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शुक्रवार, 30 मई 2014

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -7


प्रश्न 7 -सीआर.पी.सी.की धारा ४३५ में केंद्र से परामर्श करने की बात का मतलब सहमति से है ?
कानूनी स्थिति-धारा ४३५ कहती है -
[1] किसी दंडादेश का परिहार करने या उसके लघुकरण के बारे में धारा ४३२ या ४३३ द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त शक्तियों का राज्य सरकार द्वारा प्रयोग उस दशा में केंद्रीय सरकार से परामर्श के पश्चात ही किया जायेगा जब दंडादेश किसी ऐसे अपराध के लिए हो -
[क] जिसका अन्वेषण दिल्ली पुलिस स्थापन अधिनियम १९४६ [अ९४६ का २५] के अधीन गठित दिल्ली पुलिस स्थापन अधिनियम द्वारा या इस संहिता से भिन्न किसी केंद्रीय अधिनियम के अधीन अपराध का अन्वेषण करने के लिए सशक्त किसी अन्य अभिकरण द्वारा किया गया हो ,अथवा
[ख] जिसमे केंद्रीय सरकार की किसी संपत्ति का दुर्विनियोग या नाश या नुकसान अंतर्ग्रस्त हो ,अथवा
[ग] जो केंद्रीय सरकार की सेवा में के किसी व्यक्ति द्वारा तब किया गया हो जब वह अपने पदीय कर्तव्यों के निर्वहन में कार्य कर रहा था या उसका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित था .
[२] जिस व्यक्ति को ऐसे अपराधों के लिए दोषसिद्ध किया गया हो जिसमे से कुछ उन विषयों से सम्बंधित हों जिन पर संघ की कार्यपालिका शक्ति के लिए दोषसिद्ध किया गया हो जिसमे से कुछ उस अवधि के कारावास का जो साथ साथ भोगी जानी हो दंडादेश दिया गया हो ,जिसके सम्बन्ध में दंडादेश के निलंबन ,परिहार या लघुकरण का राज्य सरकार द्वारा पारित कोई आदेश प्रभावी नहीं होगा जब ऐसे विषयों के बारे में ,जिन पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार हो ,उस व्यक्ति द्वारा किये गए अपराधों के सम्बन्ध में ऐसे दण्डादेशों के ,यथास्थिति परिहार ,निलंबन या लघुकरण का आदेश केंद्रीय सरकार द्वारा भी कर दिया जाये .

स्पष्ट है कि धारा ४३५ में राज्य सरकार द्वारा केंद्रीय सरकार से परामर्श का मतलब सहमति से ही है .

शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

रविवार, 18 मई 2014

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -6

                         
प्रश्न -६ -क्या सरकार स्वयं से माफ़ी देने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकती है या इसके लिए कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है ?
कानूनी स्थिति -सरकार स्वयं से माफ़ी देने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकती है .इस सम्बन्ध में धारा ४३२ [१] में कहा गया है कि-
''जब किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए दंडादेश दिया जाये तब समुचित सरकार किसी समय ,शर्तों के बिना या ऐसी शर्तों पर जिन्हें दण्डादिष्ट व्यक्ति स्वीकार करे ,उसके दंडादेश के निष्पादन का निलंबन या जो दंडादेश उसे दिया गया है उसका पूरे का या उसके किसी भाग का परिहार कर सकती है .''
      किन्तु जहाँ उसके लिए आवेदन किया गया है वहां धारा ४३२ कहती है -
[२] जब कभी समुचित सरकार के दंडादेश के निलंबन या परिहार के लिए आवेदन किया जाया तब समुचित सरकार उस न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीश से ,जिसके समक्ष दोषसिद्धि हुई थी या जिसके द्वारा उसकी पुष्टि की गयी थी ,अपेक्षा कर सकेगी कि वह इस बारे में कि आवेदन मंजूर किया जाये या नामंजूर किया जाये ,अपनी राय ऐसी राय के लिए अपने कारणों सहित कथित करे और अपनी राय के कथन के साथ विचारण के अभिलेख की या उसके ऐसे अभिलेख की ,जैसा अस्तित्व में हो ,प्रमाणित प्रतिलिपि भी भेजे .
[३] यदि कोई शर्त ,जिस पर दंडादेश का निलंबन या परिहार किया गया हो ,समुचित सरकार की राय में पूरी न हुई हो ,तो समुचित सरकार निलंबन या परिहार को रद्द कर सकेगी और तब ,यदि वह व्यक्ति ,जिसके पक्ष में दंडादेश का निलंबन या परिहार किया गया ,मुक्त हो तो वह किसी पुलिस अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार किया जा सकेगा और दंडादेश के अनवसित भाग को भोगने के लिए प्रतिप्रेषित किया जा सकेगा .
[४] वह शर्त जिस पर दंडादेश का निलंबन या परिहार इस धारा के अधीन किया जाये ,ऐसी हो सकती है जो उस व्यक्ति द्वारा ,जिसके पक्ष में दंडादेश का निलंबन या परिहार किया जाये ,पूरी की जाने वाली हो या ऐसी हो सकेगी जो उसकी इच्छा के अधीन न हो .
[५] समुचित सरकार दण्डादेशों के निलंबन के बारे में ,और उन शर्तों के बारे में जिन पर अर्जियां उपस्थित की और निपटाई जानी चाहिए ,साधारण नियमों पर विशेष आदेशों द्वारा निदेश दे सकेगी -
   परन्तु १८ वर्ष से अधिक की आयु के किसी पुरुष के विरुद्ध किसी दंडादेश की दशा में [जो जुर्माने के दंडादेश से भिन्न हो ] दण्डादिष्ट व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी गयी कोई ऐसी अर्जी तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक दण्डादिष्ट व्यक्ति जेल में न हो ,तथा
     [क] जहाँ ऐसी अर्जी दण्डादिष्ट व्यक्ति द्वारा दी जाती है वहां जब तक वह जेल के भारसाधक अधिकारी की मार्फ़त उपस्थित न की जाये ,अथवा
   [ख] जहाँ ऐसी अर्जी किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जाये वहां जब तक उसमें यह घोषणा न हो कि दण्डादिष्ट व्यक्ति जेल में है .
   इस प्रकार समुचित सरकार को दंडादेश के लघुकरण या परिहार के लिए आवेदन किये जाने और सशर्त निलंबन या परिहार किये जाने की स्थिति में कानून द्वारा तय प्रक्रिया का पालन किया जाना अनिवार्य है किन्तु यदि उसने बिना शर्त या बिना आवेदन निलंबन या परिहार किया है तो वह कानून द्वारा नियत प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है .
शालिनी कौशिक
    [कानूनी ज्ञान ]

