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शनिवार, 28 जून 2014

क्या पुरुषों को सम्मान से जीने का अधिकार नहीं ?

Pavitra Bandhan 20th June 2014 EpisodePavitra Bandhan 25th June 2014 Episode

[False dowry case? Man kills self

Express news service Posted: Feb 07, 2008 at 0321 hrs
Lucknow, February 6 A 30-year-old man, Pushkar Singh, committed suicide by hanging himself from a ceiling fan at his home in Jankipuram area of Vikas Nagar, on Wednesday.In a suicide note, addressed to the Allahabad High Court, Singh alleges that he was framed in a dowry case by his wife Vinita and her relatives, due to which he had to spend time in judicial custody for four months.
The Vikas Nagar police registered a case later in the day.
“During the investigation, if we find it necessary to question Vinita, we will definitely record her statement,” said BP Singh, Station Officer, Vikas Nagar.
Pleading innocence and holding his wife responsible for the extreme step he was taking, Singh’s note states: “I was sent to jail after a false dowry case was lodged against me by Vinita and her family, who had demanded Rs 14 lakh as a compensation. Neither my father nor I had seen such a big amount in our lives. We even sold our house to contest the case.”
According to reports, Singh married Vinita about two years ago and lived in Allahabad since.
Early last year, his wife left him and started living with her family.
A case under Sections 323 (voluntarily causing hurt), 498 (A) (cruelty by husband or relatives of husband) and 504 (intentional insult) was lodged by Vinita and her relatives before she left him.
In the note, Singh wrote he was in the Naini Central Jail from “September 29 to December 24, 2007”.
Shishupal Singh, Singh's brother-in-law, said he was disturbed ever since he released from jail. The court case constantly haunted him.
“After he was bailed out, he was living with his mother, younger sister and a physically-challenged brother in a rented house in Jankipuram.” The family had their own house in Indira Nagar, which was recently sold to meet the legal expenses, he added.
“While he searched for a job, he drove a three-wheeler for a living. A few days ago, he received a notice from the court and since then, he stopped stepping out of the house,” he said.
In the note, Singh further wrote: “I would also like to request Vinita not to harass my family in future. It was my mistake to marry her and I am repenting it by sacrificing my life.”]

