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कानूनन भी नारी बेवकूफ कमजोर ,पर क्या वास्तव में ?

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नारी की कोमल काया व् कोमल मन को हमारे समाज में नारी की कमजोरी व् बेवकूफी कह लें या काम दिमाग के रूप में वर्णित किये जाते हैं .नारी को लेकर तो यहाँ तक कहा जाता है कि इसका दिमाग घुटनों में होता है और नारी की यही शारीरिक व् मानसिक स्थिति है जो उसे पुरुष सत्ता के समक्ष झुके रहने को मजबूर कर देती है लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल हमारे समाज की नज़रों में ही नारी कमजोर व् बेवकूफ है बल्कि हमारा कानून भी उसे इसी श्रेणी में रखता है और कानून की नज़रें दिखाने को भारतीय दंड संहिता की ये धाराएं हमारे सामने हैं -
*धारा 493 -हर पुरुष जो किसी स्त्री को ,जो विधि पूर्वक उससे विवाहित न हो ,प्रवंचना से यह विश्वास कारित करेगा कि वह विधिपूर्वक उससे विवाहित है और इस विश्वास में उस स्त्री का अपने साथ सहवास या मैथुन कारित करेगा ,वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से ,जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी ,दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .
*धारा 497 -जो कोई ऐसे व्यक्ति के साथ ,जो कि किसी अन्य पुरुष की पत्नी है ,और जिसका किसी अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है या विश्वास करने का कारण रखता है ,उस पुरुष…

देख के जाना जेवर लेने

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आपने अक्सर देखा होगा कि आपके आस-पास के किसी सर्राफ को बाहर प्रदेश से आयी हुई पुलिस पकड़कर ले जा रही है .सर्राफों के बारे में यूँ तो सभी जानते हैं कि ये जबान के बहुत मीठे होते हैं और जब भी बोलते हैं शहद से भरे शब्द ही बोलते हैं किन्तु ये मिठास अपने में अपरध का जहर भी घोले रहती है .ये कम से कम आभूषणों के पीछे पागल बेचारी औरतों को या तो पता ही नहीं होता  या वे अपनी लालसा -आभूषणों की लालसा के पीछे अनदेखा कर देती हैं और भले ही बार-बार भी किसी सर्राफ को पुलिस पकड़कर ले गयी हो तब भी सुन्दर आभूषणों के लिए उसकी दुकान पर चढ़ ही जाती हैं .
       धारा 411 भारतीय दंड संहिता में चुराई हुई संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करने के सम्बन्ध में है .यूँ तो यह प्रत्येक उस अपराधी के अपराध को लागू होती है जिसने चोरी की गयी संपत्ति को यह जानते हुए कि वह चोरी की है ,बेईमानी से ली है किन्तु विशेष रूप से यह धारा सर्राफों पर इसलिए लागू होती है क्योंकि अधिकांशतः चोरी का सामान चोर सर्राफों पर ही जाकर बेचते हैं क्योंकि चोरी भी मुख्य रूप से सोने-चाँदी के आभूषणों की ही की जाती है -तो धारा 411 के अनुसार -
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तीन तलाक- 10 खास बातें

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1-यह मसौदा गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाले एक अंतर-मंत्री समूह ने तैयार किया है. इस में अन्य सदस्य विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, वित्त मंत्री अरुण जेटली, विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद और विधि राज्यमंत्री पीपी चौधरी थे.2-प्रस्तावित कानून एक बार में तीन तलाक या 'तलाक ए बिद्दत' पर लागू होगा और यह पीड़िता को अपने तथा नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांगने के लिए मजिस्ट्रेट से गुहार लगाने की शक्ति देगा.3-इसके तहत पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के संरक्षण का भी अनुरोध कर सकती है और मजिस्ट्रेट इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करेंगे.4-मसौदा कानून के तहत, किसी भी तरह का तीन तलाक (बोलकर, लिखकर या ईमेल, एसएमएस और व्हाट्सएप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से) गैरकानूनी होगा.5-मसौदा कानून के अनुसार, एक बार में तीन तलाक गैरकानूनी और शून्य होगा और ऐसा करने वाले पति को तीन साल के कारावास की सजा हो सकती है. यह गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध होगा.6-प्रस्तावित कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होना है.7-तलाक और विवाह का विषय संविधान की समवर्ती सूची में आता है और सरकार आपातकालीन स्थि…