शनिवार, 10 मई 2014

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -5


प्रश्न -५ -क्या सीआर.पी.सी.की धारा ४३२ [७] में माफ़ी देने में दो सरकारों [केंद्र और राज्य ] को उचित सरकार माना जायेगा ?
कानूनी स्थिति -धारा ४३२[७] कहती है -
[७] -इस धारा में और धारा ४३३ में 'समुचित सरकार '' पद से -
[क] उन दशाओं में जिनमे दंडादेश ऐसे विषय से सम्बद्ध किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए है या उपधारा [६] में निर्दिष्ट आदेश ऐसे विषय से सम्बद्ध किसी विधि के अधीन पारित किया गया है ,जिस विषय पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है ,केंद्रीय सरकार अभिप्रेत है ;
[२]-अन्य दशाओं में ,उस राज्य की सरकार अभिप्रेत है जिसमे अपराधी दण्डादिष्ट किया गया है या उक्त आदेश पारित किया गया है .
और संविधान का  अनुच्छेद २५४ कहता है कि यदि राज्य विधानमंडल द्वारा किसी समवर्ती सूची के विषय पर कानून बनाया जाता है ,जो कि संसद द्वारा इससे पूर्व या बाद में बनाये गए नियम के विरोध में है ,तो अनुच्छेद २५४ के खंड [२] के उपबंधों के अधीन रहते हुए संसद द्वारा निर्मित विधि प्रभावी होगी तथा राज्य विधान मंडल द्वारा निर्मित विधि विरोध की मात्रा तक शून्य होगी .
अनुच्छेद २५४ के खंड [२] के अनुसार यदि राज्य विधान मंडल द्वारा समवर्ती सूची में वर्णित विषयों में से किसी विषय पर निर्मित विधि में कोई ऐसा उपबंध है जो संसद द्वारा उस विषय पर पूर्व में निर्मित विधि अथवा वर्तमान विधि के विरुद्ध है ,लेकिन यदि उसे राष्ट्रपति की सहमति मिल गयी है तो राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित विधि केवल उस राज्य में ,संसद के कानून के स्थान पर प्रभावी रहेगी .
लेकिन संसद उसी विषय पर राष्ट्रपति की सहमति के पश्चात भी यदि चाहे तो विधि बना सकती है .इसके द्वारा राज्य द्वारा निर्मित विधि में संशोधन ,परिवर्धन तथा उसका निरसन भी कर सकती है .अंततः संसद के कानून की सर्वोच्चता रहती है .
    इस प्रकार यदि अपराधी को दंड राज्य विधि के अंतर्गत मिला है तो राज्य समुचित सरकार है और यदि केंद्र विधि से मिला है तो केंद्र समुचित सरकार है किन्तु जहाँ समवर्ती सूची के किसी विषय पर आधारित विधि पर दंड मिला है और उससे सम्बंधित केंद्र व् राज्य दोनों की विधि है  तो केंद्रीय विधि के विस्तार तक राज्य विधि शून्य  रहेगी और माफ़ी देने में केंद्र सरकार समुचित सरकार होगी.

शालिनी कौशिक
    [कानूनी ज्ञान ]

रविवार, 4 मई 2014

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -4



प्रश्न -४ -संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची ३ में दिए गए विषय में माफ़ी देने की शक्ति में केंद्र सरकार को राज्य सरकार से ज्यादा प्राथमिकता है ?

