शनिवार, 11 अगस्त 2012

प्रोन्नति में आरक्षण :सरकार झुकना छोड़े


[गूगल से साभार ]

''सियासत को लहू पीने की लत है,
    वर्ना मुल्क में सब खैरियत है .''
       ये पंक्तियाँ अक्षरश: खरी उतरती हैं सियासत पर  ,जिस आरक्षण को दुर्बल व्यक्तियों को सशक्त व्यक्तियों से  बचाकर पदों की उपलब्धता  सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया था .जिसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक,सामाजिक ,शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े लोगों को देश की मुख्य  धारा  में लाना था उसे सियासत ने सत्ता बनाये रखने  के लिए ''वोट '' की राजनीति में तब्दील  कर दिया .
    सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण इलाहाबाद उच्च न्यायालय  ने ख़ारिज कर दिया था .इसी साल अप्रैल में उच्चतम  न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के पूर्ववर्ती मायावती सरकार के निर्णय को ख़ारिज कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को बरक़रार रखा और अखिलेश यादव सरकार ने इस फैसले पर  फ़ौरन अमल  के निर्देश दिए थे किन्तु वोट कि राजनीति इतनी अहम् है कि संविधान के संरक्षक ''उच्चतम न्यायालय '' के निर्णय के प्रभाव को दूर करने के लिए विधायिका नए नए विधेयक लाती रहती है  और संविधान में अपना स्थान ऊँचा बनाने की कोशिश करती रहती है.जिस प्रोन्नति में आरक्षण को उच्चतम नयायालय  ने मंडल आयोग के मामले में ख़ारिज कर दिया था उसे नकारने के लिए संसद ने ७७ वां संशोधन अधिनियम पारित कर अनुच्छेद १६ में एक नया खंड ४ क जोड़ा जो यह उपबंधित  करता है -
 ''कि अनुच्छेद १६ में की कोई बात राज्य के अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के किसी वर्ग के लिए जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है प्रोन्नति के लिए आरक्षण के लिए कोई उपबंध करने से निवारित [वर्जित] नहीं करेगी.''
   और इसके बाद ८५ वां संविधान संशोधन अधिनियम २००१ द्वारा खंड ४क में शब्दावली ''किसी वर्ग के लिए प्रोन्नति के मामले में'' के स्थान पर ''किसी वर्ग के लिए प्रोन्नति के मामले में  परिणामिक श्रेष्ठता के साथ ''शब्दावली अंतःस्थापित की गयी जो इस संशोधन अधिनियम को १७ जून १९९५ से लागू करती है जिस दिन ७७ वां संशोधन अधिनियम लागू हुआ .इसका परिणाम यह होगा कि अनुसूचित जाति व् जनजातियों के अभ्यर्थियों की श्रेष्ठता १९९५ से लागू मानी जाएगी .पहली बार ऐसा भूतलक्षी प्रभाव का संशोधन संविधान से धोखाधड़ी का प्रत्यक्ष प्रमाण है.
के सी वसंत कुमार  के मामले में सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी थी कि अनुसूचित जाति व् अनुसूचित जनजाति का आरक्षण सन २००० तक चलाया जाये और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की कसौटी आर्थिक हो तथा प्रत्येक ५ वर्ष पर इस पर पुनर्विचार हो .
