधी है और वह जितना स्वयं सम्मान से जीना जानता है उतना ही नारी जाति का सम्मान करना भी जानता है ] इस सब कार्यवाही से हो रही है उससे मिले घावों की भरपाई कर पायेगा .
इन्हीं सब कारणों से आज इस धारा में पूर्णरूपेण परिवर्तन की अपेक्षा है क्योंकि आज की नारी पहले की तरह मात्र आत्म-सम्मान की महत्वाकांक्षा नहीं रखती वरन आज उसकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ चुकी हैं और वह आज स्वयं को पुरुष से बढ़कर साबित करने की होड़ में कुछ भी कर गुजरने को तैयार है .ऐसे में आज बहुत सी जगह पुरुष को भी उससे वही सुरक्षा चाहिए जो उसे पुरुष से .इसलिए धारा ३७५ द्वारा परिभाषित यौन अपराध की परिभाषा में परिवर्तन होना ही चाहिए .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

गैंगरेप में मृत्यु दंड हो

मृत्युदंड एक ऐसा दंड जिसका समर्थन और विरोध हमेशा से होता रहा है पर जब जब इसके विरोध की आवाज़ तेज हुई है तब तब कोई न कोई ऐसा अपराध सामने आता रहा है जिसने इसकी अनिवार्यता पर बल दिया है हालाँकि इसका  समर्थन और विरोध न्यायपालिका में भी रहा है किन्तु अपराध की नृशंसता इस दंड की समाप्ति के विरोध में हमेशा से खड़ी रही है और इसे स्वयं माननीय न्यायमूर्ति ए.पी.सेन ने ''कुंजू कुंजू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य क्रिमिनल अपील ५११ [१९७८] में स्वीकार किया है .
    ''कुंजू कुंजू बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के वाद में अभियुक्त एक विवाहित व्यक्ति था जिसके दो छोटे बच्चे भी थे .उसका किसी युवती से प्रेम हो गया और उससे विवाह करने की नीयत से उसने अपनी पत्नी और दोनों बच्चों की रात में सोते समय निर्मम हत्या कर दी .''
     इस वाद में यद्यपि न्यायाधीशों ने 2:1 मत से इन तीन हत्याओं के अभियुक्त की मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया जाना उचित समझा परन्तु न्यायमूर्ति ए .पी. सेन ने अपना विसम्मत मत व्यक्त करते हुए अवलोकन किया -
  '' अभियुक्त ने एक राक्षसी कृत्य किया है तथा अपनी पत्नी तथा उससे पैदा हुए दो निर्दोष नन्हे बच्चों की हत्या करने में भी वह नहीं हिचकिचाया , यदि इस प्रकार के मामले में भी मृत्युदंड न दिया जाये तो मुझे समझ में नहीं आता कि मृत्युदंड और किस प्रकार के मामलों में दिया जा सकता है .''
    उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने राजेन्द्र प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ए .आई. आर १९७९ एस. सी. ९१६ के वाद में जोर देकर कहा कि जहाँ हत्या जानबूझकर , पूर्वनियोजित , नृशंस तथा बर्बरतापूर्ण ढंग से की गयी हो तथा इसके लिए कोई परिशमनकारी  परिस्थितियां न हों वहां सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से मृत्युदंड अनिवार्य रूप से दिया ही जाना चाहिए
      न्यायमूर्ति ए.पी.सेन ने एक अन्य वाद में भी मृत्युदंड के सम्बन्ध में कहा -'' दंड के प्रति मानवीय दृष्टिकोण की वास्तविकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए . यदि कोई व्यक्ति किसी निर्दोष व्यक्ति की नृशंस और पूर्व नियोजित ढंग से हत्या करता है तो उसकी बर्बरता से न्यायालय की आत्मा दहल जाती है अतः उसे अपने कृत्य का परिणाम भुगतना ही चाहिए . ऐसे व्यक्तियों को जीवित रहने के अधिकार से वंचित किया जाना चाहिए .''
     मृत्युदंड की वैधानिकता को निर्णीत करने का अवसर उच्चतम न्यायालय को एक बार फिर ''वचन सिंह बनाम पंजाब राज्य के वाद में मिला ए.आई.आर.१९८० सुप्रीम कोर्ट ८९८ ''के वाद में मिला .इस वाद में ५ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने ४:१ से विनिश्चित किया कि मृत्युदंड आजीवन कारावास के दंड के विकल्प के रूप में एक वैधानिक दंड है अतः यह अनुचित नहीं है और अनुच्छेद १४ , १९,तथा २१ का उल्लंघन नहीं करता है .......मृत्युदंड को वैकल्पिक दंड के रूप में उचित और आवश्यक ठहराते हुए उच्च न्यायालय ने अभिकथन किया कि मृत्युदंड को समाप्त किये जाने के विचार का समर्थन किये जाने के बावजूद विश्व के अनेक विद्वानों ने  [ जिसमे समाजशास्त्री ,विधिशास्त्री , न्यायविद तथा प्रशमनीय अधिकारी भी सम्मिलित हैं ] यह स्वीकार किया है कि सामाजिक सुरक्षा के लिए मृत्युदंड को यथावत बनाये रखना आवश्यक है तथापि बहुमत ने यह स्वीकार किया कि मृत्युदंड के प्रशासनीय परिस्थितियों का निर्वचन उदारता से किया जाना चाहिए ताकि इस दंड का उपयोग बिरले से बिरले मामलों में ही किया जाये ताकि मानव जीवन की गरिमा बनी रहे .
    मानव जीवन की गरिमा का विचार अपराध के कारण को विचारकर भले ही न्यायालय या सुधारवादी कर लें किन्तु एक अपराध ऐसा है जिसमे मानव जीवन की गरिमा या उदारता का विचार अपराधी के सम्बन्ध में आना एक असहनीय बात प्रतीत होती है .वह अपराध है '' बलात्कार '' ,जिसमे अपराधी द्वारा पीड़ित की मानव जीवन की गरिमा को तार-तार कर दिया जाता है और पीड़िता ही वह व्यक्ति होती है जो अपने साथ हुए इस अपराध का दोहरा दंड भोगती है जबकि उसकी गलती मात्र एक होती है और वह है  '' नारी शरीर '' , जो उसे प्रकृति प्रदत्त होता है जिसमे वह स्वयं कुछ नहीं कर सकती है और इस सबके बावजूद उसके साथ अपराध घटित होने पर ये कानून और ये समाज दोनों ही उसके साथ खड़े नहीं होते और स्वयं के साथ अपराध के कारणों में उसकी कमी भी ढूंढी जाती है जो अपराधी के लिए फायदेमंद साबित होती है और वह एक निर्दोष के मानव जीवन की गरिमा का हरण कर भी आसानी से बरी हो जाता है .
    १६ दिसंबर २०१२ को निर्भया गैंगरेप कांड के बाद हुए जनांदोलन के दबाव में भारतीय दंड संहिता में धारा ३७६ में बहुत से संशोधन किये गए जिसमे धारा ३७६ घ के रूप में सामूहिक बलात्संग सम्बन्धी धारा भी जोड़ी गयी ,जिसमे कहा गया कि -

