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मंगलवार, 28 जनवरी 2014

समलैंग‌िकता पर SC ने खार‌िज की याच‌िका-एक सराहनीय कदम


समलैंग‌िकता पर SC ने खार‌िज की याच‌िका


सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए ११ दिसंबर को भारतीय दंड सहिंता की धारा ३७७ को जायज़ ठहराया और समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध .भारतीय दंड सहिंता की धारा ३७७ जिसमे कहा गया है कि -
''जो कोई किसी पुरुष ,स्त्री या जीव-जंतु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्द्रिय भोग करेगा ,वह आजीवन कारावास से ,या दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी ,दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा .''
इस प्रकार यह एक ऐसा सम्भोग को अपराध घोषित करता है जो कि एक पुरुष दुसरे पुरुष के साथ ,एक स्त्री दूसरी स्त्री के साथ या एक पुरुष या स्त्री किसी पशु या जीव-जंतु के साथ गठित करता है .
और हद है कि जिस निर्णय की सर्वत्र तारीफ होनी चाहिए वह आलोचना का शिकार हो रहा है .
लोक व्यवस्था वह मुख्य प्रतिबन्ध है जिसे बनाये रखने के लिए नागरिकों के मूल अधिकारों में स्वतंत्रता के अधिकारों पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है फिर ऐसे कृत्य को यदि विधायिका द्वारा या जनता के एक वर्ग के समर्थन द्वारा कानूनी जामा पहनाया जाने लगा तो लोक व्यवस्था की तो सोचना ही बेकार है .यह तो साफ तौर पर संविधान के अनुच्छेद २१ में प्राप्त ''प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण ''का मूल अधिकार छीनना है .
प्रकृति पुरुष मनु ने अपने शरीर से ही शतरूपा की उत्पत्ति की और उससे विवाह रचाया उद्देश्य था सृष्टि विस्तार किन्तु यह जो समलैंगिक सम्बन्धों के समर्थन का ढोल पीटा जा रहा है इसका उद्देश्य क्या है एक मात्र यही कि जो समलैंगिक है वे शांतिपूर्वक रहे और जो जैसा मन में आयें करते रहें किसी को कोई आपति नहीं होगी किन्तु यह सम्भव नहीं है और वह भी सामान्य जनता के बीचो बीच और इस तरह के समर्थन द्वारा सामान्य जनता को निरपराध होते हुए भी ऐसी दशा भुगतने के लिए तैयार किया जा रहा है जिससे मात्र व्यभिचार ही फैलेगा . दूरदर्शन पर प्रसारित चर्चा के एक कार्यक्रम में एक फादर का कहना था कि इस तरह के सम्बन्ध में भी दोनों अभियुक्त एक पुरुष बनता है और एक स्त्री ........और ये ही विश्व में एड्स के प्रसार का सबसे बड़ा कारण है .
आम तौर पर लड़के का लड़के के साथ फिरना और लड़की के साथ लड़की का फिरना कोई गलत नज़रों से नहीं देखता और न ही आम तौर पर ऐसा होता है किन्तु इस तरह से इनकी हरकतों को कानूनी सुरक्षा दिया जाना सबके वही हाल करने वाला है जो ''कल हो न हो '' फ़िल्म में अमन और रोहित की हरकतें देख कांता बेन के हो रहे थे क्योंकि आज मीडिया अपने प्रचार के लिए और नेता वोट के हथियार के लिए हमारे समाज को फ़िल्मी बनाने में जुटे हैं .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

