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रविवार, 30 नवंबर 2014

इच्छा मृत्यु व् आत्महत्या



इच्छा मृत्यु व् आत्महत्या :नियति व् मजबूरी



Suicide  : Young woman sitting on railroadhospital bedDisappointed : Side view of a frustrated young Indian man. Isolated against white background.
अरुणा रामचंद्र शानबाग ,एक नर्स ,जिस पर हॉस्पिटल के एक सफाई कर्मचारी द्वारा दुष्कर्म की नीयत से बर्बर हमला किया गया जिसके कारण गला घुटने के कारण उसके मस्तिष्क को ऑक्सिजन  की आपूर्ति बंद हो गयी और उसका कार्टेक्स क्षतिग्रस्त हो गया ,ग्रीवा रज्जु में चोट के साथ ही मस्तिष्क नलिकाओं में भी चोट पहुंची और फलस्वरूप एक जिंदगी जिसे न केवल अपने लिए बल्कि इस समाज देश के लिए सेवा के नए आयाम स्थापित करने थे स्वयं सेवा कराने के लिए मुंबई के के.ई.एम्.अस्पताल के बिस्तर पर पसर गयी और ३६ साल से वहीँ टुकुर टुकुर जिंदगी के दिन गिन रही है .पिंकी वीरानी ,जिसने अरुणा की दर्दनाक  कहानी अपनी पुस्तक में बयां की ,ने उसकी जिंदगी को संविधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत जीवन के अधिकार में मिले सम्मान से जीने के हक़ के अनुरूप नहीं माना .और उसके लिए ''इच्छा मृत्यु ''की मांग की ,जिसे सर्वोच्च  न्यायालय के न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा ने सिरे से ख़ारिज कर दिया .अपने १४१ पन्नों के फैसले में न्यायालय ने कहा -
''देश में इच्छा मृत्यु पर कोई कानून नहीं है .जब तक संसद कानून नहीं बनाती है ,न्यायालय का फैसला पैसिव व् एक्टिव यूथनेसिया के तहत लागू रहेगा .देश में एक्टिव यूथनेसिया गैर कानूनी है लेकिन विशेष परिस्थितियों में पैसिव यूथनेसिया की इज़ाज़त  दी जा सकती है .भविष्य में हाईकोर्ट द्वारा तीन प्रमुख डाक्टरों की राय लेने और सरकार व् मरीज के करीबी रिश्तेदारों की राय जानने के बाद पैसिव यूथनेसिया की मंजूरी दे सकेगा .''
पैसिव व् एक्टिव यूथनेसिया -यूनान में इच्छा मृत्यु [यूथनेसिया ]को [गुड   डेथ]यानि अच्छी मौत कहा जाता था .यूथनेसिया मूलतः यूनानी शब्द है इसका अर्थ इयू अच्छी ,थानातोस मृत्यु से होता है .इच्छा मृत्यु वह है जब कोई मरीज अपने लिए मृत्यु खुद मांगता  है ,मर्सी किलिंग वह है जब कोई अन्य मरीज के लिए मृत्यु  की गुहार लगाता है .
भारत  में इच्छा मृत्यु अवैधानिक है क्योंकि आत्महत्या का प्रयास भारतीय दंड विधान आई.पी.सी.की धारा ३०९ के अंतर्गत अपराध है .धारा ३०९ आई.पी.सी. कहती है -
''जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा और उस अपराध के करने के लिए कोई कार्य करेगा ,वह सदा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से दण्डित किया जायेगा .''