''३७६-घ -सामूहिक बलात्संग -जहाँ किसी स्त्री से , एक या अधिक व्यक्तियों द्वारा एक समूह गठित करके या सामान्य आशय को अग्रसर करने में कार्य करते हुए बलात्संग किया जाता है , वहां उन व्यक्तियों में से प्रत्येक के बारे में यह समझा जायेगा कि उसने बलात्संग का अपराध किया है और वह ऐसी अवधि के कठोर कारावास से , जिसकी अवधि बीस वर्ष से कम नहीं होगी , किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी जिससे उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास अभिप्रेत होगा , दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .
      परन्तु ऐसा जुर्माना पीड़िता के चिकित्सीय खर्चों को पूरा करने और पुनर्वास के लिए न्यायोचित और युक्तियुक्त होगा ;
           परन्तु यह और कि इस धारा के अधीन अधिरोपित कोई जुर्माना पीड़िता को संदत्त किया जायेगा . ''
                  और इसी संशोधन के द्वारा एक धारा ३७६ ड़ का अन्तःस्थापन भी किया गया जिसमे इस अपराध के पुनरावृत्ति कर्ता के अपराधियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान किया गया .
     अब सवाल ये उठता है कि जो अपराधी उदारता जैसे मानवीय गुणों से दूर है जिसमे मानवीय संवेदनाएं हैं ही नहीं ,एक नारी  शरीर मात्र जिनकी कई की सोचने समझने की शक्ति एक साथ  विलुप्त कर उनमे मात्र हवस वासना जैसे भावों को ही उभारता है क्या उनके लिए कानून या समाज में दया करुणा जैसे भावों से भरे दंड के भाव होने चाहियें ?