दिल्ली वापस केंद्रशासित हो

Delhi Photos Map
संविधान के ६९ वे संशोधन अधिनियम १९९१ द्वारा संविधान में दो नए अनुच्छेद २३९ क क और २३९ क ख जोड़े गए हैं जिनके अधीन दिल्ली को एक नया दर्जा प्रदान किया गया .अनु.२३९ क क कहता है -
''कि संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली को अब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के नाम से जाना जायेगा और अनुच्छेद २३९ के अधीन नियुक्त इसके प्रशासक को अब उपराज्यपाल कहा जायेगा .''
अनुच्छेद २३९ क क राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र के लिए एक विधान सभा सृजित करता है .विधान सभा में सदस्यों की संख्या और इसके कार्यों से सम्बंधित सभी मामलों को संसद विधि द्वारा विनियमित करेगी .
विधान सभा को राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र के सम्पूर्ण अथवा किसी भाग के लिए राज्य सूची अथवा समवर्ती सूची में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी के सम्बन्ध में विधि बनाने की शक्ति होगी किन्तु उसे राज्य सूची की प्रविष्टि १,२,१८ और ६४ ,६५ तथा ६६ के सम्बन्ध में विधि बनाने की शक्ति नहीं होगी .उपखण्ड [१] में का कुछ भी ,संघ राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के मामले के सम्बन्ध में विधि बनाने के लिए संसद की शक्तियों का अल्पीकरण नहीं करेगी .
और राज्य सूची की प्रविष्टि २ -
२-सूची -१ की प्रविष्टि २ [क] के उपबंधों के अधीन रहते हुए पुलिस [जिसके अंतर्गत रेल और ग्राम पुलिस भी हैं ].
और राज्य सूची की इसी प्रविष्टि पर दिल्ली की सरकार के लिए कानून बनाने पर लगाया गया प्रतिबन्ध दिल्ली में पहली बार बनी ''आप'' की सरकार ने विवाद का मुद्दा बना लिया .दिल्ली में पुलिस दिल्ली सरकार के अधीन न होकर संसद के अधीन है और यह मुद्दा इससे पहले दामिनी गैंगरेप कांड के समय २०१२ में भी सामने आया था किन्तु शीला दीक्षित सरकार ने इसे कोई खास तूल न देते हुए सारी जिम्मेदारी स्वयं पर ली किन्तु जैसा कि अरविन्द केजरीवाल कहते हैं कि हम मुद्दों के लिए ही आये हैं तो ये बात वे सिद्ध भी कर रहे हैं और जिस दिन से उन्होंने सरकार बनायीं है किसी भी बात को हल्के में न लेकर चर्चा का विषय बनाया है .सर्वप्रथम तो उन्होंने शपथग्रहण समारोह ही निश्चित सरकारी स्थल से और जगह आयोजित कराया और जिस कारण एक निश्चित क्षेत्र से बढाकर पुलिस को सुरक्षा व्यवस्था का बहुत लम्बे क्षेत्र में आयोजन करना पड़ा और यहाँ तक तो फिर भी खैर थी किन्तु वे आजतक भी स्वयं के लिए कोई सुरक्षा नहीं ले रहे हैं ये कहकर कि मुझे कोई खतरा नहीं जबकि मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठकर उनका सुरक्षा दायरे से बाहर रहना न केवल उनके लिए बल्कि उनसे जुड़ने वाले भारी जनसमूह के लिए भी खतरा है .