''मुझे दहेज़ कानून की धारा ४९८-ए,३२३ और ५०४ के तहत जेल जाना पड़ा ,मेरी पत्नी विनीता ने शादी के 2 साल बाद हमारे परिवार के खिलाफ दहेज़ के रूप में 14 लाख रुपये मांगने का झूठा मुकदमा लिखाया था .इतनी रकम कभी मेरे पिता ने नहीं कमाई ,मैं इतना पैसा मांगने के बारे में कभी सोच भी नहीं सकता था ,मेरी भी बहने हैं ,इस मुक़दमे के चलते मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया है ,हम आर्थिक तंगी के शिकार हो गए ,मकान बिक गया ,अब मैं ज़िंदा नहीं रहना चाहता हूँ ख़ुदकुशी करना चाहता हूँ ,मेरी मौत के लिए मेरी ससुराल के लोग जिम्मेदार होंगे .''
       ये था उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के जानकीपुरम सेक्टर -सी में रहने वाले पुष्कर सिंह का ख़ुदकुशी से पहले लिखा गया पत्र ,जिसे लिखने के बाद ६ फरवरी २००८ को पुष्कर ने फांसी का फंदा गले में डाल कर ख़ुदकुशी कर ली .
       दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक  'पवित्र बंधन 'में एक पात्र मीनाक्षी ,जो कि एक एडवोकेट है और धारावाहिक के नायक गिरीश रॉय चौधरी की मृतक पत्नी की सहेली ,वह गिरीश राय चौधरी से एकतरफा पागलपन की हद तक प्यार करती है और उसे पाने के लिए किसी भी हद तक गुज़र जाने को तैयार है .अपने इस प्रयास में विफल रहने पर वह स्वयं को चोटें मारती है ,स्वयं के कपडे फाड़ती है और पुलिस लेकर पहुँच जाती है गिरीश राय चौधरी के घर ,ये इलज़ाम लेकर कि गिरीश ने उसके साथ 'बलात्कार का प्रयास किया है '.
     ये दोनों ही मामले ऐसे हैं जो संविधान द्वारा दिए गए प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के मूल अधिकार से एक हद तक पुरुष जाति को वंचित करते हैं .पुरुषों ने महिलाओं पर अत्याचार किये हैं ,उनके साथ बर्बर व्यवहार किये हैं किन्तु ये आंकड़ा अधिकांशतया होते हुए भी पूर्णतया के दायरे में नहीं आता .अधिकांश पुरुषों ने अधिकांश महिलाओं के जीवन को कष्ट पहुँचाया है किन्तु इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि सभी पुरुषों ने महिलाओं को कष्ट पहुँचाया है .अधिकांश महिलाएं पुरुषों के द्वारा पीड़ित रही हैं किन्तु इस बात से ये तो नहीं कहा जा सकता कि सभी महिलाएं पुरुषों के द्वारा पीड़ित रही हैं और इसीलिए अधिकांश के किये की सजा अगर सभी को दी जाती है तो ये कैसे कहा जा सकता है कि संविधान द्वारा सभी को जीने का अधिकार दिया जा रहा है .जीने का अधिकार भी वह जिसके बारे में स्वयं संविधान के संरक्षक उच्चतम न्यायालय ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९७८ एस.सी.५९७ में कहा है -
''प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुए जीने का अधिकार है .''
 फ्रेंसिसी कोरेली बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९८१ एस.सी. ७४६ में इसी निर्णय का अनुसरण करते हुए उच्चतम न्यायालय  ने कहा -''अनुच्छेद २१ के अधीन प्राण शब्द से तात्पर्य पशुवत जीवन से नहीं वरन मानव जीवन से है इसका भौतिक अस्तित्व ही नहीं वरन आध्यात्मिक अस्तित्व है .प्राण का अधिकार शरीर के अंगों की संरक्षा तक ही सीमित नहीं है जिससे जीवन का आनंद मिलता है या आत्मा वही जीवन से संपर्क स्थापित करती है वरन इसमें मानव गरिमा के साथ  जीने का अधिकार भी सम्मिलित है जो मानव जीवन को पूर्ण बनाने के लिए आवश्यक है .''
     और ऐसे मामले जहाँ कानून से मिली छूट के आधार पर शादी के सात साल के अंदर के विवाह को दहेज़ से जोड़ देना और नारी के द्वारा स्वयं ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने पर पुरुष से धिक्कार पाने पर उसे बलात्कार के प्रयास का रूप दे दिया जाना सीधे तौर पर पुरुष की गरिमा पर ,जीने के अधिकार पर हमले कहें जायेंगें क्योंकि इन मामलों में नारी का पक्ष न्यायालय के सामने मजबूत रहता है और एक यह पक्ष भी न्यायालय के सामने रहता है कि नारी ऐसे मामलों में शिकायत की पहल नहीं करती है और इसका खामियाजा पुरुषों को भुगतना पड़ता है .ऐसे मामलों में सबूतों ,गवाहों की कमी यदि महिलाओं को रहती है तो पुरुषों को भी इसका सामना करना पड़ता है और अपने मामलों को साबित करना दोनों के लिए ही कठिन हो जाता है किन्तु महिला के लिए न्यायालय का कोमल रुख यहाँ पुरुषों के लिए और भी बड़ी कठिनाई बन कर उभरता है .यूँ तो अधिकांशतया नारियों पर ही अत्याचार होते हैं किन्तु जहाँ एक तरफ ख़राब चरित्र के पुरुष हैं वहीँ ख़राब चरित्र की नारियां भी हैं और इसका फायदा वे ले जाती हैं क्योंकि ख़राब चरित्र का पुरुष ऐसे जाल में नहीं फंसता वह पहले से ही अपने बचाव के उपाय किये रहता है जबकि अच्छे चरित्र का पुरुष उन बातों के बारे में सोच भी नहीं पाता जो इस तरह की तिकड़मबाज नारियां सोचे रहती हैं और अमल में लाती हैं .
