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गुरुवार, 29 जनवरी 2015

...आखिर न्याय पर पुरुषों का भी हक़ है .





दैनिक जनवाणी से साभार 

[False dowry case? Man kills self
Express news service Posted: Feb 07, 2008 at 0321 hrs
Lucknow, February 6 A 30-year-old man, Pushkar Singh, committed suicide by hanging himself from a ceiling fan at his home in Jankipuram area of Vikas Nagar, on Wednesday.In a suicide note, addressed to the Allahabad High Court, Singh alleges that he was framed in a dowry case by his wife Vinita and her relatives, due to which he had to spend time in judicial custody for four months.
The Vikas Nagar police registered a case later in the day.
“During the investigation, if we find it necessary to question Vinita, we will definitely record her statement,” said BP Singh, Station Officer, Vikas Nagar.
Pleading innocence and holding his wife responsible for the extreme step he was taking, Singh’s note states: “I was sent to jail after a false dowry case was lodged against me by Vinita and her family, who had demanded Rs 14 lakh as a compensation. Neither my father nor I had seen such a big amount in our lives. We even sold our house to contest the case.”
According to reports, Singh married Vinita about two years ago and lived in Allahabad since.
Early last year, his wife left him and started living with her family.
A case under Sections 323 (voluntarily causing hurt), 498 (A) (cruelty by husband or relatives of husband) and 504 (intentional insult) was lodged by Vinita and her relatives before she left him.
In the note, Singh wrote he was in the Naini Central Jail from “September 29 to December 24, 2007”.
Shishupal Singh, Singh's brother-in-law, said he was disturbed ever since he released from jail. The court case constantly haunted him.
“After he was bailed out, he was living with his mother, younger sister and a physically-challenged brother in a rented house in Jankipuram.” The family had their own house in Indira Nagar, which was recently sold to meet the legal expenses, he added.
“While he searched for a job, he drove a three-wheeler for a living. A few days ago, he received a notice from the court and since then, he stopped stepping out of the house,” he said.
In the note, Singh further wrote: “I would also like to request Vinita not to harass my family in future. It was my mistake to marry her and I am repenting it by sacrificing my life.”]

''मुझे दहेज़ कानून की धारा ४९८-ए,३२३ और ५०४ के तहत जेल जाना पड़ा ,मेरी पत्नी विनीता ने शादी के 2 साल बाद हमारे परिवार के खिलाफ दहेज़ के रूप में 14 लाख रुपये मांगने का झूठा मुकदमा लिखाया था .इतनी रकम कभी मेरे पिता ने नहीं कमाई ,मैं इतना पैसा मांगने के बारे में कभी सोच भी नहीं सकता था ,मेरी भी बहने हैं ,इस मुक़दमे के चलते मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया है ,हम आर्थिक तंगी के शिकार हो गए ,मकान बिक गया ,अब मैं ज़िंदा नहीं रहना चाहता हूँ ख़ुदकुशी करना चाहता हूँ ,मेरी मौत के लिए मेरी ससुराल के लोग जिम्मेदार होंगे .''
       ये था उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के जानकीपुरम सेक्टर -सी में रहने वाले पुष्कर सिंह का ख़ुदकुशी से पहले लिखा गया पत्र ,जिसे लिखने के बाद ६ फरवरी २००८ को पुष्कर ने फांसी का फंदा गले में डाल कर ख़ुदकुशी कर ली .
       