एमपी सरकार का ऐतिहासिक फैसला, बच्ची से रेप पर फांसी की सजा

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एमपी सरकार का ऐतिहासिक फैसला, 12 साल से कम उम्र की बच्ची से रेप पर फांसी की सजा बच्‍ची से रेप के मामले में मध्यप्रदेश की सरकार ने कैबिनेट में एक एतिहासिक प्रस्ताव पास किया है। जिसके तहत 12 साल से कम उम्र की बच्‍ची के साथ रेप करने का दोषी पाए जाने पर गुनहगारों को मौत की सजा दी जाएगी। रेप के मामलों में इस तरह का सख्त कानून बनाने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है।  रविवार कोमध्यप्रदेश में कैबिनेट में यह प्रस्ताव पास किया गया है। इस प्रस्ताव के तहत 12 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कारकरने के दोषी को मौत की सजा देने का प्रावधान किया गया है।।यह सजा गैंगरेप वाले मामले में भी लागू होगी। इस मामले में सजा और जुर्माना दोनों ही होगा।  बच्चियों से रेप के मामलों में देशभर में लगातार वृद्िध हो रही है। ऐसे में लंबे समय से इस मामले में सख्त कानून बनाए जाने की मांग चल रही थी। मध्यप्रदेश में इस तरह के कई मामले सामने आए थे, इसी कड़ी में अब सरकार ने इस संबंध में कानून बनाने का फैसला किया। जिसके चलते आज मध्यप्रदेश कैबनेट ने यह फैसला लिया। [साभार अमर उजाला ] शालिनी कौशिक  [कानूनी ज्ञान ]

संविधान दिवस (भारत)

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किसी भी संशोधन से पहले भारतीय संविधान की प्रस्तावना के मूल पाठ
संविधान दिवस (26 नवम्बर) भारत गणराज्य का संविधान26 नवम्बर 1949 को बनकर तैयार हुआ था। संविधान सभा के निर्मात्री समिति के अध्यक्ष डॉ॰ भीमराव आंबेडकर के 125वें जयंती वर्ष के रूप में 26 नवम्बर 2015 को संविधान दिवस मनाया गया। डॉ॰ भीमराव आंबेडकर जी ने भारत के महान संविधान को 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में 26 नवम्बर 1949 को पूरा कर राष्ट्र को समर्पित किया।[1] गणतंत्र भारत में 26 जनवरी 1950 से संविधान अमल में लाया गया। आंबेडकरवादी और बौद्ध लोगों द्वारा कई दशकों पूर्व से ‘संविधान दिवस’ मनाया जाता है। भारत सरकार द्वारा पहली बार 2015 से डॉ॰ भीमराव आंबेडकर के इस महान योगदान के रूप में 26 नवम्बर को "संविधान दिवस" मनाया गया।[2][3] 26 नवंबर का दिन संविधान के महत्व का प्रसार करने और डॉ॰ भीमराव आंबेडकर के विचारों और अवधारणाओं का प्रसार करने के लिए चुना गया था।[4] [मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से]
शालिनी कौशिक  [कानूनी ज्ञान ]

तलाक़ ऐसे भी ...

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तलाक कहूं या विवाह -विच्छेद ,बहुत दुखद होता है किन्तु बहुत सी शादियां ऐसी होती हैं जिनमे अगर तलाक न हो तो न पति जी सकता है और न पत्नी ,बच्चों के तो कहने ही क्या ,ऐसे में तलाक आवश्यक हो जाता है .हिन्दू विधि में तलाक के बहुत से ढंग कानून ने दिए हैं किन्तु उनमे बहुत सी बार इतना समय लग जाता है कि आदमी हो या औरत ज़िंदगी का सत्यानाश ही हो जाता है इसीलिए बहुत सी बार पति या पत्नी में से कोई भी इन तरीको को अपना कर दूसरे को परेशान करने के लिए इन्ही का सहारा लेता है लेकिन जहाँ सद्भावना होती है और सही रूप में ये सोचते हैं कि हमारे अलग होने में ही भलाई है वहां विवाह-विच्छेद का एक और तरीका भी है और वह है -''पारस्परिक सहमति से विवाह-विच्छेद ''
         हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा १३-ख पारस्परिक सहमति द्वारा विवाह-विच्छेद के बारे में प्रावधान करती है .इसमें कहा गया है -
''इस अधिनियम के प्रावधानों के अधीन रहते हुए या दोनी पक्षकार मिलकर विवाह-विच्छेद की डिक्री विवाह के विघटन के लिए याचिका जिला न्यायालय में ,चाहे ऐसा विवाह ,विवाह विधि[ संशोधन ]अधिनियम ,१९७६ के प्रारम्भ  के …

डी.जे. बंद .........

