नाबालिग :उम्र की जगह अपराध की समझ व् परिपक्वता देखी जाये .

नाबालिग :उम्र की जगह अपराध की समझ व् परिपक्वता देखी जाये .

१६ दिसम्बर २०१२ की भयावह रात ,दिल्ली में हुआ गैंगरेप ,दुर्दांत रूप से हुए इस रेप में पीड़िता की मृत्यु और इस भयावहता का सबसे बड़ा दरिंदा एक नाबालिग [किशोर न्याय {बालकों की देखभाल व् संरक्षण अधिनियम २००० }के अनुसार ]था ,दामिनी कहें ,बिटिया कहें या निर्भय उसने भी मरते मरते अपने बयान में उसी की ओर इशारा किया था किन्तु भारतीय कानून उसकी उम्र को देखते हुए उसे सजा देता है मात्र ३ साल जो कि किशोर न्याय अधिनियम में अधिकतम सजा है .
बिटिया के पिता इसे मौलिक अधिकार का हनन मानते हैं और उसे सख्त सजा दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करते हैं जिस पर सुप्रीम कोर्ट केंद्र से पूछता है कि
''जघन्य अपराध के मामले में १६ साल से ऊपर के आरोपी को नाबालिग माना जाये या नहीं ,क्या यह तय करने का दायित्व फौजदारी अदालत का है ,क्योंकि जो याचिका दाखिल की गयी है उसमे कहा गया है कि किशोरावस्था तय करने का दायित्व फौजदारी अदालत का है ,किशोर न्याय बोर्ड का नहीं .''
अभी तक के फौजदारी कानून में दंड प्रक्रिया सहिंता १९७३ की धारा २७ कहती है -
''किसी ऐसे अपराध का विचारण ,जो मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय नहीं है और जो ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाता है जिसकी आयु उस तारीख़ को जब वह न्यायालय के समक्ष हाज़िर हो या लाया जाये सोलह वर्ष से कम है ,मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय द्वारा या किसी ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसे बालक अधिनियम १९६० या किशोर अपराधियों के उपचार ,प्रशिक्षण और पुनर्वास के लिए उपबंध करने तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि के अधीन विशेष रूप से सशक्त किया गया है .''
और इधर किशोर न्याय अधिनियम की धारा २[k ]कहती है -
''किशोर या बालक से अभिप्राय उस व्यक्ति से है जिसने अठारह वर्ष की आयु पूर्ण नहीं की है .''
और उस पर कौन सा कानून लागू होगा इसके लिए लल्लन प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व् अन्य २००२ cr .l .j १२४२ :२००२ all .l .j ८४ में इलाहाबाद हाईकोर्ट का कहना है ,-
''यदि अभियुक्त के विचारण के दौरान विचारण न्यायालय यह पाये कि वह किशोर है तो मामला किशोर न्याय बोर्ड को युक्तियुक्त निर्णय हेतु भेजा जाना चाहिए .''
और इधर दंड प्रक्रिया सहिंता १९७३ की धारा ४ के अनुसार -
''दंड प्रक्रिया सहिंता सभी प्रकार के अपराधिक मामलों में विचारण की प्रक्रिया का निर्धारण करती है लेकिन यदि किसी विशिष्ट संविधि में इस सम्बन्ध में कोई अन्यथा प्रावधान किया गया है तो यह इसका अपवाद माना जायेगा.''
इस प्रकार दामिनी मामले में ही क्या सभी ऐसे मामलों में जिनमे नाबालिग अभियुक्त हैं उन पर कार्यवाही का अधिकार किशोर न्याय बोर्ड का है फौजदारी अदालत का नहीं और इसमें संशोधन कर भी दिया जाये तो उक्त कार्यवाही में उस संशोधन का कोई लाभ मिलने वाला नहीं है क्योंकि विधियां भूतलक्षी प्रभाव नहीं रखती ,वे जिस दिन से लागू होती हैं उसी दिन से होने वाले अपराधों पर प्रभावी होती है ,
किन्तु संशोधन ज़रूरी है क्योंकि न्याय की मांग है कि जब कोई किसी का जीने का अधिकार और वह भी सम्मान से जीने का अधिकार छीनता है तो वह दण्डित होना ही चाहिए किन्तु ऐसे अपराधों को उम्र की सीमा में बांधकर पूर्ण न्याय नहीं किया जा सकता जिस प्रकार आई. पी. सी . की धारा ८२ के अनुसार ७ वर्ष तक के बच्चे का कोई कार्य अपराध नहीं माना गया है किन्तु धारा ८३ के अनुसार ७ से १२ वर्ष तक के बच्चे को समझ व् परिपक्वता के आधार पर अपराधी मानने या न मानने की व्यवस्था की गयी है तो ऐसे मामले जिसमे अभियुक्त ने नृशंसता की ,जघन्यता की हदें पार की हैं उसमे उसकी उम्र न देखकर अपराध करने की उसकी समझ व् परिपक्वता को ध्यान में रखना ज़रूरी है क्योंकि जब फौजदारी कानून में १६ से कम और किशोर न्याय अधिनियम में १८ से कम वाले व्यक्ति को अपराधी मानने के मामले में नाबालिग व् व्यस्क का अंतर रखा गया तब यह नहीं सोचा गया होगा कि इतनी उम्र का व्यक्ति ऐसा अपराध भी कर सकता है किन्तु आज जैसे जैसे बच्चों की समझ व् परिपक्वता बढ़ रही है इस तरह कानून को उम्र की सीमा में बांधकर हम अपराधियों के मानवाधिकार तो सुरक्षित कर रहे हैं किन्तु उन पीड़ितों के नहीं जिन्हें संविधान के अनुच्छेद २१ के तहत सम्मानपूर्ण जीने के अधिकार की गारंटी दी जाती है .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

टिप्पणियाँ

  1. according to article 21 of constitution, ''no person shall be deprived of his life or personal liberty except according to the procedure established by law''.
    so parliament may set a provision for cruel minor offender of ''nirbhaya kaand'', but corrupt politician have no time to think about it.
    ma'am, really 'evil should be returned for evil without any regard to consequence.

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