       जैसे कि हमारे ही एक परिचित के लड़के से ब्याही लड़की विवाह के कुछ समय तो अपनी ससुराल में रही और बाद में अपने मायके चली गयी और वहां से ये बात पक्की करके ही ससुराल में आई कि लड़का ससुराल से अलग घर लेकर रहेगा .लड़के के अलग रहने पर वह आई और कुछ समय रही और बाद में एक दिन जब लड़का कहीं बाहर गया था तो घर से अपना सामान उठाकर अपने भाइयों के साथ चली गयी और अपने घर जाकर अपने पति पर दहेज़ का मुकदमा दायर कर दिया ,सबसे अलग रहने के बावजूद घर के अन्य सभी को भी पति के साथ ४९८-ए के अंतर्गत क्रूरता के घेरे में ले लिया .स्थिति ये आ गयी कि लड़के के मुंह से यह निकल गया -''कि बस अब तो ऊपर जाने के मन करता है .''वह तो बस भगवान की कृपा कही जाएगी या फिर उसके घरवालों का साथ कि अपनी कोई जमीन बेचकर उन्होंने लड़की वालों को १० लाख रूपये दिए और लड़के को ख़ुदकुशी और खुद को जेल जाने से बचाया किन्तु अफ़सोस यही रहा कि कानून कहीं भी साथ में खड़ा नज़र नहीं आया .
        ऐसे ही ये बलात्कार या बलात्कार का प्रयास का आरोप है जिसमे या तो लम्बी कानूनी कार्यवाही या लम्बी जेल और या फिर ख़ुदकुशी ही बहुत सी बार निर्दोष चरित्रवान पुरुषों का भाग्य बनती है .हमारी जानकारी के ही एक महोदय का अपनी संपत्ति को लेकर एक महिला से दीवानी मुकदमा चल रहा है और वह महिला जब अपने सारे हथकंडे आज़मा कर भी उन्हें मुक़दमे में पीछे न हटा पायी तो उसने वह हथकंडा चला जिसे सभ्य समाज की कोई भी महिला कभी भी नहीं आज़माएगी .उसने इन महोदय के एकमात्र पुत्र पर जो कि उससे लगभग १५ साल छोटा होगा ,पर यह आरोप लगा दिया कि उसने मेरे घर में घुसकर मेरे साथ 'बलात्कार का प्रयास 'किया .वह तो इन महोदय का साथ समाज के लोगों ने दिया और कुछ राजनीतिक रिश्तेदारी ने जो इनका एकमात्र पुत्र जेल जाने से बच गया और उसका जीवन तबाह होने से बच गया किन्तु कानून के नारी के प्रति कोमल रुख ने इस नारी के हौसलों को ,जितने दिन भी वह इन्हें इस तरह परेशान रख सकी से इतने बुलंद कर दिए कि वह आये दिन जिस किसी से भी उसका कोई विवाद होता है उसे बलात्कार का प्रयास का आरोप लगाने की ही धमकी देती है और कानून कहीं भी उसके खिलाफ खड़ा नहीं होता बल्कि उसे और भी ज्यादा छूट देता है .भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा १४६[३] में अधिनियम संख्या ४ सं २००३ द्वारा परन्तुक अंतःस्थापित कर कानून ने ऐसी ही छूट दी है .जिसमे कहा गया है -
   [बशर्ते कि बलात्कार या बलात्कार करने के प्रयास के अभियोजन में अभियोक्त्री से प्रतिपरीक्षा में उसके सामान्य अनैतिक चरित्र के विषय में प्रश्नों को करने की  अनुज्ञा नहीं होगी .]
        क्या यही है कानून कि एक निर्दोष चरित्रवान मात्र इसलिए अपमानित हो ,जेल काटे कि वह एक पुरुष है .अगर बाद में कानूनी दांवपेंच के जरिये वह अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्ति पा भी लेता है तब भी क्या कानून उसके उस टुकड़े-टुकड़े हुए आत्मसम्मान की भरपाई कर पाता है जो उसे इस तरह के निराधार आरोपों से भुगतनी पड़ती है ?क्या ज़रूरी नहीं है ऐसे में गिरफ़्तारी से पहले उन मेडिकल परीक्षण ,सबूत ,गवाह आदि का लिया जाना जिससे ये साबित होता हो कि पीड़िता के साथ यदि कुछ भी गलत हुआ है तो वह उसी ने किया है जिस पर वह आरोप लगा रही है .ऐसे ही दहेज़ के मामले ,क्रूरता के मामले जिस तरह एकतरफा होकर महिला का पक्ष लेते हैं क्या ये कानून के अंतर्गत सही कहा जायेगा कि निर्दोष सजा पाये और दोषी खुला घूमता रहे .आज कितने ही मामलों में महिलाएं ही पहले घर वालों के द्वारा की गयी जबरदस्ती में शादी कर लेती हैं और बाद में उस विवाह को न निभा कर वापस आ जाती हैं और दहेज़ कानून का दुरूपयोग करती हैं .कानून को गंभीरता से इन मुद्दों को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों के लिए सही व्यवस्था करनी ही होगी अन्यथा इस देश में मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार पुरुषों को भी है यह बात भूलनी ही होगी .