और जहाँ तक मर्सी किलिंग की बात है भारतीय दंड विधान धारा ३०४ के अंतर्गत इसे भी अपराध मानता है .धारा ३०४ कहती है -
''जो कोई ऐसा आपराधिक मानव वध करेगा ,जो हत्या की कोटि में नहीं आता है ,यदि वह कार्य जिसके द्वारा मृत्यु कारित की गयी है ,मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति ,जिससे मृत्यु होना संभाव्य है ,कारित करने के आशय से किया जाये ,तो वह आजीवन कारावास से ,या दोनों में से किसी भांति के कारावास से ,जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी ,दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .
अथवा यदि वह कार्य इस ज्ञान के साथ कि उससे मृत्यु कारित करना सम्भाव्य है ,किन्तु मृत्यु या ऐसी शारीरिक क्षति ,जिससे मृत्यु कारित करना संभाव्य है ,कारित करने के आशय के बिना किया जाये ,तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी ,या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .''
इस प्रकार भारतीय दंड विधान मर्सी किलिंग को धारा ३०४ के अंतर्गत सदोष हत्या का अपराध मानता है और इसकी मंजूरी नहीं देता है .
इस प्रकार विशेष परिस्थितियों में यदि कोई मरीज मरणासन्न  है ,उसकी हालत में सुधार की कोई गुंजाईश नहीं है तो उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार पैसिव यूथनेसिया की मंजूरी दी जा सकती है जिसके अनुसरण में मरीज को सिर्फ जीवन रक्षक प्रणाली से हटाया जा सकता है जिसके हटाने से उसकी मृत्यु संभव हो सके किन्तु भारतीय कानून एक्टिव यूथनेसिया को मंजूरी नहीं देता है जिसमे मरणासन्न मरीज को मरने  में प्रत्यक्ष सहयोग दिया जाता है यानि डाक्टरों की मौजूदगी में रोगी को मारने के लिए ड्रग्स या जहरीले इंजेक्शन दिए जाते हैं .
और ऐसे में यदि हम विचार करें तो आत्महत्या के प्रयास को अपराध की श्रेणी से अलग करना एक्टिव यूथनेसिया की श्रेणी में ही आ जायेगा क्योंकि जिस व्यक्ति के मन में जीने की इच्छा ख़त्म हो रही है उसे निराशा के रोगी के रूप में मरणासन्न मरीज की श्रेणी में रखा जा सकता है और ऐसे में माना जा सकता है कि वह सही निर्णय नहीं ले सकता है और ऐसे में देश का कानून यदि ऐसे  प्रयास को अपराध की श्रेणी में नहीं रखता  है तो देश में एक्टिव यूथनेसिया को मंजूरी देने जैसा ही हो जायेगा .
इस प्रकार इच्छा मृत्यु व् आत्महत्या का अधिकार का वही अंतर है जो पैसिव व् एक्टिव युथनेसिया का है और देश के कानून का इनके प्रति अपनाया गया दृष्टिकोण भी इच्छा मृत्यु या मरने की नियति की मांग पर विचार कर उसकी मंजूरी दे सकता है आत्महत्या या मजबूरी गले में डालने की नहीं .
शालिनी कौशिक