    अभी २३ अक्टूबर २०१५ को दिल्ली से रावण दहन देखकर परिवार के साथ वापस आ रही १४ साल की किशोरी का जौंती मार्ग से अपहरण किया गया ,फिर पांच दरिंदों द्वारा उसके साथ गैंगरेप किया गया , उसकी हत्या की गयी और शव दफना दिया गया .पकडे गए आरोपियों के अनुसार ,''वह फुट-फूटकर गुहार लगा रही थी मुझे बख्श दो ,जाने दो लेकिन जितना वो चीखी चिल्लाई उतना ही उन दरिंदों की हैवानियत बढ़ती गयी ,दो घंटे तक वे उसका जिस्म नोचते रहे और जब लगा कि वह उन्हें पहचान लेगी तो ईंट मारकर उसे बेसुध कर दिया ,चुन्नी से गला घोंट दिया और मिटटी में शव दफ़न कर दिया और ये सब बताते वक्त आरोपियों के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई .क्या ऐसे में भी अपराधियों के द्वारा पुनरावृत्त इस अपराध की सम्भावना पर ही मृत्युदंड का विचार किया जाना चाहिए ?क्या एक किशोरी की मानव जीवन की गरिमा को तार-तार करने वालों की मानवीय जीवन की गरिमा का विचार करना चाहिए ?कहा जा सकता है कि बलात्कार के बाद हत्या में फांसी होती ही है किन्तु यदि ये ऐसे बलात्कार के बाद उसे छोड़ भी देते तो क्या उसके जीवन का उसके लिए कोई अर्थ रह गया था ? क्या आजीवन कारावास उन्हें सुधारने की क्षमता रखता है जो इतने अत्याचार करने के बाद भी सहज हैं ?
   गैंगरेप एक ऐसा अपराध है जिसके लिए निर्विवाद रूप से मृत्युदंड का प्रावधान होना ही चाहिए क्योंकि एक नारी शरीर किसी एक की उत्तेजना को भले ही एक समय में बढ़ा दे किन्तु एक समूह को एकदम वहशी बना दे ऐसा संभव नहीं है ऐसा सोची समझी रणनीति के तहत ही होता है और जहाँ दिमाग काम करता है वहां दंड भी दिमाग के स्तर का ही होना चाहिए दिल के स्तर का नहीं और ऐसे में  गैंगरेप के समस्त मामलों में मृत्युदंड का ही प्रावधान होना चाहिए .
शालिनी कौशिक


    [कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

'पत्नी की तलाक और दूसरी शादी की धमकी क्रूरता

पत्नी तलाक की धमकी तो वह क्रुरता है
आपका लिखा एक खत आपको क्रुर बताने और तलाक दिलाने के लिए काफी है। कोर्ट ने अपने पत्नी से अलग रह रहे एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। 

द टाइम्स ऑफ इं‌‌डिया में छपी एक खबर के मुताबिक पीड़ित व्यक्ति 28 साल से अपनी पत्नी से अलग रह रहा था। 1990 में उसकी पत्नी ने गुस्से में आकर अपने पति को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में पत्नी ने कहा कि वह तलाक चाहती है। उसे अपना एक पूर्व प्रेमी वापस मिल गया है, और वह उससे शादी करना चाहता है। 

पत्नी ने पत्र में यह भी बताया कि वह उनकी बेटी को भी अपनाने को तैयार है। उस वक्त महिला का पति विदेश में नौकरी करता था जबकि उसकी पत्नी भारत में ही थी। 

