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छठी इंद्री पर निर्णय दे रही सुप्रीम कोर्ट

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 सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर एक महिला का यौन शोषण करने के आरोपी व्यक्ति की रेप की सज़ा और दंड रद्द किया, क्योंकि अपील के दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे से शादी कर ली थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि   उसने अपनी "छठी इंद्री" पर काम किया कि उन्हें एक साथ लाकर विवाद को सुलझाया जा सकता है।  जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अपीलकर्ता के खिलाफ FIR, सज़ा और दंड को रद्द करके "पूरा न्याय" किया। कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब अपीलकर्ता ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा उसकी सज़ा निलंबित करने से इनकार करने को चुनौती दी थी। जस्टिस नागरत्ना ने फैसला लिखते हुए कहा कि जब यह मामला पहली बार सुप्रीम कोर्ट के सामने आया,  " मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद हमें एक छठी इंद्री महसूस हुई कि अगर अपीलकर्ता और प्रतिवादी पीड़िता एक-दूसरे से शादी करने का फैसला करते हैं तो उन्हें फिर से एक साथ लाया जा सकता है।"  इसी सहज ज्ञान पर काम करते हुए बेंच ने वकील को सलाह दी कि पक्षकारों से ...

महिलाओं का यौन शोषण खत्म हो इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि  शादी का झूठा वादा करके महिलाओं का यौन शोषण करने और बाद में शादी से इनकार करने की प्रवृत्ति समाज में बढ़ रही है, जिसे शुरुआत में ही खत्म किया जाना चाहिए।  यह टिप्पणी जस्टिस नलिन कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने की, जिन्होंने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं, जिसमें धारा 69 (धोखे से यौन संबंध बनाना आदि) भी शामिल है, उसके तहत आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की। ➡️ संक्षेप में -  आरोपी प्रशांत पाल पर पीड़िता के साथ शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाने और उसे शारीरिक और मानसिक यातना देने का आरोप है। आरोप है कि 5 साल के रिश्ते के बावजूद, आरोपी ने बाद में उससे शादी करने से इनकार कर दिया और उसने दूसरी महिला से सगाई कर ली। गिरफ्तारी से सुरक्षा पाने के लिए आवेदक ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की. ➡️ आरोपी के वकील के तर्क  ✒️ आरोप अस्पष्ट और झूठे हैं। दोनों बालिग हैं और 2020 से सहमति से रिश्ते में साथ रह रहे हैं, लेकिन उसने कभी भी उससे शादी का कोई वादा नहीं किया। ✒️ लंबे रिश्ते के बाद सिर्फ शादी से इनकार करना अपराध नहीं...

सुप्रीम कोर्ट में पत्र

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  सुप्रीम कोर्ट में अपनी समस्या पत्र के माध्यम से भेजने के लिए, आप सीधे भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को पत्र लिख सकते हैं। इसे "रिट याचिका" (writ petition) नहीं, बल्कि एक सामान्य पत्र या जनहित याचिका (PIL) के रूप में माना जा सकता है यदि यह व्यापक सार्वजनिक हित का मामला है।   पत्र भेजने के लिए नीचे दिए गए चरणों का पालन करें: 1. पत्र का प्रारूप (Format of the Letter) भाषा:  पत्र हिंदी या अंग्रेजी में लिखा जा सकता है। शीर्षक:  पत्र के शीर्ष पर स्पष्ट रूप से लिखें "भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र" या "सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को पत्र"। विवरण:  अपनी समस्या को स्पष्ट, संक्षिप्त और सटीक रूप से लिखें। अनावश्यक विवरण से बचें। अनुरोध:  स्पष्ट रूप से बताएं कि आप सुप्रीम कोर्ट से क्या कार्रवाई चाहते हैं। दस्तावेज:  अपनी समस्या से संबंधित किसी भी प्रासंगिक दस्तावेज़ की प्रतियां संलग्न करें (मूल दस्तावेज़ न भेजें)। 2. पता (Address) पत्र को निम्नलिखित पते पर भेजें: माननीय मुख्य न्यायाधीश, भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India...