  भारत संघ बनाम वीरपाल चौहान [१९९५ ] ६ एस.सी.सी.६३४ में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया ''कि सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति के लिए ''जाति ''को आधार बनाया जाना संविधान के अनुच्छेद १६[४] का उल्लंघन है.
    अनुच्छेद १६ के अनुसार-
         ''राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से सम्बंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी.''
  जिसका एक अपवाद १६[४] है जिसके अनुसार -
    ''राज्य पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्याधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है ,नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध कर सकता है 
   इस प्रकार खंड ४ के लागू होने की दो शर्ते हैं-
  १-वर्ग पिछड़ा हो :अर्थात सामाजिक व् शैक्षिक दृष्टि से ,
 2- उसे राज्याधीन पदों पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिल सका हो.
     केवल दूसरी शर्त ही एकमात्र कसौटी नहीं हो सकती .ऐसे में सरकारी सेवा में लगे  लोगों को पिछड़ा मानना सामाजिक रूप से उन लोगों के साथ तो अन्याय ही कहा जायेगा जो इनसे अधिक योग्यता रखकर भी सरकारी नौकरियों से वंचित हैं और इसके बाद प्रोन्नति में आरक्षण के लिए केंद्र सरकार का विधेयक लाने को तैयार होना सरकार का झुकना है और इस तरह कभी ममता बैनर्जी ,कभी करूणानिधि और कभी मायावती के आगे झुक सरकार अपनी कमजोरी ही दिखा रही है .यदि अनुसूचित जाति व् अनुसूचित जनजाति देश में विकास पाने के आकांक्षी हैं तो अन्य जातियां भी उन्नति की महत्वाकांक्षा रखती  हैं और एक लोकतंत्र तभी सफल कहा जायेगा जब वह अपने सभी नागरिकों से न्याय करे .पहले तो स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी आरक्षण लागू किया जाना ही गलत है इस पर प्रोन्नति में भी आरक्षण सरासर अन्याय  ही कहा जायेगा .यदि ये जातियां अभी तक भी पिछड़ी  हैं तो केवल नौकरी पाने तक ही सहायता ठीक है आगे बढ़ने के लिए तो इन्हें अपनी योग्यता ही साबित करनी चाहिए और सरकार को चाहिए की अपनी वोट की महत्वाकांक्षा में थोड़ी जगह  ''योग्यता की उन्नति'' को भी दे.नहीं तो योग्यता अंधेरों में धकेले जाने पर यही कहती नज़र आएगी जो ''हरी सिंह जिज्ञासु ''कह रहे हैं -'
                   ''अपने ही देश में हम पनाहगीर बन गए ,
                         गरीब गुरबां देश की जागीर बन गए ,
                   समझ नहीं आता कब बदलेगा यह परिवेश 
                          दिखाते रहे जो रास्ता राहगीर बन गए.''
                                                  शालिनी कौशिक 
                                                          [कौशल ]





