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अविवाहित बेटी का भरण-पोषण अधिकार

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अविवाहित बेटी का भरण-पोषण  अधिकार  दंड प्रक्रिया सहिंता १९७३ की धारा १२५ [१] के अनुसार ''यदि पर्याप्त साधनों वाला कोई व्यक्ति - ............................................................................................................................................... [ग] -अपने धर्मज या अधर्मज संतान का [जो विवाहित पुत्री  नहीं है ],जिसने वयस्कता प्राप्त कर ली है ,जहाँ  ऐसी संतान किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण अपना भरण -पोषण करने में असमर्थ है ,.......... ........................................................................................................................................................ भरण पोषण करने की उपेक्षा करता है  या भरण पोषण करने से इंकार करता है तो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट ,ऐसी उपेक्षा या इंकार साबित होने पर ,ऐसे व्यक्ति को ये निर्देश दे सकेगा कि वह अपनी ऐसी संतान को ऐसी मासिक दर पर जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे भरण पोषण मासिक भत्ता दे . और इसी कानून का अनुसरण  करते हुए  मुंबई हाई क...

कोई कानूनी विषमता नहीं ३०२ व् ३०४[बी ]आई.पी.सी.में

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कोई कानूनी विषमता नहीं ३०२ व् ३०४[बी ]आई.पी.सी.में  17 सितम्बर 2012 दैनिक जागरण में पृष्ठ २ पर माला दीक्षित ने एक दोषी की दलील दी है जिसमे दहेज़ हत्या के दोषी ने अपनी ओर से एक अहम् कानूनी मुद्दा उठाया है .दोषी की दलील है -     ' 'आई.पी.सी.की धारा ३०४ बी [दहेज़ हत्या ]और धारा ३०२ [हत्या ]में एक साथ मुकदमा  नहीं चलाया जा सकता .दोनों धाराओं में  बर्डन  ऑफ़ प्रूफ को लेकर कानूनी विषमता है जो दूर होनी चाहिए .''     धारा ३०२ ,जिसमे हत्या के लिए दंड का वर्णन है और धारा ३०४ बी आई.पी.सी.में दहेज़ मृत्यु का वर्णन है और जहाँ तक दोनों धाराओं में सबूत के भार की बात है तो दांडिक मामले  जिसमे धारा ३०२ आती   है में सबूत का भार अभियोजन पर है क्योंकि दांडिक मामलों में  न्यायालय  यह उपधारना करता है  कि अभियुक्त निर्दोष है अतः सबूत का भार अभियोजन पर है कि वह दोषी है .     दूसरी ओर दहेज़ मृत्यु के मामले में धरा ३०४-बी जो कि सन १९८६ में १९.११.८६ अधिनियम ४३ से   जोड़ी गयी ,में ...

श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.

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श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.    आज यदि देखा जाये तो महिलाओं  के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है और इसका एक परिणाम तो ये हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए है और स्त्री का आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं  जहाँ एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है वहीँ कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर  उसे नित्य-प्रति नए खतरों का सामना करना पड़ता है . कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी हैं किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव  नहीं हो पाया है.इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ''विशाखा बनाम राजस्थान राज्य ए.आई.आर.१९९७ एस.सी.सी.३०११ ''का निर्णय विशेष महत्व रखता है इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीडन को रोकने के लिए  विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं .न्यायालय ने यह कहा ''कि देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्...

प्रोन्नति में आरक्षण :सरकार झुकना छोड़े

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प्रोन्नति में आरक्षण :सरकार  झुकना  छोड़े    [गूगल  से  साभार ] '' सियासत  को लहू पीने  की लत है,     वर्ना मुल्क में सब खैरियत है .''        ये पंक्तियाँ  अक्षरश:  खरी  उतरती हैं सियासत पर  ,जिस आरक्षण को दुर्बल व्यक्तियों को सशक्त व्यक्तियों से  बचाकर पदों की उपलब्धता  सुनिश्चित करने के लिए  लागू  किया गया था . जिसका  मुख्य  उद्देश्य  आर्थिक , सामाजिक , शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े  लोगों को देश की  मुख्य  धारा  में लाना था उसे  सियासत  ने  सत्ता  बनाये  रखने  के लिए '' वोट '' की  राजनीति में  तब्दील   कर  दिया .      सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण इलाहाबाद उच्च  न्यायालय    ने ख़ारिज कर दिया था .इसी  साल अप्रैल  में उच्चतम  न्याया...