नितीश कुमार ने किया महिला की गरिमा पर आघात-SCBA

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  सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उस कथित कृत्य की कड़ी निंदा की, जिसमें उन्होंने पटना में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान एक महिला डॉक्टर का हिजाब कथित रूप से जबरन नीचे खींच दिया। बार एसोसिएशन ने इस घटना को महिला की गरिमा, स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों पर गंभीर हमला करार दिया। 20 दिसंबर, 2025 को पारित एक प्रस्ताव में एससीबीए के अध्यक्ष और कार्यकारी समिति ने 15 दिसंबर 2025 को हुई इस कथित घटना की “कड़ी शब्दों में निंदा की. प्रस्ताव में कहा गया कि  यह अत्यंत चिंताजनक है कि एक उच्च संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति ने सार्वजनिक मंच पर एक महिला की गरिमा और स्वायत्तता को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया। एससीबीए ने कहा कि किसी महिला का हिजाब या सिर ढकने का वस्त्र जबरन हटाना न केवल उसकी व्यक्तिगत गरिमा का उल्लंघन है, बल्कि उसकी स्वायत्तता, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और धार्मिक आज़ादी पर भी सीधा आघात है।  बार एसोसिएशन ने इस कृत्य को महिलाओं के प्रति “अपमानजनक और हीन भावना” को दर्शाने वाला बताया और कहा कि ऐसी घटनाएँ संविधान द्वारा संरक्षित ...

गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सिर तन से जुदा” जैसे नारे न केवल कानून के शासन के खिलाफ हैं, बल्कि भारत की संप्रभुता और अखंडता पर भी सीधा प्रहार -इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  स्रोत- ABP news 19 दिसंबर 2025  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली दंगे के एक आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बेहद सख्त रुख अपनाते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. अदालत ने स्पष्ट कहा कि  “ आई लव मोहम्मद” जुलूस के दौरान “सिर तन से जुदा” जैसे नारे लगाना केवल दंगा भड़काने की कोशिश नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर सरकार, कानून व्यवस्था और देश की संप्रभुता को चुनौती देने जैसा कृत्य है. कोर्ट ने माना कि इस तरह के नारे समाज में भय और अशांति फैलाने के साथ-साथ हिंसा के लिए उकसाने की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा देते हैं." यह मामला मौलाना तौकीर रजा के सहयोगी बताए जा रहे रेहान से जुड़ा है, जिसकी जमानत याचिका पर जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने सुनवाई की. सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों ने अपने-अपने तर्क रखे. कोर्ट ने पूरे मामले के तथ्यों और आरोपों का गहराई से अध्ययन करने के बाद याची को राहत देने से इनकार कर दिया. ➡️ एफआईआर और आरोपों का विवरण- याची रेहान के खिलाफ बरेली दंगों को लेकर कोतवाली थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी. आरोप है कि जुलूस के दौरान भड़काऊ न...

द्विविवाह के कारण हुआ वकील का 10 साल का सस्पेंशन इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रद्द

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश स्टेट बार काउंसिल द्वारा वकील पर लगाए गए 10 साल के सस्पेंशन को इस आधार पर रद्द कर दिया कि उसे सुनवाई का कोई मौका नहीं दिया गया। वकील पर कथित द्विविवाह के लिए नैतिक पतन का आरोप है। जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस मनजीव शुक्ला की बेंच ने यह टिप्पणी की:  " कारण बताओ नोटिस 17 फरवरी, 2025 को 10 मार्च, 2025 को पेश होने के लिए जारी किया गया और विवादित आदेश 23 फरवरी, 2025 को पारित किया गया, जिससे यह साफ है कि विवादित आदेश बिना सुनवाई का कोई मौका दिए एकतरफ़ा पारित किया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है"। याचिकाकर्ता ने यूपी बार काउंसिल के उस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया, जिसमें उसके प्रैक्टिस करने का लाइसेंस 10 साल के लिए सस्पेंड कर दिया गया, जिससे उसे भारत में किसी भी कोर्ट में पेश होने से रोक दिया गया। उसने दलील दी कि  "उसे किसी भी कानून के तहत द्विविवाह का दोषी नहीं ठहराया गया। फिर अगर उसने ऐसा किया भी होता, तो भी यह नैतिक पतन के दायरे में नहीं आता।"  दूसरी ओर, प्रतिवादी के वकील ने पी. मोहनसुंदरम बनाम द प्रेसिडेंट ऑफ...

