सोमवार, 23 सितंबर 2013

बाबा रामदेव समझें कानूनी और गैरकानूनी में अंतर

बाबा रामदेव कहते हैं कि मैं कोई गैरकानूनी काम नहीं करता .तो ये क्या है या वे भारतीय दंड सहिंता को नहीं जानते -
Baba Ramdev targets Sonia Gandhi for his detention in London
Ramdev dubs Rahul Gandhi as social media 'Pappu' ET 15 Sep 2013, 03:13 IST...Yoga guru Baba Ramdev on Saturday ridiculed Congress party national vice-president Rahul Gandhi calling him 'foolish' and a social media boy. He was addressing a voters' awareness programme at Badnawar in Dhar district on Saturday. "Rahul Gandhi Bhondu aur...
Ranchi: After the Ramlila crackdown in 2011, Baba Ramdev has not left any opportunity to take revenge from the Congress Party, and the coming general elections would be no different. Baba has vowed to uproot the Congress government from power in 2014, and he would go to any length to achieve his goal. Severely critisising Prime Minister 
Manmohan Singhand UPA Chairperson Sonia Gandhi, he said that the latter has hijacked all the power of the executive.
Sonia Gandhi has such a clout that country’s President and prime minister are afraid of her. She has mortgaged the democracy. All the heads of independent institutions are under her control. Our prime minister has no say in the government. The country needs a strong prime minister, and I would leave no stones unturned to give the country what it needs,” he said in a function here.
He also took a jibe at Congress vice-president 
Rahul Gandhi, saying he was ‘underdeveloped’.
“I have talked to 
Rahul Gandhi for an hour only. He seemed confused and mentally underdeveloped,” he said.
He said that he would work day and night to topple Congress from power in the 2014 General Election.
अपने उपरोक्त वक्तव्य देखकर और फिर ये धारा देखकर बाबा रामदेव स्वयं अवलोकन कर सकते हैं कि वे कितने कानूनी काम करते हैं -
आइये जानते हैं भारतीय दंड सहिंता की धारा ४९९ को -धारा ४९९-मानहानि-जो कोई बोले गए या पढ़े जाने के लिए आशयित शब्दों द्वारा ,या संकेतों द्वारा ,या ऐसे दृश्य रूप्णों  द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में कोई लांछन इस आशय से लगाता या प्रकशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि की जाये या यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि होगी ,ऐतस्मिन पश्चात् अपवादित दशाओं के सिवाय उसके बारे में कहा जाता है कि वह उस व्यक्ति की मानहानि करता है .स्पष्टीकरण १ -किसी मृत व्यक्ति को कोई लांछन लगाना मानहानि की कोटि में आ सकेगा यदि वह लांछन उस व्यक्ति की ख्याति की,यदि वह जीवित होता ,अपहानि करता और उसके परिवार या अन्य निकट सम्बन्धियों की भावनाओं को उपहत करने के लिए आशयित हो .स्पष्टीकरण २ -किसी कंपनी या संगम या व्यक्तियों के समूह के सम्बन्ध में उसकी वैसी  हैसियत में कोई लांछन लगाना मानहानि की कोटि में आ सकेगा .