छठी इंद्री पर निर्णय दे रही सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर एक महिला का यौन शोषण करने के आरोपी व्यक्ति की रेप की सज़ा और दंड रद्द किया, क्योंकि अपील के दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे से शादी कर ली थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि उसने अपनी "छठी इंद्री" पर काम किया कि उन्हें एक साथ लाकर विवाद को सुलझाया जा सकता है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अपीलकर्ता के खिलाफ FIR, सज़ा और दंड को रद्द करके "पूरा न्याय" किया। कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब अपीलकर्ता ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा उसकी सज़ा निलंबित करने से इनकार करने को चुनौती दी थी। जस्टिस नागरत्ना ने फैसला लिखते हुए कहा कि जब यह मामला पहली बार सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, " मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद हमें एक छठी इंद्री महसूस हुई कि अगर अपीलकर्ता और प्रतिवादी पीड़िता एक-दूसरे से शादी करने का फैसला करते हैं तो उन्हें फिर से एक साथ लाया जा सकता है।" इसी सहज ज्ञान पर काम करते हुए बेंच ने वकील को सलाह दी कि पक्षकारों से ...