     ये दोनों ही मामले ऐसे हैं जो संविधान द्वारा दिए गए प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के मूल अधिकार से एक हद तक पुरुष जाति को वंचित करते हैं .पुरुषों ने महिलाओं पर अत्याचार किये हैं ,उनके साथ बर्बर व्यवहार किये हैं किन्तु ये आंकड़ा अधिकांशतया होते हुए भी पूर्णतया के दायरे में नहीं आता .अधिकांश पुरुषों ने अधिकांश महिलाओं के जीवन को कष्ट पहुँचाया है किन्तु इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि सभी पुरुषों ने महिलाओं को कष्ट पहुँचाया है .अधिकांश महिलाएं पुरुषों के द्वारा पीड़ित रही हैं किन्तु इस बात से ये तो नहीं कहा जा सकता कि सभी महिलाएं पुरुषों के द्वारा पीड़ित रही हैं और इसीलिए अधिकांश के किये की सजा अगर सभी को दी जाती है तो ये कैसे कहा जा सकता है कि संविधान द्वारा सभी को जीने का अधिकार दिया जा रहा है .जीने का अधिकार भी वह जिसके बारे में स्वयं संविधान के संरक्षक उच्चतम न्यायालय ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९७८ एस.सी.५९७ में कहा है -
''प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुए जीने का अधिकार है .''
 फ्रेंसिसी कोरेली बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९८१ एस.सी. ७४६ में इसी निर्णय का अनुसरण करते हुए उच्चतम न्यायालय  ने कहा -''अनुच्छेद २१ के अधीन प्राण शब्द से तात्पर्य पशुवत जीवन से नहीं वरन मानव जीवन से है इसका भौतिक अस्तित्व ही नहीं वरन आध्यात्मिक अस्तित्व है .प्राण का अधिकार शरीर के अंगों की संरक्षा तक ही सीमित नहीं है जिससे जीवन का आनंद मिलता है या आत्मा वही जीवन से संपर्क स्थापित करती है वरन इसमें मानव गरिमा के साथ  जीने का अधिकार भी सम्मिलित है जो मानव जीवन को पूर्ण बनाने के लिए आवश्यक है .''
     और ऐसे मामले जहाँ कानून से मिली छूट के आधार पर शादी के सात साल के अंदर के विवाह को दहेज़ से जोड़ देना और नारी के द्वारा स्वयं ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने पर पुरुष से धिक्कार पाने पर उसे बलात्कार के प्रयास का रूप दे दिया जाना सीधे तौर पर पुरुष की गरिमा पर ,जीने के अधिकार पर हमले कहें जायेंगें क्योंकि इन मामलों में नारी का पक्ष न्यायालय के सामने मजबूत रहता है और एक यह पक्ष भी न्यायालय के सामने रहता है कि नारी ऐसे मामलों में शिकायत की पहल नहीं करती है और इसका खामियाजा पुरुषों को भुगतना पड़ता है .ऐसे मामलों में सबूतों ,गवाहों की कमी यदि महिलाओं को रहती है तो पुरुषों को भी इसका सामना करना पड़ता है और अपने मामलों को साबित करना दोनों के लिए ही कठिन हो जाता है किन्तु महिला के लिए न्यायालय का कोमल रुख यहाँ पुरुषों के लिए और भी बड़ी कठिनाई बन कर उभरता है .यूँ तो अधिकांशतया नारियों पर ही अत्याचार होते हैं किन्तु जहाँ एक तरफ ख़राब चरित्र के पुरुष हैं वहीँ ख़राब चरित्र की नारियां भी हैं और इसका फायदा वे ले जाती हैं क्योंकि ख़राब चरित्र का पुरुष ऐसे जाल में नहीं फंसता वह पहले से ही अपने बचाव के उपाय किये रहता है जबकि अच्छे चरित्र का पुरुष उन बातों के बारे में सोच भी नहीं पाता जो इस तरह की तिकड़मबाज नारियां सोचे रहती हैं और अमल में लाती हैं .
       जैसे कि हमारे ही एक परिचित के लड़के से ब्याही लड़की विवाह के कुछ समय तो अपनी ससुराल में रही और बाद में अपने मायके चली गयी और वहां से ये बात पक्की करके ही ससुराल में आई कि लड़का ससुराल से अलग घर लेकर रहेगा .लड़के के अलग रहने पर वह आई और कुछ समय रही और बाद में एक दिन जब लड़का कहीं बाहर गया था तो घर से अपना सामान उठाकर अपने भाइयों के साथ चली गयी और अपने घर जाकर अपने पति पर दहेज़ का मुकदमा दायर कर दिया ,सबसे अलग रहने के बावजूद घर के अन्य सभी को भी पति के साथ ४९८-ए के अंतर्गत क्रूरता के घेरे में ले लिया .स्थिति ये आ गयी कि लड़के के मुंह से यह निकल गया -''कि बस अब तो ऊपर जाने का मन करता है .''वह तो बस भगवान की कृपा कही जाएगी या फिर उसके घरवालों का साथ कि अपनी कोई जमीन बेचकर उन्होंने लड़की वालों को १० लाख रूपये दिए और लड़के को ख़ुदकुशी और खुद को जेल जाने से बचाया किन्तु अफ़सोस यही रहा कि कानून कहीं भी साथ में खड़ा नज़र नहीं आया .
        ऐसे ही ये बलात्कार या बलात्कार का प्रयास का आरोप है जिसमे या तो लम्बी कानूनी कार्यवाही या लम्बी जेल और या फिर ख़ुदकुशी ही बहुत सी बार निर्दोष चरित्रवान पुरुषों का भाग्य बनती है .हमारी जानकारी के ही एक महोदय का अपनी संपत्ति को लेकर एक महिला से दीवानी मुकदमा चल रहा है और वह महिला जब अपने सारे हथकंडे आज़मा कर भी उन्हें मुक़दमे में पीछे न हटा पायी तो उसने वह हथकंडा चला जिसे सभ्य समाज की कोई भी महिला कभी भी नहीं आज़माएगी .उसने इन महोदय के एकमात्र पुत्र पर जो कि उससे लगभग १५ साल छोटा होगा ,पर यह आरोप लगा दिया कि उसने मेरे घर में घुसकर मेरे साथ 'बलात्कार का प्रयास 'किया .वह तो इन महोदय का साथ समाज के लोगों ने दिया और कुछ राजनीतिक रिश्तेदारी ने जो इनका एकमात्र पुत्र जेल जाने से बच गया और उसका जीवन तबाह होने से बच गया किन्तु कानून के नारी के प्रति कोमल रुख ने इस नारी के हौसलों को ,जितने दिन भी वह इन्हें इस तरह परेशान रख सकी से इतने बुलंद कर दिए कि वह आये दिन जिस किसी से भी उसका कोई विवाद होता है उसे बलात्कार का प्रयास का आरोप लगाने की ही धमकी देती है और कानून कहीं भी उसके खिलाफ खड़ा नहीं होता बल्कि उसे और भी ज्यादा छूट देता है .भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा १४६[३] में अधिनियम संख्या ४ सं २००३ द्वारा परन्तुक अंतःस्थापित कर कानून ने ऐसी ही छूट दी है .जिसमे कहा गया है -
   [बशर्ते कि बलात्कार या बलात्कार करने के प्रयास के अभियोजन में अभियोक्त्री से प्रतिपरीक्षा में उसके सामान्य अनैतिक चरित्र के विषय में प्रश्नों को करने की  अनुज्ञा नहीं होगी .]
        क्या यही है कानून कि एक निर्दोष चरित्रवान मात्र इसलिए अपमानित हो ,जेल काटे कि वह एक पुरुष है .अगर बाद में कानूनी दांवपेंच के जरिये वह अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्ति पा भी लेता है तब भी क्या कानून उसके उस टुकड़े-टुकड़े हुए आत्मसम्मान की भरपाई कर पाता है जो उसे इस तरह के निराधार आरोपों से भुगतनी पड़ती है ?क्या ज़रूरी नहीं है ऐसे में गिरफ़्तारी से पहले उन मेडिकल परीक्षण ,सबूत ,गवाह आदि का लिया जाना जिससे ये साबित होता हो कि पीड़िता के साथ यदि कुछ भी गलत हुआ है तो वह उसी ने किया है जिस पर वह आरोप लगा रही है .ऐसे ही दहेज़ के मामले ,क्रूरता के मामले जिस तरह एकतरफा होकर महिला का पक्ष लेते हैं क्या ये कानून के अंतर्गत सही कहा जायेगा कि निर्दोष सजा पाये और दोषी खुला घूमता रहे .आज कितने ही मामलों में महिलाएं ही पहले घर वालों के द्वारा की गयी जबरदस्ती में शादी कर लेती हैं और बाद में उस विवाह को न निभा कर वापस आ जाती हैं और दहेज़ कानून का दुरूपयोग करती हैं .आज दिल्ली की एक अदालत ने इस बात को समझा है और इस दिशा में सही कदम उठाते हुए महिला के खिलाफ शिकायत दर्ज किये जाने की टिप्पणी की है.अपराध के इस पक्ष को सभी न्यायालयों और न्यायविदों को समझना होगा और सभी की भलाई व् सभी के लिए न्याय के लिए कानून को तैयार करना होगा, आखिर न्याय पर पुरुषों का भी हक़ है।  कानून को गंभीरता से इन मुद्दों को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों के लिए सही व्यवस्था करनी ही होगी अन्यथा इस देश में मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार पुरुषों को भी है यह बात भूलनी ही होगी .

शालिनी कौशिक 
  [कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 26 जनवरी 2015

भारतीय संविधान अपने उद्देश्य में असफल

न्यायाधिपति श्री सुब्बाराव के शब्दों में -''उद्देशिका किसी अधिनियम के मुख्य आदर्शों एवं आकांक्षाओं का उल्लेख करती है .'' इन री बेरुबारी यूनियन ,ए. आई.आर. १९६०, एस. सी. ८४५ में उच्चतम न्यायालय के अनुसार ,'' उद्देशिका संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी है .'' संविधान की रचना के समय निर्माताओं का क्या उद्देश्य था या वे किन उच्चादर्शों की स्थापना भारतीय संविधान में करना चाहते थे ,इन सबको जानने का माध्यम उद्देशिका ही होती है .हमारे संविधान की उद्देशिका इस प्रकार है -
    '' हम भारत के लोग , भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न ,समाजवादी ,पंथ निरपेक्ष ,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को -सामाजिक ,आर्थिक और राजनैतिक न्याय,विचार,अभिव्यक्ति ,विश्वास ,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता ,प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख २६ नवम्बर १९४९ को एतत्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत ,अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं .''
    और केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य [1973] में उच्चतम न्यायालय ने कहा -''कि उद्देशिका संविधान का एक भाग है .किसी साधारण अधिनियम में उद्देशिका को उतना महत्व नहीं दिया जाता है जितना कि संविधान में . मुख्य न्यायमूर्ति श्री सीकरी ने कहा -''कि हमारे संविधान की उद्देशिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और संविधान को उनमे निहित उद्दात आदर्शों के अनुरूप निर्वचन किया जाना चाहिए .''
       हमारे संविधान की उद्देशिका और उसके सम्बन्ध में केशवानंद भारती मामले में संविधान के संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय से और वर्तमान में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले ३ महीने से जारी अधिवक्ताओं की हड़ताल से उसके उद्देश्यों को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता और स्वयं संविधान द्वारा स्थापित आदर्शों में से एक आदर्श संदेह के घेरे में आ जाते हैं .उद्देशिका के अनुसार संविधान के मुख्य उद्देश्यों में से एक उद्देश्य है -
    ''न्याय -जो कि सामाजिक ,आर्थिक व् राजनैतिक सभी क्षेत्रों में मिले .''