स्पष्टीकरण ३- अनुकल्प के रूप में या व्यंग्योक्ति के रूप में अभिव्यक्त लांछन मानहानि की कोटि में आ सकेगा .स्पष्टीकरण ४-कोई लांछन किसी व्यक्ति की ख्याति की अपहानि करने वाला नहीं कहा जाता जब तक कि वह लांछन दूसरों की दृष्टि में प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उस व्यक्ति के सदाचारिक  या बौद्धिक स्वरुप को हेय न करे या उस व्यक्ति की जाति  के या उसकी आजीविका  के सम्बन्ध में उसके शील  को हेय न करे या उस व्यक्ति की साख  को नीचे  न गिराए  या यह विश्वास न कराये  कि उस व्यक्ति का शरीर घ्रणोंत्पादक   दशा  में है या ऐसी  दशा  में है जो साधारण  रूप से निकृष्ट  समझी  जाती  है .अब ध्यान दीजिये उन अपवाद पर जिनमे बोले या प्रकाशित  गए कथन मानहानि की श्रेणी में नहीं आते -पहला अपवाद-सत्य बात का लांछन जिसका लगाया जाना या प्रकशित किया जाना लोक कल्याण के लिए अपेक्षित है.दूसरा अपवाद-लोक सेवकों का लोकाचरण.तीसरा अपवाद-किसी लोक प्रश्न के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति का आचरण .चौथा अपवाद-न्यायालयों की कार्यवाहियों की रिपोर्टों का प्रकाशन . पांचवा अपवाद-न्यायालय में विनिश्चित मामले के गुणागुण  या साक्षियों तथा संपृक्त अन्य व्यक्तियों का आचरण .छठा अपवाद - लोक कृति के गुणागुण .सातवाँ अपवाद -किसी अन्य व्यक्ति के ऊपर विधिपूर्ण प्राधिकार रखने वाले व्यक्ति द्वारा सद्भावपूर्वक की गयी परिनिन्दा .आठवां अपवाद-प्राधिकृत व्यक्ति के समक्ष सद्भावपूर्वक अभियोग लगाना .नौवां अपवाद-अपने या अन्य के हितों की संरक्षा  के लिए  किसी व्यक्ति द्वारा सद्भावपूर्वक लगाया गया लांछन .दसवां अपवाद -सावधानी जो उस व्यक्ति की भलाई  के लिए,जिसे कि वह दी गयी है या लोक कल्याण के लिए  आशयित है .अब ये भी जान लें क़ी सद्भावपूर्वक क्या है -धारा ५२ -कोई बात ''सद्भाव पूर्वक ''की गयी या विश्वास की गयी नहीं कही जाएगी जो सम्यक सतर्कता और ध्यान के बिना की गयी या विश्वास की गयी हो .और इस धारा ४९९ का दंड धारा ५०० में दिया गया है जो कहती है कि-''जो कोई किसी अन्य व्यक्ति की मानहानि करेगा ,वह सादा कारावास से ,जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने  से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा ..अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कारण बाबा रामदेव और उन जैसे कितने ही भारतवासी अपनी सीमाओं को तोड़ रहे हैं किन्तु ये भूल रहे हैं कि ये स्वतंत्रता देश की सुरक्षा और सुव्यवस्था के अधीन है और सोनिया जी राहुल जी पर किये गए अश्लील आक्षेप सिर्फ उनके द्वारा दी गयी छूट के आधीन और वे जिस दिन चाहें इस तरह के कथन करने वालों को देश के कानून के अंतर्गत अपराधी की श्रेणी में ला सकते हैं और डॉ.मनमोहन सिंह पर किये गए अभद्र कथन पर तो सारा देश ही ऐसे लोगों के खिलाफ उठ खड़ा हो सकता है यदि वे ही अपने धैर्य को खो दें .इसलिए ऐसे में यदि बाबा रामदेव गैरकानूनी कामों के साथ साथ गैरकानूनी बयानबाजी से भी तौबा कर लें तो यह उनके साथ देश व् देशवासियों सभी के लिए हितकर होगा .शालिनी कौशिक[कानूनी ज्ञान ]

