संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -4



प्रश्न -४ -संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची ३ में दिए गए विषय में माफ़ी देने की शक्ति में केंद्र सरकार को राज्य सरकार से ज्यादा प्राथमिकता है ?

कानूनी स्थिति -अनुच्छेद २५४ कहता है कि यदि राज्य विधानमंडल द्वारा किसी समवर्ती सूची के विषय पर कानून बनाया जाता है ,जो कि संसद द्वारा इससे पूर्व या बाद में बनाये गए नियम के विरोध में है ,तो अनुच्छेद २५४ के खंड [२] के उपबंधों के अधीन रहते हुए संसद द्वारा निर्मित विधि प्रभावी होगी तथा राज्य विधान मंडल द्वारा निर्मित विधि विरोध की मात्रा तक शून्य होगी .
अनुच्छेद २५४ के खंड [२] के अनुसार यदि राज्य विधान मंडल द्वारा समवर्ती सूची में वर्णित विषयों में से किसी विषय पर निर्मित विधि में कोई ऐसा उपबंध है जो संसद द्वारा उस विषय पर पूर्व में निर्मित विधि अथवा वर्तमान विधि के विरुद्ध है ,लेकिन यदि उसे राष्ट्रपति की सहमति मिल गयी है तो राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित विधि केवल उस राज्य में ,संसद के कानून के स्थान पर प्रभावी रहेगी .
लेकिन संसद उसी विषय पर राष्ट्रपति की सहमति के पश्चात भी यदि चाहे तो विधि बना सकती है .इसके द्वारा राज्य द्वारा निर्मित विधि में संशोधन ,परिवर्धन तथा उसका निरसन भी कर सकती है .अंततः संसद के कानून की सर्वोच्चता रहती है .
ज़वेर भाई बनाम मुंबई राज्य ए.आई.आर.१९५४ एस.सी .७५२ का मामला इस सन्दर्भ में निर्णायक विधि प्रस्तुत करता है .सन १९४६ में केंद्रीय विधानमंडल ने आवश्यक वस्तु [अस्थायी शक्ति ]अधिनियम पारित किया जिसके अनुसार इसके उल्लंघन करने वालों को धारा ३ के अंतर्गत अधिक से अधिक 3 वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों दंड दिया जा सकता था .बम्बई राज्य के विधानमंडल ने इस दंड को कम समझकर एक अधिनियम पारित करके इस दंड को बढाकर ७ वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों कर दिया .इस अधिनियम को गवर्नर जनरल की अनुमति प्राप्त हो गयी और इस प्रकार केंद्रीय विधि निरसित हो गयी .मुंबई प्रान्त के इस अधिनियम के प्रवर्तन के बाद केंद्र ने सन १९४८ ईस्वी ;सन १९४९ और सन १९५० ईस्वी में अपने केंद्रीय अधिनियम के अंतर्गत दंड के उपबंध में काफी परिवर्तन कर डाला .दंड के उद्देश्य से अपराधी की तीन श्रेणियाँ बना दी गयी और हर श्रेणी के अपराधियों के लिए अलग -अलग दंड की व्यवस्था की गयी .उच्चतम न्यायालय ने यह अभिमत व्यक्त किया कि सन १९४७ ईस्वी का मुंबई अधिनियम केंद्र के सन १९५० ईस्वी के अधिनियम द्वारा शून्य बना दिया गया है क्योंकि दोनों एक ही विषय प्रवर्धित दंड पर अधिनिर्णित हुए हैं .
स्पष्ट है कि एक ही विषय पर केंद्र और राज्य दोनों को ही माफ़ी देने की शक्ति है तो संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची तीन में दिए गए विषय में केंद्र राज्य सरकार से ज्यादा प्राथमिकता रखता है .

शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

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