शनिवार, 22 नवंबर 2014

तेजाबी मौत :दंड केवल फांसी

 Gujarat: Woman killed in acid attack for resisting sexual advances

 A 30-year-old woman was killed and her two children were critically injured in Umarvada here when a man along with two of his accomplices, hurled acid on them, police said today. The incident took place last night after the woman rejected sexual advances of accused Aslam Sheikh, following which Sheikh along with his friends barged into the victim's house and threw acid on her and her children, Assistant Commissioner of Police Naresh Kanzariya said.]

घटना सूरत [गुजरात ] की है यौन प्रताड़ना का विरोध करने वाली महिला पर आरोपियों ने तेजाब फैंक दिया जिससे उसकी मौत हो गयी और ये घटना कमज़ोरी न केवल हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की ज़ाहिर करती है अपितु ज़ाहिर करती है हमारी कानूनी व्यवस्था की कमजोरी भी क्योंकि अभी हाल ही में हुए दंड विधि [ संशोधन] अधिनियम ,२०१३ में तेजाब सम्बंधित मामलों के लिए धारा ३२६ -क व् धारा ३२६-ख  अन्तः स्थापित की गयी हैं जिसमे धारा ३२६-क '' स्वेच्छ्या तेजाब ,इत्यादि के प्रयोग से घोर उपहति कारित करना  ''को ही अपने घेरे में लेती है जिसमे कारावास ,जो दस वर्ष से कम नहीं किन्तु जो आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ज़ुर्माना जिसका भुगतान पीड़िता को किया जायेगा ......और धारा ३२६ -ख स्वेच्छ्या तेजाब फेंकने या फेंकने के प्रयत्न को ही अपने घेरे में लेती है जिसमे ५ वर्ष का कारावास ,किन्तु जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माने का दंड मिलेगा .इन दोनों ही धाराओं की व्यवस्था करते समय हमारे कानून विदों ने शायद इस तरह की घटना की कल्पना नहीं की होगी क्योंकि आज तक हुई अधिकांश घटनाओं में तेजाब पीड़िताओं की ज़िंदगी झुलसी है मौत नहीं किन्तु इस घटना ने तेजाब पीड़िता की ज़िंदगी ही नहीं मौत को भी झुलसा दिया और उसे मौत का शिकार बना दिया किन्तु अब कानून उन्हें ज्यादा से ज्यादा क्या देगा ३२६-क और ३०२ का अंतर्गत सजा जो कि फांसी हो भी सकती है और नहीं भी जबकि इस तरह के मामलों में निश्चित रूप से फांसी होनी चाहिए क्योंकि तेजाब ने यहाँ मात्र घोर उपहति नहीं कि वरन मौत दी है और इस सम्बन्ध में कानून को नयी व्यवस्थाएं भूतलक्षी संशोधन करते हुए लागू करनी ही होंगी .

शालिनी कौशिक 
      [कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 10 नवंबर 2014

वोट देना जरूरी करने वाला पहला राज्य बना गुजरात-really ?

अब वोट नहीं करनेवालों की खैर नहीं। (प्रतिनिधि चित्र)

वोट देना जरूरी करने वाला पहला राज्य बना गुजरात


 भारतीय संविधान का अनुच्छेद २१ यह  उपबंधित करता है कि ''किसी व्यक्ति को उसके प्राण और दैहिक स्वाधीनता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा ,अन्यथा नहीं .''
    इस प्रकार प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार सभी अधिकारों में श्रेष्ठ है और अनुच्छेद २१ इसी अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है .
    यह अधिकार व्यक्ति को न केवल जीने का अधिकार देता है वरन मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्रदान करता है .फ्रेंसिस कोरेली बनाम भारत संघ ए.आई.आर .१९८१ एस.सी.७४६ में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनुछहद २१ के अधीन प्राण शब्द से तात्पर्य पशुवत जीवन से नहीं वरन मानव जीवन से है और इसमें मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार सम्मिलित है और इसी मानवीय गरिमा को मद्देनज़र रखते हुए उच्चतम न्यायालय ने प्रगति वर्गीज़ बनाम सिरिल जॉर्ज वर्गीज़ ए.आई.आर. १९९७ एस.सी.३४९ के मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि भारतीय तलाक अधिनियम १८६९ की धारा १० ईसाई पत्नी को ऐसे व्यक्ति के साथ रहने के लिए विवश करती है जिससे वह घृणा करती है .जिसने उसके साथ क्रूरता का व्यवहार करके उसे त्याग दिया था ऐसा जीवन पशुवत जीवन है .यह ऐसे विवाह को विच्छेद करने के अधिकार को इंकार  करता है जो विवाह असुधार्य टूट गया है .विवाह विच्छेद करने के अधिकार को इंकार करना अनुच्छेद २१ के अधीन प्राप्त प्राण के अधिकार का उल्लंघन है .
   इसी तरह आज गुजरात में पारित ''गुजरात स्थानीय निकाय कानून विधेयक 2009'' है जो वर्तमान परिस्थितियों में प्रत्येक नागरिक को वोट डालना अनिवार्य घोषित करता है .वोट डालने का अधिकार एक ऐसा अधिकार है जो लोकतंत्र की मजबूती के लिए है किन्तु हमारे देश की परिस्थितियों में यह अनिवार्य होना गलत है क्योंकि उम्मीदवार बहुत सी बार जनता की पसंद के नहीं होते और उसका कारण भी है वह यह कि वे वोट लेने तो आते हैं किन्तु उसके बाद वे जनता के हित व् आकांक्षाओं को दरकिनार कर देते हैं ऐसे में किसी को वोट दिया जाना अनिवार्य करना ऐसे ही है जैसे उससे साँस लेने का ही अधिकार छीना जा रहा हो .यह जनता से संविधान में दिए गए जीने के अधिकार को छीनना ही है कि कोई उम्मीदवार पसंद हो या न हो वोट ज़रूर दो और ऐसा तब तो कहा ही जायेगा जब यहाँ पर उम्मीदवार को वापस बुलाने का अधिकार जनता को नहीं दिया गया हो .
   इसलिए मतदान को अनिवार्य बनाने के कर्तव्य के साथ उम्मीदवार को वापस बुलाने का अधिकार भी जनता को मिलना ही चाहिए .आखिर जनता के यदि कर्तव्य बढ़ाये जा रहे हैं तो सरकार के कर्तव्य भी तो बढ़ने चाहियें तभी तो सच्चे लोकतंत्र के दर्शन संभव होंगे .
   शालिनी कौशिक
     [कौशल ]
   [कानूनी ज्ञान ] 