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

ए.पी.सिंह का वकालत का रजिस्ट्रेशन निरस्त करे बार कौंसिल


Bar Council notice to defense Lawyer of the Rapists and murderers of Gang Rape. Similar Notice should be given to senior lawyer of Fraudman

शनिवार, 14 सितंबर 2013

जानिए वकील का अपराध -दामिनी गैंगरेप केस

अभी हाल में ही भारतीय नारी ब्लॉग पर मैंने इंजीनियर प्रदीप साहनी जी की एक पोस्ट देखी जिसमे वे दामिनी मामले को लेकर अत्यधिक भावुक हो गए और गुनाह साबित होने पर वकीलों के लिए भी सजा की बात कर गए .पहले देखिये उनकी पोस्ट-

[वकीलों से सवालअगर गुनहगार का साथ देना भी गुनाह है तो गुनाह साबित हो जाने पर वकीलों को सजा देने का प्रावधान क्यों नहीं है, जो सबकुछ जानते हुए भी अपने मुवक्किल को बेगुनाह बताता है और गुनाह साबित हो जाने पर तरह तरह के बहाने बनाके सजा न देने की भीख माँगता है । अगर ये उनके प्रोफेशन का हिस्सा है तो ये कैसा प्रोफेशन है-चंद फीस के लिए गुनाह का साथ दो ?
क्या ज़मीर नाम की जो चीज़ होती है वो वकीलों के लिए नहीं है ? उनका दिल ये कैसे गवाही देता है कि सबकुछ जानते हुए भी वो अंतिम समय तक गुनहगार को बचाने का प्रयास करते रहते हैं ?
आप भी सोचे ? अपराध दिन ब दिन इतना बढ़ता क्यों जा रहा है क्योंकि कानून को लेके किसी के मन में कुछ भय नहीं है | सब सोचते हैं कि कुछ भी कर लो, अगर पकड़े गए तो पैसों के दम पे अच्छा से अच्छा वकील रख लो; वो कानून को तोड़-मरोड़ कर, झूठ को सही साबित करके बचा ही लेगा | अगर कुछ ऐसा प्रावधान हो जाए कि मुजरिम साबित हो जाने पर मुजरिम के साथ-साथ उसका केस लड़ रहे वकील को भी सजा मिलेगी तो डर से वकील जान कर गलत लोगों का केस लेना बंद कर देंगे और इस से अपराध करने वाले के मन में भी भय बैठ जाएगा और आधे से ज्यादा जुर्म ऐसे ही कम हो जाएंगे |
(संदर्भ-दिल्ली में गैंग रेप के आरोपियों का केस लड़ रहे वकील ने गुनाह साबित हो जाने के बाद भी मांग की है कि कम से कम सजा मिले)]