लिव-इन-रिलेशनशिप गैरकानूनी नहीं-इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  एक महत्वपूर्ण आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट (सिंगल जज) ने 17 दिसंबर 2025 को कहा कि " हालांकि लिव-इन रिलेशनशिप का कॉन्सेप्ट सभी को स्वीकार्य नहीं हो सकता है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा रिश्ता 'गैर-कानूनी' है या शादी की पवित्रता के बिना साथ रहना कोई अपराध है। इसमें यह भी कहा गया कि इंसान के जीवन का अधिकार "बहुत ऊंचे दर्जे" पर है, भले ही कोई जोड़ा शादीशुदा हो या शादी की पवित्रता के बिना साथ रह रहा हो। " कोर्ट ने टिप्पणी की, "एक बार जब कोई बालिग व्यक्ति अपना पार्टनर चुन लेता है तो किसी अन्य व्यक्ति, चाहे वह परिवार का सदस्य ही क्यों न हो, उसको आपत्ति करने और उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने का अधिकार नहीं है। संविधान के तहत राज्य पर जो जिम्मेदारियां डाली गईं, उनके अनुसार हर नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।"  इन टिप्पणियों के साथ जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों द्वारा पुलिस सुरक्षा की मांग वाली कई रिट याचिकाओं को मंज़ूरी दी। कोर्ट का विचार है कि राज्य सहमति से रहने वाले बालिग...

राज्य बार काउंसिल को मौजूदा कानून के तहत राज्य के बार एसोसिएशनों को उपर्युक्त अवधि के लिए अपने चुनाव स्थगित करने का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं था -इलाहाबाद हाईकोर्ट -

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  इलाहाबाद हाई कोर्ट की माननीय जस्टिस अतुल श्रीधरण और माननीय जस्टिस अनीश गुप्ता जी की खंडपीठ ने मो आरिफ सिद्दीकी बनाम स्टेट ऑफ़ उत्तर प्रदेश एवं अन्य में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा- राज्य बार काउंसिल को मौजूदा कानून के तहत राज्य के बार एसोसिएशनों को उपर्युक्त अवधि के लिए अपने चुनाव स्थगित करने का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं था. HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD WRIT-C No.40685 of 2025 Mohd. Arif Siddiqui (Petitioner(s) Vers State Of Uttar Pradesh And 5 Others .....Respondent(s) Ashok Kumar Counsel for Petitioner(s) Counsel for Respondent(s) Bairister Singh Tiwari, C.S.C., Sai Girdhar Court No.-35 (SL.No.28) HON'BLE ATUL SREEDHARAN, J. HON'BLE ANISH KUMAR GUPTA, J. 1. Heard Sri Bairister Singh, learned counsel for the petitioner, Sri Ashok Kumar Tiwari along with Sri Sai Giridhar, learned counsel for High Court Bar Association, Smt. Kritika Singh as well Smt. Priyanka Midha, learned Additional Chief Standing Counsel, and Sri Manoj Kumar Mishra, learned Standing Cou...

अच्छी कमाई वाली महिला गुजारा भत्ते की हकदार नहीं-इलाहाबाद हाईकोर्ट

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  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि  "अगर कोई पत्नी अच्छी नौकरी करती है और अपना गुज़ारा करने के लिए काफ़ी सैलरी कमाती है तो वह CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है।" इस तरह जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक पति को अपनी पत्नी को सिर्फ़ "इनकम को बैलेंस" करने और दोनों पक्षों के बीच बराबरी लाने के लिए 5K रुपये गुज़ारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया, जबकि पत्नी हर महीने 36K रुपये कमाती थी। कोर्ट ने इस बात पर भी एतराज़ जताया कि पत्नी "साफ़-सुथरे हाथों" से कोर्ट नहीं आई। कोर्ट ने कहा कि उसने शुरू में बेरोज़गार और अनपढ़ होने का दावा किया, जबकि असल रिकॉर्ड से पता चलता है कि वह पोस्टग्रेजुएट है और सीनियर सेल्स कोऑर्डिनेटर के तौर पर काम कर रही है। संक्षेप में मामला कोर्ट पति (रिविज़निस्ट) द्वारा दायर क्रिमिनल रिविज़न पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें गौतम बुद्ध नगर के फ़ैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज के फ़ैसले और आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें उसे पत्नी को गुज़ारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया। उनके व...