यह मामला ट्रायल कोर्ट में चल रहा था। अब इस मामले में दिल्‍ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पति को तलाक की अनुमति दे दी।
कोर्ट ने व्यक्ति को तलाक की अनुमति के साथ कहा कि एक पत्र भी जिसमें मानसिक कष्ट हो उसे भी क्रुरता का व्यवहार का आधार माना जा सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश नाजमी वजीरी ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए कहा है कि अपनी पत्नी� से दूर रह रहे एक पति के लिए काफी कष्टदेह है जब पत्नी उसे पत्र लिखकर सूचित करे कि वह वैवाहिक सम्बंध खत्म करना चाहती है और एक अन्य पुरुष से विवाह करना चाहती है। कोर्ट के फैसले के बाद पत्नी ने कहा कि उसने गुस्से में आकर अपने पति को चिट्ठी लिखी वह उनके साथ रहना चाहती थी।

महिला ने कोर्ट को बताया कि उसका कोई भी पुरूष मित्र नहीं है, और उसकी तलाक लेने की भी कोई योजना नहीं है। वह सिर्फ अपने पति को झटका देना चाहती थी। उसका ऐसा कोई इरादा नहीं था।

1995 में जब यह मामला ट्रायल कोर्ट में आया तो महिला ने वहां भी यही बयान दोहराया था। हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए उसके पति को तलाक देने की अनुमति दे दी और महिला की सभी दलीलें खारिज कर दी।

गौरतलब है कि 1980 में इस दम्पत्ति का विवाह हुआ। वर्ष 1987 में महिला का पति विदेश नौकरी करने चला गया, जबकि उसकी चार साल की बेटी और पत्नी भारत में ही रहे।[साभार -अमर उजाला ]

शालिनी कौशिक 
    [कानूनी ज्ञान ]

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

विवाह विच्छेद /तलाक और महिला अधिकार


आज मैं आप सभी को जिस विषय में बताने जा रही हूँ उस विषय पर बात करना भारतीय परंपरा में कोई उचित नहीं समझता क्योंकि मनु के अनुसार कन्या एक बार ही दान दी जाती है किन्तु जैसे जैसे समय पलटा वैसे वैसे ये स्थितियां भी परिवर्तित हो गयी .महिलाओं ने इन प्रथाओं के कारण [प्रथाओं ही कहूँगी कुप्रथा नहीं क्योंकि कितने ही घर इन प्रथाओं ने बचाएं भी हैं] बहुत कष्ट भोगा है .हिन्दू व मुस्लिम महिलाओं के अधिकार इस सम्बन्ध में अलग-अलग हैं .
  सर्वप्रथम हम मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं.पहले मुस्लिम महिलाओं को तलाक के केवल दो अधिकार प्राप्त थे १-पति की नपुंसकता ,२-परपुरुशगमन का झूठा आरोप[लियन]
किन्तु न्यायिक विवाह-विच्छेद [मुस्लिम विवाह-विच्छेद  अधिनियम१९३९]द्वारा मुस्लिम महिलाओं को ९ आधार प्राप्त हो गए हैं:
१-पति की अनुपस्थिति,
२-पत्नी के भरण-पोषण में असफलता,
३-पति को सात साल के कारावास की सजा,
४-दांपत्य दायित्वों के पालन में असफलता,
५-पति की नपुंसकता ,
६-पति का पागलपन,
७-पत्नी द्वारा विवाह की अस्वीकृति[यदि विवाह के समय लड़की १५ वर्ष से काम उम्र की हो तो वह १८ वर्ष की होने से पूर्व विवाह को अस्वीकृत  कर सकती है],
८-पति की निर्दयता,
९-मुस्लिम विधि के अंतर्गत विवाह विच्छेद के अन्य आधार,
    ऐसे ही हिन्दू विधि में विवाह विधि संशोधन अधिनियम १९७६ के लागू होने के बाद महिलाओं की स्थिति मज़बूत हुई है और पति द्वारा बहुविवाह व पति द्वारा बलात्कार,गुदा मैथुन अथवा पशुगमन  दो और आधार महिलाओं को प्राप्त हो गए हैं जबकि इससे पूर्व ११ आधार पति-पत्नी दोनों को प्राप्त थे.वे आधार हैं;
१-जारता, २-क्रूरता, ३-अभित्याग, ४ -धर्म-परिवर्तन, ५ -मस्तिष्क विकृत्त्ता  ,६--कोढ़ ,७-- रतिजन्य रोग ,८-संसार परित्याग, ९--प्रकल्पित मृत्यु ,१० -न्यायिक प्रथक्करण , ११- -दांपत्य अधिकारों के पुनर्स्थापन की आज्ञप्ति   का पालन न करना
   इस तरह अब हिन्दू महिलाओं को तलाक के १३ अधिकार प्राप्त है किन्तु जैसा कि  मैं आपसे पहले भी कह चुकी हूँ कि महिलाओं में अपने अधिकारों को लेकर कोई जागरूकता नहीं है वे घर बचाने के नाम पर पिटती रहती  हैं,मरती रहती हैं,सिसक सिसक कर सारी जिंदगी गुज़ार देती हैं यदि एक बार वे पुरुषों  को अपनी ताक़त का अहसास करा दें तो शायद इन घटनाओ पर कुछ रोक लग सकती है क्योंकि इससे पुरुषों  के  निर्दयी रवैय्ये को कुछ चुनौती तो मिलेगी.मैं नहीं चाहती आपका घर टूटे किन्तु मैं महिलाओं को भी टूटते नहीं देख सकती इसीलिए आपको ये जानकारी दे रही हूँ ताकि आपकी हिम्मत बढे और आप अपना और अपनी और बहनों का जीवन प्यार व विश्वास से सजा सकें...