दुसरे उनके कानून मंत्री सोमनाथ भारती कहने को तो कानून का पालन कराने के लिए स्वयं आगे बढ़ रहे हैं जबकि वास्तव में वे कानून का केवल मखौल उड़ा रहे हैं .वे दिल्ली पुलिस से बिना वारंट कथित सेक्स रैकैट की रात में गिरफ़्तारी चाहते हैं सर्वप्रथम तो पुलिस द्वारा बगैर वारंट के गिरफ़्तारी कानून ने कुछ निश्चित मामलों में ही सम्भव की हुई है किन्तु यहाँ सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि यहाँ विशेषकर महिलाओं की गिरफ़्तारी होनी थी जिसके बारे में दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ की धारा ४६ में उपधारा [४] जो कि दंड प्रक्रिया संहिता [संशोधन अधिनियम संख्या २५,२००५ द्वारा अन्तः स्थापित किया गया है और जिसे दिनांक २३.६.२००५ को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई ]में कहा गया है -
''असाधारण परिस्थितियों के सिवाय कोई स्त्री सूर्यास्त के पश्चात् और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं की जायेगी और जहाँ ऐसी असाधारण परिस्थितियां विद्यमान हैं वहाँ स्त्री पुलिस अधिकारी लिखित में रिपोर्ट करके ,ऐसे प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुज्ञा अभिप्राप्त करेगी ,जिसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर अपराध किया गया है या गिरफ़्तारी की जानी है .''
और इस प्रक्रिया के अनुसरण की जगह दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती स्वयं पहले पुलिस पर हुकुम चलाते हैं और उनके द्वारा कानून की अवज्ञा से इंकार करने पर स्वयं उस कथित सेक्स रैकैट पर सेंध डालने पहुँच जाते हैं और कानून का मखौल स्वयं उड़ाते हुए महिलाओं से बदसलूकी करते हैं और बाद में मुद्दों के लिए आये केजरीवाल उनके समर्थन में अपनी राजनीतिक गरिमा की धज्जियाँ उड़ाते हुए धरने पर उतारू हो जाते हैं और केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा धरना स्थल के लिए जगह सुझाने पर ,''कौन होता है शिंदे ,मैं मुख्यमंत्री हूँ मैं कहीं भी बैठ सकता हूँ ,कहकर नॉर्थ ब्लॉक पर पहुँच पाने में असफल रहने पर रेल भवन के आगे अपने पूरे मंत्रमंडल व् पूरे तामझाम सहित धरना देने बैठ जाते हैं और गणतंत्र मनाने पर के लिए भी देशविरोधी टिप्पणी करते हैं ये भूलकर कि वे भी इसी गणतंत्र के नागरिक हैं और जिस आम आदमी के नाम पर वे सत्ता में आये हैं और जिसके वे इस वक़्त सबसे बड़े हितेषी के रूप में स्वयं को प्रदर्शित कर रहे हैं उसे उनके इस तरह के कार्यों से प्रत्यक्ष व् अप्रत्यक्ष दोनों ही तरह से असुविधा ही हो रही है .इनकी कार्यप्रणाली इनकी राजनैतिक अनुभवहीनता ही दिखाती है साथ ही साफ़ तौर पर यही दिखाती है कि कॉंग्रेस के समर्थन ने इन्हें सत्ता में आने को और सत्ता सँभालने को विवश कर दिया नहीं तो इनके इरादे अभी जनता को और सपने दिखाने के थे पर अब जब ये दिल्ली के आकाश पर आ गए तो अपने प्रशंसकों में अपना रुतबा बनाये रखने के लिए ऐसी कार्यवाही पर उतारू हैं जिससे तंग आकर केंद्र वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू कर दे और इन्हें स्वयं के साथ अन्याय का रोना रोने का अवसर मिल सके .इनकी भूतपूर्व सहयोगी किरण बेदी भी इनके बारे में यही विचार रखती हैं .वे कहती हैं -
''दिल्ली का राजनीतिक नेतृत्व शासन की जिम्मेदारी से बाहर निकलने की खुजली से छटपटा रहा है .शायद वे दिल्ली पुलिस के साथ इसलिए टकराव मोल ले रहे हैं कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाये .''
ऐसे में खुद को अराजकतावादी कहने वाले केजरीवाल शिंदे के लिए अराजकता पैदा करने की बात कर रहे हैं और साथ ही यह भी कहते हैं कि यदि कोई संवैधानिक संकट पैदा हुआ तो इसके लिए केंद्र ,प्रधानमंत्री व् गृह मंत्री जिम्मेदार होंगे और इस तरह से ''चित भी मेरी पट भी मेरी .....''वाली बात कर देश को ही संकट में डालने पर उतारू हो रहे हैं .वे पुलिस में भी ईमानदार लोगों को धरने में आने के लिए उकसाते हैं और जब बात उनकी ईमानदारी की आती है अर्थात उनके कानून मंत्री पर कार्यवाही की आती है -
[सोमनाथ पर कोई कार्रवाई नहीं करेगी 'आप'
जुबान संभाल कर बोलें सोमनाथ
युगांडा की कुछ महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार के मामले में फंसे दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती को फिलहाल राहत मिल गई है।
आम आदमी पार्टी ने उपराज्यपाल की जांच कमेटी की रिपोर्ट आने तक कानून मंत्री पर किसी तरह की कार्रवाई से इंकार किया।][अमर उजाला से साभार ]
.....तो उसकी जगह वे उनके समर्थन में खड़े हो जाते हैं .
ऐसे में वे दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने व् पुलिस की नकेल खुद के अर्थात दिल्ली सरकार के हाथ में होने की बात करते हैं जबकि जो परिस्थितियां उन्होंने उत्पन्न की हैं उन्हें देखते हुए दिल्ली का राज्य का दर्जा ही समाप्त हो जाना चाहिए क्योंकि दिल्ली भारत की राजधानी है ,यहाँ देश के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान हैं ,पूरे देश की सुरक्षा दिल्ली की सुरक्षा पर निर्भर है और यहाँ पहले भी संसद पर हमले जैसी घटनाएं हो चुकी हैं .ऐसे में भविष्य़ में सतर्कता को लेकर और सम्पूर्ण राष्ट्र की सुरक्षा के मद्दे नज़र दिल्ली को वापस केंद्र शासित प्रदेश का ही दर्जा मिल जाना चाहिए क्योंकि राज्य और केंद्र का टकराव सर्वविदित है किन्तु दिल्ली के सम्बन्ध में आप की कार्यप्रणाली को देखते हुए ऐसे खतरे को मोल नहीं लिया जा सकता .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