बार कौंसिल ऑफ़ उत्तर प्रदेश द्वारा मनमाना शुल्क वसूलने से सुप्रीम कोर्ट चिंतित

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  सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल द्वारा नामांकन प्रक्रिया में मौखिक साक्षात्कार (oral interview) के लिए अभ्यर्थियों से ₹2500 शुल्क वसूलने के आरोपों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने इसे अपने 2024 के फैसले की अवहेलना बताते हुए उप्र बार काउंसिल को नोटिस जारी किया है और निर्देश दिया है कि वह इस प्रथा को स्पष्ट करने के लिए हलफनामा दाखिल करे। जस्टिस जेबी पारडिवाला और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने कहा कि यह शुल्क सुप्रीम कोर्ट के Gaurav Kumar v. Union of India (2024) निर्णय को दरकिनार करने का तरीका प्रतीत होता है, जिसमें नामांकन शुल्क की सीमा स्पष्ट रूप से तय की गई थी।  सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने टिप्पणी की:  “यह अत्यंत चौंकाने वाली बात है कि इंटरव्यू में बैठने के लिए ₹2500 वसूले जा रहे हैं। अगले दिन की सुनवाई पर यूपी बार काउंसिल को इस संबंध में हलफनामा देना होगा।”       अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को भी मामले की जांच कर उचित कार्रवाई के निर्देश दिए। सुप्रीम कोर्ट का 2024 का निर्णय 2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि—  नामा...

उत्तर प्रदेश-रामपुर- SIR फॉर्म गलत भरने पर पहली FIR-नूरजहां आमिर और दानिश पर -

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  स्रोत -जागरण न्यूज 6 दिसंबर 2025 6 दिसंबर 2025 की जागरण न्यूज के अनुसार रामपुर जिले में एसआईआर फॉर्म में तथ्यों को छुपाकर गलत जानकारी भरने का एक मामला सामने आया है, रामपुर जिले में एक महिला ने विदेश ( दुबई व कुवैत) में पिछले कई वर्षों से रहने वाले अपने दो बेटों के बारे में गलत जानकारी एसआईआर फॉर्म में भर दी। इतना ही नहीं उन्होंने फॉर्म में फर्जी साइन भी किये हैं। बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के फॉर्म का डिजिटाइजेशन करने पर यह फर्जीवाड़ा सामने आया। इस पर जिलाधिकारी रामपुर अजय कुमार द्विवेदी ने तीनों के खिलाफ सुसंगत धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई है। भारत निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशानुसार उत्तर प्रदेश में विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) का कार्य गंभीरता एवं पूर्ण पारदर्शिता के साथ संचालित किया जा रहा है। जिलाधिकारी रामपुर अजय कुमार द्विवेदी ने बताया कि  "जनपद की सभी विधानसभा क्षेत्रों में विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण का कार्य गंभीरता एवं पूर्ण पारदर्शिता के साथ संचालित किया जा रहा है। इसी क्रम में विधानसभा क्षेत्र–37, रामपुर के भाग संख्या–248 में बीएलओ ने मतदाताओं से गण...

रेक्टिफिकेशन डीड (शुद्धि पत्र)