मेरे एक आलेख पर जो कि जब मैं नारी ब्लॉग की सदस्या थी पर मेरे आलेख विवाह विच्छेद /तलाक और महिला अधिकार पर टिप्पणी कर प्राची पाराशर पूछती हैं -
[prachi parashar-
November 28, 2013 at 6:48 PM
after 16 yrs of my happy love merrige life my husband indulge with a muslim widow lady with her 3 own children.now i have stopped crying and put my application in mahila help line .please help me for the further steps .i dont want to live a compromising life .i have my 3 children ,out of which my eldest daughter has compleated her14th and the youngest one is going towards his5th .plz guide me about my rights which i can get if there is any condition of divorce.]
और इनकी समस्या को देखते हुए हिन्दू विधि में निम्न उपचार प्रदान किये गए हैं -
* विवाह विधि संशोधन अधिनियम १९७६ के पश्चात् यदि किसी हिन्दू महिला का पति धर्म परिवर्तन द्वारा हिन्दू नहीं रह गया है तो वह पत्नी तलाक की आज्ञप्ति प्राप्त कर सकती है अर्थात तलाक ले सकती है .धर्म परिवर्तन से तलाक खुद ही नहीं हो जाता इसके लिए उसे याचिका दायर करनी होगी और आज्ञप्ति प्राप्त करनी होगी आज्ञप्ति के बाद ही तलाक होगा .
*साथ ही हिन्दू दत्तक तथा भरण पोषण अधिनियम १९५६ के अंतर्गत वह और उसके बच्चे पोषण के अधिकारी भी हैं .इस अधिनियम की धारा १८ के अधीन पत्नियों को दो प्रकार के अधिकार दिए गए हैं -
१- भरण पोषण ;
२-पृथक निवास का अधिकार .
कोई भी हिन्दू पत्नी बिना पोषण का अधिकार खोये हुए अपने पति से उसके धर्म त्याग के आधार पर पृथक निवास की अधिकरणी होगी .
* इसके साथ ही दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ की धारा १२५ भी उसे और उसके बच्चों को ये अधिकार देती है -
दंड प्रक्रिया सहिंता १९७३ की धारा १२५ [१] के अनुसार ''यदि पर्याप्त साधनों वाला कोई व्यक्ति -
[क] अपनी पत्नी का ,जो अपना भरण पोषण करने में असमर्थ है ,
[ख] अपनी धर्मज या अधर्मज अव्यस्क संतान का चाहे विवाहित हो या न हो ,जो अपना भरण पोषण करने में असमर्थ है ,या
[ग] -अपने धर्मज या अधर्मज संतान का [जो विवाहित पुत्री नहीं है ],जिसने वयस्कता प्राप्त कर ली है ,जहाँ ऐसी संतान किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण अपना भरण -पोषण करने में असमर्थ है
भरण पोषण करने की उपेक्षा करता है या भरण पोषण करने से इंकार करता है तो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट ,ऐसी उपेक्षा या इंकार साबित होने पर ,ऐसे व्यक्ति को ये निर्देश दे सकेगा कि वह अपनी ऐसी पत्नी या ऐसी संतान को ऐसी मासिक दर पर जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे भरण पोषण मासिक भत्ता दे .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