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मृतक का आश्रित :अनुकम्पा नियुक्ति

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अभी लगभग १ वर्ष पूर्व हमारे क्षेत्र के एक व्यक्ति का देहांत हो गया .मृतक सरकारी कर्मचारी था और मरते वक्त उसकी नौकरी की अवधि शेष थी इसलिए मृतक आश्रित का प्रश्न उठा .यूँ तो ,निश्चित रूप से उसकी पत्नी आश्रित की अनुकम्पा पाने की हक़दार थी लेकिन क्योंकि मृतक ने पहले ही वह नौकरी अपने पिता के मृतक आश्रित के रूप में प्राप्त की थी इसलिए मृतक की बहन भी मृतक आश्रित के रूप में आगे आ गयी .मृतक की बहन के मृतक आश्रित के रूप में आगे आने का एक कारण और भी था और वह था इलाहाबाद हाईकोर्ट का ११ फरवरी २०१५ को दिया गया फैसला जिसमे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना था ''परिवार की परिभाषा में भाई-बहन-विधवा माँ भी ".
        इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मृतक आश्रित अनुकम्पा नियुक्ति 1974 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि वर्ष २००१ में हुए संशोधन के बाद ''परिवार'' का दायरा बढ़ा दिया गया है .इसके अनुसार यदि मृत कर्मचारी अविवाहित था और भाई-बहन व् विधवा माँ उस पर आश्रित थे तो वह परिवार की परिभाषा में आते हैं .वह अनुकम्पा आधार पर नियुक्ति पाने के हक़दार हैं .
          मुख्य न्यायाधीश डॉ.डी.वाई .चं…

हाय रे! क्रूरता पर भी भरण-पोषण

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पति द्वारा क्रूरता से तो सभी वाकिफ हैं और उसके परिणाम में पति को सजा ही सजा मिलती है किन्तु आनंद में तो पत्नी है जो क्रूरता भी करती है तो भी सजा की भागी नहीं होती उसकी सजा मात्र इतनी कि उसके पति को उससे तलाक मिल सकता है किन्तु नारी-पुरुष समानता के इस युग में पारिवारिक संबंधों के मामले में पुरुष समानता की स्थिति में नहीं है .
     2016  [1 ] D .N .R .[D .O .C .-11 ]17 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि हिन्दू विवाह अधिनियम 1955  की धारा 13  के अंतर्गत क्रूरता के आधार पर पति भी अपनी पत्नी से तलाक ले सकता है .
       इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उपरोक्त वाद में पत्नी द्वारा पति के विरूद्ध कई दाण्डिक एवं सिविल प्रकरणों का दाखिल किया जाना क्रूरता माना और इस आधार पर पति को पत्नी से तलाक लेने का अधिकारी मानते हुए कहा कि ऐसी क्रूरता के आधार पर तलाक की डिक्री पारित की जा सकती है ,साथ ही यह भी कहा कि ऐसे में यदि तलाक की डिक्री पारित की जाती है तो पति को पत्नी को स्थायी निर्वाह व्यय देना होगा .इस तरह इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तलाक की डिक्री के विरूद्ध अपील को ख़ारिज किया लेकिन पति को निर्देशित कि…

विवाह-विच्छेद व् हिन्दू-मुस्लिम महिलाएं

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आज मैं आप सभी को जिस विषय में बताने जा रही हूँ उस विषय पर बात करना भारतीय परंपरा में कोई उचित नहीं समझता क्योंकि मनु के अनुसार कन्या एक बार ही दान दी जाती है किन्तु जैसे जैसे समय पलटा वैसे वैसे ये स्थितियां भी परिवर्तित हो गयी .महिलाओं ने इन प्रथाओं के कारण [प्रथाओं ही कहूँगी कुप्रथा नहीं क्योंकि कितने ही घर इन प्रथाओं ने बचाएं भी हैं] बहुत कष्ट भोगा है .हिन्दू व मुस्लिम महिलाओं के अधिकार इस सम्बन्ध में अलग-अलग हैं .
सर्वप्रथम हम मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं.पहले मुस्लिम महिलाओं को तलाक के केवल दो अधिकार प्राप्त थे १-पति की नपुन्संकता,२-परपुरुशगमन का झूठा आरोप[लियन]
किन्तु न्यायिक विवाह-विच्छेद [मुस्लिम विवाह-विच्छेद  अधिनियम१९३९]द्वारा मुस्लिम महिलाओं को ९ आधार प्राप्त हो गए हैं:
१-पति की अनुपस्थिति,
२-पत्नी के भरण-पोषण में असफलता,
३-पति को सात साल के कारावास की सजा,
४-दांपत्य दायित्वों के पालन में असफलता,
५-पति की नपुन्संकता,
६-पति का पागलपन,
७-पत्नी द्वारा विवाह की अस्वीकृति[यदि विवाह के समय लड़की १५ वर्ष से कम  उम्र की हो तो वह १८ वर्ष की होने से पूर्व विवाह को अस्वीकृत  कर …