ऑनर किलिंग:सजा-ए-मौत की दरकार नहीं

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ऑनर किलिंग:सजा-ए-मौत की दरकार नहीं  ''प्रेम''जिसके विषय में शायद आज तक सबसे ज्यादा लिखा गया होगा,कहा गया होगा ,कबीर दास भी कह गए- ''ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए'' देवल आशीष कहते हैं- ''प्यार कर्म ,प्यार धर्म प्यार प्रभु नाम है.''       प्रेम जहाँ एक ओर कवियों ,लेखकों की लेखनी का प्रिय विषय रहा है वहीँ समाज में सभ्यता की राह में कांटे की तरह महसूस किया गया है और इसी कारण प्रेमी जनों को अधिकांशतया प्रेम की कीमत बलिदान के रूप में चुकानी पड़ी है  किन्तु प्रेम की भी एक सीमा होती है और जो प्रेम सीमाओं में मर्यादाओं में बंधा हो उसे बहुत सी बार सम्मान सहित स्वीकृति भी मिली है ,किन्तु आज प्रेम का एक अनोखा रूप सामने आ रहा है और इसकी परिणिति कभी भी समाज की स्वीकृति हो ही नहीं सकती क्योंकि प्रेम का यह रूप मात्र वासना का परिचायक है   इसमें प्रेम शब्द की पवित्रता का कोई स्थान नहीं है और इस प्रेम को कथित प्रेमी-प्रेमिका के परिजन कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते और इसके कारण उनकी भावनाएं इस कदर उत्तेजना का रूप ले लेती हैं जि...

मोहपाश को छोड़ सही रास्ता दिखाएँ .

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मोहपाश को छोड़ सही रास्ता दिखाएँ .    जुबैर अहमद अपने ब्लॉग ''बी.बी.सी ''में लिखते हैं कि राजेश  खन्ना जी को शायद तनहाइयाँ  मर गयी .तन्हाई शायद यही तन्हाई उनकी जिंदगी में अनीता आडवानी के साथ लिव -इन- रिलेशन के रूप में गुज़र रही थी  न केवल फिल्मो में बल्कि आज सभी जगह देश हो या  विदेश शहर हो या गाँव अपनों के साथ छोड़ने पर बड़ी उम्र के लोग तनहाइयों में जीवन गुज़ारने को विवश हैं और उनमे से कितने ही ये रास्ता अपनाने लगे हैं जिसकी शायद उन्होंने  उम्र  के आरंभिक दौर में आलोचना की होगी. अभी हाल ही में शामली [उत्तर प्रदेश ]में ओम प्रकाश -गसिया प्रकरण चर्चा में रहा .बेटों ने बाप की वृद्धावस्था में देखभाल नहीं की और एक अन्य महिला ने जब सेवा -सुश्रुषा की तो उसे अपनी पेंशन जो स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्हें मिलती है ,दिलाने के लिए उन्होंने कोर्ट-मैरिज की सोची  ये समाचार फैलते ही बेटों के आराम में खलल पड़ा और उन्होंने इसे रोकने को एडी चोटी का जोर लगा दिया .हाल ये है कि प्रतिष्ठा व...

कानूनी रूप से अपराध के विरुद्ध उचित कार्यवाही

आज शिखा जी के ब्लॉग विचारों के चबूतरा पर एक आलेख पढ़ा और ज्ञात हुआ की एक समुदाय  फेसबुक पर  प्रो.अम्बिकेश महापात्र के कार्टून कृत्य को समर्थन दे रहा  हैं और इसे भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त ''अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ''पर प्रहार कहा जा रहा है जबकि मैं शिखा जी के आलेख से बहुत प्रभावित हुई हूँ और चाहती हूँ की आपसे  भी उस आलेख को शेयर करूँ इसलिए आपको उस आलेख का लिंक दे रही हूँ जो निम्न है- ''तो सड़कों पर पिटने और जेल जाने को तैयार रहें''             और इसके  साथ ही  मैं आपको ये भी बता  दूं  की भारतीय संविधान  ये स्वतंत्रता   हमें आत्यंतिक रूप से नहीं देता  है बल्कि  इस  पर अनु.१९[२] के अंतर्गत प्रतिबन्ध भी लगाया जा सकता है .अनु.१९[२] में प्रतिबन्ध के निम्न आधार हैं- १-राज्य की सुरक्षा २-विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के हित में 3-लोक व्यवस्था ४-शिष्टाचार या सदाचार के हित में ५-न्यायालय अवमान ६-मानहानि ७-अपराध उद्दीपन के मामले में  ८-भारत की प्रभुता एवं अखंडता ...