शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

मीडिया को सुधरना होगा .


 
''सरकार को जाँच पूरी होने तक जी न्यूज़ का लाइसेंस निलंबित कर देना चाहिए ''प्रैस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू के ये शब्द एक चेतावनी हैं हमारे मीडिया जगत के लिए जहाँ चैनल की आड़ में गैर कानूनी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है .कौंग्रेस सांसद नवीन जिंदल की कम्पनी के खिलाफ खबर न चलने के बदले १०० करोड़ रूपए की वसूली का प्रयास करने और धोखा धडी के आरोप में जी न्यूज़ के दो संपादक सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया को दिल्ली की एक अदालत ने जमानत देने से इंकार कर दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया .इन दोनों पर भारतीय दंड सहिंता की निम्न धाराओं में आरोप लगाये गए हैं जिनका विवरण निम्न प्रकार है-
https://encrypted-tbn2.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcROEFKCTbabA9-tViJTLvIIvO1lUFFnVschdNu3OXl2xftLFhMW6CrlOKs

१२०-बी आपराधिक षड्यंत्र के लिए दंड -और आपराधिक षड्यंत्र क्या है ये धारा १२०-क  में बताया गया है जो कहती है -
१२०-क -आपराधिक षड्यंत्र की परिभाषा -जबकि दो या दो से अधिक व्यक्ति -
१-कोई अवैध कार्य ,अथवा
२-कोई ऐसा कार्य ,जो अवैध नहीं है ,अवैध साधनों द्वारा ,करने या करवाने के लिए सहमत होते हैं तब ऐसी सहमति आपराधिक षड्यंत्र कहलाती है ;
और धारा १२०-बी में ऐसे अपराध के लिए मृत्यु [आजीवन कारावास ]या दो वर्ष या उससे अधिक अवधि के कठिन कारावास का दंड है .

१२०-बी के साथ इन पर धारा 384  लगायी  गयी  है जिसमे  उददापन  के लिए दंड का प्रावधान  है जो कि 3 वर्ष तक के दोनों में से किसी  प्रकार के कारावास या जुर्माने  का है ये अपराध क्या है यह  धारा 383 बताती  है -
धारा 383 -जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं  उस  
व्यक्ति की या किसी  अन्य  व्यक्ति की कोई क्षति  करने के भय  में साशय  डालता  है ,और तद्द्वारा  इस  प्रकार भय में डाले गए व्यक्ति को ,कोई सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई चीज़ ,जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके किसी व्यक्ति को परिदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करता है वह उददापन करता है .
 इसके साथ ही धारा ४२० भी इनपर लगायी गयी है जो कहती है -
धारा ४२० आई.पी.सी.-जो कोई छल करेगा और तद्द्वारा उस व्यक्ति को जिसे प्रवंचित किया गया है बेईमानी  से उत्प्रेरित करेगा कि वह कोई संपत्ति किसी व्यक्ति को परिदत्त कर दे या किसी भी मूल्यवान प्रतिभूति  को या किसी चीज़ को जो हस्ताक्षरित या मुद्रांकित हो और जो मूल्यवान प्रतिभूति में संपरिवर्तित किये जाने योग्य हो पूर्णतः या अंशतः रच दे ,परिवर्तित कर दे या नष्ट कर दे वह दोनों में से किसी भांति की कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .

 और इन सभी अपराधों को करने के लिए जो इनके प्रयत्न है ऐसे अपराधों को करने के जो आजीवन कारावास या अन्य कारावास से दंडनीय हो को करने का प्रयत्न भारतीय दंड सहिंता की धारा ५११ में दंडनीय है और वह भी इन पर लगायी गयी है .
                    उपरोक्त धाराओं के सन्दर्भ में मीडिया को अपनी कार्य प्रणाली में सुधार लाते हुए कानून का पालन कराने में सक्रिय होना होगा न कि इसकी आड़ में कानून तोड़ने वालों की पंक्ति में .
                          शालिनी कौशिक
                                [कानूनी ज्ञान ]



सोमवार, 26 नवंबर 2012

देर से ही सही प्रशासन जागा :बधाई हो बार एसोसिएशन कैराना .

                  Allahabad high court.jpg
आज मैं आपको इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे निर्णय के बारे में बताने जा रही हूँ जो हमारे देश में कपटपूर्ण  व्  न्यायालय  का समय  बर्बाद करने वाले वादों की बढ़ोतरी को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है किन्तु इसके साथ ही यह दिखता है प्रशासनिक विफलता को जिसके कारन २४-५-२०१२ को दिया गया यह निर्णय २६-११-२०१२ तक भी कार्यान्वित नहीं हो पाया है .अब क्या नहीं हो पाया है यह आप इस निर्णय व् मामले के बारे में पढ़कर जान सकते हैं .
 निर्णय -इलाहाबाद उच्च न्यायालय
तिथि -२४-५-२०१२
जज-माननीय सिबगत उल्लाह जे.
दिवित्य अपील न० -२१४ -२०१२
गुलज़ार अहमद पुत्र नियाज़ अहमद निवास पुराना बाज़ार ,जामा मस्जिद ,कैराना जिला मुज़फ्फरनगर [अब शामली ]-----वादी /अपीलार्थी  

                                               बनाम
श्रीमती अख्तरी विधवा नियाज़ अहमद निवासी पुराना बाज़ार ,जामा मस्जिद कैराना जिला मुज़फ्फरनगर [अब शामली ]---------प्रतिवादी /प्रत्यर्थी 

