वकील गारंटर नहीं - गौहाटी हाई कोर्ट



 गौहाटी हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि याचिका दायर करने और बहस करने के बाद वकील को याचिकाकर्ता के ठिकाने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वकील अपने मुवक्किल के भौतिक ठिकाने (whereabouts) के लिए गारंटर नहीं बन सकते।

इस फैसले (केस) से जुड़ी मुख्य डिटेल्स और पक्षकार निम्नलिखित हैं:

1. केस का नाम और अपील संख्या

• केस का नाम: हरबिंदर सिंह कालसी और अन्य बनाम असम राज्य और 25 अन्य (Harbinder Singh Kalsi and Another v. State of Assam and 25 Others)

• अपील संख्या: Writ Appeal No. WA/51/2026

2. मुख्य पक्षकार (Parties Details)

• अपीलकर्ता (Advocates जिन्होंने अपील की): वकील हरबिंदर सिंह कालसी (Harbinder Singh Kalsi) और वकील रौनक सुल्ताना सादियाल (Rounak Sultana Sadial)।

• मूल याचिकाकर्ता (जिनके लापता होने पर विवाद था): बेओलिन खरभीह (Beolin Kharbhih), जिन्होंने खुद को पूर्व डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) की बेटी बताते हुए अपने पिता की मौत की कोर्ट-निगरानी में जांच (Court-monitored probe) कराने के लिए 2016 में रिट याचिका दायर की थी।

• प्रतिवादी (Respondents): असम राज्य (State of Assam) और अन्य। कोर्ट में प्रतिवादी संख्या 6, 7 और 8 की तरफ से एडवोकेट ए. मेना (Mr. A. Mena) पेश हुए।

3. सुनवाई करने वाली पीठ (Bench)

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार (Chief Justice Ashutosh Kumar) और न्यायाधीश अरुण देव चौधरी (Justice Arun Dev Choudhury) की डिवीजन बेंच ने की।

4. मामले की पृष्ठभूमि और हाई कोर्ट का निर्णय

• सिंगल जज का पुराना आदेश: वर्ष 2016 में दायर यह याचिका लगभग 6 साल तक लंबित रही। जब सीआईडी (CID) जांच में याचिकाकर्ता महिला अपने दिए पते पर नहीं मिली, तो सिंगल जज ने इसे "घोस्ट फाइलिंग" (फर्जी याचिका) का मामला मानते हुए याचिका खारिज कर दी थी। साथ ही दोनों वकीलों पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया था और उनके खिलाफ बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मामला भेज दिया था।

• डिवीजन बेंच का ताजा फैसला: डिवीजन बेंच ने वकीलों की अपील को स्वीकार करते हुए ₹50,000 के जुर्माने और बार काउंसिल को भेजे गए रेफरल के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया।

• अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी: कोर्ट ने साफ किया कि याचिका दायर करने और मामले में बहस करने के बाद अगर याचिकाकर्ता लापता हो जाता है या कोर्ट में पेश नहीं होता, तो उसके लिए वकीलों को जिम्मेदार ठहराना अनुचित और बहुत कठोर है।

• हालांकि, कोर्ट ने वकीलों को भविष्य के लिए आगाह किया कि किसी साथी वकील के कहने या दोस्ती में वकालतनामा (Vakalatnama) स्वीकार करते समय उन्हें मुकदमे और मुवक्किल की सत्यता की जांच अच्छे से कर लेनी चाहिए।

द्वारा

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट

कैराना (शामली) 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मृतक का आश्रित :अनुकम्पा नियुक्ति

बार कौंसिल ऑफ़ उत्तर प्रदेश चुनाव 2025-26( सम्पूर्ण जानकारी )

COP लेना है, पर कैसे