अमर उजाला पर कार्यवाही हो


अमर उजाला हिंदी दैनिक समाचारपत्र का पृष्ठ -13 पर आज प्रकाशित एक समाचार भारतीय दंड संहिता -१८६० के अधीन उसे अर्थात अमर उजाला को कानून के उल्लंघन का दोषी बनाने हेतु पर्याप्त है जिस पर अमर उजाला ने बाँदा चित्रकूट में हारने वाली एक प्रत्याशी शीलू को गैंगरेप पीड़ित लिख प्रचारित किया है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा २२८-क के अधीन अपराध है और जिसका अवलोकन आप सभी कर अमर उजाला के इस अपराध को स्वीकार कर सकते हैं
जिसके मुद्रण या प्रकाशन के सम्बन्ध में भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत कई पाबंदियां लगायी गयी हैं जो इस प्रकार हैं -
भारतीय दंड संहिता की धारा २२८-क कहती है -
[१] - जो कोई किसी नाम या अन्य बात को ,जिससे किसी ऐसे व्यक्ति की [ जिसे इस धारा में इसके पश्चात पीड़ित व्यक्ति कहा गया है ] पहचान हो सकती है , जिसके विरुद्ध धारा ३७६ , धारा ३७६-क ,धारा ३७६-ख , या धारा ३७६-घ के अधीन किसी अपराध का किया जाना अभिकथित है या किया गया पाया गया है , मुद्रित या प्रकाशित करेगा वह दोनों में किसी भांति के कारावास से , जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी , दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ;
[२] - उपधारा [१] की किसी भी बात का विस्तार किसी नाम या अन्य बात के मुद्रण या प्रकाशन पर , यदि उससे पीड़ित व्यक्ति की पहचान हो सकती है ,तब नहीं होता है जब ऐसा मुद्रण या प्रकाशन -
[क] -पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के या ऐसे अपराध का अन्वेषण करने वाले पुलिस अधिकारी के , जो ऐसे अन्वेषण के प्रयोजन के लिए सद्भावपूर्वक कार्य करता है , द्वारा या उसके लिखित आदेश के अधीन किया जाता है ; या
[ख]- पीड़ित व्यक्ति द्वारा या उसके लिखित प्राधिकार से किया जाता है ; या
[ग] - जहाँ पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है अथवा वह अवयस्क या विकृतचित्त है वहां , पीड़ित व्यक्ति के निकट सम्बन्धी द्वारा या उसके लिखित प्राधिकार से , किया जाता है ;
परन्तु निकट सम्बन्धी द्वारा कोई ऐसा प्राधिकार किसी मान्यता प्राप्त कल्याण संस्था या संगठन के अध्यक्ष या सचिव को ,चाहे उसका जो भी नाम हो , भिन्न किसी व्यक्ति को नहीं दिया जायेगा .
स्पष्टीकरण -इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए , ''मान्यता प्राप्त कल्याण संस्था या संगठन '' से केंद्रीय या राज्य सरकार द्वारा इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए मान्यता प्राप्त कोई समाज कल्याण संस्था या संगठन अभिप्रेत है .
[३] -जो कोई उपधारा [१] में निर्दिष्ट किसी अपराध की बाबत किसी न्यायालय के समक्ष किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में कोई बात , उस न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा के बिना मुद्रित या प्रकाशित करेगा , वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से , जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .
स्पष्टीकरण -किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के निर्णय का मुद्रण या प्रकाशन इस धारा के अर्थ में अपराध की कोटि में नहीं आता है .
इस प्रकार अमर उजाला का इस तरह से एक पीड़ित के नाम का प्रकाशन अपराध है और ऐसा मात्र रेटिंग बढ़ाने के लिए है जो कि पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं है और इसीलिए कानून द्वारा ऐसी पत्रकारिता पत्रकारिता पर रोक लगायी गयी है . ऐसी पत्रकारिता पर रोक के लिए यह आवश्यक है कि अमर उजाला के इस कृत्य को ध्यान में रखते हुए उसपर अति शीघ्र कानूनी कार्यवाही की जाये .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 23 नवंबर 2015

