विवाह संस्था का स्थायित्व खत्म करते कोर्ट निर्णय -शालिनी कौशिक एडवोकेट



इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक बार फिर से बहस का मुद्दा छेड़ दिया है लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक अहम निर्णय देते हुए. जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कहा कि 

"अदालत का काम कानून के अनुसार फैसला देना है, न कि सामाजिक या पारिवारिक नैतिकता के आधार पर। अगर कोई काम कानून के तहत अपराध नहीं है, तो सिर्फ समाज की सोच के कारण कोर्ट उसे गलत नहीं ठहरा सकता।"

दैनिक जनवाणी की रिपोर्ट में कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि

 "कोई शादीशुदा पुरुष यदि किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो यह अपने आप में कोई आपराधिक कृत्य नहीं है। जब तक किसी कानून का उल्लंघन नहीं हो रहा, तब तक अदालत इस तरह के रिश्ते को अपराध नहीं मानेगी। "

 न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक लिव इन जोड़े ने महिला के परिवार से मिल रही धमकियों के खिलाफ सुरक्षा की मांग की थी. समाचार पत्रों की रिपोर्टिंग के अनुसार  महिला के परिवार ने प्राथमिकी दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता, जो पहले से विवाहित है, उसने 18 वर्षीय युवती को बहला-फुसलाकर अपने साथ रखा है। परिवार का यह भी कहना था कि शादीशुदा होने के बावजूद किसी अन्य महिला के साथ रहना अपराध है। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि 

"ऐसा कोई अपराध नहीं है जिसमें एक विवाहित पुरुष, किसी वयस्क के साथ सहमति से लिव-इन संबंध में रहने पर अभियोजित किया जा सके।"

      इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के इस निर्णय ने एक तरह से विवाहित जोड़ों के एक पक्ष में अपनी वैवाहिक जिंदगी के स्थायित्व को लेकर एक भय सा उत्पन्न कर दिया है कि अगर विवाहित पुरुष का किसी अन्य महिला के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहना अपराध ही नहीं है तो विवाह संस्था की आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है?

➡️ लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) का मतलब -

 दो बालिग (18+ वर्ष) लड़का-लड़की बिना विवाह किए, आपसी सहमति से एक ही छत के नीचे पति-पत्नी की तरह रहते हैं। यह आधुनिक भारत में एक आम जीवनशैली है, जिसे भारतीय कानूनों के अनुसार अब अपराध नहीं माना जाता है। 

➡️ लिव-इन रिलेशनशिप के मुख्य बिंदु:

✒️ बिना शादी के साथ रहना:

 यह एक ऐसा रिश्ता है जिसमें विवाह अनिवार्य नहीं है, लेकिन पार्टनर साथ रहते हैं, खर्च साझा करते हैं और भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं।

✒️ लिव-इन रिलेशनशिप की कानूनी स्थिति: 

भारत में, बालिगों के बीच सहमति से बना लिव-इन रिलेशनशिप अवैध या अनैतिक नहीं है; यह एक व्यक्तिगत विकल्प है।

✒️ लिव-इन रिलेशनशिप में महिला के अधिकार: 

लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा प्राप्त है और वे भरण-पोषण (Maintenance) की हकदार हो सकती हैं।

✒️ लिव-इन रिलेशनशिप में बच्चों के अधिकार: 

यदि कपल लंबे समय तक साथ रहता है, तो उनसे पैदा हुए बच्चों को बालसुब्रमण्यम बनाम सुरत्तयन मामले में सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, माता-पिता की वैध संतान माना जाता है और उन्हें पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलता है।

       और ऐसे में  लिव-इन रिलेशनशिप में सुरक्षा /एग्रीमेंट के लिये भी राज्य सरकारें आगे आ रही हैँ. गुजरात में अभी हाल ही में इस संबंध में बिल पास किया गया है. लिव-इन रिलेशनशिप के विवादों से बचने के लिए, लिव-इन डीड (Live-in Deed) बनवाना और उसे पंजीकृत (Register) कराना सुरक्षित माना जा रहा है।

  और ये ही सब अधिकार और कानूनी व्यवस्थाएं विवाह संस्था की सुरक्षा व स्थायित्व हेतु की गई हैं और अगर अब हम देखते हैँ तो यही पाते हैं कि लिव इन रिलेशनशिप को जो दर्जा आज न्यायालय दे रहें हैँ वह इसे विवाह के समकक्ष ही रख रहें हैँ अंतर बस इतना हैं कि विवाह में सामाजिक रीति रिवाजों का पालन किया जाता है और लिव इन रिलेशनशिप में बस लड़का लड़की की अपनी सोच को ही कायम रखा जाता है.