सोमवार, 3 नवंबर 2014

नगर पालिका क्या करे फिर ?

उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम १९१६ के अधीन नगर पालिका के दो प्रकार के कर्तव्यों का उपबंध किया गया है अर्थात [१] अनिवार्य कर्तव्य  तथा [२] वैवेकिक कर्तव्य .इस अधिनियम की धारा ७ [४] के अन्तर्गत यह उपबंध किया गया है कि प्रत्येक नगर पालिका का यह कर्तव्य होगा  -
''सार्वजनिक सड़कों तथा स्थानों और नालियों की सफाई करना ,हानिकारक वनस्पति को हटाना और समस्त लोक उपताप का उपशमन करना ;''
 किन्तु अब लगता है कि समस्त कार्य जनता के ही सिर पर पड़ने वाला है क्योंकि अब हमारे मोदी जी इसे एक जनांदोलन के रूप में देख रहे हैं और इसकी वास्तविकता को और गैर ज़रूरी बोझ को नहीं देख रहे हैं या देखते हुए भी नज़र अंदाज़ कर रहे हैं .
  वास्तविकता तो ये है कि मोदी जी के आह्वान पर सलमान खान ,प्रियंका चोपड़ा जैसी हस्तियां इससे जुडी ज़रूर किन्तु जिस तरह से वे यहाँ विशिष्ट शख्सियत बनकर सफाई कर रही हैं ये केवल गंदगी को ही समझ में आ रहा है कि फ़िलहाल थोड़ी दूर रहो क्योंकि यहाँ फोटो खिंच रहा है और ज्यादा देर की तकलीफ इस कार्यक्रम से रहने वाली नहीं है और गैर ज़रूरी इसलिए कि ये कार्य जिस विभाग को कानून द्वारा सौंपा गया है यदि कानून को प्रभावी बनाते हुए उस विभाग को उसके कार्य को करने के लिए कर्तव्यबद्ध किया जाये तो इसे ऐसे नाटकों की आवश्यकता नहीं होगी जो प्रधानमंत्री जी सोशल मीडिया के जरिये कभी गन्दा स्थान दिखाते हुए फोटो अपलोड करने को कह रहे हैं ,फिर सफाई करते फोटो फिर साफ स्थान दिखाते हुए फोटो वीडियो अपलोड करने को कहते हैं .अगर प्रधानमंत्री जी अपने इस जनांदोलन की वास्तविकता ही देखना चाहते हैं तो जनता के बीच जाकर कहीं भी देख सकते हैं जहाँ स्वयं जनता और ये सरकारी विभाग ,जो इस कार्य हेतु नियुक्त हैं इस अभियान के विपरीत अस्वच्छ अभियान को जनांदोलन बनाकर उनके पवित्र अभियान को ठेंगा दिखा रहे हैं .

शालिनी कौशिक

  [कानूनी ज्ञान ]