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गुरुवार, 16 मई 2013

संपत्ति का अधिकार-३


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संपत्ति के अधिकार का इतिहास-
    संपत्ति का अधिकार ,चूंकि एक ऐसा अधिकार माना गया है ,जो अन्य अधिकारों को प्रभावशाली ढंग से प्रभावी करने में सहायक होता है इसलिए भारतीय संविधान का अनुच्छेद ३१ अतिपरिवर्तन शील अनुच्छेद माना गया क्योंकि उसने जितना अधिक अपना रूप परिवर्तित किया उतना किसी अन्य अनुच्छेद ने नहीं किया .इसका कारण यह था कि केंद्र और राज्य ,दोनों ने ही संपत्ति के अधिकार को विनियमित करने के लिए कृषि सुधार ,राष्ट्रीय करण और राज्यों के नीति निदेशक तत्वों के क्रियान्वयन हेतु बहुत अधिक विधायन कार्य सम्पादित कर डाले .कृषि क्षेत्र में आर्थिक व्यवस्था को ठीक करने और समाजवादी ढांचे पर चलने वाले नूतन समाज के निर्माण के लिए केंद्र और राज्य दोनों की सरकारों के लिए यह आवश्यक हो गया था  कि वे विधान का निर्माण कर खेत जोतने वालों को भूमि का स्वामित्व प्रदान करें ,ज़मींदारी व्यवस्था को समाप्त करें .शहरी क्षेत्रों में गृहविहीन व्यक्तियों को आवासीय सुविधाएँ प्रदान करने ,शहरी गंदगी को समाप्त करने और विकास तथा नगरीय योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता महसूस की जाने लगी .इन्हीं सब कारणों से व्यापक पैमाने पर विधायन लाये गए और अनुच्छेद ३१ के स्वरुप में कई बार परिवर्तन करने पड़े .
     संविधान का अनुच्छेद ३१ [१] किसी भी व्यक्ति को बिना विधिक प्राधिकार के संपत्ति से वंचित करने के विपरीत संरक्षण प्रदान करता था ;इसके साथ ही साथ अनुच्छेद ३१[२] ऐसी संपत्ति के अनिवार्य अर्जन अथवा अधिग्रहण के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता था ,जो लोक उद्देश्यों की परिपूर्ति के लिए विधिक प्राधिकार द्वारा किसी राशि का भुगतान करके अर्जित  अथवा अधिग्रहित न की गयी हो .इन्ही उपबन्धों की अनुपूर्ति में अनुच्छेद १९[१]च के अंतर्गत समस्त नागरिकों को संपत्ति के अर्जन ,धारण और व्ययन की स्वतंत्रता प्रदान की गयी थी .इस स्वतंत्रता पर केवल साधारण लोकहित एवं अनुसूचित जनजातियों के हितों की सुरक्षा में युक्तियुक्त निर्बन्धन लगाये जा सकते थे परन्तु राष्ट्र की संविधानिक प्रणाली में ,राष्ट्रीय योजनाओं के माध्यम से जब जब देश की भयंकर गरीबी को समाप्त करके समाजिक न्याय प्रदान करने के उद्देश्य से सार्वजानिक क्षेत्रों के निर्माण का प्रयास किया गया तब तब व्यक्तिगत हित इस मार्ग में रूकावट डालने को आ डटा.  न्यायपालिका ने भी सामाजिक न्याय के स्थान पर ,जो संविधान निर्माताओं का स्वप्न था ,विधि की सक्षमता पर ही बल दिया जिसके परिणाम स्वरुप सहकारी नीतियां ,जनकल्याण के कार्य और सामाजिक न्याय प्रभावित होते रहे [गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य ए.आई.आर १९६७ एस,सी.१६४]
    यद्यपि प्रतिकर की राशि के भुगतान के सन्दर्भ में न्यायपालिका ने यह भी अभिनिर्णय प्रदान किया कि संपत्ति के अनिवार्य अर्जन अथवा अधिग्रहण के बदले में यदि कोई राशि विधि द्वारा निश्चित कर दी गयी है ,या उसे निश्चित या निर्धारित करने के सिद्धांत उस विधि में समाहित कर दिए गए हैं तो उसकी युक्तियुक्त्ता अथवा उसकी अपर्याप्तता को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती [कर्णाटक राज्य बनाम रंगनाथ रेड्डी १९७७ [४] एस.सी.सी.४७१ ]परन्तु यह स्थिति राष्ट्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधक थी .गलत सामाजिक सिद्धांत मान्यताएं ,जो अब परिवर्तित परिस्थितियों में समाप्त होती जा रही हैं ;विदेशी न्यायिक सिद्धांत जैसे -प्रभुता अधिकार का सिद्धांत [doctrine  of  eminent  domain  ]  ,सामाजिक हित के समक्ष व्यक्तिगत हित की प्रमुखता आदि अव धारणाएं  उन स्वप्नों को साकार कर सकेंगी ,जिन्हें संविधान निर्माताओं ने देखा था और जिनको पूरा करने के लिए अनुच्छेद ३१ के अंतर्गत संपत्ति के अनिवार्य अर्जन अथवा अधिग्रहण की व्यवस्था की गयी थी .भारत को आगे बढ़ाना था .सम्पत्ति का दुराग्रही अधिकार इस मार्ग में रोड़ा बन रहा था .इसी सन्दर्भ में भारत की संसद ने अपनी संविधायी शक्ति का प्रयोग करके संविधान 
[४४ वां संशोधन अधिनियम '१९७८] पारित किया था और संपत्ति को मूल अधिकार का स्वरुप प्रदान करने वाले अनुच्छेद १९[१]च एवं ३१ को संविधान से निकाल दिया था .इस अधिनियम की धरा ३४ के अंतर्गत संविधान के भाग १२ में एक नए अध्याय [अध्याय-४ ]को अंतर्विष्ट करके अनुच्छेद ३००-क का निर्माण किया गया है .यह अनुच्छेद संपत्ति के अधिकार को मान्यता तो प्रदान करता है परन्तु उसे एक विधिक अधिकार के रूप में देखता है ,मूल अधिकार के रूप में नहीं .
  जीलू भाई नान भाई काहर बनाम गुजरात राज्य ए.आई.आर .एस.सी.१४२ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि अनुच्छेद ३००-क के अधीन गारंटी किया गया संपत्ति का अधिकार संविधान का आधारभूत ढांचा नहीं है ,बल्कि यह एक संवैधानिक अधिकार है .''........[  to be continued ...... ]
      शालिनी कौशिक 
                 [एडवोकेट]
     

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