एक महत्वपूर्ण आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट (सिंगल जज) ने 17 दिसंबर 2025 को कहा था कि 

" हालांकि लिव-इन रिलेशनशिप का कॉन्सेप्ट सभी को स्वीकार्य नहीं हो सकता है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा रिश्ता 'गैर-कानूनी' है या शादी की पवित्रता के बिना साथ रहना कोई अपराध है। इसमें यह भी कहा गया कि इंसान के जीवन का अधिकार "बहुत ऊंचे दर्जे" पर है, भले ही कोई जोड़ा शादीशुदा हो या शादी की पवित्रता के बिना साथ रह रहा हो। "

इसके साथ ही कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि 

"एक बार जब कोई बालिग व्यक्ति अपना पार्टनर चुन लेता है तो किसी अन्य व्यक्ति, चाहे वह परिवार का सदस्य ही क्यों न हो, उसको आपत्ति करने और उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने का अधिकार नहीं है। संविधान के तहत राज्य पर जो जिम्मेदारियां डाली गईं, उनके अनुसार हर नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।" 

इन टिप्पणियों के साथ जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों द्वारा पुलिस सुरक्षा की मांग वाली कई रिट याचिकाओं को मंज़ूरी दी थी, किन्तु यह बात ध्यान देने योग्य है कि 17 दिसंबर के एकल पीठ के निर्णय में लिव इन रिलेशन शिप में अपना पार्टनर चुनने का अधिकार बालिग़ व्यक्ति को दिया गया था न कि विवाहित पुरुष को, उस निर्णय में कहीं यह मुद्दा सामने नहीं आया था कि लिव इन रिलेशन शिप में रहने वाले कपल अपने पति या पत्नी को छोड़कर साथ रह रहे थे.

मौजूदा निर्णय में न्यायालय ने कहा है कि अदालत का काम कानून के अनुसार फैसला देना है, न कि सामाजिक या पारिवारिक नैतिकता के आधार पर। अगर कोई काम कानून के तहत अपराध नहीं है, तो सिर्फ समाज की सोच के कारण कोर्ट उसे गलत नहीं ठहरा सकता।"

➡️ विवाह -कानूनी दृष्टिकोण -

ऐसे में अगर समाज की सोच को परे रखते हुए हम केवल और केवल क़ानून की ही बात करते हैं तो 

1️⃣ पहले भारतीय दंड संहिता की धारा 494/495 और अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 82 के अनुसार 

✒️ धारा 82. पति या पत्नी के जीवनकाल में पुनः विवाह करना.-

 (1) जो कोई पति या पत्नी के जीवित होते हुए, किसी ऐसी दशा में विवाह करेगा जिसमें ऐसा विवाह इस कारण शून्य है कि वह ऐसे पति या पत्नी के जीवनकाल में होता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

अपवाद. - इस धारा का विस्तार किसी ऐसे व्यक्ति पर नहीं है, जिसका ऐसे पति या पत्नी के साथ विवाह सक्षम अधिकारिता के न्यायालय द्वारा शून्य घोषित कर दिया गया हो और न किसी ऐसे व्यक्ति पर है, जो पूर्व पति या पत्नी के जीवनकाल में विवाह कर लेता है, यदि ऐसा पति या पत्नी उस पश्चात्वर्ती विवाह के समय ऐसे व्यक्ति से सात वर्ष तक निरन्तर अनुपस्थित रहा हो, और उस काल के भीतर ऐसे व्यक्ति ने यह नहीं सुना हो कि वह जीवित है, परन्तु यह तब जब कि ऐसा पश्चात्वर्ती विवाह करने वाला व्यक्ति उस विवाह के होने से पूर्व उस व्यक्ति को, जिसके साथ ऐसा विवाह होता है, तथ्यों की वास्तविक स्थिति की जानकारी, जहां तक कि उनका ज्ञान उसको हो, दे दे।