शालिनी कौशिक 
  [कानूनी ज्ञान ]

सोमवार, 23 जून 2014

उपभोक्ता हित के लिए तहसील स्तर पर पीठ आवश्यक


उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम १९८६ पारित किया है .इस अधिनियम के अंतर्गत स्थापित निकाय अर्ध न्यायिक हैं और इनमे उपचार पाने की प्रक्रिया बहुत सरल व् कम खर्चीली है .इनमे वकील करने की भी आवश्यकता नहीं है .उपभोक्ता व्यक्तिगत रूप से अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकता है .यहाँ कोर्ट फीस भी नहीं लगती है .इस अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए २० लाख तक के मामले जिला स्तर के उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में ,२० लाख से ऊपर व् एक करोड़ से नीचे के मामले राज्य आयोग में व् एक करोड़ से ऊपर के मामले राष्ट्रीय आयोग में विचारित किये जाते हैं .
इस सबके बावजूद एक सबसे बड़ी कमी जो इस कानून को बनाते समय संसद ने की है वह यह है कि इसमें उपभोक्ता को अपने हितों के लिए सबसे निचली कोर्ट जिला स्तर पर उपलब्ध है और जिसमे आवेदन करने पर उपभोक्ता की दैनिक जीवन चर्या और यात्रा का कष्ट और व्यय उसे इन न्यायालयों में अपनी समस्या के लिए आवेदन करने से एक हद तक रोक देता है और वह हानि सहन कर आगे की परेशानी सोच मन मारकर घर ही बैठ जाता है और यही इस कानून की सफलता में सबसे बड़ी बाधा है .संसद को जिला पीठ से नीचे तहसील स्तर पर भी एक ऐसी पीठ की स्थापना करनी चाहिए जो उपभोक्ता को उसके निकट पहुंचकर न्याय दिलाये .उसकी ऐसे वादों को ग्रहण करने की अधिकारिता पांच लाख से नीचे के मामलों में रखी जा सकती है और इस तरह उपभोक्ता के हितों की रक्षा उसके द्वार पर ही पहुंचकर की जा सकती है .
शालिनी कौशिक