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 गिफ्ट डीड (दान विलेख) में नाम की गलती को रेक्टिफिकेशन डीड (शुद्धि पत्र) के माध्यम से सुधारा जा सकता है। यह एक कानूनी प्रक्रिया है जिसमें मूल दस्तावेज़ में हुई अनजाने में हुई टाइपिंग या तथ्यात्मक त्रुटियों को ठीक किया जाता है।  ➡️ कानूनी प्रक्रिया (Procedure) नाम की गलती को सुधारने के लिए नीचे दी गई चरण-दर-चरण प्रक्रिया का पालन करें: 1️⃣ त्रुटियों की पहचान करें: मूल गिफ्ट डीड की सावधानीपूर्वक समीक्षा करें और उन विशिष्ट गलतियों या अशुद्धियों की पहचान करें जिन्हें सुधारने की आवश्यकता है। 2️⃣ सहमति प्राप्त करें: सुधार के लिए मूल गिफ्ट डीड में शामिल सभी पक्षों (दानकर्ता और दानग्राही) की आपसी सहमति आवश्यक है। यदि कोई एक पक्ष सहमत नहीं होता है, तो मामले को अदालत में ले जाना पड़ सकता है। 3️⃣ शपथ पत्र (Affidavit) तैयार करें: एक शपथ पत्र तैयार करें जिसमें सही और गलत नाम, सुधार का कारण, और यह घोषणा हो कि दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं। इस शपथ पत्र को नोटरी द्वारा सत्यापित (notarized) किया जाना चाहिए और उचित मूल्य के गैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर पर होना चाहिए। 4️⃣ रेक्टिफिकेशन डीड (शुद्धि प...

BCI राज्य बार कौंसिल में 30%महिला आरक्षण सुनिश्चित करे-सुप्रीम कोर्ट

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  सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार 4 दिसंबर 2025 को संकेत दिया कि वह उम्मीद करता है कि  बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) आगामी राज्य बार काउंसिल चुनावों में महिलाओं के लिए 30% आरक्षण सुनिश्चित करेगी।  कोर्ट यह टिप्पणियाँ उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान कर रहा था, जिनमें राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं की अनिवार्य प्रतिनिधित्व की मांग की गई है। यह मामला याचिकाकर्ता योगमाया की ओर से सिनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता द्वारा किए गए मेंशन पर सूचीबद्ध हुआ. सुनवाई के दौरान BCI की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कुमार ने कहा कि ऐसे आरक्षण को लागू करने के लिए एडवोकेट्स एक्ट में संशोधन की आवश्यकता होगी और कई राज्य बार काउंसिलों में चुनाव प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है, इसलिए तत्काल बदलाव करना कठिन होगा। हालांकि, चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि  BCI को अपने नियमों की ऐसी व्याख्या करनी होगी जिससे राज्य बार काउंसिलों में कम से कम 30% महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके, और यह व्यवस्था कुछ पदाधिकारियों के पदों तक भी विस्तारित हो। CJI ने कहा—  “हम...

SIR 2026 -SIR FORM ONLINE STATUS CHECK

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स्रोत-नवभारत टाइम्स 1 दिसंबर 2025  क्या आपने SIR प्रक्रिया से जुड़ा अपना एन्यूमरेशन फॉर्म मतलब गणना प्रपत्र भर दिया है? लेकिन क्या बीएलओ ने आपका फॉर्म ऑनलाइन सबमिट किया है ? इसके बारे में पता करने के लिए आप नीचे दिए स्टेप्स को फॉलो कर सकते हैं। 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही SIR की प्रक्रिया के तहत क्या आपने अपना एन्यूमरेशन फॉर्म भर दिया है? ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बीएलओ ने आपका फॉर्म सबमिट किया है? दरअसल अगर आप चाहें, तो घर बैठे अपने फोन से आसानी से चेक कर सकते हैं कि आपका एन्यूमरेशन फॉर्म सबमिट हुआ है या नहीं। इसके लिए आपको कुछ आसान से स्टेप्स को फॉलो करना होगा और चंद सेकेंड्स में आपको पता चल जाएगा कि आपका एन्यूमरेशन फॉर्म सबमिट हो गया है या नहीं। चलिए इसके बारे में डिटेल में पता करते हैं। ➡️ एन्यूमरेशन फॉर्म क्या है? यह एक ऐसा डॉक्यूमेंट है जिसका इस्तेमाल मतदाताओं की लिस्ट बनाने के लिए किया जा रहा है। इसे मतदाताओं के घर-घर जाकर भरवाया जा रहा है। इस फॉर्म के जरिए भारत का चुनाव आयोग सुनिश्चित करता है कि वोटर लिस्ट से कोई भी योग्य वोटर बाहर ना रहे और कोई अयोग्...