(2) जो कोई उपधारा (1) के अधीन अपराध अपने पूर्व विवाह की बात उस व्यक्ति से छिपाकर करेगा, जिससे पश्चात्वर्ती विवाह किया जाए, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

2️⃣ बिना तलाक शादीशुदा व्यक्ति लिव-इन में नहीं रह सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट निर्णय 

जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने अभी अपने 20 मार्च को दिए निर्णय में कहा कि 

"यदि याचिकाकर्ता पहले से विवाहित हैं और उनके जीवनसाथी जीवित हैं, तो वे बिना पूर्व जीवनसाथी से तलाक लिए किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी रूप से नहीं रह सकते। उन्हें विवाह करने या लिव-इन संबंध में प्रवेश करने से पहले सक्षम न्यायालय से तलाक की डिक्री प्राप्त करनी होगी।”

     न्यायालयों के निर्णयों में यह मतभेद की स्थिति और कानूनी रूप से लिव इन रिलेशन शिप को लेकर यह उहापोह क़ानून के डांवाडोल होने का स्वरूप प्रस्तुत कर रहे हैँ. एक ओर जहाँ न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह लिव इन रिलेशन शिप का अधिकार केवल बालिग़ जोड़ों को दे रहे हैँ जो कि कानूनन व्यस्क अधिकार को लेकर सही भी कहा जायेगा, वहीं इलाहाबाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच का एक बालिग़ महिला का शादीशुदा पुरुष के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने को अपराध न मानना  और उस पर यह कहना कि 

"कोई शादीशुदा पुरुष यदि किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो यह अपने आप में कोई आपराधिक कृत्य नहीं है। जब तक किसी कानून का उल्लंघन नहीं हो रहा, तब तक अदालत इस तरह के रिश्ते को अपराध नहीं मानेगी। "

 Q-1️⃣ तो क्या शादीशुदा पुरुष का किसी व्यस्क महिला के साथ लिव इन में रहना क़ानून की "द्विविवाह अपराध "की अवधारणा में नहीं आता है?

Q-2️⃣ क्या लिव इन विवाह समान नहीं है फिर इसमें विवाहित जोड़ों के समान अधिकार क्यूँ मिलते हैँ?

      न्यायालय ने यह माना है कि अदालत का काम कानून के अनुसार फैसला देना है, न कि सामाजिक या पारिवारिक नैतिकता के आधार पर। अगर कोई काम कानून के तहत अपराध नहीं है, तो सिर्फ समाज की सोच के कारण कोर्ट उसे गलत नहीं ठहरा सकता। मौजूदा मामले में समाज की सोच को गलत कैसे ठहराया जा सकता है? न्यायालयों के निर्णयों मे यह अधिकार व्यस्को को दिया गया था न कि विवाहित जोड़ों को, शादीशुदा पुरुष के बारे में यह जानकारी तो कहीं भी सामने नहीं आ रही है कि उसकी पत्नी जीवित नहीं है या वह उससे विधिवत कानूनी रूप से तलाक ले चुका है और अगर ऐसा नहीं है तो उस शादीशुदा पुरुष का किसी अन्य व्यस्क महिला के साथ लिव इन में रहना अपराध की श्रेणी में क्यूँ नहीं माना जा रहा है. न्यायालय द्वारा समाज की सोच को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में महत्वहीन ठहराया जा सकता है किन्तु यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि समाज की महत्वपूर्ण प्रथाएँ ही आगे चलकर क़ानून का रूप लेती रही हैँ और आगे भी लेती रहेंगी, जिस किसी कृत्य को समाज ने महत्व नहीं दिया है वह कृत्य धीरे धीरे समाज में कार्यान्वित होना बंद ही हो गया है और आज लिव इन रिलेशन शिप का इतना उभर जाने का कारण ही समाज की इस ओर उदासीनता है जिसके परिणाम स्वरुप भारतीय सामाजिक ढांचा खत्म ही होता जा रहा है.

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट

कैराना (शामली )



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