कानूनी स्थिति -अनुच्छेद २५४ कहता है कि यदि राज्य विधानमंडल द्वारा किसी समवर्ती सूची के विषय पर कानून बनाया जाता है ,जो कि संसद द्वारा इससे पूर्व या बाद में बनाये गए नियम के विरोध में है ,तो अनुच्छेद २५४ के खंड [२] के उपबंधों के अधीन रहते हुए संसद द्वारा निर्मित विधि प्रभावी होगी तथा राज्य विधान मंडल द्वारा निर्मित विधि विरोध की मात्रा तक शून्य होगी .
अनुच्छेद २५४ के खंड [२] के अनुसार यदि राज्य विधान मंडल द्वारा समवर्ती सूची में वर्णित विषयों में से किसी विषय पर निर्मित विधि में कोई ऐसा उपबंध है जो संसद द्वारा उस विषय पर पूर्व में निर्मित विधि अथवा वर्तमान विधि के विरुद्ध है ,लेकिन यदि उसे राष्ट्रपति की सहमति मिल गयी है तो राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित विधि केवल उस राज्य में ,संसद के कानून के स्थान पर प्रभावी रहेगी .
लेकिन संसद उसी विषय पर राष्ट्रपति की सहमति के पश्चात भी यदि चाहे तो विधि बना सकती है .इसके द्वारा राज्य द्वारा निर्मित विधि में संशोधन ,परिवर्धन तथा उसका निरसन भी कर सकती है .अंततः संसद के कानून की सर्वोच्चता रहती है .
ज़वेर भाई बनाम मुंबई राज्य ए.आई.आर.१९५४ एस.सी .७५२ का मामला इस सन्दर्भ में निर्णायक विधि प्रस्तुत करता है .सन १९४६ में केंद्रीय विधानमंडल ने आवश्यक वस्तु [अस्थायी शक्ति ]अधिनियम पारित किया जिसके अनुसार इसके उल्लंघन करने वालों को धारा ३ के अंतर्गत अधिक से अधिक 3 वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों दंड दिया जा सकता था .बम्बई राज्य के विधानमंडल ने इस दंड को कम समझकर एक अधिनियम पारित करके इस दंड को बढाकर ७ वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों कर दिया .इस अधिनियम को गवर्नर जनरल की अनुमति प्राप्त हो गयी और इस प्रकार केंद्रीय विधि निरसित हो गयी .मुंबई प्रान्त के इस अधिनियम के प्रवर्तन के बाद केंद्र ने सन १९४८ ईस्वी ;सन १९४९ और सन १९५० ईस्वी में अपने केंद्रीय अधिनियम के अंतर्गत दंड के उपबंध में काफी परिवर्तन कर डाला .दंड के उद्देश्य से अपराधी की तीन श्रेणियाँ बना दी गयी और हर श्रेणी के अपराधियों के लिए अलग -अलग दंड की व्यवस्था की गयी .उच्चतम न्यायालय ने यह अभिमत व्यक्त किया कि सन १९४७ ईस्वी का मुंबई अधिनियम केंद्र के सन १९५० ईस्वी के अधिनियम द्वारा शून्य बना दिया गया है क्योंकि दोनों एक ही विषय प्रवर्धित दंड पर अधिनिर्णित हुए हैं .
स्पष्ट है कि एक ही विषय पर केंद्र और राज्य दोनों को ही माफ़ी देने की शक्ति है तो संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची तीन में दिए गए विषय में केंद्र राज्य सरकार से ज्यादा प्राथमिकता रखता है .

शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

शनिवार, 3 मई 2014

संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -3

प्रश्न -३ -जहाँ पर राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को कानून में माफ़ी देने का हक़ हो वहां क्या सी.आर.पी.सी.की धारा ४३२ [७] के तहत केंद्र सरकार को प्राथमिकता दी गयी है और राज्य को बाहर कर दिया गया है ?
कानूनी स्थिति -धारा ४३२[७] कहती है -
[७] -इस धारा में और धारा ४३३ में 'समुचित सरकार '' पद से -
[क] उन दशाओं में जिनमे दंडादेश ऐसे विषय से सम्बद्ध किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए है या उपधारा [६] में निर्दिष्ट आदेश ऐसे विषय से सम्बद्ध किसी विधि के अधीन पारित किया गया है ,जिस विषय पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है ,केंद्रीय सरकार अभिप्रेत है ;
[२]-अन्य दशाओं में ,उस राज्य की सरकार अभिप्रेत है जिसमे अपराधी दण्डादिष्ट किया गया है या उक्त आदेश पारित किया गया है .

हनुमंतदास बनाम विनय कुमार और अन्य तथा स्टेट ऑफ़ हिमाचल प्रदेश बनाम विनय कुमार और अन्य ए.आई.आर .१९८२ एस.सी.१०५२ में उच्चतम न्यायालय ने कहा -पद ''समुचित सरकार ''से अभिप्राय उस सरकार [राज्य ]से है जिसमे अभियुक्त को दोषसिद्ध किया गया है ,न कि उस सरकार [राज्य] से जिसमे अपराध कारित किया गया था

और ऐसे जहाँ अभियुक्त को दोषसिद्ध किया गया है वहां कानून में माफ़ी देने का हक़ उसी सरकार को है जिसके कानून का विस्तार वहां है और ऐसे में केंद्र को राज्य पर कोई प्राथमिकता नहीं है .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]