किन्तु यदि हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हाईकोर्ट बेंच के सम्बन्ध में संविधान द्वारा निर्धारित इस उद्देश्य की गहनता से जाँच-पड़ताल करते हैं तो यह हमें कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता .
     सर्वप्रथम हम इसे सामाजिक दृष्टि से देखें तो इसके लिए हमें समाज की प्रमुख इकाई अर्थात व्यक्ति को देखना होगा और व्यक्ति अर्थात आम आदमी  ही वह पीड़ित है जो इस व्यवस्था का सर्वाधिक शिकार है .कुछ समय पूर्व प्रसिद्द दैनिक अमर उजाला ने इस सम्बन्ध में कुछ मुकदमों का ब्यौरा दिया था जो इस दुखद स्थिति को स्पष्ट करने हेतु पर्याप्त है -
* केस-१ बागपत के बिजरौल गाँव के ८० वर्षीय किसान सरजीत दो साल से हाईकोर्ट के चक्कर काट रहे हैं पुलिस ने केस में फाइनल रिपोर्ट लगा दी तो सरजीत ने इंसाफ के लिए उच्च न्यायालय में अपील की तब से उन्हें हर तारीख पर इलाहाबाद जाना पड़ता है .
* केस-२ ढिकौली गाँव के सुदेश फौजी की कहानी भी इसी तरह की है उन्होंने गाँव के दो युवकों के खिलाफ जानलेवा हमले का मुकदमा दर्ज कराया जो २००९ में  हाईकोर्ट पहुँच गया तभी से सुदेश को हाईकोर्ट के चक्कर काटने को मजबूर है .

* केस ३ रमला के नरेंद्र ने दिल्ली के चंद्रभूषण के खिलाफ २००८ में चेक बाऊन्स का मामला दर्ज कराया था .यह केस भी अपील में हाईकोर्ट पहुँच गया .नरेंद्र को हर तारीख पर सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़ता है .
   ये मामले तो महज बानगी भर हैं हकीकत तो यह है कि पश्चिमी यूपी के हर जनपद में ऐसे हजारों लोग हैं जो इंसाफ के लिए हाईकोर्ट के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं और अपना काफी कुछ गंवाकर लुट-पिट चुके हैं यहीं आ जाती है संविधान द्वारा दी गयी आर्थिक न्याय की अवधारणा संदेह की परिधि में .यहाँ की जनता से हाईकोर्ट बहुत दूर है और स्थिति ये है कि यहाँ के लोगों के लिए उच्चतम न्यायालय में न्याय के लिए जाना आसान है और उच्च न्यायालय में जाना मुश्किल और यदि हम किमी० के अनुसार आकलन करें तो -
  -बागपत से ६४० किमी ०
  -मेरठ से ६०७ किमी ०
  -बिजनौर से ६९२ किमी ०
  -मुजफ्फरनगर से ६६० किमी ०
  -सहारनपुर से ७५० किमी ०
  - गाजियाबाद से ६३० किमी ०
  -गौतमबुद्ध नगर से ६५० किमी ०
  -बुलंशहर से ५६० किमी ०
     और ऐसा नहीं है कि यहाँ बेंच की मांग मात्र दूरी के कारण होने वाली थकान से बचने के लिए की जा रही हो

बल्कि आने जाने का किराया तो ऊपर से मुकदमेबाज पर पड़ता ही है उसे आने जाने के कारण अपनी दुकान बंद करनी पड़ती है ,नौकरी से छुट्टी लेनी पड़ती है उसके कारण होने वाला आर्थिक नुकसान और वहां जाने पर आने जाने के किराये के साथ ही वहां ठहरने के लिए होटल का किराया आदि की मार भी झेलनी पड़ती है जो कि उसके साथ होने वाले आर्थिक अन्याय को बताने के लिए पर्याप्त हैं .
   अब यदि हम राजनीतिक न्याय की बात करें तो वह भी इधर की जनता को नहीं मिला .सत्तारूढ़ दल अपने सत्ता में रहते इस मुद्दे को ठन्डे बस्ते में ही डालते रहे .१९५४ में यूपी के सी.एम .सम्पूर्णानन्द जी ने पश्चिमी यूपी में बेंच के लिए केंद्र को लिखा भी किन्तु उनकी नहीं सुनी गयी .१९७९ से शुरू हुआ यह आंदोलन पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के समर्थन व् प्रसिद्द किसान नेता चौधरी चरण सिंह जी के समर्थन को पाकर भी आज तक खिंच रहा है .अब २२ नवम्बर से जारी यह हड़ताल २००० में भी ६ महीने से ऊपर चली थी किन्तु राजनीतिक दांव-पेंच इस पर हमेशा भरी पड़ते रहे हैं और यह मांग उनकी बलि चढ़ती रही है .सत्तारूढ़ दल कभी भी इसके सम्बन्ध में कदम आगे नहीं बढ़ाता जबकि सत्तारूढ़ दल के नेता भी इसके पक्ष में बोलते रहे हैं .इस बार केंद्र में भाजपा की सरकार है और इसी के एक केंद्रीय मंत्री डॉ,संजीव बालियान को भी इसके पक्ष में बोलते देखा गया है .वे स्वयं इसे ज़रूरी मानते हैं और मानते हैं कि पश्चिमी यूपी वालों के लिए तो पडोसी मुल्क पाकिस्तान की लाहौर हाईकोर्ट पास है और अपनी इलाहाबाद हाईकोर्ट दूर .
भाजपा के ही उत्तर प्रदेश में सरधना विधायक संगीत सोम ने भी २२ जनवरी २०१५ को मेरठ कचहरी स्थित नानक चंद सभागार में कहा -''कि बेंच आंदोलन का तन-मन-धन से साथ दूंगा .'' शीघ्र ही सहयोग राशि की देने की भी उन्होंने घोषणा की .आश्चर्य तो यही है कि जिनके हाथ में इसके सम्बन्ध में करने को कुछ नहीं होता वे पक्ष में बोलते हैं और जिनके हाथ में कुछ होता है वे चुप हो जाते हैं .केंद्र इस संबंध में सक्षम है तो वह इसकी गेंद उठाकर यूपी सरकार व्के इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के  पाले में डाल देता है और यूपी सरकार भी यहाँ के मुख्य न्यायाधीश के ऊपर बात डाल चुप बैठ जाती है और मुख्य न्यायाधीश जो कभी भी यहाँ के मूल निवासी नहीं होते ऊपरी तौर से देखकर और यहाँ की जनता के साथ हो रहे अन्याय को दरकिनार कर संविधान की मूल भावना सभी के साथ न्याय को न मानकर मात्र अनुच्छेद २१४ के आधार पर एक हाईकोर्ट की बात कह  इसे संविधान के खिलाफ बता वेस्ट यूपी में हाईकोर्ट बेंच से इंकार कर देते हैं .