वकील आज के समय में कानून द्वारा कानून की बारीकियों से अनभिज्ञ लोगों को न्याय प्राप्त करने के लिए दिए गए वे माध्यम हैं जो न्यायालय के समक्ष अपने मुवक्किल का पक्ष रखते हैं और उसे न्याय की राह पर अग्रसर करते हैं .भारतीय साक्ष्य अधिनियम १८७२ की धारा १२६ कहती है -
''कोई भी बैरिस्टर ,अटॉर्नी,प्लीडर या वकील अपने कक्षिकार की अभिव्यक्त सम्मति के सिवाय ऐसी किसी संसूचना को प्रकट करने के लिए ,जो उसके ऐसे बैरिस्टर ,अटॉर्नी ,प्लीडर या वकील की हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में ,या के प्रयोजनार्थ उसके कक्षिकार द्वारा ,या की ओर से उसे दी गयी हो अथवा किसी दस्तावेज की ,जिससे वह अपने वृतिक नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ परिचित हो गया हो ,अंतर्वस्तु या दशा कथित करने को अथवा किसी सलाह को ,जो ऐसे नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ उसने अपने कक्षिकार को दी हो ,प्रकट करने के लिए किसी भी समय अनुज्ञात नहीं किया जायेगा .
परन्तु इस धारा की कोई भी बात निम्नलिखित बात को प्रकटीकरण से संरक्षण नहीं देगी -
१-किसी भी अवैध प्रयोजन को अग्रसर करने में दी गयी कोई भी ऐसी संसूचना ,
२- ऐसा कोई भी तथ्य जो किसी बैरिस्टर ,प्लीडर ,अटॉर्नी या वकील ने अपनी ऐसी हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में संप्रेक्षित किया हो और उससे दर्शित हो कि उसके नियोजन के प्रारंभ के पश्चात् कोई अपराध या कपट किया गया है .
यह तत्वहीन है कि ऐसे बैरिस्टर ,प्लीडर,अटॉर्नी या वकील का ध्यान ऐसे तथ्य के प्रति कक्षिकार द्वारा या की ओर से आकर्षित किया गया था या नहीं .
स्पष्टीकरण -इस धारा में कथित बाध्यता नियोजन के अवसित हो जाने के उपरांत भी बनी रहती है .''
इस प्रकार उन्हें व् अन्य जो वकील का इस मामले में खड़ा होना अपराध मान रहे हैं उन्हें जान लेना चाहिए कि सिर्फ पुलिस के दिखाने से कोई अपराधी नहीं हो जाता उसका अपराध साबित होना ज़रूरी है और यह कानून का फ़र्ज़ है कि हर व्यक्ति को न्याय मिले और ऐसे में जब किसी पर अपराध का इलज़ाम है तो उसे भी हक़ है कि उसका पक्ष भी रखा जाये और तभी सजा मिले जब वह अपराधी साबित हो जाये .कानून की बारीकियां केवल वकील जानते हैं और इसलिए उनका हर मामले में खड़ा होना ज़रूरी है अगर इस तरह से अपराध साबित होने पर उनके लिए भी सजा का प्रावधान होने लगा तो जैसे पुलिस के खौफ से डाक्टर अपराध के शिकार मरीज का इलाज नहीं करते ऐसे ही वकील भी अपराध का इलज़ाम लगे लोगों की ओर से खड़े नहीं होंगे और इस तरह न्याय की यह अवधारणा ही समाप्त हो जाएगी कि न्याय सभी तक पहुंचना चाहिए .
हाँ ये ज़रूर है कि दामिनी मामले में वकील एपी सिंह ज़रूर एक अपराध कर गए हैं जिसका संज्ञान उसी न्यायालय को लेना होगा .
ए. आई.आर १९६१ कल.४९५ में न्यायालय में वकील ने मजिस्ट्रेट को ''द्रोही ,डाह करने वाला ''कहा तो उसे अवमानना का दोषी माना गया .
यहाँ वकील एपी सिंह ने फैसला सुनते ही भरी अदालत में जोर जोर से चिल्लाते हुए कहा -''जज साहब !आपने सत्यमेव जयते का पालन नहीं किया बल्कि असत्यमेव जयते किया है .आपने मेरे मुवक्किलों को फाँसी की सजा देकर उनके साथ अन्याय किया है .आपने सियासी दबाव में सजा दी है इंसाफ नहीं दिया है .''
न्यायलय के फैसले के खिलाफ अपील का अधिकार मिला हुआ है और वहां अपने सभी तर्क रखकर उस न्याय में परिवर्तन ,परिवर्धन आदि कराया जा सकता है इस तरह न्यायालय के समक्ष उसके फैसले पर जो उसने मौजूदा सबूतों व् परिस्थितयों को देखते हुए दिया है ऊँगली उठाने का अधिकार किसी को नहीं है वकील को भी नहीं और इस तरह ये मामला न्यायालय की अवमानना के अंतर्गत आता है .
द कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट १९७१ की धारा १० के अनुसार ये पावर हाईकोर्ट को है किन्तु जब मामला भारतीय दंड सहिंता के अंतर्गत दंडनीय हो तो तो ये कार्य अधीनस्थ कोर्ट का ही है और भारतीय दंड सहिंता की धारा २२८ कहती है -
'' जो कोई किसी लोक सेवक का उस समय ,जब कि ऐसा लोक सेवक न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में बैठा हुआ हो ,साशय कोई अपमान करेगा ,या उसके कार्य में कोई विध्न डालेगा ,वह सादा कारावास से जिसकी अवधि ६ माह तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो एक हज़ार रूपए तक हो सकेगा या दोनों से दण्डित किया जायेगा .
और इस प्रकार एपी सिंह के वाकया साफ तौर पर न्यायालय की अवमानना हैं और जिस न्यायालय के समक्ष उन्होंने ऐसा कहा है वही इस अवमानना का दंड देने के लिए अधिकार रखता है क्योंकि यह भारतीय दंड सहिंता में वर्णित अपराध है .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

अपराध के रूप महत्वपूर्ण -अपराधी की उम्र नहीं


Silent Protest at India Gate.jpg
http://en.wikipedia.org/wiki/2012_Delhi_gang_rape_case






