राजनीतिक आकाओं को खुश करने में लगी यू पी पुलिस - इलाहाबाद हाई कोर्ट

 


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि 

राज्य के पुलिस अधिकारी संविधान के प्रति वफादार होने के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए काम करते हैं।

अदालत ने यूपी गैंगस्टर एक्ट के दुरुपयोग और बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के की जाने वाली गिरफ्तारियों पर गहरी चिंता जताई। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर द्वारा गाजियाबाद के एक मामले की सुनवाई करते हुए 31 पन्नों के विस्तृत फैसले में दी गई । 

   मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने यह कड़ी टिप्पणियां गाजियाबाद के निवासी राजेंद्र त्यागी द्वारा उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986 के संबंध में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं। सुप्रीम कोर्ट भी इस 1986 के अधिनियम से जुड़े मुद्दों पर विचार कर रही है, इसलिए जस्टिस दिवाकर ने इस मामले में कोई अंतिम फैसला सुनाने से परहेज किया।

इस मामले से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

संविधान से ऊपर सत्ता: कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की निष्ठा संविधान के प्रति न होकर सत्ताधारी दल के प्रति होती है। फील्ड अधिकारी ट्रांसफर और पोस्टिंग के खेल से भली-भांति वाकिफ होते हैं और राजनीतिक आकाओं को संतुष्ट करने के लिए अपना आचरण बदलते हैं।

राजनीतिक संरक्षण: अदालत ने पाया कि तबादले, पोस्टिंग और पदोन्नति योग्यता-आधारित शासन के बजाय राजनीतिक संरक्षण के साधन बन गए हैं। वफादार अधिकारियों को मनपसंद मलाईदार पोस्टिंग दी जाती है, जबकि स्वतंत्र रूप से काम करने वालों का तबादला कर दिया जाता है।

गैंगस्टर एक्ट का दुरुपयोग: कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों द्वारा यूपी गैंगस्टर एक्ट और निवारक हिरासत जैसे सख्त कानूनों का मनमाना और दुरुपयोग किया जाता है। कई बार निजी विवादों को भी संगठित अपराध का रूप देकर इसमें फंसा दिया जाता है।

गृह सचिव को फटकार: अदालत ने राज्य के गृह सचिव को भी आड़े हाथों लिया और सरकार से अपने प्रशासनिक अधिकारियों की उपयुक्तता का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करने को कहा।

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

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