ऐसे में यह कहना कि हमारा संविधान अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में सफल है ,बहुत कठिन है .जिस देश में अपनी सरकार होते हुए ,जायज मांग की पूर्ति के लिए जनता व् वकीलों को इस तरह भटकना पड़े वहां का संविधान अपनी स्थापना के ६६ वर्ष होने के बावजूद सफल नहीं कहा जा सकता .सफलता के लिए तो उसे अभी मीलों चलना होगा .
शालिनी कौशिक
    [एडवोकेट ]
[कानूनी ज्ञान ]







बुधवार, 21 जनवरी 2015

कन्या भ्रूणहत्या :सिर्फ शीघ्र सुनवाई हल नहीं



उच्चतम न्यायालय की खंडपीठ का कन्याभ्रूण हत्या को लेकर सुनवाई का समय निश्चित करना और लिंग अनुपात में आ रही कमी को लेकर चिंता जताना सराहनीय पहल है .आज कन्या भ्रूण हत्या जोरों पर है और लिंग-जाँच पर कानूनी रूप से प्रतिबन्ध लगाया जाना और इसे अवैध व् गैरकानूनी घोषित किया जाना भी इसे नहीं रोक पाया है और उच्चतम न्यायालय को इसे लेकर सरकार से कहना पड़ गया है -

'Laws to stop female foeticide have failed': SC to Indian govt, states


और ऐसा तब है जबकि भारत में इसे लेकर १९९४ से कानून है और प्रसवपूर्व लिंग जाँच पर सजा व् जुर्माने का प्रावधान है .
पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (PCPNDT) अधिनियम, 1994 भारत में कन्या भ्रूण हत्या और गिरते लिंगानुपात को रोकने रोकने के लिए भारत की संसद द्वारा पारित एकसंघीय कानून है। इस अधिनियम से प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक ‘पीएनडीटी’ एक्ट 1996, के तहत जन्म से पूर्व शिशु के लिंग की जांच पर पाबंदी है। ऐसे में अल्ट्रासाउंड या अल्ट्रासोनोग्राफी कराने वाले जोड़े या करने वाले डाक्टर, लैब कर्मी को तीन से पांच साल सजा और 10 से 50 हजार जुर्माने की सजा का प्रावधान है।[1]


  कानून होते हुए देश में कन्या भ्रूण हत्या में वृद्धि नारी जाति के अनुपात में कमी आने के कारण तो चिंता का विषय है ही यह समूची सभ्यता के डगमगाने की भी स्थिति है और इसके लिए देश में जनता के मन में कानून का डर होना ज़रूरी है क्योंकि ऐसा सोचना कि जनता इस कानून को नहीं जानती ,गलत होगा वह तो इन्हें अल्ट्रासाउंड केंद्र पर जाते ही पता चल जाता है किन्तु अपने सिर से लड़की का बोझ उतारने को ये कानून का उल्लंघन करने से भी बाज नहीं आते और यह दुस्साहस इनमे भरते हैं अल्ट्रासाउंड सेंटर चलाने वाले जो स्वयं के हाथों में कानून को खिलौना समझते हैं और अपनी बहादुरी दिखाकर कन्या का जीवन इस दुनिया में आने से पहले ही समाप्त कर देते हैं .इसलिए इस सम्बन्ध में मुकदमों की सुनवाई में शीघ्रता लाने के साथ साथ कानून का डर भी जनता के दिलो-दिमाग पर हावी करना ही होगा तभी इस हत्या को रोकना संभव हो पायेगा .

PUBLISHED IN CYBER WORLD OF JANAVANI ON 23.1.2015
शालिनी कौशिक
 [  कानूनी ज्ञान ]    

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

मुख़्तार अब्बास नकवी को मिला फायदा


Union Minister of State for Minority Affairs Mukhtar Abbas Naqvi. File photo.
Union Minister of State for Parliamentary and Minority Affairs Mukhtar Abbas Naqvi was sentenced to a one-year jail term after he and 19 others were convicted by a Rampur court for breaching prohibitory orders in the run-up to the 2009 Lok Sabha election.

The Minister was later granted bail.

Judicial magistrate Manish Kumar pronounced Mr. Naqvi guilty under Sections 143 (unlawful assembly), 341 (wrongful restraint) and 342 (wrongful confinement) of the Indian Penal Code, Section 7 of the Criminal Law Amendment Act and Section 144 of the Cr.PC.
केंद्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी को सजा भी हुई और हाथ की हाथ जमानत भी मिल गयी .
भारतीय दंड संहिता की धारा १४३ संज्ञेय है और जमानतीय भी किन्तु इसमें ६ महीने के कारावास की सजा भी दोषी पाये जाने पर मिलती है .
भारतीय दंड संहिता की धारा ३४१ संज्ञेय है और जमानतीय भी किन्तु इसमें भी दोषी पाये जाने पर १ महीने के कारावास की सजा का प्रावधान है .
और भारतीय दंड संहिता की धारा ३४२ भी संज्ञेय है और जमानतीय भी और इसमें भी दोषी पाये जाने पर १ वर्ष की सजा का प्रावधान है .
और यहाँ हमारे केंद्रीय मंत्री के खिलाफ जो सजा का आदेश हुआ है उसे राजनीति से प्रेरित कहा जा रहा है जबकि उन्हें यहाँ राजनीतिज्ञ होने कही फायदा मिला है जो कारावास के स्थान पर जमानत मिल गयी है .

शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

रविवार, 11 जनवरी 2015

जनता को हाईकोर्ट बेंच दे





बेंच को लेकर वकीलों की तालाबंदी,कचहरी गेट पर दिया धरना ,इलाहाबाद बार का पुतला फूंका ,वकीलों से झड़पें ऐसी सुर्खियां समाचारपत्रों की १९७९ से बनती रही हैं और अभी आगे भी बनते रहने की सम्भावना स्वयं हमारी अच्छे दिन लाने वाली सरकार ने स्पष्ट कर दी है क्योंकि केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के पत्र पर बेंच गठन के लिए बनी कमेटी को ही भंग कर दिया गया है .
   पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच हमेशा से राजनैतिक कुचक्र का शिकार बनती रही है और किसी भी दल की सरकार आ जाये इस मुद्दे पर अपने वोट बैंक को बनाये रखने के लिए इसे ठन्डे बस्ते में डालती रही है और इसका शिकार बनती रही है यहाँ की जनता ,जिसे या तो अपने मुक़दमे को लड़ने के लिए अपने सारे कामकाज छोड़कर अपने घर से इतनी दूर कई दिनों के लिए जाना पड़ता है या फिर अपना मुकदमा लड़ने के विचार ही छोड़ देना पड़ता है .
  वकील इस मुद्दे को लेकर जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं और जनता इस बात से अभी तक या तो अनभिज्ञ है या कहें कि वह अपनी अनभिज्ञता  को छोड़ना ही नहीं चाहती जबकि यह हड़ताल उन्हें हर तरह से नुकसान पहुंचा रही है और वे रोज़ न्यायालयों के चक्कर काटते है और वापस आ जाते हैं वकीलों पर ही नाराज़ होकर ,वे समझना ही नहीं चाहते कि हड़ताल की पूरी जिम्मेदारी हमारी सरकारों की है जो समय रहते इस मुद्दे को निबटाना ही नहीं चाहते और पूर्व के वर्चस्व को पश्चिम पर बनाये रखना चाहते हैं .साथ ही एक बात और भी सामने आई है कि सरकार जनता को बेवकूफ बनाये रखने में ही अपनी सत्ता की सुरक्षा समझती है और नहीं देखती कि न केवल जनता के समय की पैसे की बर्बादी हो रही है बल्कि इतनी दूरी के उच्च न्यायालय से जनता धोखे की शिकार भी हो रही है क्योंकि पास के न्यायालय में बैठे अधिवक्ता अपने मुवक्किल के सामने होते हैं और उन्हें मुक़दमे के संबंध में अपनी प्रतिबद्धता अपने मुवक्किल को साबित करनी पड़ती है किन्तु ये दूरी वकील को भी उस प्रतिबद्धता से मुक्ति दे देती है .दूरी के कारण मुवक्किल उस तत्परता से वकील से मिल नहीं पाता और वकील उसका बेवकूफ बनाते रहते हैं ये मात्र कथन नहीं है सच्चाई है जो हमने स्वयं देखी है .
      पिछले 2 महीने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिवक्तागण हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की मांग को लेकर एक बार फिर से संघर्षरत हैं और ऐसा लगता है कि हड़ताल दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और सरकार की तरफ से अधिवक्ताओं की हड़ताल को लेकर कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जा रहा है जिसे देखते हुए कहा जा सके कि सरकार जनता के हित  को लेकर संजीदा है .बार बार इस तरह की हड़ताल और लगातार शनिवार को चली आ रही इसी मांग को लेकर हड़ताल का औचित्य ही अब समझ से बाहर हो गया है .
       पश्चिमी यू.पी.उत्तर प्रदेश का सबसे समृद्ध क्षेत्र है .चीनी उद्योग ,सूती वस्त्र उद्योग ,वनस्पति घी उद्योग ,चमड़ा उद्योग आदि आदि में अपनी पूरी धाक रखते हुए कृषि क्षेत्र में यह उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वाधिक राजस्व प्रदान करता है .इसके साथ ही अपराध के क्षेत्र में भी यह विश्व में अपना दबदबा रखता है .यहाँ का जिला मुजफ्फरनगर तो बीबीसी पर भी अपराध के क्षेत्र में ऊँचा नाम किये है और जिला गाजियाबाद के नाम से एक फिल्म का भी निर्माण किया गया है .यही नहीं अपराधों की राजधानी होते हुए भी यह क्षेत्र धन सम्पदा ,भूमि सम्पदा से इतना भरपूर है कि बड़े बड़े औद्योगिक घराने यहाँ अपने उद्योग स्थापित करने को उत्सुक रहते हैं और इसी क्रम में बरेली मंडल के शान्ह्जहापुर में अनिल अम्बानी ग्रुप के रिलायंस पावर ग्रुप की रोज़ा  विद्युत परियोजना में २८ दिसंबर २००९ से उत्पादन शुरू हो गया है .सरकारी नौकरी में लगे अधिकारी भले ही न्याय विभाग से हों या शिक्षा विभाग से या प्रशासनिक विभाग से ''ऊपर की कमाई'' के लिए इसी क्षेत्र में आने को लालायित रहते हैं .इतना सब होने के बावजूद यह क्षेत्र पिछड़े हुए क्षेत्रों में आता है क्योंकि जो स्थिति भारतवर्ष की अंग्रेजों ने की थी वही स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बाकी उत्तर प्रदेश ने व् हमारे भारतवर्ष ने की है .
 आज पश्चिमी यूपी में मुकदमों की स्थिति ये है कि अगर मुकदमा लड़ना बहुत ही ज़रूरी है तो चलो इलाहाबाद समझौते की गुंजाईश न हो ,मरने मिटने को ,भूखे मरने को तैयार हैं तो चलिए इलाहाबाद ,जहाँ पहले तो बागपत से ६४० किलोमीटर ,मेरठ से ६०७ किलोमीटर ,बिजनोर से ६९२ किलोमीटर ,मुजफ्फरनगर से ६६० किलोमीटर ,सहारनपुर से ७५० किलोमीटर ,गाजियाबाद से ६३० किलोमीटर ,गौतमबुद्ध नगर से ६५० किलोमीटर ,बुलंदशहर से ५६० किलोमीटर की यात्रा कर के धक्के खाकर ,पैसे लुटाकर ,समय बर्बाद कर पहुँचो फिर वहां होटलों में ठहरों ,अपने स्वास्थ्य से लापरवाही बरत नापसंदगी का खाना खाओ ,गंदगी में समय बिताओ और फिर न्याय मिले न मिले उल्टे पाँव उसी तरह घर लौट आओ .ऐसे में १९७९ से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट खंडपीठ के आन्दोलन कारियों में से आगरा के एक अधिवक्ता अनिल प्रकाश रावत जी द्वारा विधि मंत्रालय से यह जानकारी मांगी जाने पर -''कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खंडपीठ स्थापना के लिए कोई प्रस्ताव विचाराधीन है ?''पर केन्द्रीय विधि मंत्रालय के अनुसचिव के.सी.थांग कहते हैं -''जसवंत सिंह आयोग ने १९८५ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित करने की सिफारिश की थी .इसी दौरान उत्तराखंड बनने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले उत्तराखंड के अधिकार क्षेत्र में चले गए वहीँ नैनीताल में एक हाईकोर्ट की स्थापना हो गयी है .इस मामले में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय मागी गयी थी .इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश  ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की किसी शाखा की स्थापना का कोई औचित्य नहीं पाया है .''