 अपराध के रूप महत्वपूर्ण -अपराधी की उम्र नहीं 
संविधान का अनुच्छेद २१ कहता है कि
    '' किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा अन्यथा नहीं .''
   और इस तरह प्राण का अधिकार एक मूल मानवाधिकार है और चैयरमेन रेलवे बोर्ड बनाम चंद्रिमा दास [२०००] २ एस.सी.सी .४६५ में उच्चतम न्यायालय ने भी माना कि अनुच्छेद २१ में प्रतिष्ठापित ''प्राण ''के अधिकार में मानव गरिमा के साथ जीवित रहने का अधिकार सम्मिलित है और यदि किसी स्त्री के साथ बलात्संग किया जाता है तो वह उसके अधिकार का उल्लंघन करता है .
   इसी तरह भारतीय दंड सहिंता की धारा ८३ कहती है कि -
 '' कोई बात अपराध नहीं है जो सात वर्ष से ऊपर और बारह वर्ष से कम आयु के ऐसे शिशु द्वारा की जाती है जिसकी समझ इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह उस अवसर पर अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों का निर्णय कर सके .''
इसका साफ मतलब ये है कि जो शिशु ७ से १२ वर्ष के बीच का है और अपने द्वारा किये गए कार्य का अपराध होना और उसके परिणाम को जानता है वह अपराधी है .
     जब समझ का निर्णय भारतीय कानून ने इस आयु के मध्य में कर लिया है फिर उससे ऊपर के किशोरों की अपराधों की सजा के मामले में छूट प्रदान किया जाना भारतीय कानून को कठघरे में खड़ा करता है .और साथ ही प्रश्न उत्पन्न करता है कि आखिर ''जीने का अधिकार ''इस तरह आसानी से छीनने का अधिकार भारतीय कानून किस तरह स्वघोषित नाबालिग को अपराधी होने पर भी दे सकता है ?
  भारत में विवाह के पश्चात् ही सेक्स को मान्यता प्राप्त है और विवाह के लिए लड़की की उम्र १८ वर्ष व्  लड़के की उम्र २१ वर्ष रखी गयी है .ऐसे में बलात्कार के जरिये नाबालिग लड़कों द्वारा जो सेक्स संबंधों को हवस मिटाने का दर्जा दिया जा रहा है वह उनके द्वारा भारतीय कानून का खुलेआम मखौल उड़ाया जाना है . दामिनी गैंगरेप के बाद नाबालिगों की इस सम्बन्ध में जो कम सजा के बारे में जानकारी बढ़ी है उसके बाद इन अपराधों के इनके द्वारा किये जाने की संख्या भी तेज़ी से बढ़ी है .ऐसे में कानून का इनके प्रति नरम रुख आश्चर्य उत्पन्न करता है .
अब यदि देखा जाये तो फिर तो यह छूट १८ से कम के ही किशोरों को क्यूं बल्कि २१ से कम के सभी युवाओं को मिल जानी चाहिए क्योंकि कानून के अनुसार उनकी समझ तो इस संबंधों के लिए २१ वर्ष में ही परिपक्व होती है .
     और यदि कानून को सही रूप प्रदान करना है तो फिर जिसमे इस सम्बन्ध में समझ परिपक्व हो चुकी है उसे नाबालिग मानना एक तरह से अपराध को खुली छूट देना है और ऐसे में अपराध का रूप देखकर ही ऐसी छूट के बारे में विचार किया जाना चाहिए  क्योंकि १८ हो या १६ यदि पूर्ण सर्वेक्षण किया जाये तो आज बच्चों की बढती समझ देख शायद ही १२ से ऊपर के किसी भी बच्चे को इस छूट का लाभ मिलेगा क्योंकि आज बॉय-फ्रेंड व् गर्ल फ्रेंड की संस्कृति तेज़ी से बढती  जा रही है और यही कह रही है कि अब अपराध के रूप पर कानून विदों को ज्यादा ध्यान देने होगा न की अपराधी की उम्र पर .

              शालिनी कौशिक 
                   [कानूनी ज्ञान ]