बार एसोसिएशन की सदस्यता रिट क्षेत्राधिकार नहीं - इलाहाबाद हाई कोर्ट



इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि बार एसोसिएशन (Bar Association) की सदस्यता, निलंबन या किसी सदस्य को संगठन से बाहर करने से जुड़े विवाद मूल रूप से निजी प्रकृति के होते हैं और ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय (maintainable) नहीं है। 

मुख्य पक्षकार (Parties)याचिकाकर्ता (Petitioner): 

लाल बिहारी वर्मा (Lal Bihari Verma) 

प्रतिवादी (Respondents): 

उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य, सेंट्रल बार एसोसिएशन (तहसील गोला गोकर्णनाथ, जिला लखीमपुर खीरी) 

पीठ (Bench):

 न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ (Justice Shekhar B. Saraf) और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी (Justice Abdhesh Kumar Chaudhary) की खंडपीठ 

➡️ निर्णय की मुख्य बातें और निष्कर्ष

⚫ रिट याचिका खारिज:

 अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा सेंट्रल बार एसोसिएशन के उस आदेश (प्रेस विज्ञप्ति दिनांक 12 जून 2026) को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसके तहत उन्हें एक साल के लिए बार एसोसिएशन की सदस्यता से वंचित (debar) कर दिया गया था। 

निजी प्रकृति का विवाद: 

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन के आंतरिक प्रशासन, सदस्यता, प्रवेश, निलंबन या निष्कासन से जुड़े मामले उसके उपनियमों (bye-laws) द्वारा शासित होते हैं। इसमें कोई सार्वजनिक कानून तत्व (public law element) शामिल नहीं होता है, इसलिए यह जनहित या सार्वजनिक चरित्र का नहीं है। 

वैकल्पिक उपाय:

 अदालत ने कहा कि ऐसे विवादों के समाधान के लिए पीड़ित सदस्य को सक्षम दीवानी अदालत (Civil Court), संबंधित सोसायटी के रजिस्ट्रार (Registrar of Societies), या बार एसोसिएशन के उपनियमों के तहत नामित प्राधिकारी के पास जाना चाहिए। 

अदालत ने याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर संबंधित प्राधिकारी या सिविल कोर्ट के समक्ष उचित आवेदन करने की छूट दी है, और यह भी निर्देश दिया कि यदि ऐसा आवेदन किया जाता है, तो संबंधित प्राधिकारी चार सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार मामले का निस्तारण करें.

द्वारा

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

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