     सवाल ये है कि क्या उत्तराखंड बनने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट से दूरी घट गयी है ?क्या नैनीताल हाईकोर्ट इधर के मामलों में दखल दे उनमे न्याय प्रदान कर रही है ?और अगर हाईकोर्ट के माननीय  मुख्य न्यायाधीश को इधर खंडपीठ की स्थापना का कोई औचित्य नज़र नहीं आता है तो क्यों?क्या घर से जाने पर यदि किसी को घर बंद करना पड़ता है तो क्या उसके लिए कोई सुरक्षा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी.में तो ये हाल है कि जब भी किसी का घर बंद हो चाहे एक दिन को ही हो चोरी हो जाती है .और क्या अपने क्षेत्र से इलाहाबाद तक के सफ़र के लिए किसी विशेष सुविधा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी. में तो आर.पी.ऍफ़.वाले ही यात्रियों को ट्रेन से धकेल देते हैं .राजेश्वर व् सरोज की घटना अभी की ही है जिसमे सरोज की जान ही चली गयी .क्या इलाहाबाद में वादकारियों के ठहराने व् खाने के लिए कोई व्यवस्था की गयी है ?जबकि वहां तो रिक्शा वाले ही होटल वालों से कमीशन खाते हैं और यात्रियों को स्वयं वहीँ ले जाते हैं .और क्या मुक़दमे लड़ने के लिए वादकारियों को वाद व्यय दिया जाता है या उनके लिए सुरक्षा का कोई इंतजाम किया जाता है ?जबकि हाल तो ये है कि दीवानी के मुक़दमे आदमी को दिवालिया कर देते हैं और फौजदारी में आदमी कभी कभी अपने परिजनों व् अपनी जान से भी हाथ धो डालता है .पश्चिमी यू.पी .की जनता को इतनी दूरी के न्याय के मामले में या तो अन्याय के आगे सिर झुकाना पड़ता है या फिर घर बार  लुटाकर न्याय की राह पर आगे बढ़ना होता है .      न्याय का क्षेत्र  यदि हाईकोर्ट व् सरकार अपनी सही भूमिका निभाएं तो बहुत हद तक जन कल्याण भी कर सकती है और न्याय भी .आम आदमी जो कि कानून की प्रक्रिया के कारण ही बहुत सी बार अन्याय  सहकर घर बैठ जाता है .यदि सरकार सही ढंग से कार्य करे तो लोग आगे बढ़ेंगे .यदि हाईकोर्ट  सरकार सही ढंग से कार्य करें .यह हमारा देश है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था है फिर हमें ही क्यों परेशानी उठानी पड़ती है ?
 अधिवक्ताओं के इस आंदोलन को लेकर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी पक्ष में थे और  प्रधानमंत्री प्रसिद्द  किसान नेता चौधरी चरण सिंह भी किन्तु किसी ने भी इस सम्बन्ध में अधिवक्ताओं का साथ नहीं दिया और यही कार्यप्रणाली आज की भाजपा सरकार अपना रही है इस पार्टी के गृह मंत्री राजनाथ सिंह पहले अधिवक्ताओं  को आश्वासन देते हैं कि यह मुद्दा सरकार के एजेंडे में है और सत्र के बाद इस पर सकारात्मक फैसला होगा और बाद में ये कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि मैंने हाईकोर्ट विभाजन समबन्धी कोई बयान नहीं दिया और यही काम हाईकोर्ट कर रही है इस  मुद्दे का सही व् सकारात्मक हल करने की बजाय वह अधिवक्ताओं को भड़का रही है और इसीलिए उसने मेरठ का क्षेत्राधिकार मुरादाबाद को सौंप दिया है परिणाम जो होना था वह ही हो रहा है अब अधिावक्ता जो जनता के हित को देखते हुए दो दिन मंगलवार व् बुद्धवार को कार्य किये जाने पर सहमत हो गए थे अब अनिश्चित कालीन हड़ताल पर चले गए हैं .किन्तु सरकार और हाईकोर्ट का अभी तक भी इस संबंध में इधर के प्रति कोई सकारात्मक  रुख दिखाई नहीं दिया है ऐसे में यह लगता ही नहीं है कि यहाँ प्रजातंत्र है हमारी सरकार है .जब अपने देश में अपनी सरकार से एक सही मांग मनवाने के लिए ३०-४० वर्षों तक संघर्ष करना पड़ेगा तब यह लगना तो मुश्किल ही है .
यदि वेस्ट यू.पी.में हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित की जाती है तब निश्चित रूप से मुक़दमे बढ़ेंगे और इनसे होने वाली आय से जो सरकारी खर्च में इस स्थापना के फलस्वरूप बढ़ोतरी हुई होगी वह तो पूरी होगी ही सरकार की आय में भी बढ़ोतरी होगी और जनता में सरकार के प्रति विश्वास भी बढेगा जो सरकार के स्थायित्व के लिए व् भविष्य में कार्य करने के लिए बहुत आवश्यक है  किन्तु पूर्व का अर्थात इलाहाबाद  का राजनीतिक प्रभाव इतना ज्यादा है कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जायेगा जिससे पश्चिम की जनता वहां से कटे और उनकी आमदनी पर प्रभाव पड़े भले ही इधर की जनता लुटती पिटती रहे   किन्तु सरकार को ये नहीं दिखता और वह रोज़ नए बहाने बनाकर इस बेंच को टालने में लगी रहती है अभी समाचार पत्रों में शीतलवाड़ आयोग की रिपोर्ट का सहारा लिया गया .
संविधान का अनुच्छेद २१४ कहता है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा और १९५४ में गठित शीतलवाड़ लॉ कमीशन ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि न्याय प्रशासनके उच्च मानदंडों को बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि हाईकोर्ट एक ही स्थान पर कार्य करे .उच्च न्यायालय द्वारा सम्पादित किये जाने वाले कार्य की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए ऐसा आवश्यक है .लेकिन जो संवैधानिक स्थिति है वह स्पष्ट तौर पर शीतलवाड़ आयोग की सलाह को हमेशा दरकिनार करती हुई दिखाई देती है .
    इलाहाबाद हाईकोर्ट की ऐसा नहीं है कि यह पहली बार किसी बेंच के सम्बन्ध में मांग हो .इलाहाबाद हाईकोर्ट की पहले से ही एक खंडपीठ लखनऊ बेंच के रूप में कार्य कर रही है ,हालाँकि यह सत्य है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ शीतलवाड़ आयोग की रिपोर्ट से पहले की है .
लेकिन सभी जगह ऐसा नहीं है .शीतलवाड़ आयोग १९५४ में गठित हुआ था और इसकी रिपोर्ट के बाद भी हाईकोर्ट की बेंच मध्य प्रदेश में व् राजस्थान में बनायीं गयी .
राजस्थान उच्च न्यायालय के पहले न्यायाधीश  कमला कांत वर्मा थे उसकी एक बेंच जयपुर में ३१ जनवरी १९७७ को स्थापित की गयी .
ऐसे ही मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय १ नवमबर १९५६ को स्थापित हुआ और इसकी दो खंडपीठ इंदौर और ग्वालियर में स्थापित की गयी .
जब संविधान में राज्य के लिए एक ही उच्च न्यायालय का प्रावधान है और अनुच्छेद २३१ के अनुसार दो या दो से अधिक राज्यों या संघ क्षेत्र के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना की जा सकती है तब ये इन राज्यों में उच्च न्यायालय की खंडपीठ क्यों स्थापित की गयी है ?
 और इसी का सहारा लेकर इलाहाबाद के वकील पश्चिमी यूपी में खंडपीठ का विरोध करते हैं तब इन्हीं की बात को ऊपर रखते हुए पश्चिमी यूपी की जायज मांग को दरकिनार करने के लिए ऐसे पुराने महत्वहीन उदाहरणों को सामने लाने का मीडिया जगत का यह प्रयास और वहां के वकीलों का पश्चिमी यूपी के वकीलों के आंदोलन को लगातार दबाने का यह प्रयत्न सिर्फ एक कुचक्र ही कहा जायेगा जिसे केवल इधर की जनता के साथ अन्याय करने के लिए ही अमल में लाया जाता है और यह कुचक्र ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है क्योंकि अबकी बार यहाँ के वकील कमर कसकर मुकाबले में आ जुटे हैं और सरकार को भी अब यह देखना होगा कि वह चालबाजी से इन्हें रोककर चालबाज़ों  का तमगा पाती है या यहाँ की जनता को हाईकोर्ट बेंच दे न्यायवादी सही रूप में कहलाने का .
वास्तविकता तो यह है कि आज ये अधिवक्ता जिस लड़ाई को लड़ रहे हैं उससे अंतिमतः फायदा जनता का ही है और जनता को भी यहाँ के अधिवक्ताओं के साथ जुड़कर चाहे प्रदेश की सरकार हो या केंद्र की अधिवक्ताओं  के कंधे से कन्धा मिलाकर अधिवक्ताओं के आंदोलन को मजबूती देनी होगी और अब जिस तरह से सरकार इस मुद्दे को टाल रही है और वकील जिस तरह से आक्रोशित हो रहे हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि ये हड़ताल अभी और बढ़ेगी और जैसे कि आज तक होता आया है वही होगा अर्थात जब तक क्रुद्ध व् आन्दोलनरत वकील हिंसा का सहारा लेते हुए मरने मारने को उतारू नहीं  होंगे जब तक ये नहीं कहेंगे ''बेंच करो या मरो '' तब तक सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगेगी .

शालिनी कौशिक
    [एडवोकेट ]

बेंच दो या हटो सरकारों




बेंच को लेकर वकीलों की तालाबंदी,कचहरी गेट पर दिया धरना ,इलाहाबाद बार का पुतला फूंका ,वकीलों से झड़पें ऐसी सुर्खियां समाचारपत्रों की १९७९ से बनती रही हैं और अभी आगे भी बनते रहने की सम्भावना स्वयं हमारी अच्छे दिन लाने वाली सरकार ने स्पष्ट कर दी है क्योंकि केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के पत्र पर बेंच गठन के लिए बनी कमेटी को ही भंग कर दिया गया है .
   पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच हमेशा से राजनैतिक कुचक्र का शिकार बनती रही है और किसी भी दल की सरकार  जाये इस मुद्दे पर अपने वोट बैंक को बनाये रखने के लिए इसे ठन्डे बस्ते में डालती रही है और इसका शिकार बनती रही है यहाँ की जनता ,जिसे या तो अपने मुक़दमे को लड़ने के लिए अपने सारे कामकाज छोड़कर अपने घर से इतनी दूर कई दिनों के लिए जाना पड़ता है या फिर अपना मुकदमा लड़ने के विचार ही छोड़ देना पड़ता है .
  वकील इस मुद्दे को लेकर जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं और जनता इस बात से अभी तक या तो अनभिज्ञ है या कहें कि वह अपनी अनभिज्ञता  को छोड़ना ही नहीं चाहती जबकि यह हड़ताल उन्हें हर तरह से नुकसान पहुंचा रही है और वे रोज़ न्यायालयों के चक्कर काटते है और वापस  जाते हैं वकीलों पर ही नाराज़ होकर ,वे समझना ही नहीं चाहते कि हड़ताल की पूरी जिम्मेदारी हमारी सरकारों की है जो समय रहते इस मुद्दे को निबटाना ही नहीं चाहते और पूर्व के वर्चस्व को पश्चिम पर बनाये रखना चाहते हैं .साथ ही एक बात और भी सामने आई है कि सरकार जनता को बेवकूफ बनाये रखने में ही अपनी सत्ता की सुरक्षा समझती है और नहीं देखती कि  केवल जनता के समय की पैसे की बर्बादी हो रही है बल्कि इतनी दूरी के उच्च न्यायालय से जनता धोखे की शिकार भी हो रही है क्योंकि पास के न्यायालय में बैठे अधिवक्ता अपने मुवक्किल के सामने होते हैं और उन्हें मुक़दमे के संबंध में अपनी प्रतिबद्धता अपने मुवक्किल को साबित करनी पड़ती है किन्तु ये दूरी वकील को भी उस प्रतिबद्धता से मुक्ति दे देती है .दूरी के कारण मुवक्किल उस तत्परता से वकील से मिल नहीं पाता और वकील उसका बेवकूफ बनाते रहते हैं ये मात्र कथन नहीं है सच्चाई है जो हमने स्वयं देखी है .
      पिछले 2 महीने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिवक्तागण हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की मांग को लेकर एक बार फिर से संघर्षरत हैं और ऐसा लगता है कि हड़ताल दिनों-दिन बढ़ती जा रही है और सरकार की तरफ से अधिवक्ताओं की हड़ताल को लेकर कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जा रहा है जिसे देखते हुए कहा जा सके कि सरकार जनता के हित  को लेकर संजीदा है .बार बार इस तरह की हड़ताल और लगातार शनिवार को चली  रही इसी मांग को लेकर हड़ताल का औचित्य ही अब समझ से बाहर हो गया है .
       पश्चिमी यू.पी.उत्तर प्रदेश का सबसे समृद्ध क्षेत्र है .चीनी उद्योग ,सूती वस्त्र उद्योग ,वनस्पति घी उद्योग ,चमड़ा उद्योग आदि आदि में अपनी पूरी धाक रखते हुए कृषि क्षेत्र में यह उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वाधिक राजस्व प्रदान करता है .इसके साथ ही अपराध के क्षेत्र में भी यह विश्व में अपना दबदबा रखता है .यहाँ का जिला मुजफ्फरनगर तो बीबीसी पर भी अपराध के क्षेत्र में ऊँचा नाम किये है और जिला गाजियाबाद के नाम से एक फिल्म का भी निर्माण किया गया है .यही नहीं अपराधों की राजधानी होते हुए भी यह क्षेत्र धन सम्पदा ,भूमि सम्पदा से इतना भरपूर है कि बड़े बड़े औद्योगिक घराने यहाँ अपने उद्योग स्थापित करने को उत्सुक रहते हैं और इसी क्रम में बरेली मंडल के शान्ह्जहापुर में अनिल अम्बानी ग्रुप के रिलायंस पावर ग्रुप की रोज़ा  विद्युत परियोजना में २८ दिसंबर २००९ से उत्पादन शुरू हो गया है .सरकारी नौकरी में लगे अधिकारी भले ही न्याय विभाग से हों या शिक्षा विभाग से या प्रशासनिक विभाग से ''ऊपर की कमाई'' के लिए इसी क्षेत्र में आने को लालायित रहते हैं .इतना सब होने के बावजूद यह क्षेत्र पिछड़े हुए क्षेत्रों में आता है क्योंकि जो स्थिति भारतवर्ष की अंग्रेजों ने की थी वही स्थिति पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बाकी उत्तर प्रदेश ने व् हमारे भारतवर्ष ने की है .
 आज पश्चिमी यूपी में मुकदमों की स्थिति ये है कि अगर मुकदमा लड़ना बहुत ही ज़रूरी है तो चलो इलाहाबाद समझौते की गुंजाईश  हो ,मरने मिटने को ,भूखे मरने को तैयार हैं तो चलिए इलाहाबाद ,जहाँ पहले तो बागपत से ६४० किलोमीटर ,मेरठ से ६०७ किलोमीटर ,बिजनोर से ६९२ किलोमीटर ,मुजफ्फरनगर से ६६० किलोमीटर ,सहारनपुर से ७५० किलोमीटर ,गाजियाबाद से ६३० किलोमीटर ,गौतमबुद्ध नगर से ६५० किलोमीटर ,बुलंदशहर से ५६० किलोमीटर की यात्रा कर के धक्के खाकर ,पैसे लुटाकर ,समय बर्बाद कर पहुँचो फिर वहां होटलों में ठहरों ,अपने स्वास्थ्य से लापरवाही बरत नापसंदगी का खाना खाओ ,गंदगी में समय बिताओ और फिर न्याय मिले  मिले उल्टे पाँव उसी तरह घर लौट आओ .ऐसे में १९७९ से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट खंडपीठ के आन्दोलन कारियों में से आगरा के एक अधिवक्ता अनिल प्रकाश रावत जी द्वारा विधि मंत्रालय से यह जानकारी मांगी जाने पर -''कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खंडपीठ स्थापना के लिए कोई प्रस्ताव विचाराधीन है ?''पर केन्द्रीय विधि मंत्रालय के अनुसचिव के.सी.थांग कहते हैं -''जसवंत सिंह आयोग ने १९८५ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित करने की सिफारिश की थी .इसी दौरान उत्तराखंड बनने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले उत्तराखंड के अधिकार क्षेत्र में चले गए वहीँ नैनीताल में एक हाईकोर्ट की स्थापना हो गयी है .इस मामले में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय मागी गयी थी .इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश  ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट की किसी शाखा की स्थापना का कोई औचित्य नहीं पाया है .''