प्रस्तुत मामले में वादी ने अपनी माता प्रतिवादी के विरुद्ध एक वाद दायर किया कि वादी द्वारा माता /प्रतिवादी के पक्ष में २०-७-२००२ को निष्पादित किया गया विक्रय दस्तावेज क्योंकि लेनदारों को कपटवंचित   करने के आशय से निष्पादित किया गया था इस आधार पर शून्य है .प्रतिवादी के उपस्थित न होने पर वाद एकपक्षीय रूप से ख़ारिज कर दिया गया .
   १५-७-२००२ को सिविल जज सीनियर डिविजन कैराना द्वारा ख़ारिज कर दिया गया न केवल वाद ख़ारिज किया गया बल्कि यह कारण वादी व् उसके वकील के विरुद्ध सात दिन के अन्दर यह कारण दिखाने हेतु नोटिस भी जारी किया गया कि क्यों न उनके विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जाये ?
इस आज्ञप्ति  के विरुद्ध वादी ने ए.डी.जे .कोर्ट न० ९ मुज़फ्फरनगर में अपील दायर की .वादी ने इसमें कहा कि विक्रय दस्तावेज के निष्पादन के पश्चात् वह अपने ऋण अदा करा चुका था .इसके अनुसार वादी द्वारा माता के पक्ष में किया गया अंतरण वाद पात्र में वर्णित आधार पर शून्य नहीं है बल्कि केवल शून्यकरणीय    है  और वह भी केवल लेनदारों के विकल्प पर न कि स्वयं वादी के विकल्प पर .
प्रिवी कौंसिल ने ज़फरुल हसन बनाम फरीदुद्दीन ए.आई .आर .१९४६ पी.सी.१७७ में धारित किया कि पक्षों में किया गया ऐसा अंतरण उनमे से किसी के द्वारा त्यागा नहीं जा सकता है .
     ए . आई .आर. १९५४ नागपुर १२९ [डी बी ]में धारित किया गया कि धारा ५३ संपत्ति अंतरण अधिनियम में ऐसी घोषणा का प्रभाव पक्षों में ऐसे विक्रय दस्तावेज को संचालित करने का होता है न कि निरस्त  करने या ऐसे एक ओर रखने का .

ए.आई.आर.१९३९ मद्रास ८९४ ,ए,आई.आर.१९६१ पंजाब ४२३ और ए.आई.आर.१९५४ मद्रास १७३ में धारित किया गया कि जबकि ऐसा अंतरण नहीं किया गया है अपने दावे लागू करने के अधिकार केवल लेनदारों का होता है .यह भी धारित किया गया कि धारा ५३ में घोषणा का परिणाम केवल तभी निरस्त किया जा सकता है जबकि लेनदारों और उनके दावों व् दावों  के अधीन रहते हुए संतुष्ट करने से बचने के लिए किया गया हो ,पक्षों में ऐसा अंतरण विधिमान्य व् प्रवर्तनीय है .
    ए.आई.आर.१९६३ मैसूर २५७ में धारित किया गया कि धारा ५३ के अंतर्गत आने से बचने में किया गया अंतरण बचने योग्य संव्यवहार नहीं है किन्तु इसका लेनदारों को देरी कराने या पराजित करने पर कोई प्रभाव नहीं है.
मोहम्मद तकी खान बनाम जंग सिंह ए.आई.आर.१९३५ इलाहाबाद ५२९ ऍफ़.बी में धारित किया गया कि जहाँ सारभूत रूप में कपट द्वारा प्रभावित किये जाने का आशय है वहां न्यायालय किसी पक्ष को अपने दस्तावेज से बचने के क्रम में अपने कपट का कथन करने की आज्ञा न देगा .

    और उपरोक्त प्राधिकार के प्रकाश में न्यायालय ने यह वाद निरस्त कर दिया .न्यायाधीश की राय में इसमें वादी व् उसके वकील के विरुद्ध नोटिस या प्रथम सूचना रिपोर्ट का कोई अवसर नहीं था .
            इसके अनुसार गुण पर दिवित्य अपील ख़ारिज की गयी .यद्यपि निचले न्यायालय को वादी व् उसके वकील के विरुद्ध नोटिस व् प्रथम सूचना रिपोर्ट के आदेश को निरस्त किया गया .फिर भी वादी पर कपटपूर्ण ,वाद और न्यायालय का समय बर्बाद करने के कारण २५,०००/-रूपए का जुर्माना लगाया गया .जो कि वह तीन महीने में बार एसोसिएशन कैराना जिला मुज़फ्फरनगर अब शामली को अदा करेगा और यदि वह ऐसा करने में असफल रहता है तो कलेक्टर भू राजस्व की बकाया की तरह इसकी वसूली करेगा .बार एसोसिएशन कैराना इसका उपयोग किताबें खरीदने में करेगा .  

[और यह विचारणीय है कि नायालय का यह निर्णय अभी तक कार्यान्वित नहीं हुआ है .न तो वादी ने जमा किया है और न ही कलेक्टर ने इसे वसूल  किया है .चूंकि मुजफ्फरनगर की जगह अब कैराना का जिला शामली है तो ये दायित्व शामली के कलेक्टर का बनता है किन्तु बार एसोसिशन कैराना द्वारा आग्रह के बावजूद  इस पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है इसलिए इसे प्रशासन द्वारा न्याय को विफल करने का प्रयास कहना पड़ रहा  है .
            शालिनी कौशिक
                  [कानूनी ज्ञान ]


[ अभी अभी बार एसोसिएशन कैराना के अध्यक्ष श्री कौशल प्रसाद जी से २.४५ पी.एम्.पर प्राप्त सूचना के अनुसार बार एसोसिएशन  कैराना को २५.०००/-रूपए की ये राशि प्राप्त हो गयी है .चलिए देर से ही सही पर प्रशासन को सुध तो आई है. बधाई हो बार एसोसिएशन कैराना .
                                   शालिनी कौशिक एडवोकेट  

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