रविवार, 12 जनवरी 2014

धारा ३७५ -भारतीय दंड संहिता :एक आलोचनात्मक विश्लेषण


The Indian Penal Code, 1860
CitationAct No. 45 of 1860
Territorial extentWhole of India except the State of Jammu and Kashmir
Enacted byParliament of India
Date enacted6 October 1860
Date assented to6 October 1860
Date commenced6 October 1860
भारतीय दंड संहिता १८६० का अध्याय १६ का उप-अध्याय ''यौन अपराध ''से सम्बंधित है जिसमे धारा ३७५ कहती है-
[I.P.C.]
Central Government Act
Section 375 in The Indian Penal Code, 1860
375. Rape.-- A man is said to commit" rape" who, except in the case hereinafter excepted, has sexual intercourse with a woman under circumstances falling under any of the six following descriptions:-
First.- Against her will.
Secondly.- Without her consent.
Thirdly.- With her consent, when her consent has been obtained by putting her or any person in whom she is interested in fear of death or of hurt.
Fourthly.- With her consent, when the man knows that he is not her husband, and that her consent is given because she believes that he is another man to whom she is or believes herself to be lawfully married.
Fifthly.- With her consent, when, at the time of giving such consent, by reason of unsoundness of mind or intoxication or the administration by him personally or through another of any stupefying or unwholesome substance, she is unable to understand the nature and consequences of that to which she gives consent.
Sixthly.- With or without her consent, when she is under sixteen years of age.
Explanation.- Penetration is sufficient to constitute the sexual intercourse necessary to the offence of rape.
Exception.- Sexual intercourse by a man with his own wife, the wife not being under fifteen years of age, is not rape.
यौन उत्पीड़न एक ऐसा अपराध जिसमे पुरुष हमेशा शोषक व् नारी हमेशा पीड़ित की भूमिका में रहे हैं और इसी कारण कानून ने यहाँ भी इन्हें यही भूमिका दी है किन्तु विज्ञान के नए नए प्रयोग जोड़कर वर्त्तमान में कानून ने नारी की स्थिति को जो मजबूती दी है वह सुरक्षा पुरुष के व्यक्तित्व को नहीं दी या यूँ कहें कि नारी को जो सुरक्षा दी गयी है उसके कारण पुरुष की सुरक्षा आज खतरे में पड़ गयी है और कानून का काम न्याय है सभी के साथ न कि किसी एक के साथ .
नारी की प्राकृतिक दुर्बलता के कारण वह इस अपराध का शिकार बनती रही है किन्तु इसम भी दो राय नहीं कि वह इस धारा को पुरुष के खिलाफ हथियार रूप में इस्तेमाल करती भी आ रही है और इसका अवसर स्वयं कानून उसे दे रहा है इस तरह-
*यौन सम्बन्ध यदि नारी की इच्छा के विरुद्ध हैं तो यौन उत्पीड़न -किन्तु इच्छा है या नहीं इसका कोई निश्चित पैमाना नहीं .
*यौन सम्बन्ध यदि नारी की सहमति के बिना तो यौन उत्पीड़न -किन्तु सम्मति थी या नहीं इसे जानने का कोई तरीका नही .
