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'उम्मीद पोर्टल पर लगाई जाए रोक-मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

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( shalini kaushik law classes) ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर उम्मीद पोर्टल को निलंबित किये जाने की मांग की गई है. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा वक्फ एक्ट 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई पूरी होने तक सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दाखिल कर उम्मीद पोर्टल को निलंबित करने की मांग की है.बोर्ड ने याचिका दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि    " या तो पोर्टल पर रोक लगाई जाए या केंद्र सरकार को उसका अधिसूचना वापस लेने का निर्देश दिया जाए।"      बोर्ड के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. एस. क्यू. आर. इलियास ने कहा कि  " बार-बार अपील करने के बावजूद सरकार ने 6 जून को उम्मीद पोर्टल शुरू कर दिया और वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण को अनिवार्य बना दिया। बोर्ड इस कदम को “गैरक़ानूनी” और “अदालत की अवमानना” करार देता है. " ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा है कि,   “यह मुतवल्लियों पर अवैध दबाव डालता है और सुप्रीम कोर्ट में मांगी गई राहतों को प्रभावित करता है।”   ऑल इ...

सुप्रीम कोर्ट में फंसा 🇪‌🇨‌🇮‌

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  @IndianlawSK28 सप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (14 अगस्त) को भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया कि वह बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के बाद प्रकाशित वोटर लिस्ट से हटाए गए लगभग 65 लाख मतदाताओं की जिलावार सूची जिला निर्वाचन अधिकारियों की वेबसाइटों पर प्रकाशित करे। न्यायालय ने यह भी कहा कि नाम हटाने के कारण जैसे मृत्यु, प्रवास, दोहरा पंजीकरण आदि, स्पष्ट किए जाने चाहिए। यह जानकारी बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर भी प्रदर्शित की जानी चाहिए ताकि दस्तावेजों को EPIC नंबरों के आधार पर सर्च किया जा सके। इसके अलावा, न्यायालय ने चुनाव आयोग को सार्वजनिक नोटिस में यह भी निर्दिष्ट करने का निर्देश दिया कि छूटे हुए व्यक्ति फाइनल लिस्ट में शामिल होने के लिए अपना दावा प्रस्तुत करते समय अपना आधार कार्ड भी प्रस्तुत कर सकते हैं। समाचार पत्रों, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक प्रचार किया जाना चाहिए कि सूची वेबसाइट पर प्रकाशित की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग को अगले मंगलवार तक ये कदम उठाने का निर्देश दिया गया। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागच...

अब नहीं होगी बच्चों की ताड़ना यू पी के स्कूलों में

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@indianlawsk28    उत्तर प्रदेश के निजी व सरकारी विद्यालयों के शिक्षक अब बच्चों की ताड़ना नहीं कर सकेंगे.बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से इस संबंध में शिक्षकों के लिए कड़े निर्देश जारी किये गए हैं.  बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से राष्ट्रीय बालक अधिकार संरक्षण आयोग की ओर से जारी इन दिशा निर्देशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि विद्यालय में पढ़ रहे बच्चों को किसी प्रकार की शारीरिक व मानसिक दंड न दिए जाएँ. साथ ही सभी निजी व सरकारी विद्यालयों को कहा गया है कि इन दिशा निर्देशों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाये, साथ ही, बच्चों को भी बताया जाये कि वे इसके विरोध में अपनी बात कह सकते हैं।  ➡️ स्कूल शिक्षा महानिदेशक कंचन वर्मा का आदेश-  स्कूल शिक्षा महानिदेशक कंचन वर्मा की ओर से सभी बीएसए को निर्देश दिया गया है कि  "हर स्कूल जिसमें छात्रावास हैं, जेजे होम्स, बाल संरक्ष्ज्ञण गृह भी शामिल हैं, में एक ऐसी व्यवस्था की जाए, जहां बच्चे अपनी बात रख सकें। ऐसे संस्थानों में किसी एनजीओ की सहायता ली जा सकती है। हर स्कूल में एक शिकायत पेटिका भी होनी चाहिए, जहां छात्र अपनी शिकायत दे सकें।...

