ST का दर्जा.... सबूत जरूरी-इलाहाबाद हाईकोर्ट

 


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 

किसी दूसरे धर्म में धर्म परिवर्तन करने से ही किसी व्यक्ति का 'अनुसूचित जनजाति' (ST) का दर्जा अपने आप खत्म नहीं हो जाता..... कोई व्यक्ति ST का सदस्य बना रहता है या नहीं, यह तथ्यों पर निर्भर करता है। इसका फैसला आदिवासी पहचान की ज़रूरी विशेषताओं की जांच करके किया जाएगा, जिसमें पारंपरिक रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और संबंधित आदिवासी समुदाय द्वारा स्वीकार्यता शामिल है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने एक महत्वपूर्ण Nanhki @ Naimunnisha vs. State of U.P. and 3 others मामले के निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल धर्म परिवर्तन या अंतर-धार्मिक विवाह से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा स्वतः समाप्त नहीं होता है। 

साक्ष्यों की आवश्यकता:

 यदि किसी व्यक्ति के जनजातीय दर्जे पर विवाद होता है, तो यह जांच की जाएगी कि क्या वह व्यक्ति अभी भी उस जनजाति की संस्कृति, रीति-रिवाजों और समुदाय से जुड़ा हुआ है या नहीं. भूमि हस्तांतरण मामला: इस मामले में याची ने मुस्लिम व्यक्ति से विवाह और पहचान अपनाने के बाद कृषि भूमि की खरीद से जुड़े तीन विक्रय विलेखों (Sale Deeds) को चुनौती दी थी। कोर्ट ने पाया कि याची यह साबित नहीं कर पाई कि दशकों तक मुस्लिम पहचान अपनाने के बाद भी उसका भुइयां जनजाति से वास्तविक संबंध या जुड़ाव बरकरार था। 

लेन-देन रद्द: अदालत ने उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि सुधार अधिनियम (UPZA & LR Act) के तहत भूमि सौदों को अवैध ठहराते हुए डिप्टी कलेक्टर, दुद्धी (सोनभद्र) के आदेश को सही ठहराया और याचिका खारिज कर दी।

निर्णय से जुड़ी संपूर्ण जानकारी

निर्णय की तिथि: सितंबर 2026 (14/15 सितंबर 2026)

पीठ (Bench): न्यायमूर्ति अरुण कुमार (Justice Arun Kumar)

मुख्य पक्षकार (Case Title): ननकी उर्फ नईमुन्निसा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (Nanhki @ Naimunnisha vs. State of U.P. and 3 others)

मामले की citation: 2026 LiveLaw (AB) 705 [1]

 मामले के मुख्य बिंदु और निर्णय का सार

पक्षकारों का विवाद: याचिकाकर्ता (ननकी उर्फ नईमुन्निसा) ने भुइयां अनुसूचित जनजाति समुदाय से होने का दावा किया था और दुद्धी, सोनभद्र के डिप्टी कलेक्टर द्वारा उसकी भूमि के तीन अंतरणों (Land Transfers) को शून्य (Void) घोषित करने वाले आदेशों को चुनौती दी थी। रिकॉर्ड के अनुसार उसने एक मुस्लिम व्यक्ति से विवाह किया था और दशकों तक इस्लामी सामाजिक व धार्मिक पहचान अपनाई थी। 

अदालत की मुख्य टिप्पणी:

कोर्ट ने कहा कि केवल धर्म बदलने या अंतर-धार्मिक विवाह से किसी व्यक्ति का एसटी (ST) दर्जा अपने आप खत्म नहीं होता।हालांकि, यदि किसी व्यक्ति की जनजातीय स्थिति पर विवाद है, तो उसे यह साबित करना होगा कि वह जनजातीय रीति-रिवाजों, परंपराओं और समुदाय से लगातार जुड़ा हुआ है। 

निर्णय: चूंकि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रही कि भूमि खरीद के समय भी भुइयां जनजाति से उसका वास्तविक और निरंतर जुड़ाव था, इसलिए अदालत ने उसकी रिट याचिकाएं खारिज कर दीं और जमीन के सौदों को अवैध व शून्य ठहराने वाले राजस्व अधिकारियों के आदेश को बरकरार रखा।

इस प्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Nanhki @ Naimunnisha vs. State of U.P. and 3 others मामले में निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल धर्म परिवर्तन से किसी व्यक्ति की अनुसूचित जनजाति (ST) की स्थिति स्वतः समाप्त नहीं होती, लेकिन इस दर्जे को बनाए रखने के लिए आदिवासी रीति-रिवाजों और समुदाय से निरंतर जुड़ाव के ठोस सबूत पेश करना अनिवार्य है।

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

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