अविवाहित सरकारी कर्मचारी-मृत्यु - अनुकम्पा नियुक्ति

 


अविवाहित सरकारी कर्मचारी की मृत्यु होने पर, अनुकंपा नियुक्ति उनके परिवार के आश्रित सदस्य को मिलती है। प्राथमिकता के क्रम में आमतौर पर माता-पिता या भाई-बहन (यदि अविवाहित सरकारी कर्मचारी पर पूरी तरह आश्रित हों) हकदार होते हैं या यदि मृतक व्यक्ति द्वारा किसी को अपने वारिस के तौर पर नामांकित किया गया हो तो वह हकदार होता है. यह नियुक्ति परिवार की आर्थिक मदद के लिए दी जाती है, न कि अधिकार के तौर पर। 

➡️ नगर पंचायत निदेशक बनाम एम जयबाल (2025) के केस में 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ के न्यायमूर्ति मनमोहन व न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने इस तथ्यात्मक संरचना का उपयोग करते हुए, समेकित और सशक्त तरीके से, कानून के चार केंद्रीय सिद्धांतों को दोहराया:

1️⃣ अनुकंपा नियुक्ति कोई निहित अधिकार नहीं है , बल्कि यह अचानक आए वित्तीय संकट से निपटने के लिए दी जाने वाली एक बार की रियायत है ।

2️⃣ एक बार आश्रित व्यक्ति अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का प्रस्ताव स्वीकार कर लेता है, तो विचार करने का अधिकार "पूर्ण" हो जाता है ; दोबारा मौका नहीं मिल सकता या " अनंत करुणा " का कोई अवसर नहीं हो सकता।

3️⃣ किसी आश्रित को केवल इसलिए मृतक के पद से उच्च पद पर नियुक्ति की मांग नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसके पास उच्च योग्यताएं हैं।

4️⃣ अवैध या अनियमित नियुक्तियों (नकारात्मक समानता) के आधार पर की गई समानता और अत्यधिक देरी के बाद की गई नियुक्तियों पर विचार नहीं किया जाएगा।

➡️ मुख्य नियम और पात्र व्यक्ति:

आश्रित परिवार: मृतक के माता-पिता या यदि अविवाहित बहन थी, तो भाई।

आवेदन समय: मृत्यु के आमतौर पर 1 से 5 वर्ष के भीतर।

शैक्षणिक योग्यता: आवेदक के पास पद के लिए आवश्यक योग्यता होनी चाहिए।

पद: नियुक्ति आमतौर पर ग्रुप 'सी' या 'डी' (क्लर्क/चपरासी) के पदों पर होती है। 

➡️ महत्वपूर्ण दस्तावेज:

अनुकंपा नियुक्ति के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र, उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (तहसीलदार/एसडीएम कार्यालय से), और परिवार की आय का विवरण देना आवश्यक होता है। 

यदि परिवार आर्थिक रूप से सक्षम है या अन्य सदस्य पहले से ही सरकारी नौकरी में है, तो आवेदन विभाग द्वारा खारिज किया जा सकता है। इसके साथ ही भारत के सर्वोच्च न्यायालय और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता के संशोधनों के बाद, कानूनी उत्तराधिकार के मामले में विवाहित या अविवाहित बेटी के बीच का भेदभाव पूरी तरह समाप्त हो गया है।

➡️ उत्तर प्रदेश के संदर्भ में मुख्य बिंदु यहाँ दिए गए हैं:

समान अधिकार: बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, उसे अपने पिता की संपत्ति में बेटे के बराबर ही कानूनी उत्तराधिकारी माना जाता है 

उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate): यदि संपत्ति (भूमि, बैंक खाता, आदि) के हस्तांतरण को लेकर कोई विवाद है या सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराना है, तो संबंधित तहसीलदार या एसडीएम कार्यालय से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र या वारिसान प्रमाण पत्र (Legal Heir Certificate) प्राप्त करना अनिवार्य होता है।

प्रक्रिया: इसके लिए आपको तहसीलदार/एसडीएम के समक्ष आवेदन करना होता है। इसके बाद पैमाइश और विरासत के माध्यम से बेटे बेटी का नाम रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है। 

यह कानून महिलाओं को सशक्त बनाने और लैंगिक समानता सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

अन्य किसी जानकारी के लिए ब्लॉग के कमेन्ट सेक्शन में टिप्पणी करें, जिसे हम आवश्यक समझते हुए प्रकाशित करेंगे और आपकी समस्या का समाधान प्रस्तुत करेंगे. ब्लॉग को फॉलो करना न भूलें. धन्यवाद 🙏🙏

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मृतक का आश्रित :अनुकम्पा नियुक्ति

बार कौंसिल ऑफ़ उत्तर प्रदेश चुनाव 2025-26( सम्पूर्ण जानकारी )

COP लेना है, पर कैसे