शनिवार, 21 जून 2014

ये है नगर पालिका का अनिवार्य कर्तव्य



उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम -१९१६ के अधीन नगरपालिका के दो प्रकार के कर्तव्य उपबंधित किये गए हैं अर्थात अनिवार्य और वैवेकिक और नगर पालिकाओं द्वारा अपने अन्य कर्व्याओं के साथ साथ जिस एक कर्तव्य की सबसे ज्यादा अनदेखी की जाती है वह इसी अधिनियम की धारा ७ [६] में उल्लिखित है -धारा ७ [६] कहती है -
''धारा ७ के अंतर्गत यह उपबंध किया गया है कि प्रयेक नगर पालिका का यह कर्तव्य होगा कि वह नगर पालिका क्षेत्र के भीतर निम्नलिखित की समुचित व्यवस्था करे -
[६] आवारा कुत्तों तथा खतरनाक पशुओं को परिरुद्ध करना ,हटाना या नष्ट करना ;
और देखा जाये तो इस कर्तव्य के प्रति नगर पालिका ने अपनी आँखें मूँद रखी हैं और सभी का तो पूरी तरह से पता नहीं किन्तु कांधला नगर पालिका अपने इस कर्तव्य को पूरा करने में पूरी तरह से उपेक्षा कर रही है .
अभी लगभग २ महीने पहले एक सामान्य रेस्तरा चलाने वाले ने जैसे सभी अपने सामान को थोडा बहुत बाहर की तरफ सजाकर रख लेते हैं रख लिया था कि दो सांड जो कि दिन भर यहाँ खुले घुमते हैं लड़ते लड़ते वहां आ पहुंचे और उन्हें देख वह जैसे ही अपना सामान बचाने लगा कि वह उनके पैरों के नीचे आ गया और बहुत बुरी तरह घायल हो गया और इलाज में ही उसका लाखों रुपयों का व्यय हो चूका है .
ऐसे ही अभी २९ सितम्बर २०१३ को मेरे पिताजी के मित्र के भाई अपनी धेवती को गोद में लेकर घूमने निकले ही थे कि सांड ने पीछे से टक्कर मारी और उनके हाथ से बच्ची छूटकर  सड़क पर जा गिरी और उसका इलाज कराने के लिए उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में ले जाना पड़ा जिस कारण बच्ची के इलाज में उनका काफी रुपया लग गया.
रोज आये दिन घरों में बंदरों की आवजाही बढ़ रही है और कहीं कोई छत से गिर रहा है तो किसी किसी को बन्दर के काटने के कारण इन्जेंक्शन लगवाने पर 1500-2000 रूपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं बन्दर कहाँ से बढ़ रहे हैं तो ये ही पता चलता है कि कोई छोड़ गया और नगर पालिका से इसके लिए कुछ करने को कहा जाता है तो आश्वासन दे टरका दिया जाता है .
घटनाएँ बढ़ रही हैं और किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं जाता कि आखिर इस तरह से इन पशुओं को यहाँ घूमने दिया जा रहा है तो इनके हमलों को रोकने की जिम्मेदारी किसकी बनती है ? जबकि उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम की धारा ७ [६] साफ तौर पर ये जिम्म्मेदारी नगर पालिका के माथे पर लादती है और जनता को यह हक़ देती है कि वह नगर पालिका से ऐसी घटना का मुआवजा मांग सके .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

बुधवार, 18 जून 2014

ये भी बलात्कार है -धारा ३७५ [४]

सहमत‌ि से संबंध रेप नहीं

शादी के नाम पर सहमत‌ि से बने शारीरिक संबंध रेप नहीं

 भारतीय दंड संहिता की धारा ३७५ की ६ भांति की परिस्थितियों में से चौथी में कहा गया है कि वह पुरुष बलात्संग करता है -
*जो उस स्त्री की सम्मति से ,जबकि वह पुरुष यह जानता है कि वह उस स्त्री का पति नहीं है और उस स्त्री ने सम्मति इसलिए दी है कि वह यह विश्वास करती है कि वह ऐसा पुरुष है जिससे वह विधि पूर्वक विवाहित है या विवाहित होने का विश्वास करती है ;
और यहाँ अदालत ने लगभग ऐसे ही मामले में शादी के नाम पर सहमति से बने शारीरिक संबंधों को रेप नहीं माना .आखिर क्यूँ अदालत हर बार लिखी लिखाई परिभाषा में ही उलझकर रह जाती है और उसका परिणाम यह होता है कि अपराधी उसका लाभ उठाकर आसानी से छूट जाता है .सब जानते हैं कि लड़कियां भोली होती हैं और उन्हें बहकाना या बहलाना आसान होता है ऐसे में इस परिभाषा में यह भी यदि यह भी सम्मिलित माना जाये कि विवाह का झांसा देकर सहमति से बनाये गए सम्बन्ध रेप हैं तो यह कानूनी रूप से न्याय के अंतर्गत ही आएगा क्योंकि एक हद तक ये सच्चाई भी है और न्याय के लिए आवश्यक भी .वैसे भी पुरुष सत्तात्मक समाज में पुरुष के लिए विवाह किये जाने का नाटक करना कोई मुश्किल नहीं है और लड़कियों का उसके भुलावे में आकर ऐसे सम्बन्ध के लिए सहमति देना .ऐसे में ये न्याय की मांग है कि न्यायालय अपने निर्णय का पुनर्विलोकन करे .

शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

मंगलवार, 17 जून 2014

संविधान का पालन करें राज्यपाल

राजभवन में बैठेंगे BJP नेता, बीएल जोशी का इस्तीफा

राजभवन में बैठेंगे BJP नेता, बीएल जोशी का इस्तीफा 

   केंद्र की तरह राज्यों में प्रशासन का स्वरुप संसदात्मक है .कार्यपालिका का प्रधान एक संवैधानिक प्रधान होता है जिसे मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करना होता है .भारतीय संविधान के अनुच्छेद १५३ में राज्यपाल के पद का उपबंध किया गया है जिसके अनुसार प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होगा .दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक ही राज्यपाल हो सकता है .यही नहीं अनुच्छेद १५६ में राज्यपाल की पदावधि के विषय में भी उपबंध किया गया है और जिसमे साफ तौर पर कहा गया है कि राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त अपना पद धारण करेगा .सामान्य  रूप से राज्यपाल का कार्यकाल ५ वर्ष होता है किन्तु राष्ट्रपति किसी भी समय राज्यपाल को उसके पद से हटा सकता है और इस मामले में राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिमंडल के परामर्श के अनुसार कार्य करता है क्योंकि उसकी नियुक्ति न तो प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से होती है  और न विशेष रूप से राष्ट्रपति के लिए गठित निर्वाचक मंडल द्वारा ,जो अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति का निर्वाचन करता है .यह केंद्र सरकार द्वारा नामांकित व्यक्ति होता है और सभी जानते हैं कि अनुच्छेद ५२ में भारत के राष्ट्रपति के सम्बन्ध में जो उपबंध है उससे ही साफ है कि वह मात्र नाममात्र का ही प्रधान होता है ,वह संवैधानिक अध्यक्ष होता है किन्तु वास्तविक शक्ति केंद्रीय मंत्रिपरिषद में निहित है जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होता है और संविधान में अनुच्छेद ५३ में संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित की गयी है लेकिन अनुच्छेद ७४ में यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि वह इसका प्रयोग मंत्रिपरिषद की सहायता व् मंत्रणा से ही करेगा .
   ऐसे में ,राज्यपाल की नियुक्ति का अधिकार वर्तमान केंद्रीय सरकार के हाथ में है और इसे ही निभाने की परंपरा रही है ऐसे में इस मुद्दे पर व्यर्थ विवाद न खड़े करते हुए वर्तमान जिन राज्यपालों पर इस्तीफे की तलवार लटक रही है उसे उन्हें अपने ऊपर से स्वयं ही हटा देना चाहिए और अपना आत्मसम्मान बरकरार रखने के लिए उत्तर-प्रदेश के राज्यपाल बनवारी लाल जोशी जी का ही अनुसरण करते हुए संविधान के प्रति अपनी निष्ठां को न केवल बाहरी रूप से अपितु अपने अंतर्मन द्वारा भी प्रदर्शित करना चाहिए .