इन दोनों ही तथ्यों को पुरुषों द्वारा भी नारी के विरुद्ध स्वयं के अपराध से पीछा छुड़ाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता रहा है और इस तरह नारी को अपने इस कृत्य में सहभागी दिखाया जाता रहा है किन्तु इसके साथ साथ आज नारी द्वारा भी पहले पुरुष को इसके भ्रम में डालकर और बाद में इसे हथियार बनाकर उस उत्पीड़न का दोषी बनाया जाता है जो कहीं न कहीं नारी के ही उकसावे का परिणाम था .
आज के समय में जब नारी पुरुष पर अपने फायदे के लिए यौन उत्पीड़न के झूठे इलज़ाम लगा रही है [ये कोई मनगढंत बात नहीं कर रही हूँ मैं बल्कि मैंने स्वयं ऐसी महिलाएं आज देखी हैं जो अपने प्रतिद्वंदी को दबाव में लेने के लिए कानून की इस सुरक्षा का नाजायज फायदा उठा रही हैं और उन्हें सलाखों के पीछे भिजवा रही हैं .]पूर्ण रूप से ब्याह रचाकर घर की समस्त नकदी जेवरात लेकर घर के पुरुषों को बेहोश कर फरार हो रही हैं ,अपने कैरियर को बुलंदी पर पहुँचाने के लिए स्वयं पुरुषों को अपने मोहजाल में फंसा रही हैं और आगे बढ़ रही हैं ऐसे में क्या यौन अपराध की जो स्थिति भारतीय दंड संहिता में रखी गयी है सही मानी जा सकती है ?
आज महिला सशक्तिकरण के नाम पर और हमेशा से पुरुषों के व्यभिचार के नाम पर दनादन सम्मानित शख्सियतों पर इलज़ाम लगाये जा रहे हैं और बगैर सबूत ,बगैर प्रमाणिकता के वे अपने पद त्याग को मजबूर किये जा रहे हैं जबकि अभी ये भी साफ़ नहीं कि उन्होंने वास्तव में ऐसा किया या नहीं या उन्होंने ऐसा किया तो स्वयं किया या किसी उकसावे के परिणाम स्वरुप किया ,क्या ऐसे में भारतीय कानून में यौन अपराध की परिभाषा में परिवर्तन आवश्यक नहीं हो गया है ?
ये सत्य है कि पुरुषों के व्यभिचार का नारी को हमेशा से शिकार होना पड़ा है और इसीलिए कानून की मदद की वे पहली पात्र हैं किन्तु कानून का कार्य न्याय करना है और न्याय तभी होता है जब पीड़ित को इंसाफ मिले और दोषी को दंड .अभी हाल ही में रिटायर्ड जस्टिस गांगुली और जस्टिस स्वतंत्र कुमार पर यौन उत्पीड़न के लॉ इंटर्न द्वारा आरोप लगाये गए हैं और एकतरफा कार्यवाही झेलने के कारण जस्टिस गांगुली को तो अपने पद से इस्तीफा तक देना पड़ा है .यदि बाद में जस्टिस गांगुली दोषी साबित होते हैं तो ये सब सही कहा जायेगा किन्तु यदि वे निरपराध साबित होते हैं तो क्या कानून की इस प्रक्रिया द्वारा उन्हें उनका पद वापिस दिलवाया जा सकेगा और चलिए उन्हें उनका पद मिल भी गया तब भी क्या जो अपमान , मानसिक व् सामाजिक प्रताड़ना उन्हें व् उनके परिवारी जनों को [क्योंकि समाज में पुरुषों का एक वर्ग ऐसा भी है जो पुरुषों के द्वारा किये जा रहे इन गलत व् अभद्र कार्यों का विरोधी है और वह जितना स्वयं सम्मान से जीना जानता है उतना ही नारी जाति का सम्मान करना भी जानता है ] इस सब कार्यवाही से हो रही है उससे मिले घावों की भरपाई कर पायेगा .
इन्हीं सब कारणों से आज इस धारा में पूर्णरूपेण परिवर्तन की अपेक्षा है क्योंकि आज की नारी पहले की तरह मात्र आत्म-सम्मान की महत्वाकांक्षा नहीं रखती वरन आज उसकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ चुकी हैं और वह आज स्वयं को पुरुष से बढ़कर साबित करने की होड़ में कुछ भी कर गुजरने को तैयार है .ऐसे में आज बहुत सी जगह पुरुष को भी उससे वही सुरक्षा चाहिए जो उसे पुरुष से .इसलिए धारा ३७५ द्वारा परिभाषित यौन अपराध की परिभाषा में परिवर्तन होना ही चाहिए .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