बुधवार, 8 अगस्त 2012

ऑनर किलिंग:सजा-ए-मौत की दरकार नहीं


ऑनर किलिंग:सजा-ए-मौत की दरकार नहीं 


''प्रेम''जिसके विषय में शायद आज तक सबसे ज्यादा लिखा गया होगा,कहा गया होगा ,कबीर दास भी कह गए-
''ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए''
देवल आशीष कहते हैं-
''प्यार कर्म ,प्यार धर्म प्यार प्रभु नाम है.''
     प्रेम जहाँ एक ओर कवियों ,लेखकों की लेखनी का प्रिय विषय रहा है वहीँ समाज में सभ्यता की राह में कांटे की तरह महसूस किया गया है और इसी कारण प्रेमी जनों को अधिकांशतया प्रेम की कीमत बलिदान के रूप में चुकानी पड़ी है किन्तु प्रेम की भी एक सीमा होती है और जो प्रेम सीमाओं में मर्यादाओं में बंधा हो उसे बहुत सी बार सम्मान सहित स्वीकृति भी मिली है ,किन्तु आज प्रेम का एक अनोखा रूप सामने आ रहा है और इसकी परिणिति कभी भी समाज की स्वीकृति हो ही नहीं सकती क्योंकि प्रेम का यह रूप मात्र वासना का परिचायक है  इसमें प्रेम शब्द की पवित्रता का कोई स्थान नहीं है और इस प्रेम को कथित प्रेमी-प्रेमिका के परिजन कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते और इसके कारण उनकी भावनाएं इस कदर उत्तेजना का रूप ले लेती हैं जिसे ''ऑनर किलिंग ''या सम्मान के लिए हत्या कहा जाता है.
८ अगस्त २०१२ को लगभग सभी समाचार पत्रों में सुर्ख़ियों के रूप में छाये ''ऑनर किलिंग में बाप बेटे को सजा-ए-मौत ''समाचार ने एक बार फिर इस शब्द ''प्रेम''की अनैतिकता की परतों को उधेड़ा है .इस हौलनाक वारदात को अंजाम देकर फंसी की सजा पाने वाले ६६ साल के मैथलीशरण और उसके बेटे हरेन्द्र ने २८ दिसंबर २००७ की रात तीन बजे गाँव की दलित बस्ती में खली पड़े मकान में बलकटी से ताबड़तोड़ वार कर प्रेमी युगल को  मौत के घाट उतार दिया था .क़त्ल हुआ मैथलीशरण की अविवाहिता बेटी गीता[२२]और उसके घर के सामने रहने वाले विजय के शादीशुदा बेटे सुनील[३२]का .दोनों को एक साथ देखकर आपा खो बैठे मैथलीशरण ने दोनों बेटों की मदद से उनको बेरहमी से मार डाला था.
यूँ तो क़त्ल अपराध है और अपराधी को सजा हमेशा मिलनी चाहिए किन्तु ऑनर किलिंग एक ऐसा अपराध है जिसमे न्यायालय को यह हमेशा देखना होगा कि अपराधी अपराध वृति  का है या उससे ये अपराध परिस्थितिवश हो गया है .
धारा  ३०० भा .दंड .सहिंता ऐसे अपराध को हत्या कहती है जिसमे क़त्ल किया गया है किन्तु वह भी कुछ अपवादों के अध्यधीन रहकर ही -
  धारा-३०० -एतस्मिन पश्चात् अपवादित दशाओं को छोड़कर अपराधिक मानव वध हत्या है यदि वह कार्य ,जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गयी है ,मृत्यु कारित करने के आशय से की गयी हो.
          और इसी धारा के अपवाद-१ में कहा गया है -
 ''अपराधिक मानव वध हत्या नहीं है यदि अपराधी उस समय जबकि वह गंभीर व् अचानक प्रकोपन से आत्म-संयम की शक्ति से वंचित हो ,उस व्यक्ति की जिसने कि वह प्रकोपन दिया था ,मृत्यु कारित करे या किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु भूल या दुर्घटना वश कारित करे.
      उपरोक्त प्रावधान की नज़र से यदि हम देखते हैं तो हम्मे से कोई भी मैथलीशरण व् उसके बेटों की हरकत को फाँसी के काबिल नहीं मान सकता .''प्रेम ''हमेशा से समाज व् परिजनों की नज़रों में खटकता रहा है किन्तु सुनील व् गीता का सम्बन्ध प्रेम कहा ही नहीं जा सकता .अभी हाल ही में अनुराधा बाली उर्फ़ फिजा की दर्दनाक मौत ऐसे प्रेम का ही परिणाम है जिसमे किसी और से विवाहित चंद्रमोहन से प्रेम करना अनुराधा को आत्म-बलिदान के रूप में भुगतना पड़ा .कोई बाप-भाई ये नहीं चाहेगा कि उनकी बेटी -बहन जीवन में ऐसे मोड़ से गुज़रे .ऐसे में गलत स्थिति में फँसी अपनी बेटी-बहन व् उसके कथित प्रेमी के प्रति उनका वही रवैया होगा जो इनका था. 
  इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट की नज़ीर पेश की गयी हैं जिनमे ९ मई २०११ की एक नज़ीर में सुप्रीम कोर्ट ने ऑनर किलिंग को ''विरल से विरलतम''की श्रैणी में माना है और ये कहा है कि मृत्यु दंड का दंडादेश सर्वथा अपेक्षित माना जाये ताकि समाज को इस वीभत्स अत्याचार से निजात दिलाई जा सके.''और एक नज़ीर में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय''धनञ्जय चटर्जी बनाम स्टेट ऑफ़ पश्चिम बंगाल १९९४'' को प्रस्तुत किया गया जिसमे कहा गया -''कि न्यायालयों को अपराधियों के अधिकारों की चिंता से कहीं अधिक चिंता सम्पूर्ण समाज की सुरक्षा की करनी चाहिए .''
ऐसे में जो प्यार सुनील व् गीता का था क्या उसे सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से सही कहा जायेगा?इसमें या तो गीता की जिंदगी उजड्नी थी या शादीशुदा सुनील की शादीशुदा जिंदगी .ऐसे मामलों को सुप्रीम कोर्ट स्वयं ''विरल से विरलतम की श्रैणी ''नहीं दे सकती .ये मामला तो उसी तरह की श्रेणी में आता है जिसमे उच्चतम न्यायालय ने ऐसे अपराध को ''हत्या की कोटि में न आने वाले अपराधिक मानव वध माना ''है.
     उत्तर प्रदेश राज्य बनाम लखमी १९९८ में लखमी ने अपनी युवा पत्नी ओमवती जो दो बच्चों की माँ थी की हत्या की .अभियुक्त ने स्वयं स्वीकार किया कि उसकी पत्नी कि मृत्यु मानव वध है .साक्ष्य दर्शाते हैं कि जब अभियुक्त खेत से अपने घर वापिस आया तो उसने अपनी पत्नी को अन्य व्यक्ति रमे के साथ कामुकता में देखा .उसने गंभीर तथा अचानक प्रकोपन में पत्नी की हत्या की .सत्र न्यायाधीश ने उसे दोषी पाया किन्तु उच्च न्यायालय ने दोषमुक्त किया .उच्चतम न्यायालय ने भी उसे धारा ३०० के अपवाद-१ का लाभ पाने का हक़दार माना और उसकी दोषसिद्धि धारा ३०० से परिवर्तित कर धारा ३०४ के भाग १ के अधीन कर दी गयी जिसमे अधिकतम सजा आजीवन कारावास या दस वर्ष की अवधि का कारावास है .
चन्दन सिंह बनाम राजस्थान राज्य में भी राजस्थान उच्च न्यायालय ने गंभीर प्रकोपन को तथ्य का विषय माना और कहा कि न्यायालय उस वर्ग ,समुदाय व् समाज के रीति रिवाजों तथा आदतों पर विचार करेगा जिसका कि अभियुक्त सदस्य है .और ऐसे में यदि हम भारतीय समाज का आकलन करें तो ये सबके सामने है कि प्रेम को धर्म परिवर्तन द्वारा निकाह में परिवर्तित करने वाले चंद्रमोहन को फिजा उर्फ़ अनुराधा बाली को छोड़कर पत्नी के पास वापस लौटना पद गया .जिस तरह का प्रेम सुनील व् गीता कर रहे थे उसे यहाँ की फ़िल्मी दुनिया ,जिसमे धर्मेन्द्र प्रकाश कौर को छड हेमा मालिनी को अपना लेते हैं या बोनी श्रीदेवी से बांध जाते हैं में या फिर कुछ उच्चवर्गीय परिवारों में ही मान्यता मिल सकती है .आम मध्यवर्गीय भारतीय जन मानस में तो प्रेम को स्वीकृति है ही नहीं और उसपर भी ऐसे प्रेम को जिसमे कथित प्रेमी प्रेमिका पहले से ही किसी और से विवाहित हैं ऐसे प्रेम को कोई स्वीकृति यहाँ क्या कहीं भी नहीं मिल सकती.और इसका परिणाम अंतत ऑनर किलिंग के रूप में सामने आता है और मैं नहीं समझती कि ऐसे प्यार के दुश्मन समाज के दुश्मन कहें जायेंगे.किसी की जिंदगी या मौत किसी के हाथ में नहीं है ऐसे में इन्होने अपराध तो किया है किन्तु सामाजिक सुरक्षा को देखता हुए इनका कदम फांसी के फंदे की ओर नहीं बढाया जा सकता है .ये धारा ३०० के अपवाद १ के लाभ के हक़दार हैं और न्यायालय को इन सभी परिस्थितियों पर विचार अवश्य करना चाहिए .
 कविवर दुष्यंत की ये पंक्तियाँ यहाँ सही कही जाएँगी-
''कैसे मंज़र नज़र आने लगे हैं ,
  गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं ,
    अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ,
     ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं .''
                           शालिनी कौशिक 
                                [कौशल]