शालिनी कौशिक 
 [कौशल ]

रविवार, 1 जून 2014

यह संविदा असम्यक असर से उत्प्रेरित

कोई भी संविदा तभी विधिमान्य है जब उसके लिए सम्मति स्वतंत्र रूप से दी गयी हो परन्तु सम्मति स्वतंत्र कब होती है इस सम्बन्ध में प्रावधान भारतीय संविदा अधिनियम की धारा १४ में दिए गए हैं धारा के अनुसार सम्मति स्वतंत्र तब कही जाती है जब वह निम्लिखित ढंग से न प्राप्त की गयी हो -
[१] प्रपीड़न [coercion ] [धारा १५ ]
[२[ असम्यक असर [undue influence ][धारा १६ ]
[३] कपट [fraud ][धारा १७]
[४] दुर्व्यपदेशन [misrepresentation ][धारा १८]
[५] भूल [mistake ][धारा १९ ]
मुझसे एक ब्लॉगर महोदय ने ये सवाल पूछा है -
मेरी नानी जो एक 65 साल की महिला है उसके तीन भाइयो ने ये कहके की कोर्ट का काम है आना जाना पड़ेगा
हम तुमको तुम्हारे हिस्से का देते रहेंगे करके साइन ले लिए और फिर पैसा देने से मुकर गए बहुत परेशानी में
 है ये लोग ...... 2 साल से ज्यादा हो गए जिला कोर्ट का चक्कर लगते तहसीलदार घुमाते रहता है ...
शायद पैसे खिलाइये है इनको .. कोई तरीका बताइये मैम जिससे इनको इनका हक़
मिले  संपत्ति का अधिकार -५ पर
इस शिकायत के अनुसार मामला असम्यक असर का प्रतीत होता है .असम्यक असर के सम्बन्ध में भारतीय संविदा अधिनियम कहता है कि-
यदि संविदा के किसी पक्षकार की सम्मति असम्यक असर के प्रभाव से युक्त है तो उक्त संविदा उस पक्षकार के विकल्प पर शून्यकरणीय होगी ,जिसकी सम्मति इस प्रकार से प्राप्त की गयी है -
[१] असम्यक असर को भारतीय संविदा अधिनियम की धारा १६ में परिभाषित किया गया है .धारा -१६ के अनुसार ,''संविदा असम्यक असर द्वारा उत्प्रेरित कही जाती है ,जहाँ के पक्षकारों के बीच विद्यमान सम्बन्ध ऐसे हैं कि उनमे से एक पक्षकार की इच्छा को अधिशसित करने की स्थिति में है और उस स्थिति का उपयोग उस दूसरें पक्षकार से अऋजु फायदा अभिप्रापट करने के लिए करता है .
[२] विशिष्टतया और पूर्ववर्ती सिद्धांत की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यह है कि कोई व्यक्ति किसी अन्य की इच्छा को अधिशासित करने की स्थिति में समझा जाता है ,जबकि वह -
[क] उस अन्य पर वास्तविक या दृश्यमान प्राधिकार रखता है या उस अन्य के साथ वैश्वासिक सम्बन्ध की स्थिति में है ,अथवा
[ख] ऐसे व्यक्ति के साथ संविदा करता है जिसकी मानसिक सामर्थ्य पर आयु रुग्णता या मानसिक या शारीरिक कष्ट के कारण अस्थायी या स्थायी रूप से प्रभाव पड़ा है .
[३] जहाँ की कोई व्यक्ति ,जो किसी अन्य की इच्छा को अधिशासित करने की स्थिति में हो उसके साथ संविदा करता है और वह संव्यवहार देखने से ही या दिए गए साक्षय के आधार पर लोकात्मा विरुद्ध प्रतीत होता है वहां पर यह साबित करने का भार कि ऐसी संविदा असम्यक असर से उत्प्रेरित नहीं की गयी थी उस व्यक्ति पर होगा जो उस अन्य की इच्छा को अधिशासित करने की स्थिति में था .
और अतुल जी के अनुसार उनकी नानी के भाइयों ने उनसे साइन लिए हैं वे निश्चित रूप में उनकी इच्छा को अधिशासित करने की स्थिति में हैं और यह संविदा असम्यक असर से उत्प्रेरित कही जाएगी और इस प्रकार यह संविदा इनकी नानी के विकल्प पर शून्यकरणीय है और यह साबित करने का भार क़ि यह संविदा असम्यक असर से उत्प्रेरित नहीं है इनकी नानी के भाइयों पर है .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]