आपसी सहमति से तलाक मे वापसी नहीं : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि
भले ही आपसी सहमति से तलाक के मामलों में कोई भी पक्ष अंतिम डिक्री से पहले अपनी सहमति वापस ले सकता है, लेकिन यदि पति-पत्नी के बीच सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम समझौता (Full & Final Settlement) हो चुका हो, तो उस समझौते की शर्तों से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं है।
जस्टिस राजेश बिंडल और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें पत्नी द्वारा अदालत-मान्य मध्यस्थता समझौते से पीछे हटने पर कड़ी नाराज़गी जताई गई।
➡️ पूरा मामला:
विवादित पक्षों की शादी वर्ष 2000 में हुई थी। वर्ष 2023 में पति ने तलाक की याचिका दायर की, जिसके बाद फैमिली कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। मध्यस्थता में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत उन्होंने आपसी सहमति से तलाक लेने और सभी विवादों का निपटारा करने पर सहमति जताई। समझौते के अनुसार, पति ने पत्नी को ₹1.5 करोड़ दो किश्तों में देने, ₹14 लाख कार खरीद के लिए देने और कुछ आभूषण सौंपने पर सहमति दी। वहीं, पत्नी ने संयुक्त व्यवसाय खाते से ₹2.5 करोड़ पति को ट्रांसफर करने पर सहमति व्यक्त की। इसके बाद दोनों ने संयुक्त रूप से आपसी सहमति से तलाक की याचिका दाखिल की और आंशिक भुगतान भी किया गया।
हालांकि, दूसरी मोशन से पहले पत्नी ने अपनी सहमति वापस ले ली और बाद में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत शिकायत भी दर्ज कर दी, जिस पर मजिस्ट्रेट ने समन जारी किए।
➡️ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि
आपसी सहमति से तलाक में सहमति वापस लेने का अधिकार कानून में निहित है, लेकिन यह अधिकार उन मामलों में लागू नहीं होता, जहां पक्षकारों ने मध्यस्थता के माध्यम से अपने सभी विवादों का अंतिम समाधान कर लिया हो।
पीठ ने कहा कि
एक बार मध्यस्थ द्वारा प्रमाणित और अदालत द्वारा स्वीकार किया गया समझौता मूल विवाद को प्रतिस्थापित कर देता है और वही पक्षों के बीच लागू ढांचा बन जाता है। ऐसे में उससे पीछे हटना न्यायिक प्रक्रिया और मध्यस्थता व्यवस्था की बुनियाद पर आघात है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि
बिना उचित कारण के समझौते से पीछे हटने वाले पक्ष पर भारी लागत (Heavy Costs) लगाई जानी चाहिए, ताकि मध्यस्थता प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोका जा सके।
➡️ पत्नी के दावों पर कड़ी टिप्पणी
पत्नी ने यह दलील दी कि समझौते के अलावा पति ने उसे ₹120 करोड़ के आभूषण और ₹50 करोड़ के सोने के बिस्कुट देने का वादा किया था, जिसे टैक्स से बचने के लिए लिखित समझौते में शामिल नहीं किया गया। इस पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसी दलील न्यायालय के समक्ष देना न्याय प्रणाली के प्रति स्पष्ट अनादर दर्शाता है।
➡️ DV Act कार्यवाही पर कोर्ट की राय
कोर्ट ने पाया कि 23 वर्षों के वैवाहिक जीवन के दौरान पहली बार घरेलू हिंसा का आरोप लगाया गया और यह शिकायत पति द्वारा अवमानना याचिका दायर करने के बाद की गई। ऐसे में कोर्ट ने इसे “बाद में सोचा गया कदम (afterthought)” माना।
➡️ अंतिम आदेश
मामले में विवाह को अपरिवर्तनीय रूप से टूट चुका मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह को भंग कर दिया। साथ ही, घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया गया और पति को शेष राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। यह फैसला मध्यस्थता समझौतों की बाध्यता और उनकी न्यायिक मान्यता को मजबूत करता है, साथ ही यह स्पष्ट करता है कि ऐसे समझौतों से मनमाने तरीके से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं होगा।
स्रोत - LIVELAW. IN
प्रस्तुति
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)

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