सबूत का भार सुब्रमणियम स्वामी पर


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भारतीय राजनीति में ऐसे लोग कम नहीं जिनकी राजनीतिक रोटियां केवल और केवल गांधी परिवार की बुराई के चूल्हे पर ही सिंकती हैं और केवल इस परिवार की बुराई करकर ही वे स्वयं को बहुत बड़ा देशभक्त साबित करते हैं और इन्हीं नेताओं में से सर्वप्रमुख नेता हैं ''माननीय सुब्रमणियम स्वामी'' अभी हाल ही में वे एक बहुत बड़ा मुद्दा [केवल उनकी नज़रों में ] लेकर आये हैं और वह है राहुल गांधी के ब्रिटिश नागरिक होने का मुद्दा ,वे कहते हैं कि -
''राहुल ब्रिटिश नागरिक हैं ''

Rahul Gandhi is a British citizen, Subramanian Swamy says;

NEW DELHI: BJP leader Subramanian Swamy on Monday alleged that Congress vice-president Rahul Gandhi has claimed himself to be a British national before the authorities there and has demanded that he be stripped of Indian citizenship and Lok Sabha membership.
और अब वे कह रहे हैं कि ''राहुल साबित करें , वह ब्रिटिश नागरिक नहीं ''और अपने इस दावे के समर्थन में वे ब्रिटिश सरकार की आधिकारिक वेबसाइट से उपलब्ध दस्तावेज का हवाला देते हुए कहते हैं कि राहुल भारत के नहीं बल्कि ब्रिटिश के नागरिक हैं और अब राहुल साबित करें कि ये कागजात फर्जी हैं .
जहाँ तक हम जानते हैं सुब्रमणियम स्वामी एक जाने माने विधिवेत्ता हैं विकिपीडिया भी कहता है -
''डॉ॰ सुब्रह्मण्यम् स्वामी (जन्म: 15 सितम्बर 1939 चेन्नई, तमिलनाडु, भारत) जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। वे सांसद के अतिरिक्त 1990-91 में वाणिज्य, विधि एवं न्याय मन्त्री और बाद में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार आयोग के अध्यक्ष भी रहे''
और ऐसे में वे स्वयं जानते हैं कि यहाँ ये साबित करने का भार किस पर है चलिए अगर वे अपने इस भार से बचना चाहते हैं तो हम उन्हें बता दें कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा १०२ और १०३ उन्हें इससे बचने नहीं देंगी क्योंकि ये कहती हैं -
धारा १०२ -किसी वाद या कार्यवाही में सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जो असफल हो जायेगा ,यदि दोनों में से किसी भी ओर से कोई भी साक्ष्य न दिया जाये .
और धारा १०३ उस विशिष्ट तथ्य के बारे में सबूत के भार के बारे में कहती है जो सुब्रमणियम स्वामी जी यहाँ लाये हैं -
धारा १०३ - किसी विशिष्ट तथ्य के सबूत का भार उस व्यक्ति पर होता है जो न्यायालय से यह चाहता है कि वह उसके अस्तित्व में विश्वास करे ,जब तक कि किसी विधि द्वारा यह उपबंधित न हो कि उस तथ्य के सबूत का भार किसी विशिष्ट व्यक्ति पर होगा .
और इस तरह यहाँ इस तथ्य को साबित करने का भार पूरी तरह से सुब्रमणियम स्वामी पर है क्योंकि वे मात्र अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं कर रहे .मात्र वहां की आधिकारिक वेबसाइट पर से उपलब्ध दस्तावेज के जरिये वे अपने अनर्गल प्रलाप को पुख्ता सबूत के रूप में प्रस्तुत नहीं कर सकते क्योंकि वेबसाइट कितना सही बोलती हैं यह अभी हाल में ही गूगल ने दिखा दिया जब प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में जवाहर लाल नेहरू के स्थान पर नरेंद्र मोदी को दिखाया गया .इसलिए अब सुब्रमणियम स्वामी पुख्ता सबूत पेश कर साबित करें कि राहुल ब्रिटिश नागरिक हैं तब आगे बात करें .
शालिनी कौशिक