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रजिस्टर्ड एडवोकेट को ही वकालत का अधिकार - इलाहाबाद हाइकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि  कोई भी व्यक्ति, भले ही उसके पास पावर ऑफ़ अटॉर्नी हो, एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए मुक़दमे लड़ने वालों की ओर से और उनकी तरफ़ से एक वकील या अटॉर्नी के तौर पर अधिकार के तौर पर पेश होकर बहस नहीं कर सकता।  एडवोकेट्स एक्ट 1961 की धारा 29 और 33 का ज़िक्र करते हुए जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने साफ़ तौर पर कहा कि   सिर्फ़ "रजिस्टर्ड वकील" ही किसी दूसरे व्यक्ति की ओर से कोर्ट के सामने पेश होकर बहस कर सकते हैं। बेंच ने आगे कहा कि  हालांकि कोई भी व्यक्ति कोर्ट की मंज़ूरी से किसी सीमित मकसद के लिए किसी दूसरे व्यक्ति का केस पेश कर सकता है और बहस कर सकता है, लेकिन अधिकार के तौर पर ऐसा नहीं कर सकता [धारा 32]।  इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने एक याचिका खारिज की, जिसमें याचिकाकर्ता ने मुक़दमे लड़ने वालों की ओर से और उनकी तरफ़ से केस लड़ने और बहस करने की इजाज़त माँगी थी, जबकि वह न तो क़ानून का जानकार ग्रेजुएट था और न ही बार काउंसिल में रजिस्टर्ड था। संक्षेप में केस -  याचिकाकर्ता [विश्राम सिंह] ने दावा किया कि व...