     सवाल ये है कि क्या उत्तराखंड बनने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट से दूरी घट गयी है ?क्या नैनीताल हाईकोर्ट इधर के मामलों में दखल दे उनमे न्याय प्रदान कर रही है ?और अगर हाईकोर्ट के माननीय  मुख्य न्यायाधीश को इधर खंडपीठ की स्थापना का कोई औचित्य नज़र नहीं आता है तो क्यों?क्या घर से जाने पर यदि किसी को घर बंद करना पड़ता है तो क्या उसके लिए कोई सुरक्षा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पी.में तो ये हाल है कि जब भी किसी का घर बंद हो चाहे एक दिन को ही हो चोरी हो जाती है .और क्या अपने क्षेत्र से इलाहाबाद तक के सफ़र के लिए किसी विशेष सुविधा की व्यवस्था की गयी है ?जबकि यहाँ यू.पीमें तो आर.पी.ऍफ़.वाले ही यात्रियों को ट्रेन से धकेल देते हैं .राजेश्वर व् सरोज की घटना अभी की ही है जिसमे सरोज की जान ही चली गयी .क्या इलाहाबाद में वादकारियों के ठहराने व् खाने के लिए कोई व्यवस्था की गयी है ?जबकि वहां तो रिक्शा वाले ही होटल वालों से कमीशन खाते हैं और यात्रियों को स्वयं वहीँ ले जाते हैं .और क्या मुक़दमे लड़ने के लिए वादकारियों को वाद व्यय दिया जाता है या उनके लिए सुरक्षा का कोई इंतजाम किया जाता है ?जबकि हाल तो ये है कि दीवानी के मुक़दमे आदमी को दिवालिया कर देते हैं और फौजदारी में आदमी कभी कभी अपने परिजनों व् अपनी जान से भी हाथ धो डालता है .पश्चिमी यू.पी .की जनता को इतनी दूरी के न्याय के मामले में या तो अन्याय के आगे सिर झुकाना पड़ता है या फिर घर बार  लुटाकर न्याय की राह पर आगे बढ़ना होता है .      न्याय का क्षेत्र  यदि हाईकोर्ट व् सरकार अपनी सही भूमिका निभाएं तो बहुत हद तक जन कल्याण भी कर सकती है और न्याय भी .आम आदमी जो कि कानून की प्रक्रिया के कारण ही बहुत सी बार अन्याय  सहकर घर बैठ जाता है .यदि सरकार सही ढंग से कार्य करे तो लोग आगे बढ़ेंगे .यदि हाईकोर्ट  सरकार सही ढंग से कार्य करें .यह हमारा देश है हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था है फिर हमें ही क्यों परेशानी उठानी पड़ती है ?
 अधिवक्ताओं के इस आंदोलन को लेकर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी पक्ष में थे और  प्रधानमंत्री प्रसिद्द  किसान नेता चौधरी चरण सिंह भी किन्तु किसी ने भी इस सम्बन्ध में अधिवक्ताओं का साथ नहीं दिया और यही कार्यप्रणाली आज की भाजपा सरकार अपना रही है इस पार्टी के गृह मंत्री राजनाथ सिंह पहले अधिवक्ताओं  को आश्वासन देते हैं कि यह मुद्दा सरकार के एजेंडे में है और सत्र के बाद इस पर सकारात्मक फैसला होगा और बाद में ये कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि मैंने हाईकोर्ट विभाजन समबन्धी कोई बयान नहीं दिया और यही काम हाईकोर्ट कर रही है इस  मुद्दे का सही व् सकारात्मक हल करने की बजाय वह अधिवक्ताओं को भड़का रही है और इसीलिए उसने मेरठ का क्षेत्राधिकार मुरादाबाद को सौंप दिया है परिणाम जो होना था वह ही हो रहा है अब अधिावक्ता जो जनता के हित को देखते हुए दो दिन मंगलवार व् बुद्धवार को कार्य किये जाने पर सहमत हो गए थे अब अनिश्चित कालीन हड़ताल पर चले गए हैं .किन्तु सरकार और हाईकोर्ट का अभी तक भी इस संबंध में इधर के प्रति कोई सकारात्मक  रुख दिखाई नहीं दिया है ऐसे में यह लगता ही नहीं है कि यहाँ प्रजातंत्र है हमारी सरकार है .जब अपने देश में अपनी सरकार से एक सही मांग मनवाने के लिए ३०-४० वर्षों तक संघर्ष करना पड़ेगा तब यह लगना तो मुश्किल ही है .
यदि वेस्ट यू.पी.में हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित की जाती है तब निश्चित रूप से मुक़दमे बढ़ेंगे और इनसे होने वाली आय से जो सरकारी खर्च में इस स्थापना के फलस्वरूप बढ़ोतरी हुई होगी वह तो पूरी होगी ही सरकार की आय में भी बढ़ोतरी होगी और जनता में सरकार के प्रति विश्वास भी बढेगा जो सरकार के स्थायित्व के लिए व् भविष्य में कार्य करने के लिए बहुत आवश्यक है  किन्तु पूर्व का अर्थात इलाहाबाद  का राजनीतिक प्रभाव इतना ज्यादा है कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जायेगा जिससे पश्चिम की जनता वहां से कटे और उनकी आमदनी पर प्रभाव पड़े भले ही इधर की जनता लुटती पिटती रहे   किन्तु सरकार को ये नहीं दिखता और वह रोज़ नए बहाने बनाकर इस बेंच को टालने में लगी रहती है अभी समाचार पत्रों में शीतलवाड़ आयोग की रिपोर्ट का सहारा लिया गया .
संविधान का अनुच्छेद २१४ कहता है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा और १९५४ में गठित शीतलवाड़ लॉ कमीशन ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि न्याय प्रशासनके उच्च मानदंडों को बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि हाईकोर्ट एक ही स्थान पर कार्य करे .उच्च न्यायालय द्वारा सम्पादित किये जाने वाले कार्य की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए ऐसा आवश्यक है .लेकिन जो संवैधानिक स्थिति है वह स्पष्ट तौर पर शीतलवाड़ आयोग की सलाह को हमेशा दरकिनार करती हुई दिखाई देती है .
    इलाहाबाद हाईकोर्ट की ऐसा नहीं है कि यह पहली बार किसी बेंच के सम्बन्ध में मांग हो .इलाहाबाद हाईकोर्ट की पहले से ही एक खंडपीठ लखनऊ बेंच के रूप में कार्य कर रही है ,हालाँकि यह सत्य है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ शीतलवाड़ आयोग की रिपोर्ट से पहले की है .
लेकिन सभी जगह ऐसा नहीं है .शीतलवाड़ आयोग १९५४ में गठित हुआ था और इसकी रिपोर्ट के बाद भी हाईकोर्ट की बेंच मध्य प्रदेश में व् राजस्थान में बनायीं गयी .
राजस्थान उच्च न्यायालय के पहले न्यायाधीश  कमला कांत वर्मा थे उसकी एक बेंच जयपुर में ३१ जनवरी १९७७ को स्थापित की गयी .
ऐसे ही मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय  नवमबर १९५६ को स्थापित हुआ और इसकी दो खंडपीठ इंदौर और ग्वालियर में स्थापित की गयी .
जब संविधान में राज्य के लिए एक ही उच्च न्यायालय का प्रावधान है और अनुच्छेद २३१ के अनुसार दो या दो से अधिक राज्यों या संघ क्षेत्र के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना की जा सकती है तब ये इन राज्यों में उच्च न्यायालय की खंडपीठ क्यों स्थापित की गयी है ?
 और इसी का सहारा लेकर इलाहाबाद के वकील पश्चिमी यूपी में खंडपीठ का विरोध करते हैं तब इन्हीं की बात को ऊपर रखते हुए पश्चिमी यूपी की जायज मांग को दरकिनार करने के लिए ऐसे पुराने महत्वहीन उदाहरणों को सामने लाने का मीडिया जगत का यह प्रयास और वहां के वकीलों का पश्चिमी यूपी के वकीलों के आंदोलन को लगातार दबाने का यह प्रयत्न सिर्फ एक कुचक्र ही कहा जायेगा जिसे केवल इधर की जनता के साथ अन्याय करने के लिए ही अमल में लाया जाता है और यह कुचक्र ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है क्योंकि अबकी बार यहाँ के वकील कमर कसकर मुकाबले में  जुटे हैं और सरकार को भी अब यह देखना होगा कि वह चालबाजी से इन्हें रोककर चालबाज़ों  का तमगा पाती है या यहाँ की जनता को हाईकोर्ट बेंच दे न्यायवादी सही रूप में कहलाने का .
वास्तविकता तो यह है कि आज ये अधिवक्ता जिस लड़ाई को लड़ रहे हैं उससे अंतिमतः फायदा जनता का ही है और जनता को भी यहाँ के अधिवक्ताओं के साथ जुड़कर चाहे प्रदेश की सरकार हो या केंद्र की अधिवक्ताओं  के कंधे से कन्धा मिलाकर अधिवक्ताओं के आंदोलन को मजबूती देनी होगी और अब जिस तरह से सरकार इस मुद्दे को टाल रही है और वकील जिस तरह से आक्रोशित हो रहे हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि ये हड़ताल अभी और बढ़ेगी और जैसे कि आज तक होता आया है वही होगा अर्थात जब तक क्रुद्ध व् आन्दोलनरत वकील हिंसा का सहारा लेते हुए मरने मारने को उतारू नहीं  होंगे जब तक ये नहीं कहेंगे ''बेंच करो या मरो '' तब तक सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगेगी .


शालिनी कौशिक 
    [एडवोकेट ]