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प्रोन्नति में आरक्षण :सरकार झुकना छोड़े

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प्रोन्नति में आरक्षण :सरकार  झुकना  छोड़े    [गूगल  से  साभार ] '' सियासत  को लहू पीने  की लत है,     वर्ना मुल्क में सब खैरियत है .''        ये पंक्तियाँ  अक्षरश:  खरी  उतरती हैं सियासत पर  ,जिस आरक्षण को दुर्बल व्यक्तियों को सशक्त व्यक्तियों से  बचाकर पदों की उपलब्धता  सुनिश्चित करने के लिए  लागू  किया गया था . जिसका  मुख्य  उद्देश्य  आर्थिक , सामाजिक , शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े  लोगों को देश की  मुख्य  धारा  में लाना था उसे  सियासत  ने  सत्ता  बनाये  रखने  के लिए '' वोट '' की  राजनीति में  तब्दील   कर  दिया .      सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण इलाहाबाद उच्च  न्यायालय    ने ख़ारिज कर दिया था .इसी  साल अप्रैल  में उच्चतम  न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति व  अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के पूर्ववर्ती  मायावती  सरकार के  निर्णय  को ख़ारिज कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को बरक़रार रखा और अखिलेश यादव सरकार ने इस फैसले पर  फ़ौरन अमल   के निर्देश दिए थे  किन्तु वोट कि राजनीति इतनी अहम्

ऑनर किलिंग:सजा-ए-मौत की दरकार नहीं

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ऑनर किलिंग:सजा-ए-मौत की दरकार नहीं  ''प्रेम''जिसके विषय में शायद आज तक सबसे ज्यादा लिखा गया होगा,कहा गया होगा ,कबीर दास भी कह गए- ''ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए'' देवल आशीष कहते हैं- ''प्यार कर्म ,प्यार धर्म प्यार प्रभु नाम है.''       प्रेम जहाँ एक ओर कवियों ,लेखकों की लेखनी का प्रिय विषय रहा है वहीँ समाज में सभ्यता की राह में कांटे की तरह महसूस किया गया है और इसी कारण प्रेमी जनों को अधिकांशतया प्रेम की कीमत बलिदान के रूप में चुकानी पड़ी है  किन्तु प्रेम की भी एक सीमा होती है और जो प्रेम सीमाओं में मर्यादाओं में बंधा हो उसे बहुत सी बार सम्मान सहित स्वीकृति भी मिली है ,किन्तु आज प्रेम का एक अनोखा रूप सामने आ रहा है और इसकी परिणिति कभी भी समाज की स्वीकृति हो ही नहीं सकती क्योंकि प्रेम का यह रूप मात्र वासना का परिचायक है   इसमें प्रेम शब्द की पवित्रता का कोई स्थान नहीं है और इस प्रेम को कथित प्रेमी-प्रेमिका के परिजन कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते और इसके कारण उनकी भावनाएं इस कदर उत्तेजना का रूप ले लेती हैं जिसे ''ऑनर