बुधवार, 1 जनवरी 2014

प्रधानमंत्री चयन सांसदों का विशेषाधिकार


भारतीय संविधान के अनुच्छेद ७५[१] में कहा गया है -
*अनुच्छेद ७५[१]-प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा .''
यदि इस अनुच्छेद को सर्वमान्य माना जाये तो प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करती है और राष्ट्रपति की स्थिति संविधान के अनुसार यह है -
-अनुच्छेद ५२ कहता है कि भारत का एक राष्ट्रपति होगा .
-अनुच्छेद ५३ [१] कहता है कि संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी और वह उसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा .
-और अनुच्छेद ७४ कहता है कि [१] राष्ट्रपति को उसके कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा और राष्ट्रपति ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा .
परन्तु राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से ऐसी सलाह पर साधारणतया या अन्यथा पुनर्विचार करने की अपेक्षा कर सकेगा और ऐसे पुनर्विचार के पश्चात् दी गयी सलाह के अनुसार कार्य करेगा .
[२] इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जाँच नहीं की जायेगी कि क्या मंत्रियों ने राष्ट्रपति को कोई सलाह दी और दी तो क्या दी .
इस प्रकार संविधान के अनुसार राष्ट्रपति नाममात्र का ही प्रधान है वास्तविक प्रधानता मंत्रिपरिषद में ही निहित है और उसका प्रधान प्रधानमंत्री होता है जो लोक सभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है और जिसका चयन चुनाव पश्चात् ही किया जा सकता है क्योंकि वास्तविक स्थिति चुनाव पश्चात् ही सबके सामने होती है .ऐसे में किसी भी दल को यह अधिकार नहीं है कि वह बताये कि कौन प्रधानमंत्री होगा जैसा कि भारत के एक प्रमुख दल भारतीय जनता पार्टी ने देश के संविधान को नकारते हुए आगे बढ़कर नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है जबकि भारत में प्रधानमंत्री पद के लिए कोई चुनाव होता ही नहीं है वह तो लोक सभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होता है और यदि वह राज्य सभा का सदस्य है तो उसके लिए आवश्यक है कि वह लोक सभा के बहुमत का विश्वास प्राप्त करे .
ऐसे में संवैधानिक व्यवस्था को नकारते हुए अपने इरादों को देश पर थोपने का अधिकार किसी भी दल को नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री कौन होगा यह जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का अधिकार है और उन्हें प्रतिनिधित्व देने वाली जनता का अधिकार है और इसे छीनने की यदि किसी भी दल द्वारा कोशिश की जाती है तो इसे संविधान की अवमानना की श्रेणी में रखा जाना चाहिए क्योंकि संविधान ने भारत को ''सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य ''का दर्जा दिया है जो कि यह तभी है जब जनता अपने प्रतिनिधि चुने और प्रतिनिधि अपना नेता और जो स्थिति भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी को अपना अगुवा बनाकर प्रस्तुत की है ऐसे में न तो यह लोकतंत्र ही रह सकता है और न ही गणतंत्र ,ऐसे में ये मात्र दलतंत्र ही कहा जा सकता है क्योंकि दल अपनी पसंद जनता पर थोप रहे हैं और एक यह दल ऐसे कुत्सित कार्य कर अन्य दलों को भी इस कार्य के लिए उकसाकर सारी संवैधानिक व्यवस्था को डगमगाने की कार्यवाही कर रहा है ऐसे में संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करने में अग्रणी रहने वाली भारतीय जनता पार्टी की मान्यता रद्द होनी चाहिए .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]