समर्थक

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

फांसी और वैधानिक स्थिति







पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी जी के हत्यारों मुरुगन,संतन,और पेरारिवलन की फाँसी की सजा ८ सप्ताह तक टालना एक  बार फिर फाँसी को लेके विवादों को जन्म दे गया इनकी फाँसी की सजा को माफ़ करने के पक्ष में तमिलनाडु के कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए कांचीपुरम में सेनकोदी[२७] नाम की महिला ने खुद को आग लगा कर जान दे दी .२९ अगस्त को कानून के करीब १०० छात्रों ने ट्रैफिक जाम कर दिया.वहीँ ''द हिन्दू गवर्नमेंट ला कॉलेज''के छात्रों ने त्रिची में ''रेल रोको'आन्दोलन किया .जबकि दंड विधि के अंतर्गत फाँसी के लिए निम्न व्यवस्थाएं की गयी हैं-

१-भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ना या युद्ध करने का प्रयत्न या दुष्प्रेरण करना ;[धारा १२१]
२- सैनिक विद्रोह का दुष्प्रेरण,[धारा १३२]
३- मृत्यु दंड से दंडनीय अपराध के लिए किसी व्यक्ति  की दोषसिद्धि करने के आशय से उसके विरुद्ध मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना [धारा १९४]
४- हत्या[धारा-३०२]
५- आजीवन कारावास के दंडादेश के अधीन रहते हुए किसी व्यक्ति की हत्या करना [धारा ३०३]
६- किसी शिशु या उन्मत्त व्यक्ति को आत्महत्या करने के  लिए दुष्प्रेरित करना [धारा ३०५]
७- आजीवन सिद्धदोष अभियुक्त द्वारा हत्या का प्रयास [धारा ३०७]
८- हत्या सहित डकैती [धारा ३९६]
उल्लेखनीय है कि उपर्युक्त अपराधों में से केवल क्रमांक ५ में वर्णित धारा ३०३ के अपराध को छोड़कर शेष सभी सात अपराधों के लिए मृत्युदंड के विकल्प के रूप में आजीवन   कारावास का दंड दिया जा सकता है लेकिन धारा ३०३ के अपराध के लिए केवल मृत्यु दंड की एकमात्र सजा का प्रावधान है .परन्तु सन १९८३ में मिट्ठू बनाम पंजाब राज्य ए.आई .आर.१९८३ सु.कोर्ट .४७३ के प्रावधान की वैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि उक्त धारा के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद १४ एवं २१ से विसंगत थे .उच्चतम न्यायालय की पञ्च न्यायाधीशों की खंडपीठ ने ,जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.वाई .चन्द्रचूढ़ कर रहे थे ,ने इस वाद में विनिश्चित किया की धारा ३०३ असंवैधानिक थी क्योंकि इसके अंतर्गत मृत्यु दंड दिया जाना अनिवार्य रखा गया था जबकि अन्य अपराधों के लिए आजीवन कारावास  के विकल्प रखे गए थे अतः इस निर्णय के बाद सभी प्रकार की हत्याएं चाहे वे आजीवन कारावास भोग रहे अभियुक्त के द्वारा क्यों न की गयी हों ,भारतीय दंड सहिंता की धारा ३०२ के अंतर्गत ही दंडनीय होती हैं
ये सब तो हुई कानूनी बात पर इस विषय पर यदि हम मानवीय रुख की बात करते हैं तो हम पाते  हैं कि जो अपराध फाँसी की  श्रेणी में रखे गए हैं वे सभी अपराध करने वाले अभियुक्त इसी सजा के हक़दार हैं आप खुद ही सोचिये  धारा १२१ में भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध  करने का दुष्प्रेरण करना ;क्या ये अपराध किसी माफ़ी के लायक है?
ऐसे ही यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को किसी के मिथ्या साक्षी के कारण फाँसी हो जाती है तो क्या ये अपराधी फाँसी से कम सजा का हक़दार है?
आज अपहरण एक धंधा बन गया है और इसमें क्या हत्या होने पर फाँसी नहीं मिलनी चाहिए?
ऐसे ही  कई सवाल आज के जनमानस के मन में हैं कि राजीव गाँधी जी की हत्या करने वाले अभियुक्त आज तक जिंदा घूम रहे हैं इनसे कैसी सहानुभूति दिखाई जा रही है जबकि ये फाँसी के ही हक़दार हैं क्योंकि सु.कोर्ट ने भी ''रेयरेस्ट ''मामलों में अर्थात गंभीरतम अपराध के मामले में फाँसी का प्रावधान किया है और ये मामले गंभीरतम है.
   शालिनी कौशिक 

8 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी प्रस्तुति |
    बहुत-बहुत बधाई ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. Bahut badhiya kanooni gyan diya aapne.
    Rahi bat fansi ki to yaho to hamare desh ki vidambana hai ki ek to insaf hone me had se jyada samay lag jata hai. Aur jab mil bhi jata hai to implement nahi ho pata. Tamil log Rajeev Gandhi ke hatyaron ki fansi taal rahe hain to Congress khud Afjal aur Kasab jaise Atankvadiyon ko fansi nahi hone dena chahti.
    Tamil nadu vidhansabha me prastav pas kara kar President se punavichar karne ko kaha gaya hai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. सच ये है किसी का दर्द हमें तकलीफ देता है...
    http://jan-sunwai.blogspot.com/2010/10/blog-post_4971.html

    मिलाइए हाथ क्योंकि एक और एक ग्यारह.

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच ये है किसी का दर्द हमें तकलीफ देता है...

    http://jan-sunwai.blogspot.com/2010/10/blog-post_4971.html

    उत्तर देंहटाएं