कामकाजी महिलाएं और कानून

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आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है .
कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं कर…

YOUR PROPERTY:YOUR DUTY

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हमारे घर के पास अभी हाल ही में एक मकान बना है .अभी तो उसकी पुताई का काम होकर निबटा ही था कि क्या देखती हूँ कि उस पर एक किसी ''शादी विवाह ,पैम्फलेट आदि बनाना के विज्ञापन चिपक गया .बहुत अफ़सोस हो रहा था कि आखिर लोग मानते क्यों नहीं ?क्यूं नई दीवार पर पोस्टर लगाकर उसे गन्दा कर देते हैं ?
यही नहीं हमारे घर से कुछ दूर एक आटा चक्की है और जब वह चलती है तो उसके चलने से आस-पास के सभी घरों में कुछ हिलने जैसा महसूस होता है .मुझे ये भी लगता है कि जब हमारे घर के पास रूकती कोई कार हमारे सिर में दर्द कर देती है तब क्या चक्की का चलना आस-पास वालों के लिए सिर दर्द नहीं है ?फिर वे क्यूं कोई कार्यवाही नहीं करते ?
मेरे इन सभी प्रश्नों के उत्तर मेरी बहन मुझे देती है कि पहले तो लोग जानते ही नहीं कि उनके इस सम्बन्ध में भी कोई अधिकार हैं और दूसरे  ये कि लोग कानूनी कार्यवाही के चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहते क्योंकि ये बहुत लम्बी व् खर्चीली हैं किन्तु ये तो समस्या का समाधान नहीं है इस तरह तो हम हर जगह अपने को झुकने पर मजबूर कर देते हैं और चलिए थोड़ी देर कोई मशीनरी चलनी हो तो बर्दाश्त की जा सकती है किन्तु …

पट्टा-लाइसेंस और मानस जायसवाल

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मेरी पिछली पोस्ट ''पारिवारिक निपटान आलेख और मानस जायसवाल ''में मानस जायसवाल जी ने एक प्रश्न और पूछा था ,जो कुछ इस प्रकार था -
धन्यवाद शालिनी जी, अभी भी एक सवाल बाकी है | अपने वाद के अनुसार पूछता हूँ|
पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए 3 भाई एक नए शहर में बस गए| उन्होंने खुली नीलामी में अलग अलग कई संपतियां प्राप्त की, जो सभी 33x3 वर्ष की लीज पर प्राप्त हुई| इनमें से 2 भाइयों ने साझे नाम से भी 2-3 संपतियां प्राप्त की| अधिकतर प्लाट इन्होने शुरू के 12-15 सालों में विक्रय कर दिए| 
इन दो भाइयों में से एक ने अपने तन्हा नाम से प्राप्त एक प्लाट में अपने परिवार के साथ रिहाईश शुरू की, और दुसरे को भी उसके एक भाग में रहने के लिए बुला लिया (जिसे लाइसेंस का नाम दिया गया) | दुसरे भाई की मृत्यु १९७३ में हो गई (पर उसकी विधवा के नाम लाइसेंस जारी रहा) और उसके बाद २०१५ तक जारी रहा| इस बीच पहले भाई, दुसरे भाई की पत्नी और उसके पुत्रों की भी मृत्यु हो चुकी थी (लेकिन लाइसेंस जारी रहा)| 
उक्त प्लाट की पहले ३३ वर्ष की लीज 1989 में समाप्त होने बाद दोबारा नहीं बड़ी| २०१२ में सरकार की फ्री होल्ड नीति आ…

