माननीय...... कौन? - इलाहाबाद हाईकोर्ट

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि किसी भी रैंक के सिविल सेवक माननीय संबोधन के पात्र नहीं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सांसद, मंत्री, जज व अन्य ऐसे संवैधानिक पदाधिकारी ही इस सम्मानसूचक संबोधन के हकदार हैं। कोर्ट ने कहा कि संप्रभु कार्यों का निर्वहन करने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को प्रत्येक आधिकारिक संचार माध्यमों में माननीय संबोधन दिया जाना चाहिए।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने हर्षित शर्मा एवं अन्य की आपराधिक याचिका की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी नाराजगी या पारिवारिक परिचय के आधार पर किसी संवैधानिक पदाधिकारी को उसके वैधानिक सम्मानसूचक संबोधन से वंचित नहीं किया जा सकता। केंद्र व राज्य सरकारों के मंत्री, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के जज, लोकसभा एवं राज्यसभा के अध्यक्ष/सभापति, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष, सांसद एवं विधायक ही माननीय संबोधन के अधिकारी हैं। खंडपीठ ने यह भी कहा कि प्रोटोकॉल के अनुसार अन्य समान पदाधिकारी भी इस सम्मान के पात्र हो सकते हैं और जो भी इसके हकदार हों, उन्हें उसी प्रकार संबोधित किया जाना चाहिए।

मामले के तथ्यों के अनुसार गत 31 मार्च को सुनवाई के समय कोर्ट ने यूपी पुलिस द्वारा एफआईआर में सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के नाम से पहले माननीय न लिखे जाने पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद कोर्ट ने प्रदेश शासन के अपर मुख्य सचिव गृह से स्पष्टीकरण मांगा था। 30 अप्रैल को हलफनामे में बताया गया कि खजान सिंह की तहरीर में अनुराग ठाकुर के नाम के साथ माननीय नहीं लिखा गया और वही विवरण ज्यों-का-त्यों एफआईआर में दर्ज कर लिया गया। शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि उसे सांसदों या पूर्व केंद्रीय मंत्रियों के लिए ऐसे प्रोटोकॉल की जानकारी नहीं थी।

इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सांसद होने के नाते अनुराग ठाकुर माननीय संबोधन के पूर्णतः अधिकारी हैं। कोर्ट ने कहा कि माननीय शब्द केवल उन्हीं संवैधानिक पदाधिकारियों के नाम के साथ लगाया जाना चाहिए, जो शासन के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में संप्रभु शक्तियों का प्रयोग करते हैं। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि यह सम्मानसूचक संबोधन सिविल सेवकों पर लागू नहीं होता चाहे उनका पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो।


रिकॉर्ड पर लेते हुए कोर्ट ने विवाद का यह भाग समाप्त कर दिया

मामले के इस पहलू पर राज्य सरकार और विपक्षी के जवाबी हलफनामों को रिकॉर्ड पर लेते हुए कोर्ट ने विवाद का यह भाग समाप्त कर दिया। मुख्य मामला धमकी और आपराधिक न्यासभंग से संबंधित एफआईआर रद्द कराने की याचिका से जुड़ा है। याचिका में पूर्व केंद्रीय मंत्री का नाम प्राथमिकी में है। हालांकि उन्हें आरोपी नहीं बनाया गया।

स्रोत - हिन्दुस्तान 

⚫ निर्णय - हर्षित शर्मा एवं अन्य की आपराधिक याचिका (Criminal Misc. Writ Petition No. 4982 of 2026) में दिया है।

⚫ निर्णय/आदेश की तिथि: यह आदेश 30 अप्रैल 2026 को पारित किया गया था।

⚫ पीठ (Bench): यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने की है।

प्रस्तुति 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

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