Maintenance Case पत्नी को है अधिकार दिल्ली हाईकोर्ट

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( Shalini kaushik law classes ) दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि पत्नी अपने पति की वास्तविक आय/संपत्ति का पता लगाने के लिए बैंक अधिकारियों को गवाह के तौर पर बुलाने की मांग कर सकती है.          पतियों द्वारा अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए अपनी वास्तविक आय को छिपाना कोई नई बात नहीं है, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि  "पत्नी अपने पति की वास्तविक आय/संपत्ति के बारे में अपने दावों की पुष्टि के लिए बैंक अधिकारियों सहित गवाहों को बुलाने के लिए बैंक अधिकारियों को गवाह के तौर पर बुलाने की मांग कर सकती है।"       जस्टिस रविंदर डुडेजा ने याचिकाकर्ता-पत्नी की याचिका स्वीकार की, जबकि फैमिली कोर्ट ने प्रतिवादी-पति की वास्तविक आय के संबंध में अपने दावों की पुष्टि के लिए बैंक अधिकारियों सहित गवाहों को बुलाने के लिए CrPC की धारा 311 के तहत उसकी अर्जी खारिज कर दी थी।   Case title: NJ v. आज आभार 🙏👇 प्रस्तुति शालिनी कौशिक एडवोकेट कैराना (शामली)

पत्नी की परिभाषा दस्तावेज से बड़ी -इलाहाबाद हाईकोर्ट

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( shalini kaushik law classes ) इलाहाबाद हाई कोर्ट का मानना है कि जो पुरुष और महिला एक लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं तो पत्नी का भरण-पोषण का हक बनता है। इसलिए भरण-पोषण के लिए विवाह को साबित करना जरूरी नहीं है। भरण पोषण के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि  " भरण-पोषण के मामले में पत्नी की परिभाषा दस्तावेज से बड़ी है। पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं तो भरण-पोषण का हक बनता है। लिहाजा, भरण-पोषण के लिए विवाह को साबित करना जरूरी नहीं है। कानून का मकसद न्याय है न कि ऐसे रिश्तों को नकारना जो समाज में पति-पत्नी की तरह माने जाते है।" इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की अदालत ने देवरिया निवासी याची की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय का आदेश रद्द कर नए सिरे से मामले की सुनवाई करने के लिए वापस भेज दिया। साथ ही कांस्टेबल पति को मामले के निस्तारण होने तक याची को 8,000 रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया है। मामले में याची ने 2017 में पति के निधन के बाद कांस्टेबल देवर संग शादी होने का दा...

14 साल बाद अनुकम्पा नियुक्ति रद्द करना गलत -इलाहाबाद हाई कोर्ट

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( Shalini kaushik law classes )  इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने शिव कुमार की याचिका पर आदेश देते हुए कहा कि  "अनुकंपा नियुक्ति में कोई धोखाधड़ी या महत्वपूर्ण तथ्य नहीं छुपाया गया है, तो वर्षों बाद उस नियुक्ति को निरस्त नहीं किया जा सकता। "    यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने मां के सरकारी स्कूल में शिक्षिका होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति के तहत क्लर्क के पद पर कार्यरत कर्मचारी को बर्खास्त किए जाने के आदेश को रद्द कर दिया हाथरस निवासी शिव कुमार के पिता हाथरस में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत थे । सेवा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। याची को 2001 में अनुकंपा के आधार पर जूनियर क्लर्क पद पर नियुक्ति दी गई। बाद में वह पदोन्नत होकर सीनियर क्लर्क बने। इस बीच 31 मई 2023 में उनकी सेवा यह कहकर समाप्त कर दी गई कि नियुक्ति के समय उन्होंने यह तथ्य नहीं बताया था कि उनकी मां सरकारी नौकरी में थीं। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची अधिवक्ता ने दलील दी कि नियुक्ति आवेदन के समय कोई निर्धारित फॉर्म नहीं था जिसमें परिवार के सदस्यों की नौकरी की जानकारी दे...

सोशल मीडिया और अश्लील तस्वीरें -अपराध

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 गुजरात हाईकोर्ट द्वारा अभी हाल ही में उस पति पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया गया, जिसने अपनी पत्नी की 'अश्लील' तस्वीरें और उनके साथ भद्दी टिप्पणियां व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर अपलोड की थीं और उन्हें वायरल भी किया था।  इसके साथ ही जस्टिस हसमुख डी. सुथार की पीठ ने यह आदेश पारित करते हुए पति के खिलाफ दर्ज एफ आई आर और उसके बाद शुरू की गई सभी कार्यवाही यह देखते हुए रद्द कर दी गयी कि मामला दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया गया है. आदेश पारित करते हुए जस्टिस हसमुख डी. सुथार ने कहा,  "...यद्यपि दोनों पक्षों के बीच विवाद सुलझ गया, लेकिन याचिकाकर्ता के आचरण को देखते हुए पति ने अपनी पत्नी की अश्लील तस्वीरें मांगी हैं। इतना ही नहीं, उसने इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर भी वायरल कर दिया, याचिकाकर्ता पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया जाता है।"         इसके साथ ही जज ने जुर्माने की राशि एक सप्ताह के भीतर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा किये जाने के निर्देश दिए।  प्रस्तुत मामले में पति पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66(ई) और 67 के साथ भारत...