पारिवारिक निपटान आलेख और मानस जायसवाल

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पूर्व आलेख ' 'मेमोरेंडम ऑफ़ फॅमिली सेटलमेंट-पारिवारिक निपटान के ज्ञापन का महत्व '' को लेकर पाठकों की उत्साहवर्धक टिप्पणी प्राप्त हुई लेकिन इसके साथ ही एक पाठक ''श्री मानस जायसवाल'' जी के तो कई प्रश्न थे जिनके निवारण हेतु मैं एक नयी  पोस्ट आप सभी से साझा कर रही हूँ .पहले श्री मानस जायसवाल जी की टिप्पणी-
बहुत ही उपयोगी लेख|
लेकिन क्या ऐसे "जुबानी खानदानी बंटवारे का यादाश्तनामा" लिखित में बनने के बाद इसको लागू कराने की कोई समयसीमा होती है ??
क्या इसे रजिस्टर्ड कराना ज़रूरी है?
क्या इसमें सभी सम्पतियों का हवाला होना ज़रूरी है?
इस नाम के अग्रीमेंट को हम "Family Settlement" कहेंगे या "Family Partition Deed"
तो आप सभी की जानकारी के लिए बता दूँ कि बहुत सी बार घर में अपनेआप हिस्से बांटकर रहना आरम्भ कर देते हैं तब बाद में ये याद रहे कि हमने क्या बाँटा है इसे एक कागज पर लिख लेते हैं ये कागज सादा  भी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता पर इस पर घर से बाहर के कम से कम दो लोगों के हस्ताक्षर होने चाहियें और इस पर सभी हिस्सेदारों के हस्ताक्षर भी होने च…

मेमोरेंडम ऑफ़ फैमिली सेटलमेंट ''पारिवारिक निपटान के ज्ञापन '' का महत्व

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संपत्ति का विभाजन हमेशा से ही लोगों के लिए सरदर्द रहा है और कलह,खून-खराबे का भी इसीलिए घर के बड़े-बुजुर्ग हमेशा से इसी कोशिश में रहे हैं कि यह दुखदायी कार्य हमारे सामने ही हो जाये .इस सबमेँ करार का बहुत महत्व रहा है .करार पहले लोग मौखिक भी कर लेते थे और कुछ समझदार लोग वकीलों से सलाह लेकर लिखित भी करते थे लेकिन धीरे धीरे जैसे धोखाधड़ी बढ़ती चली गयी वैसे ही करार का लिखित होना और निश्चित कीमत के स्टाम्प पर होना ज़रूरी सा हो गया .अब लगभग सभी करार सौ रूपये के स्टाम्प पर होते हैं क्योंकि सौ रूपये के स्टाम्प पर होने से करार का रजिस्टर्ड होना आसान हो जाता है .लेकिन इस सबके साथ एक बात यह भी है कि अब भी बहुत से करार ऐसे किये जा सकते हैं जो लिख भी लिए जाएँ और उनका रजिस्टर्ड होना ज़रूरी भी न हो .वैसे भी रजिस्ट्रेशन एक्ट ,१९०८ की धारा १७[२] कहती है कि
''१७[२][i ] किसी भी समझौता अभिलेख का रजिस्ट्रेशन ज़रूरी नहीं है ''
किन्तु ऐसा नहीं है कि इस धारा को मानकर आप सभी जगह समझौते को रजिस्टर्ड कराने से बचें .वास्तव में मैं यहाँ पारिवारिक समझौते से विभाजन की बात कर रही हूँ जिसके लिए कहा गया है क…

उत्तर प्रदेश तहसील दिवस :एक धोखा

हर महीने के पहले और तीसरे मंगलवार को उत्तर प्रदेश के हर जिले में हर तहसील पर तहसील दिवस आयोजित किया जाता है .जिसमे कभी जिला मजिस्ट्रेट तो कभी उप-जिला मजिस्ट्रेट उपस्थित हो लोगों की समस्याओं को सुनते हैं और उनकी समस्याओं को देखते हुए तहसील स्तर के विभागों से जिन कर्मचारियों की वहां उपस्थित  होती है उन्हें लोगों की समस्याओं के समाधन हेतु निर्देश भी देते हैं .ये सब इतनी अधिकारिता से होते देख एक बार तो पीड़ित को लगता है कि अब उसकी समस्या सक्षम अधिकारी के सामने पहुँच गयी है और अब इस समस्या का समाधान निश्चित रूप से हो जायेगा और वह ये सोचकर घर आकर चैन की बंसी बजाता है .
                 लेकिन सच्चाई कुछ और है और जो केवल वही बता सकता है जो कम से कम एक बार तो तहसील दिवस में अपनी समस्या लेकर गया हो और मैं उन्हीं लोगों में से एक हूँ जो तीन  बार तहसील दिवस में अपनी समस्या लेकर गई हूँ  और निराशा ही हाथ लेकर आयी हूँ मेरी समस्या क्या है कोई बहुत व्यक्तिगत नहीं है बल्कि सार्वजानिक है और जिसके लिए मैं अकेले नगरपालिका कांधला द्वारा उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम १९१६ में धारा ७ में दिए गए उनके अ…